उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

व्यवहार में एकात्म मानव दर्शन


pandit_deenadayal_upadyaपं. दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती के अवसर पर एकात्म मानव दर्शन को लेकर अनेक गोष्टियों परिचर्चा ये और प्रकाशन हो रहे हैं। सामन्यतः इन सबमे दर्शन एवं सिद्धांतो की ही चर्चा अधिक होती है। थोडा अधिक चिंतन करने वाले व्यक्तियों ने एकात्म मानव दर्शन पर आधारित नीतियों का कैसे निर्माण किया जाए इस पर सुविचारित मंथन कर कुछ मार्गदर्शन नीतियों का आलेख भी किया है। जैसे एकात्म मानव दर्शन पर आधारित अर्थनीति, शिक्षानीति, राजनीति आदि-आदि। इसके आगे भी और अधिक व्यवहारिक धरातल पर एकात्म मानव दर्शन का प्रयोग किया जा सकता है। वास्तव में एकात्म मानव दर्शन का सही उद्देश्य है। अपने परिवार को, व्यापार को, संस्थान को विद्यालय, महाविद्यालय आदि को कल कारखानों, बैक आदि से लेकर सरकार तक सभी स्तरों पर एकात्म मानव दर्शन का व्यवहारिक प्रयोग संभव है। इस दृष्टि में कुछ बिन्दु नीचे सूची बद्ध करने का प्रयत्न किया है। यह सूची ना तो पूर्ण है, न ही सटीक। परिवर्तन, रूपांतरण एवं सूची में और बिन्दु जोडने की पूर्ण संभवना है।

1. आत्मीयता से एकात्मता (Integrated approach through empathy) – akmहर सामूहिक इकाई फिर चाहे वह परिवार हो या कार्य चमू (Working Team) जैसे विद्यालय के सभी अध्यापक एक एकात्म ईकाई के रूप में कार्य करें यह उद्देश्य प्राप्ति हेतु अनिवार्य है। यह जैविक एकात्मता आत्मीयता से ही संभव है। एकात्म मानव दर्शन में सब अपने ही है कोई दूसरा है ही नही। आत्मीयता का वातावरण बनाने से कार्य स्थल पर भी एकात्म चमूत्व (Team Spirit) प्रकट होता है।

2. उदात्तध्येय (Noble Mission Statement) – प्रत्येक कार्य का अधिष्ठान कियी उदात्त विचार से प्रेरित होने पर ही सभी को उस आदर्श  की ओर बढने की प्रेरना प्राप्त होती है। गुरूकुल रीती सदा चला आई प्राण जाई पर वचन न जाई – यह परिवार का ध्येय वाक्य बना। अतः व्यवहार उससे संचालित हुआ। व्यापारिक संस्थान हो या शि क्षा संस्थान या षासन सबको अपना ध्येय उदात्त विचारों के आधार पर सुस्पष्ट परिभाषीत करना होगा। सामान्यतः व्यापार का उद्देश्य लाभ कमाना माना जाता है किंतु यथार्थ में जिस वस्तु अथवा सेवा का व्यापार किया जा रहा है उसको सर्वोत्तम गुणवत्ता के स्तर पर न किया जाए तो, वह व्यापार स्थायी रूप से लाभकारी नही हो सकता अतः व्यापारिक संस्थान का उदात्त ध्येय अपने विनिमय में सर्वोच्च गुणवत्ता एवं पारदार्शीता हो सकता है। यह उदाहरण के लिए किया गया सामान्यीकरण है। वास्तव में प्रत्येक पेन्शन  को अपनी विशिष्ट चिती के अनुरूप उदात्त ध्येय स्पष्ट रूप से शब्दबद्ध करना चाहिये।

youth3. सहशासन से सुशासन (Participatory Governance) – परिवार हो या संस्था या सरकार सभी को सुव्यवस्थित ढंग से संचालित किया जाना अपेक्षित है। किसी भी सामूहिक ईकाई में स्वभावतः श्रेणी (Hirerarchy) का निर्माण होता है। ऐसे में प्रशासकीय व्यवस्थाओं का निर्माण भी होना स्वाभाविक ही है। किंतु निर्णय प्रक्रिया में सबका सहभाग सुनिश्चित करने से प्रशासन के स्थान पर सुशासन का निर्माण किया जा सकता है। केवल संस्था अथवा सरकार में कार्यरत अधिकारी, कर्मचारी ही नही अपितु लाभार्थी जैसे व्यापारिक संस्थान के ग्राहक, विद्यालय के छात्र और सरकार के मामले मे तो सभी नागरिक इन्हे भी शासन में सहभागिता का अवसर प्रदान करने से सर्वत्र अपनत्व का निर्माण होता है।  इस हेतु हर स्तर पर सुसंवाद की सरल व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिये। वर्तमान युग में अनेक प्रकार के संचार माध्यम इस कार्य में उपलब्ध है।

4. अंत्योदय (सबका विकास) Devlopment of all – जब अंतिम व्यक्ति के विकास की बात की जाती है तो उसका अर्थ केवल वंचित विकास की बात नही है हर स्तर पर पंक्ति के प्रत्येक व्यक्ति को सर्वांगीण विकास की आवश्यकता होती है। अतः अंत्योदय का अर्थ सबको विकास के समुचित अवसर प्रदान करने वाले वातावरण और व्यवस्था का निर्माण करना है। यह जिस प्रकार से अपने सभी बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार पोषण, रक्षण और ताडन (डाँटना) भी करती है। उसी प्रकार का वातावरण संस्थान, समाज और सरकार में भी निर्माण किया जा सकता है। साथ ही सभी घटक भी याने परिवार के उदाहरण में भाई भी ईकाईयों के विकास में सहयोग, प्रेरणा, मार्गदर्शन जहाँ जो आवश्यक हो प्रदान करते रहें।

5. सतत गुणवत्ता विकास (Continuous Excellence) – किbirdsसी भी व्यक्ति समूह या ईकाई में यदि सतत उन्नयन का प्रयत्न न हो तो स्थिरता और जडता आ जाती है। जीवन का क्रम फिसलन भरी फिसल रही पर उपर चढने का प्रयास है रूकने से ही पतन निश्चित है। अतः अपने संस्थान में, चमू में सतत स्वयं को और अधिक गुणवत्तापूर्ण विकसित सृजनशील एवं नवोन्मेषशाली (Innovative) बनाए रखने का भाव निर्माण करना होता है। एकात्म मानव दर्शन पर आधारित गुणवत्ता वृद्धि में बाह्य परीक्षण अथवा प्रतियोगिता का आश्रय नही लिया जाता। अंदर से ही अपने आपको सतत बेहतर बनाने की प्रेरणा जगानी होती है। इस हेतु हर स्तर पर नवनवीन एवं उच्चतर चुनौतीयों की प्रस्तुत करना यह इसका मार्ग है।

6. सर्वांगीण उन्नती (Over all progress) – एकात्म मानव दर्शन मनुष्य को केवल भौतिक रूप मे नही देखता अपितु शरीर, मन, बुद्धि एवं आत्मा इन चारों आयामों का विचार करता है। केवल व्यक्ति के स्तर पर ही नही प्रत्येक सामूहिक ईकाई में भी इन चारों के प्रगटन की बात एकात्म मानव दर्शन में की है। इसे व्यवहार में लाने के लिए उन्नती के पैमाने तय करते समय केवल भौतिक आधार पर मूल्यांकन करने के स्थान पर भावनात्मक वातावरण, चुनौतियों का सामना करने की संकल्प षक्ति एवं आत्मीय एकात्मता का मुल्यांकन भी किया जाए। किसी संस्था में अथवा शासन में जो विभाग है, उस विभाग की चमू का मुल्यांकन करते समय सर्वांगीण विकास पर बल देना प्रारंभ करेंगे तो अपने आप ही सारी बाते व्यवस्थित हो जायेगी।

7. योगदान का भाव (Sense of Contribution) – व्यष्टि और समष्टी संबंध एकात्म मानव दर्शन का एक प्रमुख सिद्धांत है। व्यष्टि अर्थात छोटी ईकाई और समष्टी अर्थात बड़ी इकाई जैसे परिवार समष्टी है तो व्यक्ति व्यष्टि है। किंतु समाज समाज समष्टी है तो परिवार व्यष्टि है। इसी प्रकार किसी भी संस्था में पुरी संस्था यही समष्टी है तो उसमें कार्यरत विभिन्न विभाग व्यष्टि है। उन विभागों में जो छोटी छोटी चमूएं है वो उस विभाग की भी व्यष्टि हुई। हर स्तर पर छोटी इकाई और बड़ी इकाई के मध्य संबंध होना पुरे संस्था के और अंन्ततोगत्वा पुरे राष्ट्र के ध्येय के लिए अत्यंत आवष्यक है। व्यक्ति से लेकर सरकार तक सभी एक ध्येय की ओर अग्रसर हो इस हेतु प्रत्येक स्तर पर हर इकाई में योगदान का भाव Sence of Contribution आना आवश्यक है। जैसे व्यक्ति की उन्नती परिवार में योगदान करने से होगी। किसी संस्था में प्रत्येक कार्यकर्ता का अपनी चमू में योगदान, फिर उस विभाग का पूरे संस्थान में योगदान और राष्ट्र का समुची मानवता के अर्थात राष्ट्रों के परिवार के उन्नयन में योगदान इस प्रकार क्रमशः प्रत्येक व्यष्टि का अपने से अगली समष्टी में योगदान का भाव जागृत रहे तो स्वतः ही पुरे समाज का एकात्म एवं समग्र विकास संभव होता है यही सर्वे भवन्तु सुखिना का आदर्श  है।

8. मौलिकता का प्रोत्साहन Promoting Originality  चिति की संकल्पना इस एकात्म मानव दर्शन की एक विशिष्टता है। प्रत्येक व्यक्ती और प्रत्येक इकाई की अपनी विशिष्ट अनुभूति होती है। इसे उसकी चिति कहते है। इस चिति अनुरूप ही वह इकाई सर्वोत्तम कार्य करती है। नैसर्गिक इकाई में चिति अपने आप प्रकट होती है। मानव निर्मीत कृत्रिम इकाईयों में अर्थात चमू, सरकार के विभाग कोई, व्यापारिक अथवा शिक्षा संस्थान इनमे चिति का निर्माण ध्यानपूर्वक करना होता है। प्रत्येक व्यष्टि अपनी विशिष्ट चिति के अनुरूप ही समष्टी में योगदान देती है। अतः एक दूसरे को परिपूरक विशिष्टताओं का निर्माण करते हुए, उन्हे प्रोत्साहन देते हुए कार्य करने से एकात्म रूप से विकास संभव है। इस हेतु प्रत्येक को मौलिक रूप से कार्य करने का अवसर प्रदान करना होगा। पूर्व के अनुसार नकल करने से त्रुटी होने की संभावना कम होती है। अतः प्रशासन में कई बार नवीनता को और सृजन को हतोत्साहित किया जाता है। कोई पत्र भी लिखना है, तो ‘पुराना देख के लिख दो’ इस प्रकार का भाव होता है। मौलिकता समाप्त होने से यांत्रिकता आ जाती है। अतः चिती के विकास के लिए मौलिकता से पद्धतीयों का (Processes) का निर्माण किया जाना आवश्यक है। उदा. के लिए Indian Coffee House यह भी अपने आप में किसी और रेस्टरों के समान ही एक उपहार गृह है जहाँ भोजन और नास्ते की व्यवस्था है, किंतु उन्होने अपनी मौलिक विशेषता के आधार पर एक पद्धती का निर्माण किया है। पूरे देश में कही पर भी आप ICH में जायेंगे तो वह मौलिकता और विशेषता आपको स्पष्ट दिखाई देगी। उसी प्रकार सरस्वती विद्यामंदीरों में अपने आप एक मौलिक विषेषता की अभिव्यक्ती हम देखते है। ऐसा होते हुए भी किसी विशिष्ट विद्यामंदीरों में वहाँ के प्रधानाचार्य और अन्य आर्चायों की चिति का प्रगठन भी विशिष्टता से दिखाई देता है। अतः समष्टी के रूप में सरस्वती विद्यामंदिरों की चिति होते हुए भी उसके अंतर्गत प्रधानाचायों, विद्यामंदिरों और आचार्य को अपने चिति के अनुसार मौलिक कार्य करने का स्वातंत्र्य और प्रोत्साहन मिलता रहता है।

