उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

प्रेरणा परशुराम की


भारत का आर्थिक महाशक्ति के रुप में विश्व में दबदबा बढ़ ही रहा है। एक तो स्वयं भारत की सामाजिक ताकद अपने आप को आर्थिक सुदृढ़ता के रुप में अभिव्यक्ति कर रही है साथ ही योरोप व अमेरिका वैश्विक मंदी तथा जापान में सुनामी के प्रभावों को झेल कर पूर्णतः कमजोर हो रहे है। गत माह ही अमेरिका का ऋण $14.7 ट्रीलियन डालर्स तक पहुँच गया है जो उसके सकल घरेलु उत्पाद GDP $13.6 ट्रीलियन डालर्स से भी अधिक है। यह एक अत्यन्त गंभीर आंताराष्ट्रीय घटना है जो भारत में भ्रष्टाचार के आन्दोलनों के मध्य समाचारों में दबकर रह गयी है। वास्तव में ये गंभीर वैश्विक स्थिति भारत को कालेधन और भ्रष्टाचार के भयावह परिणाम को अधोरेखित करने के लिये सबक सिखाती है। आज तो हमारे मध्यमवर्ग की उद्यमिता एवं बचत की आदत के भरोसे भारत महंगाई, बेरोजगारी व अव्यवस्था जैसी व्याधियों के बावजूद भी दृढ़ता से विकास पथपर अग्रेसर है। किन्तु इन बिमारियों के मूल में छिपे विकार का यदि निदान व उपचार नहीं किया गया तो फिर ये सुखकर स्थिति बहुत अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। यह जीवन शैली का विकार है। जिस जीवन शैली के कारण युनान से प्रारम्भ कर अमेरिका तक सारी विकसित अर्थव्यवस्थायें चरमरा रही है उसीका अनुसरण हम भारत में तेजी से करते जा रहे है। समाज में पाश्चात्य जीवनमूल्य प्रचण्ड गति से प्रतिष्ठा पा रहे है। फिर भी जैसे भारत की सनातन संस्कृति की मौलिक विशेषता है इस बाह्य परिवर्तन में भी हमारा समाज अपने मूल तत्व को संजोये रखने का सफल प्रयास कर रहा है। किन्तु राज्यव्यवस्था में हिन्दु तत्वों का आविर्भाव ना होने के कारण हम वैश्विक दबावों में अपनी व्यवस्था को भी उन्हीं आत्मघाती प्रभावों की ओर जाने से नहीं रोक पा रहे है।

सत्ता जब सार्वजनीन जनहित के स्थान पर स्वयं को ही बनाये रखने में व्यस्त हो जाती है तब प्रजातन्त्र के होते हुये भी विरोध असह्य हो जाता है और दमन अवश्यम्भावी। वैसे तो भारतीय संस्कृति में राजतन्त्र में भी क्षत्रीय का धर्म प्रजापालन ही होने के कारण राजा का प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व सर्वोपरि था। जब राजा का राज्याभिषेक होता था तो एक रिवाज में राजा कहता था ‘अदण्डोस्मि’ अब मै सार्वभौम हो गया हूँ और मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता। तब राजगुरू उसके मस्तक पर धर्मदण्ड का स्पर्श कराकर कहते थे ‘धर्मदण्डोसि’। तुम धर्म के अधीन हो और यदि धर्म के विपरित कार्य करोगे तो धर्म तुम्हें दण्डित करेगा। आज तो प्रजातन्त्र के शीर्षस्थ सत्ताधीश स्वयं को लोकपाल की पूछताछ के अधीन करने से भी कतरा रहे है। व्यवस्था में हिन्दु जीवनमूल्यों अर्थात धर्म के ना होने का ही यह परिणाम है।
धर्मदण्ड को ना माननेवाली सत्ता को सबक सीखाने का सामथ्र्य भी धर्मरक्षक धर्मात्माओं के पास था। जब क्षत्रीय अपने धर्म से च्युत हो गये तो भगवान् परशुराम ने 21 बार पूरी पृथ्वि को निःक्षत्रीय कर दिया। यह सत्ता पर धर्मको प्रस्थापित करने का कार्य था। परशुराम का चरित्र आज के समय में बड़ा ही मार्गदर्शक है। बचपन में पिता जमदग्नि की आज्ञा का पालन करते हुए माता रेणुका का शिरच्छेद करने का साहस और प्रसन्न पितासे माता के जीवन का वरदान मांगने की संवेदनशीलता; सत्ता के मद को धर्म का पाठ पढ़ाने का प्रयास करते जनआन्दोलनों में अनुशासन, आज्ञापालन व संवेदनशीलता का यह समन्वय वर्तमान समय की मांग है। परशुराम को हमारे शास्त्रों में विष्णु का अवतार माना गया है। भगवद्गीता के अनुसार अवतार का कार्य साधु अर्थात सज्जनों की रक्षा तथा दूष्टशक्ति अर्थात दूर्जनों के विनाश के द्वारा धर्मसंस्थापना का है। भगवान् परशुराम में हम देखते है कि जब दूर्जनशक्ति सत्ता में केन्द्रित हो जाये तो अपने पराक्रम के द्वारा उसको भी सही स्थान दिखाया जा सकता है।