bharatmata9. विराट राष्ट्र की कार्यशक्ती (Comprehensive National Strength)राष्ट्र यह नैसर्गिक रूप से सबसे बडी व्यष्टि है। मानवता को राष्ट्रों के परिवार के रूप यदि हम देखें तो इस राष्ट्र परिवारों की समष्टी की राष्ट्र यह व्यष्टि है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी चिती के अनुसार इस विश्व परिवार में अपना योगदान देता है। वही उस राष्ट्र की कार्यशक्ती है। एकात्म मानव दर्शन के प्रेरणा स्त्रोत दैशिक शास्त्र में इसे ‘विराट’ कहा है। राष्ट्र की समस्त इकाईया केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, उसके विभिन्न विभाग यहाँ तक की निजि संस्थान फिर व शिक्षा के हो, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय हो व्यापारिक संस्थान हो, उद्योग हो, क्रीडा क्षेत्र के विभिन्न संघ हो, कला के क्षेत्र में काम करने वाले कलाकारों से लेकर विभिन्न उत्पादक संस्थाये हो, प्रोडक्षन हाऊस हो। ये सभी मिलकर राष्ट्र की विराट कार्यशक्ती निर्माण करते है, आधुनिक भाषा में इसे Comprehensive National Strength इसमें Soft Power और Hard Power मृदुशक्ती और स्थूलशक्ती दोनो का योगदान है। कला, संस्कृती, परंपराएँ यह सब मृदुशक्ती का अंग है। सैन्यशक्ती, उद्योग, आर्थिक, सामथ्र्य ये सारे स्थूलशक्ती है। (हार्ड पावर) में आते है। प्रत्येक संस्थान अपने-अपने क्षमता अद्वितीयता और कार्य के अनुसार इस विराट को योगदान देता है, सिचिंत करता है। जैसे शरीर के भिन्न-भिन्न अंग शरीर की शक्ति का हिस्सा होते है। उसी प्रकार राष्ट्र में चलने वाली प्रत्येक गतिविधी अंततोगत्वा उस राष्ट्र की शक्ती अथवा कमजोरी (दुर्बलता) का कारण बनती है। यदि इसका भान प्रत्येक इकाई को हो तो राष्ट्र हित में राष्ट्रीय ध्येय की पूर्ती में योगदान करते हुए प्रत्येक व्यक्ती और संस्थान का स्वयं का भी पूर्ण विकास संभव होता है।

जनवरी 25, 2017 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , | टिप्पणी करे

Bharatiya Way to Celebrate the New Year


“Dosto countdown begins on 31st…Kesi he tayyari..!!”  This was the heading of this photo on the Face book wall of a teenager. I was stunned by this. One may feel that it is old-fa…

स्रोत: Bharatiya Way to Celebrate the New Year

जनवरी 1, 2017 Posted by | Uncategorized | 1 टिप्पणी

या देवी सर्व भूतेषु दायित्व रूपेण संस्थिता . . .


आज सप्तमी है ! उस अवसर पर लिखा पुराना लेख आज पुनः दल रहा हूँ | बदले सन्दर्भों में भी पूर्ण सार्थक

उत्तरापथ

दायित्व:
देवी भागवत में शुम्भ-निशुम्भ की कथा आती है। ये दोनों मधु-कैटभ के ही वंशज है। उनके वध का प्रतिशोध लेना चाहते है। अपना सशक्त साम्राज्य बना लिया है। ब्रह्माजी से तपस्या कर  वरदान पा लिया कि कोई नर चाहे मानव हो या पशु के हाथों मृत्यु नहीं होगी। उनको दम्भ है कि कोई मादा, नारी से क्या ड़र। वे माता की शक्ति से अपरिचित है क्योंकि स्त्री को मादा के रूप में ही देखते है। यह असुर विचार का एक लक्षण है। नारी को मादा के रूप में भोग का साधन समझना। भारतीय संस्कृति में हर बाला को माँ के रूप में ही देखा जाता है। आज सप्तमी है। कुमारी पूजा का दिन है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं कुमारी के अन्दर दिव्यता के दर्शन कर कुमारी पूजा करते थे। कश्मिर में क्षीरभवानि में आसपास जब कोई हिन्दू बालिका नहीं थी तो नाववाले मुसलमान की बेटी की स्वामीजी ने कुमारी पूजा…

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अक्टूबर 8, 2016 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

कार्यकर्ता : कृपा कात्यायनी की . . .


2011 में मा परमेश्वरन जी के सान्निध्य में नवरात्री के हर दिन एक आलेख लिखा था | ये है षष्ठी का आलेख

उत्तरापथ

कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ौसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते है पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य सम्पन्न होते है। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। अपने तक रहो, दुसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी मातायें कहाँ चली गई?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि…

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अक्टूबर 6, 2016 Posted by | Uncategorized | टिप्पणी करे

International Conference on “Research For Resurgence” Resolves to revamp research in Academics’


स्रोत: International Conference on “Research For Resurgence” Resolves to revamp research in Academics’

Over 700 scholars from Bharat and abroad deliberated how to sublimate research for national regeneration making it socially relevant, environmentally eco-friendly and technically and economically sustainable

Days before Prime Minister Narendra Modi at the Benaras Hindu University (BHU) opened his heart about the necessity of original innovations and ideas and not just the research of ‘cut and paste’ nature to obtain only degree for jobs, scholars from different streams of science, humanities and literature, planners, decision-makers, policy and framers gathered in Nagpur to deliberate on this very theme and its application for bettering the human life. The three-day conference, Research for Resurgence, organised by Bharatiya Shikshan Mandal (BSM) at VNIT Nagpur resolved ‘to take the benefits of research to the last man standing in the row. A total of 728 scholars from Bharat and 9 other countries participated in the conference. 68 Universities from 15 States including 17 central institutes were represented. 24 Industrial houses and organizations including TATASONS, CEAT, RPG, MIDC, MADC, FICII, CII also participated. The conference was graced by the attendance of 55 Vice chancellors and heads of National Educational bodies such as NAAC, AICTE, NCTE etc. The main objective was to explore and imbibe the ‘Bharatiya perspective’ towards life when the whole world is still revolving round the ideas like ‘holistic and sustainable’ development.

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Inaugurating the conference, Union HRD Minister Smriti Irani rightly criticised those who always denounce the Bharatiya research. “We must celebrate Bharatiya contribution to science and mathematics” she said appealing to the audience to consider contributions not only from the Silicon Valley but also from Damodar Valley to the field of science and technology.

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Noted educationist Prof Aniruddh Deshpande said the research was very important component of education. Quest for excellence and inquisitiveness has been the academic tradition of Bharat but it seems to have disappeared due to overdose of materialism today. Stating that Bharatiya talent is still alive, we need to promote research that is good for the society. He appealed to the scholars to do research for social uplift and for this they should be ready to break the slavery of the formal system, he added. The resurgence in the research is needed to explore the ultimate goal of human life, he said adding that we must adapt and adopt the changes in technology and science for the betterment of human life.

Maharashtra Chief Minister Devendra Fadanvis said his government would set up a Model Laboratory at least in each district so that the students get an opportunity to dwell into various aspects of research since their school days. This model lab will be on the lines of the one made by Indian Institute of Technology (IIT) Mumbai, he said adding that he wanted to make Maharashtra a innovation State and extend full support to the research activities for human wellbeing.

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The participants were divided into four groups for discussion viz. ‘Udyam’, ‘Sthapati’, ‘Manas’ and ‘Naipunya’. The first group ‘Udyam’ was comprised of those from industry and academia including 30 CEOs and equal number of Vice-Chancellors. They discussed the ways to draw a roadmap for industry-academia interface. Rajiv Modi, CMD of Cadila Pharmaceuticals, R Gopalkrishnan, former director of Tata Sons, SP Bansal VC of Maharaja Agrasen University and Yogesh Singh VC of Delhi Technological University were the panelists.  Rajya Sabha MP Ajay Sancheti, inaugurated the symposium. Shalini Sharma from CII was the moderator for the session.

The second group was of architects called ‘Sthapati’ which witnessed presentations from some of the best participating architects, Nimish Patel from Ahmedabad, Chitra Vishwanathan from Bangaluru, Anil Laul from Delhi being prominent amongst them. ‘Manas’ group devoted their time and energy to discuss issues related to psychology. Anand Paranjape from Canada was the chief orator amongst the psychologists who had gathered for in-depth thinking.

‘Naipunya’ was the fourth group that included young researchers. This group was more interested in honing and sharpening the skills of the upcoming researchers. Shri Narendra Karmakar who worked with NASA for supercomputer design also spoke.

Union Environment Minister Prakash Javdekar stressed on using research to know the secrets of nature but lamented “our education system is killing the research instinct” among the students. Noted water expert Madhav Chitale called for comprehensive research that would include Water, Environment, Habitation, Agriculture and Biodiversity (WEHAB). AICTE Chairman Anil Sahasrabuddhe dwelt on developing analytical mind for fundamental and applied research.

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Noted economist S Gurumurthy said prejudiced mindset of the intellectuals about Bharat and everything that is Bharateeya proved fatal for innovations. “Our students have immense potential, however, many educational institutions do not have enough means for research. That’s why the country lags on research and innovation,” said noted space scientist and former Chief of ISRO Madhavan Nair. Head of Physics Department at BARC Dr BN Jagtap stressed to remove the ‘disconnect’ between science and society.

IMG_2167 (1)Union Surface Transport Minister Nitin Gadkari stressed the need to have all-encompassing vision in research to make it more useful for the people and solving their problems. Niti Aayog Member Dr VK Saraswat said the country needs nano, bio researches that would contribute to all round development of the country. VNIT Chairman Vishram Jamdar, Dr Arvind Joshi, Dr Vaman Gogate, Vinayak Kanitkar, Mukul Kanitkar, Principal GN Hadap, Prof BK Kuthiala, and other scholars were also present on the occasion. There was a ‘brainstorming’ session on the framework for research emerged out of the deliberations in the conference. With minor modifications it was decided to set up a Research for Resurgence foundation at Nagpur. The conference was co-sponsored by National Environmental Engineering Research Institute (NEERI), Visveswaraya National Institute of Technology (VNIT), Rashtrasant Tukdoji Maharaj Nagpur University (RTMNU), Dr Panjabrao Deshmukh Krishi Vidyapeeth (PDKV), Kavikulguru Kalidas Sanskrit University (KKSU), Sant Gadgebaba Amravati University (SGBAU) and Gondwana Univeristy, Gadchiroli (GUG).

अप्रैल 27, 2016 Posted by | English Posts | , , , , | 8 टिप्पणियाँ

धर्मानुसारी शिक्षा की स्थापना में शिक्षकों की भूमिका


Ruprekhaमानव की पहचान संबंधों से है | बिना संबंधों के मनुष्य का कोई परिचय ही नहीं है | समस्त सृष्टि के अन्तर्निहित एकत्व का सुप्त ज्ञान मानव मन को अनंत विस्तार हेतु प्रेरित करता है | प्रकटतः भले ही हम स्वयं को सबसे अलग मानते है फिर भी अंतर्मन में इस बात का भान सदैव रहता है कि हम उस एक ईश्वरीय चेतना के अंग है | इस अनुभूति के कारण ही मनुष्य सदैव अपनी चेतना का विस्तार करने का प्रयत्न करता है | इसीलिए मानव को सामाजिक प्राणी भी कहते है | यह सामाजिकता मनुष्यता का महत्वपूर्ण अंग है किंतु सृष्टि के सम्बन्ध केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं है | इसके तंतु सर्वव्यापी है | मानव का मानव से, मानव का समाज से, मानव का अन्य प्राणियों से, सृष्टि से, समूचे ब्रम्हांड से तथा अंततोगत्वा परमात्मा से जो सम्बन्ध है, उन संबंधों के निर्वहन को धर्म कहते है | इस पूरे अस्तित्व को जिन अन्तर्निहित नियमों द्वारा धारण किया गया है उसी को धर्म कहते है | यही धर्म व्यवहार में भी अपेक्षित है | धर्मानुसारी शिक्षा का अर्थ है प्रत्येक को इस धर्म की अनुभूती कराना तथा उसपर आधारित व्यवहार का प्रशिक्षण प्रदान करना |

वर्तमान समय में धर्मसंकल्पना का अर्थ स्पष्ट न होने के कारण पूरी शिक्षा ही धर्मविहीन हो गयी है| उपासना के रूप में धर्म का सीमित अर्थ प्रचलित होने के कारण उसे भेद का मूल मान लिया | परिणामतः धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के समग्र रूप को ही व्यवहार से बाहर कर दिया | धर्मानुसारी शिक्षा तो क्या, शिक्षा में धर्म के अंतर्भाव की भी कल्पना वर्तमान वातावरण में नहीं कर सकते | ऐसी स्थिति में से धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श तक पहुँचने हेतु जिन महत्प्रयासों की आवश्यकता है उनमें शिक्षकों की भूमिका सर्वोपरि है | शिक्षक ही शिक्षा की धुरी है | चाहे जैसी भी व्यवस्था हो, शिक्षक के बिना शिक्षा की कल्पना ही नहीं कर सकते | व्यवस्था चाहे जितने भी निर्बंध लगा ले, कक्षाकक्ष में पढ़ाते समय विधि एवं व्यवहार की स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता | शिक्षक यदि अपने इस स्वातंत्र्य का समुचित उपयोग करे तो शिक्षा व्यवस्था के पुनरुत्थान में चमत्कार संभव है | वैसे भी धर्म आचरण से ही संभव है और आचरण का प्रशिक्षण किसी पाठ्यक्रम की अपेक्षा व्यावहारिकता से अधिक दिया जा सकता है | अतः यदि शिक्षक अपनी भूमिका का धर्म के अनुसार निर्वहन करने लगे तो वर्तमान व्यवस्था में भी धर्मानुसारी शिक्षा प्रदान करना संभव है | २ से ३ प्रतिशत शिक्षकों के दृष्टिकोण में सम्यक परिवर्तन आ जाये तो व्यवस्था परिवर्तन भी प्रारंभ हो जायेगा | व्यवस्था परिवर्तन के २ मार्ग है | क्रान्ति के मार्ग से व्यवस्था को एक झटके में बदला जाता है | किंतु इस पद्धति में परिवर्तन का आधार राजतंत्र होता है जोकि अपनेआप में धर्मानुसारी शिक्षा के सिद्धांतों के विपरीत है | क्रान्ति में परिवर्तन ऊपर से नीचे की ओर होता है | परिवर्तन का दूसरा मार्ग सहज, स्वाभाविक, क्रमशः होनेवाला परिवर्तन है | परिवर्तन संसार का स्थायी स्वभाव है | संसरति इति संसारः | अतः समाज में स्वतः होनेवाले परिवर्तनों के साथ शिक्षा में भी क्रमशः परिवर्तन होता है | इसे उत्क्रांति मार्ग कहते है | वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अनियंत्रित परिवर्तन पतन की ओर ही जाता है | भौतिक शास्त्र में इसे Entropy (परिक्षय) का सिद्धांत कहते है | क्रांति में प्रस्थापित व्यवस्था का ध्वंस निहित है | १८३५ में मैकोले ने यही किया था | सकारात्मक शिक्षा की प्रस्थापना हेतु क्रांतिकारी परिवर्तन कितना भी आकर्षक लगे, अत्यंत कठिन है | एक तो ऐसे परिवर्तन हेतु आवश्यक सम्पूर्ण सैद्धांतिक स्पष्टता तथा उसे व्यवहार में उतारनेवाले प्रशिक्षित आचार्य एक साथ एक समय इतनी बड़ी संख्या में तैयार करना तथा इस व्यवस्था को स्थापित करने हेतु अनुकूल राजतंत्र का उपलब्ध होना, दोनों ही बातें दुष्प्राप्य है | यदि महत्प्रयास से धर्मसत्ता आदर्श आचार्यों को तथा राजसत्ता राजनैतिक इच्छाशक्ति को प्राप्त भी कर ले तब भी अचानक व्यवस्था परिवर्तन समाज में सांस्कृतिक क्षोभ (cultural shock) उत्पन्न करेगा | दूरस्थ वनवासी क्षेत्रों में अचानक आधुनिक शिक्षा को प्रस्थापित करने से ऐसा विक्षोभ देखने में आता है | ऐसे सामूहिक विक्षोभ की स्थिति में अधिकतर समय समाज अच्छी बातों को भी नकार देता है |

उत्क्रांति का पथ सहज, स्वाभाविक व नैसर्गिक है | किंतु फिर भी उसमें विकास के स्थान पर पतन की ही अधिक संभावना है | प्रयत्नपूर्वक धर्मानुसारी शिक्षा की chanakyaस्थापना हेतु आवश्यक परिवर्तन करना यह मार्ग ना तो अचानक झटके से की हुई क्रान्ति हो सकता है और ना ही अत्यंत धीमी गति से होनेवाली उत्क्रांति | जिस मार्ग का अवलंबन धर्मसंस्थापना के लिए किया जाना अपेक्षित है उसे सम्यक क्रान्ति कहा जा सकता है | संस्कृत में इसे यदि एक शब्द में कहना हो तो कहेंगे ‘संक्रांति’ | संक्रांति में परिवर्तन क्रमशः व नैसर्गिक है किंतु परिवर्तन की गति व दिशा सुनियोजित होगी | क्रमशः उत्थान करते हुए अंतिम आदर्श को प्राप्त किया जायेगा | यही भारतीय पद्धति है | संक्रांति में क्रान्ति की तरह विस्फोट नहीं है और ना ही उत्क्रांति की तरह पतन | जो-जो जिस-जिस स्तर पर है वही से क्रमशः उत्थान की ओर अग्रसर हो यही संक्रांति का मार्ग है | धर्मसंस्थापना की यही शाश्वत विधि है |

शिक्षा में संक्रांति की आधारशिला शिक्षक ही होंगे | संक्रांति में चूंकि परिवर्तन बाहर से थोपा नहीं जाता अपितु अन्दर से ही किया जाता है | अतः यह हमेशा मानव-केन्द्रित होगा, व्यवस्थानुगत नहीं हो सकता | शिक्षक धर्मानुसारी शिक्षा की संकल्पना को अर्थात धर्म की सुस्पष्ट संकल्पना को हृदयंगम करे | इसीसे शिक्षा में संक्रान्ति प्रारम्भ होगी | इस धर्म को अपने व्यक्तिगत जीवन में आचरण से प्रारम्भ करना होगा | धीरे-धीरे अध्ययन, अध्यापन व शिष्यों के साथ व्यवहार में धर्म का प्रभाव प्रारम्भ होगा | शिक्षक के कक्षा में धर्माचरण प्रारम्भ करने से सकारात्मक परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे | किसी भी शैक्षिक संस्थान में यदि १० प्रतिशत शिक्षक धर्माचरण करनेवाले हो जाये तो प्रयत्नपूर्वक उस शिक्षा संस्थान को धर्मानुसारी शिक्षा के आदर्श के रूप में प्रस्थापित किया जा सकता है | जब इन शिक्षा संस्थानों से समाज के सभी क्षेत्रों में सर्वोत्तम व्यक्तित्व प्रदान किये जायेंगे तब सारा समाज इन शिक्षा संस्थानों का अनुसरण करने लगेगा | परिवर्तन का धर्मानुसारी मार्ग यही है |

संक्रांति का प्रारम्भ शिक्षकों के सुगठन हेतु आयोजन करने से होगा | आचार्य निर्माण की यह प्रक्रिया बाहरी प्रशिक्षण से नहीं अपितु अंदरूनी स्वाध्याय से ही संभव है | धर्मसंस्थापना की प्रेरणा से उद्दीपित आचार्य एकत्रित आकर धर्म को समझने हेतु अध्ययन, विमर्श, मनन, चिंतन करेंगे तब उसे स्वाध्याय कहा जायेगा | इस स्वाध्याय का मूल आधार तो शास्त्र ग्रन्थ ही हो सकते है | किंतु साथ ही शास्त्रीय सिद्धांतों की युगानुकुल अभिव्यक्ति को भी स्वाध्याय का आधार बनाना होगा | धर्म के तत्व को हृदयंगम करना स्वाध्याय का प्रथम चरण है | इसका अगला चरण धर्मावलंबन के व्यावहारिक आयामों का सृजन है | कुछ दो, चार, दस या पचास लोग भी कुछ विधियों की सूचि बनाकर सारे अध्यापकों को दे देंगे तो काम नहीं चलेगा | धर्मावलंबन की विधियों का सृजन प्रत्येक को अपनी प्रतिभा का समुचित उपयोग करते हुए करना होगा | यह सृजन प्रक्रिया प्रत्येक के लिए स्वतंत्र होते हुए भी व्यक्तिगत नहीं हो सकती | धर्म का मर्म सामूहिक क्रिया में है | अतः स्वाध्याय भी सामूहिक ही करना पड़ेगा | चिंतन मनन द्वारा समझे हुए तत्व को व्यवहार में उतारने का नाम है निदिध्यासन | इसी से स्वाध्याय परिपूर्ण होगा | स्वाध्यायी आचार्यों के नियमित मंडल सर्वत्र प्रारम्भ करने होंगे | प्रयत्नपूर्वक पूरे समाज में इस योजना को क्रियान्वित करना होगा |

स्वाध्याय से प्राप्त विधियों को अपने-अपने अध्यापन में प्रयोग कर परिष्कृत किया जायेगा | ऐसे कुछ शिक्षक साथ मिलकर या तो पूर्व से चल रहे शिक्षा संस्थान को आदर्श बनायेंगे अथवा नूतन पूर्णतः धर्मानुसारी शिक्षा संस्थानों का निर्माण करेंगे | इनके प्रभाव से नीतियों में भी परिवर्तन होगा | प्रारम्भ में केवल इतना भी हो जाये कि राजसत्ता ऐसे पूर्णतः निःस्वार्थ भाव से चलनेवाले गैर-वाणिज्यिक धार्मिक शिक्षा संस्थानों को स्वतंत्रता से कार्य करने दे, किसी भी प्रकार का नीतिगत हस्तक्षेप ना करने दे तो भी पर्याप्त है | ऐसे समाजपोषित शिक्षा संस्थान क्रमशः प्रमुखता प्राप्त करते जायेंगे व शासनमुक्त शिक्षा व्यवस्था का विकास करेंगे |

Saraswati-Statue-to-Washingtonइस पूरी प्रक्रिया में शैक्षिक संगठनों की भी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है | इस हेतु शैक्षिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का मानस धर्मसंकल्पना के प्रति दृढ़ करना होगा | वर्तमान में देश में भारतीय दृष्टी को ध्यान में रखकर काम करनेवाले तीन प्रकार के शैक्षिक संगठन कार्यरत हैं | कुछ संगठन शिक्षा संस्थानों का संचालन करते हैं | निःस्वार्थ सेवा भाव से राष्ट्रनिर्माण हेतु चरित्र निर्माण करनेवाली संस्कारवान शिक्षा प्रदान करनेवाले कई शैक्षिक संगठन हैं | संख्या की दृष्टी से विद्याभारती इनमें अग्रणी है | रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन, भारत सेवक समाज, सर्वोदयी विचारधारा से चलनेवाले संगठन आदि अनेक संगठन इस श्रेणी में आते हैं | यद्यपि इन शिक्षा संगठनों द्वारा चलाये जानेवाले शिक्षा संस्थान आधुनिक व्यवस्था का अंग होने के कारण पूर्णतः भारतीय नहीं है | फिर भी इन संगठनों का संचालन करनेवाले कार्यकर्ताओं की मंशा धर्माधिष्ठित भारतीय पद्धति को स्थापित करने के लिए अनुकूल है | धर्मदृष्टि को समझने से इन शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों द्वारा संक्रांति होना तुलनात्मक रूप से अधिक सुकर होगा |