भगवान परशुराम सात चिरंजीवों में आते है अर्थात यह तत्व सार्वकालीक है। सदा ही रहनेवाला है। किन्तु सदा रहने से भी अपनी बदलती भुमिका के प्रति वे सजग है। अतः रामायण में हम पाते है कि भगवान् राम के प्राकट्य के बाद मिथिला में शिवधनुष्य पर श्रीराम के प्रभुत्व का समाचार पाते ही परशुराम ने परीक्षा कर कोदण्ड के साथ ही अवतार का दायित्व रामजी को सौंप दिया। महाभारत में तो हम परशुराम जी की भुमिका और भी हाशियेपर देखते है। केवल कर्ण को ब्र्रह्मास्त्र का प्रशिक्षण तथा बादमें श्रापद्वारा विस्मरण में ही उनकी सक्रीय भूमिका दिखाई देती है। परशुराम के समान विराट व्यक्तित्व का समयानुकुल भूमिकाओं में समेटना भी वर्तमान समय में अनुकरणीय है।

आज पुनः जन जन में परशुराम का सत्व जागृत होने की महती आवश्यकता है। प्रजातन्त्र में सैद्धांतिक रूप से तो जन ही सार्वभौम है किन्तु व्यवहार में जब प्रशासन में सत्ता केन्द्रित हो जाये तब परशुराम को पुनः धर्मदण्ड धारण करना पड़ेगा।  व्यवस्था में सनातन तत्वों को सम्मिलित करने में हममें से प्रत्येक सहभागी हो सकता है। सरकार अपने नीति निर्धारण में जनता को योगदान करने का अवसर प्रदान करती है। प्रत्येक नये विधेयक के अनुलेखन में समाज को प्रतिक्रिया देने का अवसर दिया जाता है। केन्द्र भारती के जागरूक नागरिकों का कर्तव्य है कि ऐसे अवसरों का समुचित उपयोग करें। अभी काले धन पर जनता की राय जानने के लिये अणुडाक की घोषणा की गई है – bm-feedback@nic.in आज के परशुराम का परशु हमारी लेखनी, संगणक और वाणी ही है। इन उपकरणों के विवेकपूण प्रयोग से हम सत्ता को सन्मार्ग पर लाने का कर्तव्य निर्वाह कर सकें यह समय की मांग है|

जून 28, 2011 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

सत्य पथ


सत्य का पथ
कहते है कि बडा
कन्ट्काकीर्ण होता है
सत्य का पथ !

पर
अनुभव तो है ये कि
सत्यपथ सदाही
मनोहर होता है।

हां बाधायें तो निश्चित
अधिक आयेंगी।
पर हौसला भी तो
औरों से अधिक होगा।
साथी भी भले
संख्या में कम लगे
पर होंगे सच्चे और पक्के।
सत्यपथ के
सहपथिक ही
साथी कहलाते है।

तो साथी कभी
अकेला
ना अनुभव करना।
चाहे देनी पडे
सैंकडों बार
अग्निपरीक्षा !

या किसी  धोबी के
भौंकने से
करना पडे बार बार
वनगमन!

हे मेरे सत्यपथी
छोडना न साथ
सत्य का
तोड़ना न व्रत
धर्म का …

जून 25, 2011 Posted by | कविता | 3 टिप्पणियाँ

Bharat Ka Samvidhan : Useless or Used Less


Dr Ambedkar, who was the Chairman of the Constitution Assembly and is credited as the author of the Constitution of India, has on record said that there was no need for any constitution. The Government of India Act 1935 passed by the British parliament was enough. Then again he repeatedly denied being the framer of the draft. He even said when pressed too much if allowed he will like to burn the constitution of India. 