दूसरे प्रकार के संगठन शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न घटकों के हितों की रक्षा हेतु काम करते हैं | विद्यार्थियों के हितों के लिए विद्यार्थी संगठन जैसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षकों के हितों के लिए विभिन्न राज्यों में गठित शिक्षक संघ तथा कई राज्यों में निजी संस्थाचालकों के संगठन भी हैं | इस प्रकार के शैक्षिक संगठन प्रमुखतः अपने सदस्यों के अधिकारों, आर्थिक हितों तथा समस्याओं के समाधान हेतु आन्दोलन शासन से चर्चा अथवा न्यायालयीन दावों के माध्यम से कार्य करते हैं | इन संगठनों का मूल स्वभाव सदस्यों की स्वार्थपूर्ति होने के कारण इनमें जुडनेवालों के मन में भी निजी हितों की वरीयता अधिक होती हैं | इसका सकारात्मक परिणाम यह है कि इन संगठनों की सदस्य संख्या बहुत अधिक होती है | यह संख्याबल इनकी प्राथमिक शक्ति है | धर्मानुसारी शिक्षा के तत्वों का प्रचार कर अनुकूल वातावरण निर्मिती में ये संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं | इनके माध्यम से शिक्षा में जुड़े हुए एक बड़े वर्ग तक वैचारिक सन्देश पहुंचाना संभव हो सकता है | यद्यपि इसका सैद्धांतिक गुणांकन नहीं होगा फिर भी धर्माचरण में रत शिक्षकों को नैतिक समर्थन देनेवाले अनुकूल मन के समर्थकों का वर्ग तैयार किया जा सकता है | ये लोग स्वाध्याय और संक्रांति के क्रियान्वयन में पूरी तरह से सहभागी भले ही न हो उसके लिए पोषक उर्वराभूमि का निर्माण निश्चित रूप से कर सकते हैं | संक्रांति के द्वितीय चरण धर्माधिष्ठित शिक्षा के सर्वव्यापीकरण में लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संख्या का भी बड़ा महत्त्व है | इस चरण में इन शैक्षिक संगठनों की भूमिका सबसे प्रभावी होगी | इन संगठनों में धर्मानुसारी शिक्षा के विचार का बीजारोपण करने हेतु कुछ वैचारिक कार्यक्रमों की योजना करना आवश्यक होगा | ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को धर्मसंकल्पना का परिचय दिया जा सकेगा | संख्या बड़ी होने के कारण पूर्ण वैचारिक स्पष्टता की अपेक्षा तो नहीं कर सकते, केवल अधिकारों के साथ कर्तव्यों का विचार करने का संस्कार भी प्रेरित किया जा सके तो प्रारंभ के लिए पर्याप्त होगा | अधिकारों के लिए लड़ने के साथ ही कर्तव्यपालन में ही हमारा अधिक स्थायी हित है यह बात समझना धर्मविचार का शुभारम्भ है |

तीसरे प्रकार के शैक्षिक संगठन वैचारिक कार्य करनेवाले संगठन हैं | इनका मूल काम ही शिक्षा के भारतीय प्रतिमान पर अनुसंधान कर उसे युगानुकूल रूप में प्रस्थापित करने का नियोजन करना है | पुनरुत्थान विद्यापीठ, भारतीय शिक्षण मंडल, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास आदि संगठन इस श्रेणी में आते हैं | धर्माधिष्ठित शिक्षा को ही विभिन्न नामाभिधानों से प्रकट करते हुए उसकी संस्थापना हेतु ये वैचारिक संगठन कार्य कर रहे हैं | शिक्षा व्यवस्था में धर्मसंस्थापना हेतु संक्रांति करने में इन संगठनों की योजक भूमिका अपेक्षित है | संक्रांति के लिए आवश्यक विभिन्न घटकों को एक सूत्र में गूंथने का परोक्ष कार्य इन संगठनों को करना होगा | संक्रांति के तात्विक अधिष्ठान की सुस्पष्टता की जिम्मेवारी भी इन्ही संगठनों की बनती है | अनादि काल से भारत में जीवंत धर्मसंकल्पना को मूल रूप में समझकर उसका युगानुकुल स्पष्टिकरण समाज में प्रदान करना धर्मानुसारी शिक्षा के लिए प्रथम आवश्यकता है | धर्म तो साक्षात्कार का विषय है | अतः इन संगठनों के कार्यकर्ताओं को साधक बनना होगा | उपरी प्रवचन, उद्घोषणाएं, प्रस्ताव आदि तो संगठनात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप चलते रहेंगे किंतु इन संगठनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि गहन गंभीर साधना को तत्पर कितने कार्यकर्ताओं का निर्माण इन संगठनों की प्रेरणा से हुआ | संक्रांति के अन्य सभी चरणों की शुद्धि, पावित्र्य, प्रभाव, साफल्य तथा सार्थकता इस साधना पर निर्भर करती है | अतः इन संगठनों से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं का शास्त्राध्ययन तथा स्वाध्याय कठोर नियमितता के साथ होना अपेक्षित है | समय-समय पर सामूहिक विमर्श, प्रत्यक्ष प्रयोग, उन प्रयोगों से प्राप्त अनुभवों पर पुनः सर्वांगीण संविमर्श तथा आपसी समन्वय यह इस साधना की कार्यपद्धति बनती है | इस चर्चा स्वाध्याय के साथ ही इन विचारों का युगानुकुल शब्दावलि में संहिता लेखन भी अनिवार्य है | तैतरीय उपनिषद् के शिक्षावल्ली अनुवाक् में गुरु अपने दीक्षांत आदेश में स्पष्ट निर्देश दे रहा है – स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां मा प्रमदितव्यं – स्वाध्याय और प्रवचन में कभी आलस न करना | यहाँ वर्तमान युग के अनुरूप प्रवचन के अर्थ को विस्तारित करके समझना होगा | वैसे भी प्रवचन का अर्थ है पूर्ण गंभीरता से प्रकट करना – प्रकर्षेण वाच्यति इति प्रवचनं | वर्तमान स्थिति में वैखरी वाणी का अक्षररूप अर्थात लिखित साहित्य अधिक प्रामाणिक माना जाता है | अतः प्रवचन के अर्थ में गंभीर लेखन को सम्मिलित करना पड़ेगा | वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को प्रयत्नपूर्वक नित्यलेखन का अभ्यास करना होगा | प्रतिदिन नियमपूर्वक कुछ पृष्ठ लिखने की आदत बन जाये तो शनैः शनैः लेखनी में स्पष्टता व लेखन में गांभीर्य आ जायेगा |

धर्म के सुस्पष्ट साक्षात्कार के साथ ही वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं का यह भी दायित्व बनता है कि उसका युगानुकुल प्रयोग करे | अतः शिक्षकों व पहले दो प्रकार के संगठनों के साथ मिलकर शिक्षा में धर्मप्राण नवोन्मेष करने का शुभ व्रत भी इन संगठनों का है | ऐसे प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों को संहिताबद्ध कर अनेक स्थानों पर दोहराने योग्य प्रतिमान का निर्माण करना होगा | यह प्रतिमान सभी स्तरों पर स्वाध्याय, प्रयोग व धर्माचरण का आधार बनेगा | इसी प्रतिमान से धर्मानुसारी शिक्षा को स्थापित करने, धर्मप्राण, स्वाध्यायी आचार्यों की संक्रांति संभव होगी |

अप्रैल 4, 2016 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

बहुआयामी धर्म की एकात्म संकल्पना


BG2किसी भी राष्ट्र में सामाजिक, राजनैतिक समस्याओके मूल में वैचारिक अस्पष्टता की बहुत बडी भूमिका रहती है। भारत में ब्रिटिष राज के अवषेष आज भी वैचारिक विभ्रम के रूप में बने हुए है। सदियों से ऐतिहासिक सांस्कृतिक अनुभूति के आधार पर जिन संकल्पनाओं का विकास हुआ उनकी अवधारणाओं एंव मर्म को अनुवाद की अपर्याप्तता के कारण भ्रमित कर दिया गया है। समाज एवं लोक जीवन में प्रचंड विविधता के बाद भी अनेक संकल्पनायें देश के सभी भाग में समान रूप से समझी जाती है। आपको उस प्रांत की प्रादेशिक भाषा का ज्ञान हो न हो अनेक आध्यात्मिक गूढ संकल्पनाओं को भी आप सहजता से समझ सकते है। कैलास से लेकर कन्याकुमारी व द्वारका से लेकर परषुराम कुंड तक कही पर भी आप जाइए-माया, लीला, श्रद्धा आदि अत्यंत गंभीर आध्यात्मिक संकल्पनाओं को सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी सहजता से समझता है। अतिविषिष्ट भाषाई विविधता के होते हुए भी इन संकल्पनाओं का एक समान अर्थ पूरे देश में प्रचलित है। लीला को समझाने के लिए महर्षि वेदव्यास को भागवत महापुराण की रचना करनी पडी, जयदेव को गीत गोविंद लिखना पडा और तुलसी को मानस। संभवतः इन्ही सबके सदियो तक किए हुए अनुष्ठान का ही परिणाम है कि आज हमारा पूरा समाज इन गूढ मान्यताओं को सामान्य बोलचाल की भाषा मे अचूक प्रयोग करता है । ऐसे अनेक पद ऐतिहासिक अनुभूतियों से विकसित होते हैं । वे केवल इस भाषा के शब्द नही होते अपितु एक जीवंत व्यावहारिक संकल्पना होते हैं । इन शब्दों का न तो किसी भाषा मे अनुवाद किया जा सकता है और न ही ऐसा प्रयास करने की कोई आवश्यकता है । जैसे लड्डू को विश्व की सभी भाषाओं मे लड्डू ही कहना चाहिए और पिझ्झा को पिझ्झा ही । वैसे ही इन संकल्पनाओं को अनुवाद के बिना जस का तस व्यक्त किया जाना वैचारिक प्रामाणिकता के लिए अनिवार्य है । ब्रिटिश राज के काल में विद्वानो द्वारा इस महत्वपूर्ण तथ्य की अनदेखी की गई । जिस कारण संकल्पनाओं का विकृत, संकुचित और सीमित अर्थ समाज मे प्रचलित हुआ । जिसके फलस्वरूप सामूहिक संभ्रम की स्थिति देश की मेधा में छा गई । राज प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा इन भ्रमित संकल्पनाओं पर आधारित नीतियों पर आधारित कार्य्रक्रमों का चलन हुआ । देश में व्याप्त मानसिक गुलामी का यह सबसे बडा कारण हैं । जिस एक संकल्पना के संकीर्ण व भ्रमित होने के कारण स्वतंत्र भारत मे सर्वाधिक परिणाम हुए हैं, वह है ‘धर्म’ की अवधारणा । धर्म को रिलीजन के पर्यायवाची मान लिए जाने के कारण, सर्वपंथ समभाव को पंथ निरपेक्षता के रूप मे परिभाषित किया जाना, और इस विकृत शब्दरचना के कारण राजकीय व्यवस्थाओं तथा सभी सामुदायिक गतिविधियों से धर्म को प्रयत्नपूर्वक अलग कर दिया गया । शिक्षा में से भी धर्म को अलग करने के प्रयास में सभी संस्कार, सदाचार, नैतिकता आदि अनिवार्य बातें भी हटा दी गई । अब इन सब बातों को लागू करने के लिए मूल्य शिक्षा जैसे अधूरे प्रयास किए जा रहे है । आवश्यकता तो यह है कि धर्म की सही अवधारणा को पुनःप्रस्थापित कर धर्मानुसारी शिक्षा की पुनर्रचना की जाए ।

भारत में धर्म यह एक बहुआयामी संकल्पना है । वास्तव में यह एक जीवन जीने का मार्ग है । पाशविक वासनाओं से उपर उठकर मानवीय संवेदनाओं के अनुरूप जीवन जीना तथा क्रमश: विकसित होते हुए महामानव, देवमानव, दिव्यमानव व अंततः प्रत्यक्ष दिव्यता की अनुभूति यह विकास का मार्ग धर्म है । धर्म केवल व्यक्तिगत आत्मोन्akmनति ही नही अपितु पूरे समाज के ही दिव्यत्व की ओर गति करने का माध्यम बनता है । धर्माधिष्ठित समाज में प्रत्येक व्यक्ति अपने -अपने स्वभाव के अनुसार जहाॅ हैं उस स्थिती से क्रमशः इस प्रगति की ओर अग्रेसर होता है । समाज जीवन मे धर्म प्रतिष्ठित होने पर प्रत्येक में यह उच्च आकांक्षा स्वतः जन्म लेती है । साथ ही समाज में इस प्रकार के अवसर और मार्गदर्षक दोनो ही उपलब्ध होते हैं । समाज जीवन के सभी अंग धर्मप्राण होते हैं । अतः जो प्रजा को धारण करता है वह ‘धर्म’, ऐसी धर्म की व्याख्या की जाती है । स्वभाव को भी धर्म कहा है । अतः उस स्वभाव के अनुरूप ही मार्ग का चयन करना होता हैं । स्वभाव भी धर्म है और उन्नतिगामी समाज में आपसी संबंध व सामुदायिक जीवन की परंपरायें भी धर्म है । मानव का मानव से, परिवार से, समाज से, सृष्टी से तथा अंत मे परमेष्ठी मे एकात्म संबंध है । इस संबंध को समझकर उसका निर्वाह करना धर्म है । अतः भारत में सामान्य बोलचाल की भाषा मे पुत्रधर्म, पितृधर्म, पत्नीधर्म, पतिधर्म ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं । आपसी संबंधो का निर्वहन कर्म के द्वारा किया जाता हैं । अतः क्या करणीय है ? और क्या अकरणीय है? यह जो बताया है, उसे भी धर्म कहते हैं । उस अर्थ मे धर्म कर्तव्य का परिचायक हैं । ‘राजधर्म’ आदि शब्दों मे ‘राजा के कर्तव्य’ यही भाव प्रकट होता हैं । स्वयं के व सृष्टी के प्रति मनुष्य के कर्तव्य का बोध होने पर धर्म संयम का रूप धारण करता हैं । अतः इसे मर्यादा भी कहा गया है । कर्तव्य, अकर्तव्य के साथ ही भोगने की मर्यादा भी धर्म निर्धारित करता हैं । इन्द्रियों के द्वारा कितना भोग करेंगे? क्या भोगें? व कैसे भोगे? यह बात जिस अलिखित नियम से, संस्कारो के रूप मे सामूहिक मन मेे सुप्रतिष्ठित की जाती हैं उस नियम को भी धर्म कहते हैं । समाज जीवन के नियम धर्माधारित होते हैं । अपेक्षा यह है कि राज सत्ता भी धर्म विधान से ही परिचालित हो । अतः भारत मे न्याय करने हेतु रचित विधिविधान के नियमों को भी धर्म कहा गया । जब इसमें किसी व्याख्या का निर्धारण करना हो तो ‘धर्मसभा’ का आयोजन किया जाता था । अब आधुनिक युग मे कानून, विधि विधान तथा नैतिक अपेक्षा व धर्म विहित कर्तव्य दोनो अलग-अलग हो गये हैं । वास्तव में राजव्यवस्था धर्माधिष्ठित हो तब इन दोनो का भी तादात्म्य ही होता हैं ।