Recently after the anti corruption agitations there have been discussion on a total change of system is needed for eradication of corruption. There is discussion on changing the parliamentary system to presidential and also following the American system rather than the British etc. Some are demanding the constitution to be rewritten.

Though repeatedly amended the Constitution of India in itself is not very bad and no one can say American system has served America well. So there is no guarantee that copying some of its provisions would have served India better. 

The present constitution has served us well for last 61 years. We are in much better condition than many of our contemporaries. Most of the problems we face today are because of the neglect of Constitution rather than because of it. As Swami Chinmayanand ji used to say about Youth we can say the same thing about the constitution “It is not useless it is in fact used less”. To take an example – the constitutional provisions about Common Civil Code were never implemented.  The makers of our constitution wanted Common Civil Code to be implemented soon. There have been several strong advisory from time to time by the Supreme Court. Still it is a distant dream. Let alone enactment the discussion about the demand itself is not tolerated. BJP had to compromise on this issue while arriving at the common minimum programme of the NDA. Now the super cabinet NAC is proposing a special criminal code for minorities in the garb of Communal Violence (prevention) Bill. 

The makers of the constitution wanted the reservations for the SC and ST for 15 years only to give them a level playing ground. Constitution said it to be discontinued after 15 years. But no one dares to talk about this eve after a prolonged protest by the promising youths of professional institutions. Contrary to the spirit of the constitution that reservations are only temporary arrangements and should not be treated as right, now there is demand for reservation by every community. The vote bank politics has stooped to such a level that this UPA government has promised to give reservation to religious minorities.

Article 370 was also a temporary arrangement and hence the revocation of the same was provided for in the same article without the need of any constitutional amendment. But again contrary to the constitutional spirit the interlocutors on Kashmir issue appointed by the Union Government in their recommendations talk about more autonomy to J & K. There are many other constitutional provisions that are grossly neglected. We have not implemented our constitution in totality. Only the provisions which were politically convenient were used indiscriminately.

Even so we need to review the whole constitution not because it is useless but because many things have changed since. The hangover of the British raj is over and now we are a confident nation on a march to lead the whole humanity. The exuberance and enthusiasm can be seen in all walks of life. The economy, entrepreneurship, social activism and also the electoral activity all have shown a remarkable confidence.  The percentage of voting has increased to 80% in last assembly elections. The just concluded Panchayat elections in Jammu and Kashmir saw 90% voting in spite of threats by the extremists. This shows the growing awareness of the masses. The nationwide support received by the recent anti corruption agitation is also the indication of rising aspirations of the nation.  We need a constitution that reflects this NATIONAL SPIRIT. 

It can not be a copy paste product. We can study and learn from all the existing models of governance but to cater to the rising Bharat what we need is an original charter of this ancient nation. We need a total Bharatiya Approach. We have to study our own constitutional history. Each nation has its own evolution. This gives it a unique identity. The rise of Bharat will definitely ignite this search of its Identity. The constitution needs to project this National Identity to the whole world.

The quest is for a Constitution rooted in the oldest Civilisational experience of leading the world toward peace and prosperity.


जून 22, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , | 28 टिप्पणियाँ

खबर क्या बनेगी?