चर अचर सभी वस्तुओं के स्वभाव को धर्म ही कहा जाता हैं । आधुनिक विज्ञान शिक्षा मे भी वस्तुओं के गुणधर्म सिखायें जाते हैं । किसी भी सजीव भूतमात्र अथवा निर्जीव वस्तु का स्वभाव ‘धर्म’ कहलाता है जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता, जल का धर्म है प्रवाहित होना । कितने भी छोटे स्थान पर जल को बांध भी दे वह लहरों के रूप प्रवाहित होता हैं । प्रत्येक वस्तु अपने स्वभावधर्म को धारण किए हुए अस्तित्व मे रहती हैं । प्रत्येक मनुष्य भी अपने आप में विशिष्ट स्वभाव का होता है । वह स्वभाव ही उसका स्वधर्म हैं । उसी के अनुसार उसे स्वयं से व अन्यों से संबंधों का निर्वाह करना हैं । यह संबंध भी धर्म द्वारा परिभाषित हैं । सारी सृष्टि ही एक ईश्वर की एकात्म अभिव्यक्ति हैं । अतः उसके प्रत्येक अंग का विशिष्ट स्थान होने के साथ अन्य अंगो के साथ अंगांगी संबंध हैं| जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंग परस्पर पूरकता के साथ स्वयं के कार्य को करते हुए औरों के सहयोगी बनते हैं उसी प्रकार मनुष्य को परिवार, समाज, सृष्टि व परमेष्टि के साथ समन्वयात्मक संबंध का निर्वाह करना होता है । सृष्टि के इन ईश्वरीय नियमों को ‘धर्म’ कहते हैं । मानव को अपने स्वधर्म का प्रगटीकरण कर्म रूप मे करना होता हैं । उद्देष्यपूर्ण कर्म स्वधर्म होता हैं । स्वधर्माधिष्टित कर्म मानव जीवन को परिपूर्ण बनाता हैं । धर्म केवल तत्व न हो करके प्रत्यक्ष व्यवहार में उतारना पडता है । अतः कहा गया है कि ‘आचार प्रभवो धर्म’ इन इतनी सारी विविध छॅटाओ का एक साथ धारण किए हुए धर्म की संकल्पना इस यज्ञ भूमि मे विकसित हुयी । समय-समय पर लोगों ने इसे अपने जीवन मे उतारकर आदर्श प्रस्तुत किए । विद्वानों ने इसके गुण तत्वों की मीमांसा की । जीवन के विभिन्न आयामों मे धर्म को सुव्यवस्थित रूप से परिभाषित करने का काम शास्त्रों ने किया । सार्वकालिक, शाश्वत तत्वों के रूप मे मनुष्यों ने इसकी पहचान की । मनुमहाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं । एक दो भेंदो के साथ यही पंतजली के योगसूत्रों मे परिलक्षित हुए हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद गीता के सोलहवे अध्याय मे दैवी गुण सम्पद के सोलह गुणों के रूप मे धर्माचरण को स्पष्ट किया हैं ।

समाज जीवन में व्यक्ति को भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह करना पडता है । अनेक बार इन विभिन्न भूमिकाओं मे आचरण किए जाने वाले धर्म का आपसी टकराव हो जाता है । ऐसे धर्म संकट में से बाहर निकलने का मार्ग भी शास्त्र बताते हैं । जहाॅ व्यष्टि धर्म समष्टि धर्म के साथ टकराता है, वहाॅ बडी इकाई को महत्व देना साधारण सा नियम है| जब व्यक्ति के ही दो व्यक्तिगत धर्मो के बीच टकराव हो तब शास्त्र कहते हैं कि समाज के अधिकतम हित का ध्यान रखते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों का जिसमे हित हो उस बात को वरीयता दी जाए । इसी प्रकार से एक और वर्गीकरण धर्मपालन की कठोर नियमितता को लेकर शास्त्रों में मिलता है। वह है सामान्य धर्म, विशेष धर्म व आपदधर्म । सामान्य जीवन यापन करते हुए नित्यनियम के रूप मे कुछ कर्तव्यो का समावेष होता है, उसे सामान्य धर्म कहते हैं । यात्रा, बीमारी आदि विशेष परिस्थितियों मे इन नियमों की कठोरता में कुछ मात्रा मे रियायत बरती जाती है उसे विषेष धर्म कहते है । जब प्राणों पर ही संकट आ पडें, उस समय सामान्य रूप से अकरणीय कार्य को करने की अनुमती होती है इसे आपदधर्म कहते है | धर्मपालन के लिए जब देह ही न बचे ऐसी आशंका की परिस्थिती में ही आपदधर्म का अवलंब किया जा सकता है अन्यथा नही ।
इस प्रकार धर्म का अत्यंत व्यावहारिक एवं सूक्ष्म विवेचन भारत मे शास्त्र ग्रंथो में और साथ ही लोक जीवन में भी दिखाई देता है । आज भी हिंदू समाज के अधिकतकम लोग सहज सुलभ परंपरा के रूप मे धर्म का अवलंबन करते हैं । धर्म पालन में त्रुटि के परिणाम स्वरूप जीवन में जो संकट आयेंगे उनका स्पष्ट भान सामान्य भारतीय को परंपरा से प्राप्त हुआ है । अतः धर्म भीरूता के चलते सामान्य व्यक्ति शुद्ध सात्विक एवं प्रामाणिक जीवनयापन करने का प्रयत्न करता है । विदेशी शासन के चले जाने के बाद भी विदेशी तंत्र को ही अपनाए रखने के कारण व्यवस्था में से धर्म लुप्त हो गया हैं । उस कारण चरित्र का संकट शासन तंत्र और उससे जुडी सामूहिक गतिविधियों में दिखाई दे रहा हैं । यह अत्यावश्यक है कि हम अपनी समस्त व्यवस्थाओं को शाश्वत, सनातन धर्मानुसार पुनर्गठित करें । चिरस्थायी सार्वजनिक सुख का यह एकमात्र मार्ग हैं । धर्मराज्य की स्थापना ही सर्वे भवन्तु सुखिनः की वैश्विक प्रार्थना को साकार कर सकती हैं ।

दिसम्बर 23, 2015 Posted by | आलेख | , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

प्रसार माध्यम भी कहे – ‘पहले भारत!’


newshourयह बहस का विषय है की प्रसार माध्यम और पत्रकारिता समाज के दर्पण के रूप में काम करे या उनपर समाज के प्रबोधन का दायित्व हो? वर्तमान में प्रसार माध्यम गंदगी को परोसते समय यह तर्क देते है की समाज यही देखना/पढ़ना चाहता है | वैसे तो यह कुतर्क ही है और इसकी सत्यता को भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता | समाज में फूहड़ पत्र-पत्रिकाओं की पाठकसंख्या कुछ हजार ही होगी वहीं दूसरी ओर ‘अखंड ज्योति’ जैसी धार्मिक पत्रिकाएँ लाखों की संख्या में प्रकाशित, मुद्रित व वितरित होती है | चित्रवाहिनियों (Channels) में भी आस्था, संस्कार जैसे धार्मिक वाहिनियों की दर्शकसंख्या MTV या iTunes जैसी दिनभर फूहड़ गाने बजानेवाली वाहिनियों से कई गुना अधिक है| फिर भी प्रसार माध्यम कहते है की ‘जो बिकता है वही छपता है’ | तर्क के लिए यह बात मान भी ली जाये की समाज अश्लीलता को देखना-पढ़ना चाहता है | तब हमारे पास यह प्रश्न उठता है कि प्रसार माध्यम और उनमें काम करनेवाले पत्रकारों का नैतिक, सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व क्या है?

स्वतंत्रतापूर्व राष्ट्रीय आंदोलन में पत्रकारिता राष्ट्रजागरण व जनप्रबोधन का माध्यम बनी | लगभग सभी राष्ट्रीय नेताओं ने या तो समाचारपत्र चलाये या किसी न किसी पत्र-पत्रिका में कार्य किया | लोकमान्य तिलक द्वारा प्रारंभ किये गए ‘केसरी’ और ‘मराठा’ राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्ण आधार रहे | महात्मा गाँधी ने भी ‘Young India’ व ‘हरिजन’ को जनप्रबोधन का माध्यम बनाया | अरविंद घोष ने भी राष्ट्रीय आंदोलन का प्रारंभ ‘वंदे मातरम्’ इस पत्र के संपादन द्वारा किया | ऐसे और भी कई उदाहरण दिए जा सकते है जहा पत्रकारिता क्रांति की मशाल बन गयी | गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे राष्ट्रनायक भी पत्रकारिता की ही देन है | स्वतंत्र भारत में भी आपातकाल की तानाशाही का विरोध करने के लिए जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति का साथ रामनाथ गोयनका ने Indian Express समूह के माध्यम से दिया | अरुण शौरी, एस. गुरुमूर्ति जैसे पत्रकारों ने इस राष्ट्रधर्म का निर्वाह आगे भी किया |

आज भी अनेक स्तंभलेखक पत्रकारिता को प्रबोधन का माध्यम मानकर लेखनकर्म करते है किंतु मुख्यधारा की पत्रकारिता ने यह भाव खो दिया है | 24 घंटे की समाचारवाहिनियों ने सतत ख़बरों की खोज के चलते पत्रकारिता के स्तरों को नित्य नूतन नीचाइयों के दर्शन कराए है | हमारे समाचार देने से समाज पर उसका क्या असर होगा इसका विचार शायद ही कोई पत्रकार करता है | केवल एक अंधी प्रतियोगिता में नकारात्मक समाचार लेखन/चित्रण की दौड़ चल पड़ी है | कई बार सारे तथ्य जाने बिना ही सनसनी के रूप में समाचार दिए जाते है | अनेक बार तो अच्छी बातों को भी नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया जाता है | नवरात्रि के दिनों में एक समाचार चला कि अहमदाबाद के सरकारी अस्पताल ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के कार्यक्रम के बाद डॉक्टरों और नर्सों ने गरबा किया | लगभग सभी समाचारवाहिनियों ने इसे नकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया | स्वास्थ्य मंत्री से भी प्रश्न पूछे गए और उन्होंने भी पूछताछ करने का आदेश दे दिया तथा दोषी कर्मचारियों पर कारवाई करने का आश्वासन भी | यह माध्यमों की ताकत है | किन्तु, जब तथ्य सामने आये तो वे चौंकानेवाले थे | एक अत्यंत सकारात्मक पहल के रूप में यह कार्यक्रम आयोजित हुआ था | घुटना प्रत्यारोपण (knee replacement) के बारे में समाज में जागृति लाने हेतु यह आयोजन था | गरबा करनेवाले सभी लोग ऐसे थे जिनके घुटने बदले जा चुके थे और इस शस्त्रक्रिया के बाद आप सामान्य जीवन जी सकते है इस बात का संदेश देने के लिए गरबा के सांस्कृतिक कार्यक्रम का प्रयोग किया गया था | वास्तव में इस घटना में सकारात्मक समाचार छुपा हुआ है किंतु सनसनी खोजने की जल्दबाजी में हर बात का नकारात्मक चित्रण करना ही हमारा पत्रकारधर्म है ऐसा मानकर यह उल्टा काम हुआ |