१८ जून की शाम ५ बजे राजघाट का दृश्य बड़ा विश्वास बढ़ाने वाला था | कितने भिन्न भिन्न विचारधारा के लोग एक मुद्दे पर एकमत होकर उत्साह के साथ किन्तु पूर्ण अनुशासन में विरोध प्रदर्शित कर रहे थे| भारतीय लोकतंत्र की यह ताकद है| यहाँ जन जन अपनी बात को शांति से रखने का साहस रखता है| बात शासन द्वारा इसी अधिकार के दमन की ही थी| क्या शांति से विरोध प्रगट करने का अधिकार भी लोकतंत्र खो देगा? यह प्रश्न था| ४ जून की रात रामलीला मैदान में हुई रावणलीला के प्रति अपना विरोध दर्ज करने विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाले कार्यकर्ता आये थे| सबका प्रेम भाईचारा देखने लायक था| गोविन्दाचार्य, आरिफ मोहम्मद खान और रामबहादुर राय जैसे राष्ट्रीय स्तर के स्थापित नेताओं के साथ २०-२२ साल के देवेन्द्र पई, तेजिन्द्र्पल सिंह और अनूप जैसे कार्यकर्ता सहजता से अपनी बात कर पा रहे थे|
पि वि राजगोपाल थे जो वनवासियों के मध्य आन्दोलन करते है और अपने वाम झुकाव के बारे में स्पष्ट है| पर उनके मन में गोविन्दजी जिनको मिडिया लगातार संघ के सूत्र के रूप में प्रचारित कर रहा है उनके प्रति आदर व स्नेह देखने लायक था| छद्म सेकुलर वाद के विरुद्ध उच्चतम न्यायलय से लेकर सभी मंचों पर अपने विचार स्पष्टता से रखने वाली अधिवक्ता श्रीमती मीनाक्षी लेखी भी मंच पर थी| अपने स्पष्ट सिद्धांतो के लिए ख्यातनाम जे एस राजपूत जी भी थे| भोपाल से अनिल सौमित्र भी आये थे तो दीनदयाल शोध संस्थान  के  अतुल जैन भी थे| अर्थात परिवार की भी पूरी उपस्थिति थी|  १९७४ के जे पि आन्दोलन के अनुभवी संजय पासवान भी आये थे | रामदेव बाबा के अनुयायी भी बड़ी संख्या में थे| श्री श्री रविशंकर जी के अनुयायी भी थे| नेताजी सुभाषचंद्र बोस आई एन ए ट्रस्ट के ब्रिगेडियर छिक्कारा और त्यागीजी आझाद हिंद सेना की टोपी लगाकर चमक रहे थे| वो अपने साथ ५० टोपियाँ भी लाये थे और सब आन्दोलनकारियों में इन टोपियों के प्रति आकर्षण था| मुंबई से लोकसत्ता दल के सुरेन्द्र श्रीवास्तव भी आये थे| तो मंच और फुटपाथ की चर्चा दोनों में जोश में रहने वाले चन्द्र विकाश भी थे| कुल मिलकर गोविन्दजी के व्यक्तित्व और राष्ट्रिय स्वाभिमान आन्दोलन के कार्यकर्ता सुरेन्द्र बिष्ट, सुरजीत, सुदेश, अतुल अग्रवाल, राकेश दुबे, रमेश कुमार जी की मेहनत देश के अनेक लोगों को एक मंच पर लाने में सफल हुई|

जब विभिन्न वक्ता अपने विचार व्यक्त कर रहे थे, कोने में बैठकर सामान्य लोगों के विचार सुनना बड़ा आनंददायी था| कुछ मिडिया के मित्र भी थे इन्ही लोगों में| तब तक ये बात स्पष्ट हो गयी थी की पुलिस ने शांति मार्च को अनुमति नहीं दी है| मिडिया के मित्र इस बात से बड़े निराश थे| कह रहे थे ये लोग तो बड़े शांति से आन्दोलन कर रहे है | न तो लाठी चार्ज होगा ना और कुछ, तो खबर क्या बनेगी?  हुआ भी ऐसा ही पुलिस ने मार्च को सांकेतिक रूप से होने दिया २०० कदम मौन चलने के बाद पुलिस ने कहा हम आगे नहीं जाने देंगे| आन्दोलनकारियों ने गिरफ्तारी दी| गोविन्दजी, वैदिक जी सबने शांति से बैठने को कहा| ५०० लोग बैठ गए ना नारे लग रहे थे ना कुछ केवल हाथ में लगी तख्तियां और मुह पर बंधी कलि पट्टी चिल्ला चिल्ला कर लोकतान्त्रिक अधिकारों की दुहाई दे रही थी|  बसों का इंतज़ार बैठकर हुआ| प्रेम से बस में सब बैठ गए और दरियागंज थाने में गए| 

सरकार ३ किमी के मार्च को भी नहीं होने देना चाहती| किस बात से डरती है| इतना अनुशासित आन्दोलन फिर भी ये दमन? दाल में कुछ काला नहीं सारी दाल ही काली है|  हाँ सब लोग इकट्ठा आ गए ये जरुर सरकार के लिए खतरे की घंटी है| बड़ी  मेहनत से मिडिया पर खर्चा कर बाबा – अन्ना में फूट की खबरे बना ली थी| अब तो सब फिर एक हो रहे है| आन्दोलन अब और सर्वव्यापी होगा| दमन करके इसे दबाया नहीं जा सकता| युवा जाग उठा है| अब वो नेतृत्व की प्रतीक्षा नहीं करेगा, स्वयं नेतृत्व प्रदान करेगा| गोविन्दाचार्य जी जैसे संयोजक ऐसे युवा नेतृत्व का पोषण कर उन्हें जोड़े रखेंगे तो पूरा देश एक होगा|  शनिवार को राजघाट पर बात सत्ता बदलने की नहीं व्यवस्था बदलने की हो रही थी| राज्य की नहीं राष्ट्र के निर्माण की बात है| कोई राजनीती नहीं| फिर मिडिया के लिए क्या होगा? रविवार को हिंदी अखबारों ने तो खबर दी आन्दोलन की पर अंग्रेजों के लिए तो प्रश्न शायद यही रहा ऐसे शांतिपूर्ण निरामिष वेज आन्दोलन में खबर क्या बनेगी?

जून 19, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 5 टिप्पणियाँ

Chankya : Pradigm of the new world order


The whole world is talking about the demographic dividend that the countries like Bharat and China have. It is expected that the largest population of the employable youth in the whole world will be concentrated in Bharat. Though china has almost one and half times more populated than Bharat, the population in the youth age group is reducing due to the stringent population control measures china adopted in the second half of last century. The other aspect of the demographic dividend is that the employability of the young population. Here comes the role of education. As we know for last one year the US president Barak Hussain Obama has been warning the Americans about the Bharatiya youth taking their jobs. He talked about the the education of Bharat being more superior to the US. And has repeatedly asked the US universities to gear up to compete with Bhartiya institutes of higher learning. These were more warnings to their education rather than praise for our educational system. They have changed their visa policy to safeguard the jobs from Bharatiya immigrants. He topped it all in his visit to the school in Mumbai where he declared that the day was not far when Americans will start coming to Bharat for learning.

This is nothing new. We all know that there were times when the whole world used to come here for learning. Till the first part of the 19th century we had well spread educational system. All were given free primary education. Irrespective of caste or socio-economic status everyone was given education according to their needs. Prof Dharmpal has brought out the report of a survey done by the British collectors and submitted to the Privy Council in 1823. http://www.samanvaya.com/dharampal/ When we read that report we are surprised to know that the so called backward class was also fully educated and their were teachers abound from these sections/castes. So this was the state of our nation not in the distant history but just a 200 hundred years. Prof Dharampal says that the educational system in Bharat inspired the spread of primary education first in Briton and then in whole of Europe.

So these are the two facts about Bharat’s educational supremacy in the whole world. But do we feel proud of our education today. Even if Obama may shout on the top of his voice there would hardly be anyone in Bharat who is satisfied with the condition of either our schooling or the higher education. There are articles in the media, surveys and also the day to day experience of most of us that all is not well in our educational system. Why this difference of perception. Obama sees Bharatiya Educational System as threat and we consider the same system rotten. We have passed a bill in the parliament to invite foreign universities to start their campus here. The worst part of the bill is that the language is that of an inferior country. The same act could have been phrased realistically if the drafting law officer of the HRD ministry had little pride in the nation. Again it the failure of the educational system that the well educated civil servant of such seniority lacks national pride.

We are not satisfied with our existing educational system because somewhere deep within unknowingly we feel that it is not rooted in our own past. It is not our educational system. It is not Bharatiya. We may not on the face of it understand what constitutes this Bhartiyata. But we feel it. We have a sense of it. This Bhartiyata has to reflect itself in all the walks of life. In all the socio-economic-political systems of our modern nation. This is the real nation building that needs to be attended to. How to go about it. We have to first understand our own system. Here we are talking about the education so let us try to understand what are principles on which such a system was created which could provide education to all even in the 19th century, after so many invasions and foreign rule for more than a millennium. Swami Vivekananda says that if you do not have pride in your own history you will not be able to create a bright future. He says standing on the firm foundation of the past only you will be able to look into the future.