समाचार किस बात में है यह समझना पत्रकार का पहला धर्म है | नए पत्रकारों को सिखाते समय यह समझाया जाता है कि पत्रकार की नाक तेज होनी चाहिए | सड़क पर घटित होनेवाली सामान्य घटना में भी समाचार सूंघने की शक्ति पत्रकार में होती है | वही सच्चे अर्थ में पत्रकार है | किंतु, इसके साथ ही यह भी समझाया जाता है कि हर घटना समाचार नहीं होती | सामान्य से हटकर कोई बात हो तब ही वह समाचार की श्रेणी में आती है | सामान्यतः दिया जानेवाला उदाहरण है कि कुत्ता यदि मनुष्य को काटे तो समाचार नहीं बनता किन्तु यदि मनुष्य कुत्ते को काटे तो समाचार है क्योंकि यह असामान्य घटना है | असामान्यत्व के इस उदाहरण में ही इतनी नकारात्मकता छिपी हुई है कि पत्रकार का स्वभाव ही बन जाता है कि हर बात में उल्टा समाचार ही ढूंढे | जिस प्रकार गिद्ध को ऊँचे आकाश में विहार करते हुए नीचे के सुन्दर दृश्य में और कुछ नहीं दिखाई पड़ता, केवल शव ही दिखाई देता है, सडी हुई लाश हो तो और पहले दिखाई देती है, उसी प्रकार वर्तमान मीडियाकर्मी समाज में से सडांध को ढूंढकर समाज के सामने प्रस्तुत करना अपना कर्तव्य मान बैठे हैं | समाज में हो रहे सकारात्मक कार्य उनके दृष्टिपथ में ही नहीं आते | जबकि ऐसी अनेक असामान्य किन्तु अनुकरणीय घटनायें, कार्य समाज में चल रहे है | समाचार उन सकारात्मक बातों में भी छिपा है और जब कभी ऐसी बातें समाज के सामने प्रस्तुत की जाती है तो उनका बहुत अधिक स्वागत एवं सराहना होती है | समाज जो देखना चाहता है वह परोसने की बात करनेवाले माध्यम इस पर ध्यान नहीं देते |

वास्तविकता में मनुष्य की दृष्टि उसके उद्देश पर निर्भर करती है | अतः समाचारमाध्यमों के उद्देश पर विचार करना आवश्यक है | ‘केसरी’, ‘मराठा’ या ‘वंदे मातरम्’ जैसे समाचारपत्रों का उद्देश ही स्वतंत्रता आंदोलन था | अतः उसमें कार्य करनेवाले पत्रकारों की दृष्टि भी उसी प्रकार से थी | वर्तमान में प्रसारमाध्यमों को भी व्यापारिक दृष्टिकोण से ही देखा जा रहा है | जिसके कारण पत्रकारों का दृष्टिकोण भी व्यापारिक हो गया है | पत्रकारिता अब व्रत (mission) नहीं रहा | अब उसे व्यवसाय (profession) के रूप में देखा जाने लगा है | इस स्थिति को राष्ट्रभाव के जागरण से ही बदला जा सकता है | जब हर बात में राष्ट्रहित महत्वपूर्ण हो जायेगा तो समाचार लिखनेवाले पत्रकार से लेकर उसे संपादित करनेवाले संपादक और माध्यमों के कर्ताधर्ता स्वामियों में भी दृष्टिपरिवर्तन संभव होगा | जिन्हें यह अत्यंत आदर्शवादी व अव्यावहारिक बात लगती है उनके लिए वर्तमान समय के एक अत्यंत विकसित राष्ट्र का उदाहरण दिया जाना उचित होगा| डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की आत्मकथा में एक प्रसंग आता है | वे किसी संगोष्ठी हेतु इजराइल गए थे | तेल-अवीव में जिस होटल में वे रुके थे उसी पर आतंकवादी हमला हुआ | विस्फोटकों से भरा हुआ ट्रक लेकर आतंकवादी होटल की दीवार से टकरायें | विस्फोट के बाद सड़क पर लाशें बिछी हुई थी | ऊपर होटल के कमरे से इस दृश्य को देखकर डॉ. कलाम ने सोचा की कल सुबह सभी समाचारपत्रों के मुखपृष्ठ पर यही तस्वीरें दिखाई देंगी | किंतु उन्हें आश्चर्य तब हुआ जब दूसरे दिन के किसी भी समाचारपत्र में मुखपृष्ठ पर न तो घृणित तस्वीरें थी न ही इस समाचार ने कोई स्थान पाया था | सभी समाचारपत्रों के 12वे से 15वे पृष्ठ पर एक छोटीसी घटना के रूप में इस समाचार का वर्णन किया गया था और मुखपृष्ठ पर – देश के कोने में एक छोटेसे गाँव के किसान ने सिंचाई में नए प्रयोग द्वारा गन्ने का विक्रमी उत्पादन किया – यह समाचार उस किसान की हंसती हुई तस्वीर के साथ प्रमुखता से प्रकाशित था |

‘अग्निपंख’ (Wings of Fire) पुस्तक में इस प्रसंग को पढ़ने के बाद इस बात पर खोजबीन की कि ऐसा कैसे संभव है ? क्या इजराइल में कोई कानून है जो समाचारपत्रों को सकारात्मक समाचार प्रमुखता से प्रकाशित करने के लिए विवश करता है ? ऐसा कोई कानून नहीं है, ना ही कोई विवशता | वहाँ की शिक्षा पद्धति प्रत्येक नागरिक को देशभक्ति का ऐसा पाठ पढ़ाती है की वह किसी भी व्यवसाय में हो, देश उसके लिए सर्वोपरि है | व्यवसाय से चिकित्सक भी स्वेच्छा से वर्ष में कुछ माह सीमा पर जाकर सुरक्षा का कार्य करता है | हर व्यक्ति को आयु के 12 वर्ष पूर्ण करते ही 2 साल का सैनिकी प्रशिक्षण दिया जाता है | इसलिए वे अपनेआप को देश के सिपाही ही मानते है | बातचीत में भी यह सुनने को मिल सकता है की ‘मैं देश का सिपाही पहले, प्रोफेसर बाद में; सिपाही पहले और पत्रकार बाद में हूँ |’ जब ऐसा राष्ट्रीय भाव हो तब अपनेआप ही आतंकवादी गतिविधियों की खबर प्रमुखता नहीं पायेगी | हमारे देश में भी सेना व पुलिस नहीं चाहती की अपराधियों का महिमामंडन हो | यदि पत्रकार/मीडियाकर्मी स्वयं को सैनिक मानने लगे तो वह समाचारों को उसी दृष्टि से देखने लगेगा फिर घटना का समाज के मन पर और राष्ट्र के मानस पर होनेवाला परिणाम प्रमुख स्थान निश्चित करेगा |

अमेरिका जैसे घोर व्यापारिक देश में भी, समाचार माध्यमों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा होने के बाद भी, राष्ट्रहित का ध्यान रखा जाता है | न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद 2 साल तक मलबा हटाया नहीं जा सका किंतु अमेरिका की किसी समाचारवाहिनी ने यह बात विश्व के सामने नहीं रखी | ना ही कोई पत्रकार माइक लेकर न्यूयॉर्क के महापौर के पीछे भागा कि ‘देश जानना चाहता है कि मलबा अभी तक साफ़ क्यों नहीं हुआ?’ समस्त सांस्कृतिक, आर्थिक एवं सामाजिक खामियों के बावजूद अमेरिका के शक्तिशाली होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण नागरिकों की देशभक्ति है | इसके मूल में है शिक्षा | केवल 500 साल का इतिहास होते हुए भी वे अपने प्रत्येक नागरिक को बचपन से ही उसपर गर्व करना सिखाते है | दुनियाभर के देशों के प्रवासी लाखों की संख्या में प्रतिवर्ष अमेरिकी नागरिकता के लिए प्रयास करते है | उन सभी को अमेरिका का इतिहास पढ़ना पड़ता है, परीक्षा देनी होती है | तभी नागरिकता प्राप्त होती है |

पत्रकारिता को राष्ट्रीयता का माध्यम तब बनाया जा सकता है जब हमारी शिक्षा राष्ट्रगौरव और राष्ट्रीयता का निर्माण नागरिकों में करने लगे | वर्तमान समय में परेशानी यह है कि हमारी आज की पत्रकारिता शिक्षा में इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रयास को भी नकारात्मक रूप से प्रचारित करेगी | क्या कोई सोच सकता है कि विद्यालयों में ‘सुबह उठकर माता-पिता के चरण छूना’ यह शिक्षा देना सांप्रदायिकता है ? किंतु ऐसा भारत में हुआ | जब गुजरात सरकार ने दीनानाथ बत्रा जी की बालकों को संस्कारित करनेवाली पुस्तकें सह-पठन के लिए प्रकाशित करवाकर सरकारी विद्यालयों में वितरित की तब देश के प्रमुख अंग्रेजी समाचारपत्रों ने इसे घोर राष्ट्रद्रोही कदम के रूप में प्रचारित किया |

अतः शिक्षा बदले ना बदले, कुछ पत्रकारों को तो बदलना होगा| सकारात्मक समाचारों को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करना होगा | ग्वालियर में जब सूर्यनमस्कार का गिनीज विश्वविक्रम बना तब 4 पृष्ठों में उसकी खबर छापनेवाले संपादक मित्र ने टिप्पणी की थी, “अच्छी बातों को समाचार बनने के लिए बहुत प्रयत्न करने पड़ते है| 150 कार्यकर्ताओं द्वारा 6 माह तक 350 विद्यालयों में प्रशिक्षण के महान परिश्रम के कारण यह अच्छा समाचार तयार हुआ|” संपादक मित्र को जो उस समय उत्तर दिया था वह आज भी प्रासंगिक है | अच्छे प्रयास समाचार बनने का प्रयत्न तो छोड़ो, स्वप्न भी नहीं देखते | सच्चा पत्रकार ऐसे प्रयासों को ढूंढकर उन्हें समाचार बना देता है | अच्छे काम तो समाज में हो ही रहे है | पर आज के वातावरण में उन्हें समाचार बनने में प्रयास करना पड़ रहा है | इजराइल जैसी राष्ट्रीय पत्रकारिता भले ही भारत के लिए अभी दूर हो किंतु हमारे पत्रकार इतना काम तो कर ही सकते है कि अच्छी खबरों को प्रयत्नपूर्वक खोजकर समाज के सामने लाये | संपादक व प्रसारमाध्यमों के स्वामी ऐसे पत्रकारों को प्रोत्साहन दे, कम से कम प्रतिरोध तो ना करे | देश में राष्ट्रीय पत्रकारिता का अगला चरण होगा जब पत्रकार, संपादक व स्वामी देश में घटनेवाली नकारात्मक घटनाओं का चित्रण करते समय भी राष्ट्रहित का ध्यान रखेंगे | तब प्रसारमाध्यमों के लिए भी राष्ट्र सर्वोपरि होगा |

प्रसारमाध्यम ऐसी अगुवाई करेंगे तो उनके साथ ही देश का हर व्यवसायी, हर नागरिक अपने नीजी हित के पहले सोचने लगेगा – ‘पहले भारत!’

नवम्बर 3, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

पुरस्कार वापसी का राजनैतिक अरण्य रुदन


sahity akadamiप्रश्न यह है कि साहित्यकारों ने माहौल बनाना है या माहौल के अनुसार चलना है | कहते है कि साहित्य समाज का दर्पण है | फिर यदि समाज में किसी विषय पर आक्रोश है तो वह कवि की लेखनी या लेखक के आलेख को विषय देगा | जब लेखनी कमजोर पड़ जाये तब साहित्यकारों को अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए अन्य माध्यम ढूँढने पड़ते है | एक कविता, एक उपन्यास अथवा एक लेख ही क्रान्ति को दिशा देने में समर्थ होता है | अंग्रेजों की नौकरी में बाबूगिरी करते हुए बंकिमचन्द्र की लेखनी से जन्मा एक गीत पूरे भारत को जगानेवाला जागरणमन्त्र बन गया | भारत के अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आन्दोलन के इतिहास में एकमात्र सफल आन्दोलन ‘वंग-भंग’ का प्रेरणागीत ‘वंदे मातरम’ ही था | 1857 से लेकर 1942 तक के अन्य सभी आन्दोलन अंग्रेजों द्वारा निर्ममता से कुचल दिए गए | जिन सीमित उद्देशों के लिए वे आंदोलन चलाये गए थे उनमें भी आंशिक सफलता किसी आंदोलन में नहीं मिली |

1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया और सारा देश एकमुख से मातृभूमि केsaptakoti kanth इस विभाजन का विरोध करने खड़ा हुआ | बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक, पंजाब-उत्तराँचल से लेकर मदुरै तक इस राष्ट्रीय उठाव में क्रान्तिगान बना बंकिम के उपन्यास ‘आनंदमठ’ का वह मात्रुगान ‘बोंदे मातरम’ | मूलतः 1882 में बंगला में लिखे उपन्यास आनंदमठ का सन्यासियों द्वारा गाया गया भक्तिगीत 1896 में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में जब गाया गया तब भारत का निर्विवाद राष्ट्रगीत बन गया | इसको गाते-गाते क्रान्तिकारी हँसते-हँसते फांसी पर झूल गए | नंदलाल बोस जैसे राष्ट्रीय चित्रकारों ने इस गीत से प्रेरणा पाकर भारत माँ के चित्रों की मालिका बनायी | राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने भारतभक्ति स्तोत्र लिखा | वंग-भंग का आंदोलन तब सफल हुआ जब 1911 में अंग्रेजों को बंगाल का विभाजन वापस लेना पड़ा | देश पुनः अखंड हुआ | यह वंदे मातरम की ही शक्ति थी जिसने पूरे भारत को एक सूत्र में पिरोया | बंगला साहित्यकारों और उनसे प्रेरित क्रांतिकारियों से अंग्रेज ऐसे भयभीत हुए कि उन्हें अपनी राजधानी कलकत्ता से बदलकर दिल्ली लानी पड़ी | यह है साहित्य की शक्ति |

1905 में भी बंकिमचंद्र सरकारी नौकरी में ही थे | अंग्रेजों के निर्णय का विरोध करने के लिए उन्हें नौकरी से त्यागपत्र नहीं देना पड़ा | साहित्यकार की ताकत उसकी लेखनी होती है | उसे राजनीती की आवश्यकता नहीं पड़ती |

ramprasad bismilराष्ट्र के लिए कार्य करनेवाले देशभक्तों में यदि साहित्य की शक्ति हो तो वह उनकी प्रेरणा को धार देती है और कार्य को गति | रामप्रसाद बिस्मिल जैसा क्रांतिकारी राष्ट्रहित में क्रान्ति के कार्य करने के साथ ही उन्होंने ऐसी सुन्दर कविताओं की निर्मिती की है कि अनेक युवाओं को राष्ट्रकार्य में भाग लेने हेतु प्रेरित किया | भागा-दौड़ी के जीवन में भी उन्होंने इतनी रचनाएं की कि उनका समग्र साहित्य 5 खण्डों में प्रकाशित है | ‘तेरा वैभव सदा रहे माँ, हम दिन चार रहे ना रहे’, ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ ऐसी अनेक सुप्रसिद्ध रचनाएँ इस महान क्रान्तिकारी ने की है | हर क्रांतिकारी भले ही कवि ना हो पर हर कवि क्रांतिकारी जरुर होता है |

इस पार्श्वभूमी पर वर्तमान में साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने की घटना का विश्लेषण करें तो हम इसे प्रामाणिक आक्रोश के स्थान पर राजनीती से प्रेरित छद्मविलाप ही जानेंगे | यदि वास्तविकता में आक्रोश होता तो वह लेखनी को धार देता और कोई क्रान्ति की रचना निकल पड़ती | जब साहित्यकारों को अपने सृजन के अलावा और किसी धरने, आन्दोलन, प्रदर्शन आदि साधन का उपयोग विरोध करने के लिए प्रयोग करना पड़ता है तब वह साहित्य के नपुंसक होने की स्थिति है |

Akadami boardजो साहित्यकार टीवी चैनलों पर आ-आकर पुरस्कार लौटाने का समर्थन कर रहे है उनके तर्क भी अधूरे है | उन्हें अचानक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात होते हुए दिखाई दे रहा है, असहिष्णुता बढ़ी दिखाई दे रही है, भय का वातावरण समाज में व्याप्त होता दिखाई दे रहा है | इस सबका कोई यथार्थ आधार उनके पास नहीं है | विशेषज्ञ बताते हैं कि साम्प्रदायिक तनाव तथा जातिगत, पन्थगत विभेदों से उपजी हिंसा के मामलों में बड़े स्तर पर कटौती हुई है | गत 10 वर्षों में लगभग 700 ऐसे मामले प्रतिवर्ष हुए है जबकि 2015 के 9 महीनों में मात्र 215 ऐसी घटनाएं हुई है | यह विडम्बना है कि घटनाएं कम होते हुए भी चर्चा अधिक है | तथाकथित विद्वानों द्वारा जानबूझकर इस प्रकार का वातावरण बनाया जा रहा है | माननीय प्रधानमंत्री के चमत्कारिक नेतृत्व में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मिली प्रचंड लोकतान्त्रिक सफलता कुछ लोगों को हजम नहीं हो रही | इसके पीछे उनके व्यक्तिगत हितों का भी प्रश्न है | गत कई वर्षों से अनेक सरकारी, अर्ध-सरकारी संस्थाओं पर आपसी साठ-गाँठ से निरंकुश शासन चलानेवाले इन ‘ख्यातनाम’ ‘विद्वानों’ की ठेकेदारी समाप्त होती दिखाई दे रही है | एक मजेदार तथ्य यह है कि पुरस्कार लौटानेवाले महानुभावों में वे सारे लोग सम्मिलित है जिन्होंने एक-दूसरे को पुरस्कार बांटे हैं | एक के पुरस्कार में बाकी दो जूरी रहे | जिसे पुरस्कार मिला उसने भी लौटाया और जिसने दिया उसने भी अपना पुरस्कार लौटाया | अब उसके जूरियों में से भी किसी ने पुरस्कार लौटाया | 3-4 चरण बाद पहला पुरस्कारकर्ता आपको जूरी में मिल जायेगा | ऊपर के 2-3 वाक्यों से पाठक संभ्रमित हो तो उसमें आश्चर्य नहीं क्योंकि गत 60 वर्षों से पुरस्कारों की दुनिया में यही हेरा-फेरी चल रही है | ये लगभग वही लोग है जो 15 वर्षों से बिना किसी तथ्य के गुजरात दंगों को लेकर देश-विदेश में बवाल मचाते रहे है | संजीव भट और तीस्ता सेतलवाड जैसे लोगों की पोल सर्वोच्च न्यायलय में खुलने के बाद भी इस कबीले का मगरमच्छी साम्प्रदायिक विलाप बदस्तूर जारी है |

पुरस्कार लौटाने की इस राजनीती के पीछे विदेशी षडयंत्रों को भी नकारा नहीं जा सकता | रूसी जासूसी संस्था केजीबी की फाइलों तथा विकिलीक्स के IYD Logoदस्तावेजों से यह स्पष्ट है कि हमारे यहाँ के कई विद्वान विदेशी पैसों के बूते पर देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं | वर्तमान में वैश्विक परिदृश्य कुछ ऐसा दिखाई देता है जो इस शंका को और अधिक बलवती करता है | गत डेढ़ वर्ष में अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी है | अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा एकमत से स्वीकार करना भारत की नई मान्यता का परिचायक है | गत कुछ महीनों में हमारे विदेश विभाग में संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषदों में स्थायी सदस्यता हेतु भारत के दावे को अत्यंत बलपूर्वक रखा है | विश्व के बहुसंख्य देशों का इस बात को प्रत्यक्ष व परोक्ष समर्थन मिल रहा है | स्वाभाविक रूप से ही हमारे दोनों पड़ोसियों के पेट में प्रचंड शूल उठा है | गत सप्ताह संयुक्त राष्ट्र संघ के संयुक्त सचिव की भ्रष्टाचार के मामले में हुई गिरफ़्तारी में यह तथ्य सामने आया कि भारत को सुरक्षा परिषद् में स्थान न मिल पाए इस हेतु चीन ने उसे अरबों डॉलर्स की घूस दी थी | हमारे देश में अचानक उठे विद्वत आक्रोश के पीछे भी ऐसा कोई घोर सांसारिक कारण सामने आये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए | काश कि इन सबके बैंक खातों की निष्पक्ष पूछताछ की जाती |

youthइन सब विद्वानों की प्रेरणा का मुख्य स्त्रोत प्रचार है | यदि प्रसार माध्यम संभल जाये और पुरस्कार लौटाने की खबर दिखाना बंद कर दे तो पुरस्कार लौटाने अपनेआप बंद हो जायेंगे | पर इतनी देशभक्ति प्रसार माध्यमों में कहाँ ? दादरी की निंदनीय घटना को महीनों तक प्रतिदिन घंटों दिखानेवाले ये समाचार माध्यम गणेश पंडाल में पढ़ी जानेवाली नमाज को अथवा संघ के पथसञ्चलन पर पुष्पवृष्टि करते मुस्लिम बांधवों की तस्वीरों को एक बार भी नहीं दिखाते | अतः समाज को जोड़नेवाले तथा राष्ट्र को एकता के सूत्र में बांधनेवाले विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का जिम्मा हम जैसे जागृत भारतवासियों का ही है | आन्तरताने ने विश्व खोल दिया है | सामाजिक माध्यम हर हाथ में पहुंचे मोबाईल के माध्यम से बहुत प्रभावी हो चुका है | उत्तरापथ के सुधि पाठकों से निवेदन है कि इस लेख में दिए गए विषयों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाए | काटकर अपने-अपने माध्यमों पर चिपकाने की पूर्ण स्वतंत्रता आपको है | आपकी चर्चा और टिप्पणी विषय की गंभीरता को समाज में प्रसारित करेगी | अतः टिप्पणी अवश्य दें |

अक्टूबर 27, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

एकात्म स्वावलंबी ग्राम विकास


sgv1अनेक विद्यालयों के द्वार पर लिखा होता है ‘ज्ञानार्थ प्रवेश-सेवार्थ प्रस्थान’ | यह शिक्षा के समग्र उद्दिष्ट का नित्य स्मरण है | केवल ज्ञानप्राप्ति अथवा व्यक्तिगत कौशल का विकास शिक्षा का पूर्ण उद्देश नहीं प्रकट करता | यह ज्ञानप्राप्ति अथवा कौशल विकास किस उद्देश से है यह भी स्पष्ट होना आवश्यक है | विद्यालय से निकला बालक परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में योगदान करने के लिए सुयोग्य बने ऐसी अपेक्षा है | यह योगदान कितना भी अर्थकारक हो किंतु उसके पीछे का भाव सेवा का ही रहे ऐसा संस्कार विद्यालयों में नई पीढ़ी को प्राप्त हो यह शिक्षा के परिपूर्ण उद्देश की व्याख्या है | अतः शिक्षा के विषय में चिंतन करते समय व्यक्तित्व विकास के साथ ही सामाजिक विकास के विभिन्न आयामों पर चिंतन करना भी आवश्यक है | जब तक समाज की भिन्न-भिन्न इकाइयाँ यथा परिवार, ग्राम, संगठन, नगर आदि के विकास की सम्यक अवधारणा सुस्पष्ट न हो तब तक शिक्षित पीढ़ी के सम्यक उपाययोजन की योजना शिक्षाविद नहीं बना सकते | समग्र ग्राम विकास, नगर विकास, संगठनशास्त्र, व्यापार प्रबंधन आदि पर स्पष्ट प्रारूप तयार करना भी शिक्षा के भारतीय स्वरुप के विकास हेतु आवश्यक है |

आजकल स्मार्ट सिटी, स्मार्ट विलेज आदि की चर्चा चलती है | स्मार्ट विलेज की बात करते हीsgv2 योजनाकारों के मन में आधुनिक शहरी सुविधाओं से संपन्न, संचार के सभी साधनों से परिपूर्ण गांव का ही विचार मन में आता है | चिकनी-चुपड़ी पक्की सड़कें हो, बिजली की अखंड आपूर्ति, मोबाइल इंटरनेट आदि सभी संचार के साधन हर गांव में उपलब्ध करा दिए जाएँ | सरकार ने इस दिशा में कार्य प्रारंभ भी कर दिया है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से ग्रामीण फीडरों को अलग करने की देशव्यापी महत्त्वाकांक्षी योजना केन्द्र सरकार ने सितंबर 2015 में प्रारंभ की | इसके माध्यम से गांव-गांव में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होगी | सिंचाई के लिए आवश्यक 3 चरण (three phase) विद्युत आपूर्ति भले ही कुछ समय के लिए प्राप्त हो किंतु घरेलू एवं अन्य व्यापारी उपयोग के लिए आवश्यक एकल चरण (single phase) बिजली 24 घंटे गांव-गांव में उपलब्ध होगी | इस आधार पर इंटरनेट आदि संचार के साधन गांव में पूरे समय उपलब्ध रह सकेंगे | सभी गांवों को पक्की सड़क से जोड़ने की योजना भी इसी दिशा में एक प्रयास है कि गांवों का यातायात तथा मालवाहक संपर्क द्रुत गति से हो सके | किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सबसे गांव का समग्र विकास हो पायेगा? केवल व्यापार और संचार के अवसर उपलब्ध हो जाने से नई पीढ़ी का नगरों की ओर पलायन रुक जायेगा?