So one of the easiest way to understand the Bharatiya National educational system is to understand our great teachers. The one name that stands out bright in the history of great teachers is Chanakya. The teacher of the great university of Takshashila (now in Afghanistan) who created a great Maurya empire. A teacher could create such student and such system which would integrate the whole nation. The backdrop is the brutal attack of the Great(?) Alexander. He brutally attacks the civilized Bharatiya principalities and republics. But has to return accepting defeat at the hands of the unorganized but inspired force of common mass of the great Bharat. But the teacher is not happy. Chanakya sees this as a challenge to this great civilization. Which with all it economic prosperity and ideal social order, great knowledge of the spiritual and the physical; this nation has failed in creating a strong political system which could protect its bounty and the righteous masses. Chanakya understood the need of the hour to create an example of  strong state mechanism based on the universal principles of existence called as laws of being( Dharma) traditionally. So he creates a leader in the form of Chandragupta and dedicated team of his associates and then conquers the greatest empire of the time Magadha and establishes the common umbrella of a chakravarty to protect the individuality of the diversity of expression of the inherent unity. We all know the story, so let us try to understand the concept, what makes Chanakya the great teacher. So that we can create such nation building teachers even today.

  1. Pride of being Teacher : Chanakya is a proud teacher. HE understands the creative power of the teacher hence is not afraid of the king. He challenges the King of Takshashila when Ambhi decides to side with the invader. He is apt in replying the Magadha Emperor Dhananand – A teacher does not beg, he creates. He has the capacity to create the emperors. This confidence is the backbone of Chanakya. When he did not have any one with him, any material support even then he is confident of success of his plan.
  2. The National character : This pride and confidence was not the product of individual achievement but was deep-rooted in the national pride. Chanakya had firm faith in the timeless (Sanatan) principle of Bharatiya jivan. He had practiced it in his own life and realized the truth of it. This adherence to the Dharma had created the selfless goal of national reconstruction. He knew that this is the purpose of his being a teacher to apply these universal principles to the present time. His goal was not personal as misinterpreted in some history books. It was not revenge of the individual insult but a correction of the whole political system of self-centric supremacy of the ruler. His aim was to re create a political system sensitive to the need of the time  and the plight of the masses. As he explains afterwards in his great treatise “Arthashastra”, a system that delivers best to the Praja (better born). He does not have any personal agenda. This selflessness is the greatest strength of the teacher. He lives and teaches for the sake of the nation. Chanakya has no personal animosity. Hence for the good of the nation he invites, even forces the Nanda Prime minister Katyayana (sometimes referred to as Rakshasa for his strict discipline) to take the prime ministership of Chandragupta. He state in Kautilya’s Arthashastra – to a king (read State) there are no permanent friends or enemies. The National interest dictates the royal relations. He is one of the rare Bharatiya philosopher who understands and also explains the concept of enemy.
  3. The Team Builder : Chanakya is able to create a great mauryan empire on his strength of team building. He not only trained Chandragupta but also built able and dedicated associates who formed a formidable team. The goal of the team was clear and always remembered by all the team members. Chanakya makes it sure that they do not forget their collective goal in the din & dust of day to day politics. All the team members are clear about their own roles in the grand scheme of things. This was the expertise of the great teacher to understand, encourage and facilitate the realization of the inherent potential of each of his disciples in the best chosen role. Here the individual also expresses his best and at the same time is able to contribute to the collective achievement. This became the basis of the principle of collective decision making and collecting sharing of responsibilities & credit by the council of minister in the ideal political system created by the great Kautilya. Till date collective responsibility of the cabinet is the basis of a successful parliamentary democracy.
  4. The Theorizer : the greatness of Chanakya is after creating the empire successfully does not become one of the beneficiary but instead goes to his proverbial hut and chronicles his conclusions into a well bound theory for the posterity to follow. As Swami Vivekananda says, “Life is laboratory for one to explore and experiment.” For Chanakya the nanda conquest and formation of the Maurya empire is but an experiment. He writes the conclusions in the form of the great treatise of Political science, economics and governance : Kautilya’s Arthashastra. Even today it is considered to be great guide in formulating the doctrines and strategies for building a strong State power.

Bharat needs to understand Chanakya and follow the principles led down by him if she has to fulfill her destiny. The world is saying that Bharat is not only an emerging power but already  super power just she has to proclaim it to the whole world with her OWN voice. Today when all the philosophies are crumbling and the humanity is devoid of any paradigm of a holistic life, Bharat has the onus to provide the sustainable alternative paradigm of world order. Who else but the great teacher Chanakya can be our guide in this hour of reckoning!

जून 14, 2011 Posted by | चरित्र, English Posts | 1 टिप्पणी

बाबा और अण्णा के आंदोलन से उपजे प्रश्न?


देश परिवर्तन चाहता है। चाहे अण्णा का आंदोलन हो या बाबा का जिस उत्साह से लाखों भारतीय इस आन्दोलन में कूद पड़े वो इस बात का द्योतक है कि इस अन्यायकारी व्यवस्था से देश के युवा का मोहभंग हुआ है। भ्रष्टाचार या काले धन को तो मिटाना ही है पर देश पूरा परिवर्तन चाहता है। यह जागरण सर्वत्र है। जहां अण्णा के ओदोलन में शहरी लोग अधिक संख्या में उत्साह से सहभागी हुए वही बाबा के आंदोलन में दूर दूर के गांव कस्बे के लोगों की भी सहभागिता हुई। सत्ता का केन्द्र इस परिवर्तन के आंदोलन से उद्वेलित हो गया है। स्वाभाविक ही है जो चल रहा है उसका दायित्व भी उनका ही है और इस सड़ी गली व्यवस्था से वे ही सर्वाधिक लाभान्वित हो रहे है।
भारत की वर्तमान स्थिति के बारे में तीन बातें स्पष्ट है। पहली बात तो ये कि आज हमारे देश के युवा में एक आशावाद जन्मा है। स्वप्न जगे हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को अधिक सुखद बनाना चाहता है। गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहता है। सबको लगता है कि उसके लिये अवसर भी है और नहीं है तो होने चाहिये। इस आशावाद से अपेक्षायें बढ़ी है। शासन से भी अपेक्षयें बढ़ी है।
दूसरी बात ये है कि सरकार और देश की राजनीति सम्भवतः इस परिवर्तन के साथ अपने रवैये को नहीं बदल पा रही है। उनकी संवेदनहीनता का परिणाम ये हे कि देश में प्रचण्ड क्रोध है। हर स्तर पर महंगाई, भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता से पूरे देश में हर स्तर का व्यक्ति त्रस्त है और गुस्से में है।
तिसरी बात ये है कि मिडिया के माध्यम से घोटालों के बाद घोटालों के बाहर आने के बाद जो जनता में घृणा और गुस्से का वातावरण जगा उसको कोई राजनितिक उपकरण नहीं मिला। विपक्षी दलों की विश्वसनीयता पर भी मिडिया ने प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। इस आस्थाहीनता ने लोगों में निराशा छा गयी।
इन तीन बातों का परिणाम हुआ कि जब बाबा रामदेव ने देशभर में पदयात्रा के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरूद्ध जनजागरण प्रारम्भ किया तो पूरा देश इसमें जुड़ गया। अण्णा हजारे के आन्दोलन को मिले मिड़िया कवरेज ने देश के शहरी युवा को इस मुद्देपर आवाज़ उठाने का अवसर प्रदान किया। इसी के चलते अण्णा के आन्दोलन को उत्सफूर्त प्रतिसाद प्राप्त हुआ।
बाबा रामदेव का आन्दोलन अधिक सुनियोजित था। सारे देश से लोग रामलीला मैदान में एकत्रित हुए थे। दिन में तो संख्या एक लाख के पार हो गई थी। रात को भी 50000 से अधिक लोग अनशन में सहभागी हो रहे थे। इस जनसहभाग ने सरकार की नीन्द उडा दी। मुद्दों से ध्यान हटाने के लिये साम्प्रदायिकता का विषय उठाने का प्रयत्न हुआ। पर बाबा के आन्दोलन को सभी सम्प्रदायों का समर्थन था। देवबन्द के मौलाना मदनी ने मंच से घोषणा की कि रविवार को हजारों मुसलमान इस संघर्ष में सम्मिलित होंगे। पता नहीं किस कारण से पर शासन के नियोजक बौखला गये।
बौखलाहट इतनी कि आधी रात के अंधेरे में शांत प्रार्थना करनेवाले साधकों पर निर्मम अत्याचार किये गये। लोगों की चोटें हमने अपनी आंखों से देखी है। अस्पतालों में कराहते लोगों की आंखों में भी संकल्प का ज्वार मन को आश्वस्त कर देता है। देश में सैकड़ों लोग अपने घरों के सुरक्षित वातावरण में समाचार वाहिनियों वा भ्रमित करती चर्चाओं को सुनकर भलेही ये सोचते रहे कि कुछ नहीं बदलेगा, पर रविवार की सुबह सड़कों पर, गुरूद्वारा बंगलासाहिब में, आर्यसमाज मंदिरों में एकत्रित आंदोलनकारियों के संकल्प को जिसने देखा है वो ही जान सकता है कि परिवर्तन का शंखनाद हो चुका है। सत्तालोलुप दुष्ट इस आग को अब अधिक देर नहीं दबा पायेंगे।