शहरों की ओर स्थानांतरण के अन्य दो महत्वपूर्ण कारक योजनाकारों ने खोजे है – स्वाथ्य एवं शिक्षा | प्राथमिक एवं माध्यमिक के आगे की शिक्षा तथा इस स्तर पर भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा गांवों में उपलब्ध न होने के कारण जिन्हें भी संभव है वो अपने बच्चों को शिक्षा हेतु शहर में भेजना पसंद करते है | एकबार पढ़ाई के लिए शहर गया बालक पढ़-लिख कर जवान होने पर गांव क्यों लौटेंगे ? अतः गांव के गांव ही युवाओं से रिक्त होते जा रहे है | अनेक राज्यों में आने वाले दिनों में यह एक बहुत बड़ी चुनौती होगी | नई पीढ़ी जब गांव में रहेगी ही नहीं तो ये संचार साधन, ये बिजली किस काम आयेगी ?

ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए स्थिति बड़ी विकट है | अनेक स्थानों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध ही नहीं है | जहाँ भवन उपलब्ध है वहां भी चिकित्सकों का अभाव है | कोई चिकित्सक गांव जाना ही नहीं चाहता है | सरकार ने अनेक प्रयास कर लिए, कुछ वर्षों की अनिवार्यता कर दी, अतिरिक्त भत्ता देना प्रारंभ कर दिया फिर भी चिकित्सक शहर छोड़ना नहीं चाहता है | निजी व्यवसाय में इतनी अधिक कमाई है कि महाराष्ट्र जैसे राज्यों के शहरों के सरकारी अस्पतालों में भी चिकित्सक नहीं जाना चाहते है | अतः स्वास्थ्य सुविधाओं का गांवों में उन्नयन असंभव के बराबर है | इस हेतु नए सिरे से सोचना होगा |

शहरीकरण की नकल के रूप में ग्रामविकास का विचार किया जा रहा है | इस सोच में ही मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैsgv | वर्तमान में विकास के वैश्विक परिमाणों में शहरीकरण एक प्रमुख मापदंड है | जिस देश में जितना अधिक शहरीकरण होगा उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है | समूची जनसंख्या के कितने प्रतिशत जनसंख्या शहरी है यह विकास का मापदंड है | इसी जीवनदृष्टि के कारण गांवों का शहरीकरण ही गांव का विकास माना जा रहा है | ग्राम विकास के नाम पर सारा सरकारी चिंतन व योजनायें इसी दिशा में है | यह पूर्णतया अभारतीय विचार है | भारत में गांव एक परिपूर्ण जैविक इकाई है | पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ग्रामोदय के एकात्मिक प्रारूप में इस बात का विचार किया है | सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक स्तर पर पूर्णतः स्वावलंबी ग्रामों अथवा ग्रामसमूहों का विकास किया जाना भारत में ग्रामविकास का माध्यम हो सकता है | गांवों की जीवनशैली में कृषि व गोरक्ष यह केवल आर्थिक उत्पादन के साधन न होकर उनका सांस्कृतिक व सामाजिक मूल्य भी है | जब तक हम इन दोनों को लाभ का व्यवसाय नहीं बनाते तब तक ग्रामोदय के सारे प्रयास अधूरे ही होंगे | वर्तमान समय के अनुरूप कृषि एवं गोरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण उद्योग और कृषि उत्पादों के व्यापार को भी जोड़ा जा सकता है | इन सबके आधार पर संपूर्णरूपेण स्वावलंबी ग्रामों का विकास किया जा सकता है |

इस विकास की प्रक्रिया का भी जैविक होना आवश्यक है | स्वावलंबी समाज निर्माण सरकारी बैसाखियों से नहीं हो सकता | सरकारी योजनाओं के माध्यम से सरकारी पैसा सरकारी अधिकारियों द्वारा ही खर्च किया जाता रहा तो सारे विश्व की पूंजी एक गाँव में लगाने पर भी ग्रामविकास कतई संभव नहीं है | योजना के स्तर से ही ग्रामीणों का न केवल सहभाग अपितु नेतृत्व सच्चे ग्रामविकास में अनिवार्य है | सारा गांव पूर्ण जागरूकता के साथ संगठित होकर एक मन से विकास का संकल्प ले तब वह ग्रामविकास का प्रथम चरण होगा | भौगोलिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार पर कुछ गांवों के समूह बनाये जा सकते है | समूह में कितने और कौनसे गांव हो इसका निर्णय भी ग्रामवासी ही आपस में मिल कर करें | नैसर्गिक संसाधन, मानव बल, आर्थिक उपलब्धता तथा भौगोलिक दूरी के आधार पर पूर्ण स्वावलंबी ग्रामसमूह विकसित करने हेतु आवश्यक गांवों की संख्या ग्रामवासी निर्धारित करेंगे | यह एकत्रिकरण बहुत अधिक कठोर नहीं होना चाहिए | और अधिक ग्रामों को जोड़ने अथवा कुछ गांवों को समूह बदलने की लचीली सुविधा इस व्यवस्था में उपलब्ध हो | कुछ गांव धीरे-धीरे अपनेआप में ही स्वावलंबी बनने का प्रयत्न कर सकते है | इस स्थिति में उन्हें किसी समूह का हिस्सा बने रहने की आवश्यकता नहीं रहेगी |

यह ग्रामसमूह अपने स्तर पर नियोजन करे कि किस प्रकार वे पाँच-सात वर्षों की अवधि में पूर्णतः आत्मनिर्भर हो सकते है | शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, गौरक्षा, व्यापार के साथ ही ऊर्जा के उत्पादन आदि में भी यह ग्रामसमूह पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर बने | इस हेतु ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करना आवश्यक होगा | तेलंगाना के लगभग 40 गांव जैव-इंधन (bio-diesel) के माध्यम से बिजली के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गए है | ऐसे ही सौर, पवन, छोटे नालों पर बने चक बाँध आदि को मिलाकर विकेन्द्रित विद्युत् आत्मनिर्भरता को प्राप्त किया जा सकता है | सिंचाई एवं पेयजल हेतु भी इसी प्रकार का चिंतन एवं नियोजन किया जाये कि कुछ अवधि में यह ग्रामसमूह उस मामले में भी आत्मनिर्भर बन सके | कृषि का नियोजन भी ‘स्वपोषण’ व ‘व्यापार’ इन दो रूपों में किया जाये | गांवों की अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही गांव शहरों के भी अन्नदाता है | आसपास की नगरीय आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए कृषि का व्यापारिक नियोजन किया जाये | फल, सब्जी और अनाज की आपूर्ति के अलावा अनेक ऐसे कृषिउत्पाद है जिनकी औद्योगिक उपयोगिता है | इन सभी का अपनी स्थानीय विशेषताओं के अनुरूप नियोजन किया जाये तो कृषि न केवल भरण-पोषण का अपितु अच्छे लाभ का माध्यम भी बन सकती है | किंतु यह एकल चिंतन अथवा प्रयोग से संभव नहीं है | सामूहिक चिंतन, संगठित प्रयास इस हेतु अनिवार्य है | कुछ कृषिउत्पाद सीधे बाजार में बेचने के स्थान पर थोड़ी सी प्रक्रिया करने से उनमें बहुत बड़ी मूल्य वृद्धि हो सकती है | अतः ऐसे कृषि के सहयोगी ग्रामोद्योगों की योजना भी ग्राम्य विकास का महत्वपूर्ण अंग है |

इस sgv3सब हेतु, शिक्षा में भी स्वावलंबी विचार इन ग्रामसमूहों को करना होगा | अपने नए पीढ़ी की शैक्षिक आवश्यकताओं की पूर्ति अपने ही ग्रामसमूह में हो सके ऐसी आत्मनिर्भरता को लक्ष्य किया जाये | हर बालक को 8वी तक जीवनोपयोगी सामान्य शिक्षा सहज, सुलभ, जहा तक हो सके निःशुल्क प्राप्त हो | उसके आगे की शिक्षा का नियोजन बालकों के स्वभाव एवं रूचि के अनुरूप तथा ग्रामसमूह की आवश्यकता के अनुसार किया जाये | इस हेतु विशेष रूप से ग्रामीण शिक्षा संस्थानों का निर्माण करना पड़ेगा जिसमें कृषि एवं कृषि सहायक उद्योगों में कार्य करने का प्रशिक्षण ग्रामीणों को दिया जाये | सामान्य उच्च विद्यालयीन शिक्षा (9वी से 12वी) तथा स्नातक तक महाविद्यालयीन शिक्षा ग्रामसमूह में उपलब्ध हो | केवल परास्नातक अथवा व्यावसायिक शिक्षा हेतु छात्रों को किसी अन्य ग्रामसमूह अथवा शहर में जाने की आवश्यकता रहे | इस प्रकार ग्रामसमूह शैक्षिक आवश्यकताओं हेतु पूर्णतः आत्मनिर्भर बन सकेंगे | स्वास्थ्य सुविधाओं में भी इसी प्रकार की आत्मनिर्भरता पाई जा सकती है | प्रत्येक गांव के एक या दो युवा-युवती को परा-चिकित्सकीय (para-medical) प्रशिक्षण दिलाकर आरोग्य मित्र के रूप में तैयार किया जाये | सामान्य छोटे-मोटे हादसों से होनेवाली छोटी-मोटी चोटें, सामान्य संक्रमण, बुखार, जुकाम, पेट की बिमारियाँ आदि के उपचार का ज्ञान व दवाई आरोग्य मित्र के माध्यम से हर गांव में उपलब्ध हो | थोड़े प्रगत उपचार तथा कुछ दिन के निवासी उपचार हेतु प्राथमिक स्वाथ्य केंद्र हर ग्रामसमूह में हो | ग्रामीणों के हाथ इस सबका प्रबंधन/संचालन दिया जाये ताकि चिकित्सकों की साप्ताहिक उपस्थिति व परिचारक कर्मचारियों (nursing staff) की नित्य उपलब्धता सुनिश्चित हो |

इस प्रकार का स्वावलंबी ग्रामविकास तभी संभव है जब शिक्षित, समरस, संगठित, शोषणमुक्त समाज स्थापित किया जाये | यह काम धार्मिक आयोजनों के माध्यम से सदियों से होता रहा है | यज्ञ, कथा, कीर्तन, जत्रा, उत्सव आदि के पारंपारिक आयोजन समाज को सुसंगठित करने के माध्यम रहे हैं | स्वावलंबी ग्रामविकास में इनकी महती भूमिका है | मठों, मंदिरों, धर्माचार्यों तथा सामाजिक संगठनों ने एकात्म स्वावलंबी ग्रामविकास के इस व्रत को अपनाया तो यह स्वप्न साकार होने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा | सरकार की भूमिका केवल उत्प्रेरक (catalyst) की रह जाएगी | रास्तें, भवन, तालाब, कैनाल, उर्जा संयंत्र, शिक्षा जैसी आवश्यक अधोसंरचनाओं (infrastructures) का निर्माण ग्रामीणों के माध्यम से सरकारी अनुदान के उपयोग से हो | बाकि आवश्यक संसाधन समाज के संबल से ही खडे किये जाये |

स्वावलंबी ग्रामविकास की प्रक्रिया भी शासनमुक्त, समाज पोषित व ग्रामीणों पर पूर्ण विश्वास रखनेवाली होगी तभी उचित परिणाम भी प्राप्त होंगे |

अक्टूबर 24, 2015 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

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