सरकार कुछ नहीं करना चाहती ये तो दमन से ही स्पष्ट है। बाबा के अनश्न को तोड़ने के लिये कोई ठोस प्रयत्न ना करना शासन के अंहकार को ही दर्शाता है। मूल मूद्दों को छोडकर साम्प्रदायिकता की बाते करना, व्यक्तिगत आक्षेप लगाना ये दर्शाता है कि सरकार बूरी तरहा से ड़र गयी है। सत्ता का दंभ सोचता है कि चरित्र हनन, सौदेबाजी अथवा दमन से आन्दोलन के नेतृत्व को दबा देने से परिवर्तन टल जायेगा। इसी के अन्तर्गत पतंजली योग पीठ पर कारवाई की जारही है। पर इस आंदोलन की सर्वव्यापकता ने अनेक युवाओं को नेतृत्व का प्रशिक्षण दे दिया है। गांव गांव में समर्पित युवा संकल्प के साथ कटिबद्ध हो गये है। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन व 1974 के जे पी आन्दोलन के समान ही इस काले धन विरोधाीआन्दोलन ने युवा नेतृत्व को जन्म दिया है। आक्रोश और क्रोध सुलग रहा है। इसे दबाया नहीं जा सकता।
रविवार रात की घटना के बाद सोमवार की सुबह दिल्ली का एक आॅटो वाला कहता है कल रात केवल बाबा का अपमान नहीं हुआ हम सब का अपमान हुआ है सारी जनता का अपमान हुआ है। इसका परिणाम चुनाव में दिखेगा। जब उसे बताया कि चुनाव अभी दूर है तो वो बोला अगले साल दिल्ली के तो है ना? हम दिखा देंगे। नया भारत जाग गया है। इस वर्ष के विधानसभा चुनावों में हमने देखा कि बड़ी संख्या में लोग मतदान के लिये आगे आये। 80-85 प्रतिशत मतदान सब जगहा हुआ। लोकतन्त्र के उपकरणों पर आज भी भारत का धार्मिक समाज विश्वास रखता है। और उसी के माध्यम से देश के भवितव्य को बदलने की मंशा रखता है।
भारत में अचानक क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होतें हमने हर बार व्यवस्था को व्यवस्था के उपकरणों का प्रयोग करके ही बदला है। यहां तक की स्वतन्त्रता का आंदोलन भी औपनैवेशिक संविधान के अन्तर्गत ही हमने किया। आज उसी को बदनले का यह प्रसव पीड़न चल रहा है। व्यवस्था बदलेगी चुनाव के प्रस्थापित तन्त्र के द्वारा। पर क्या हमारा राजनैतिक नेतृत्व इस प्रसव को धारण कर नवीन को जन्म देने के लिये तैयार है। जनता के आक्रोश से हुआ सत्ता परिवर्तन क्या व्यवस्था परिवर्तन बनेगा? क्या विपक्ष व्यवस्था का विकल्प समाज के सामने रख पायेगा? क्या भारत के हजारों वर्षों के ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित सच्ची स्वदेशी व्यवस्था का जन्म हो पायेगा?
बाबा और अण्णा के आंदोलन देश की संवेदनशील मेधा के सम्मूख ये प्रश्न छोड़ गये है। राजनीति तो परिवर्तन का माध्यम बनती है पर उससे पूर्व विचारकों के स्तर पर पूर्ण मंथन होना आवश्यक है। इस मंथन में देश के प्रबुद्ध वर्ग को सक्रीय होना होगा। भारत के महाशक्ति बनने में सबसे बड़ी बाधा यह विदेशी, कालातीत, भ्रष्ट व्यवस्था है। समर्थ भारत विश्व का नेतृत्व करने के लिये सन्नध हो रहा है उसी का अंग यह व्यवस्था परिवर्तन है। संवेदनशील, इमानदार व सर्वस्पर्शी विकास को धारण करने वाली व्यवस्था को भारत को लाना ही होगा।

जून 13, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , | टिप्पणी करे

   

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