उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

बाबा और अण्णा के आंदोलन से उपजे प्रश्न?


देश परिवर्तन चाहता है। चाहे अण्णा का आंदोलन हो या बाबा का जिस उत्साह से लाखों भारतीय इस आन्दोलन में कूद पड़े वो इस बात का द्योतक है कि इस अन्यायकारी व्यवस्था से देश के युवा का मोहभंग हुआ है। भ्रष्टाचार या काले धन को तो मिटाना ही है पर देश पूरा परिवर्तन चाहता है। यह जागरण सर्वत्र है। जहां अण्णा के ओदोलन में शहरी लोग अधिक संख्या में उत्साह से सहभागी हुए वही बाबा के आंदोलन में दूर दूर के गांव कस्बे के लोगों की भी सहभागिता हुई। सत्ता का केन्द्र इस परिवर्तन के आंदोलन से उद्वेलित हो गया है। स्वाभाविक ही है जो चल रहा है उसका दायित्व भी उनका ही है और इस सड़ी गली व्यवस्था से वे ही सर्वाधिक लाभान्वित हो रहे है।
भारत की वर्तमान स्थिति के बारे में तीन बातें स्पष्ट है। पहली बात तो ये कि आज हमारे देश के युवा में एक आशावाद जन्मा है। स्वप्न जगे हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को अधिक सुखद बनाना चाहता है। गरीब से गरीब व्यक्ति अपने बच्चों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देना चाहता है। सबको लगता है कि उसके लिये अवसर भी है और नहीं है तो होने चाहिये। इस आशावाद से अपेक्षायें बढ़ी है। शासन से भी अपेक्षयें बढ़ी है।
दूसरी बात ये है कि सरकार और देश की राजनीति सम्भवतः इस परिवर्तन के साथ अपने रवैये को नहीं बदल पा रही है। उनकी संवेदनहीनता का परिणाम ये हे कि देश में प्रचण्ड क्रोध है। हर स्तर पर महंगाई, भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता से पूरे देश में हर स्तर का व्यक्ति त्रस्त है और गुस्से में है।
तिसरी बात ये है कि मिडिया के माध्यम से घोटालों के बाद घोटालों के बाहर आने के बाद जो जनता में घृणा और गुस्से का वातावरण जगा उसको कोई राजनितिक उपकरण नहीं मिला। विपक्षी दलों की विश्वसनीयता पर भी मिडिया ने प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। इस आस्थाहीनता ने लोगों में निराशा छा गयी।
इन तीन बातों का परिणाम हुआ कि जब बाबा रामदेव ने देशभर में पदयात्रा के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरूद्ध जनजागरण प्रारम्भ किया तो पूरा देश इसमें जुड़ गया। अण्णा हजारे के आन्दोलन को मिले मिड़िया कवरेज ने देश के शहरी युवा को इस मुद्देपर आवाज़ उठाने का अवसर प्रदान किया। इसी के चलते अण्णा के आन्दोलन को उत्सफूर्त प्रतिसाद प्राप्त हुआ।
बाबा रामदेव का आन्दोलन अधिक सुनियोजित था। सारे देश से लोग रामलीला मैदान में एकत्रित हुए थे। दिन में तो संख्या एक लाख के पार हो गई थी। रात को भी 50000 से अधिक लोग अनशन में सहभागी हो रहे थे। इस जनसहभाग ने सरकार की नीन्द उडा दी। मुद्दों से ध्यान हटाने के लिये साम्प्रदायिकता का विषय उठाने का प्रयत्न हुआ। पर बाबा के आन्दोलन को सभी सम्प्रदायों का समर्थन था। देवबन्द के मौलाना मदनी ने मंच से घोषणा की कि रविवार को हजारों मुसलमान इस संघर्ष में सम्मिलित होंगे। पता नहीं किस कारण से पर शासन के नियोजक बौखला गये।
बौखलाहट इतनी कि आधी रात के अंधेरे में शांत प्रार्थना करनेवाले साधकों पर निर्मम अत्याचार किये गये। लोगों की चोटें हमने अपनी आंखों से देखी है। अस्पतालों में कराहते लोगों की आंखों में भी संकल्प का ज्वार मन को आश्वस्त कर देता है। देश में सैकड़ों लोग अपने घरों के सुरक्षित वातावरण में समाचार वाहिनियों वा भ्रमित करती चर्चाओं को सुनकर भलेही ये सोचते रहे कि कुछ नहीं बदलेगा, पर रविवार की सुबह सड़कों पर, गुरूद्वारा बंगलासाहिब में, आर्यसमाज मंदिरों में एकत्रित आंदोलनकारियों के संकल्प को जिसने देखा है वो ही जान सकता है कि परिवर्तन का शंखनाद हो चुका है। सत्तालोलुप दुष्ट इस आग को अब अधिक देर नहीं दबा पायेंगे।
सरकार कुछ नहीं करना चाहती ये तो दमन से ही स्पष्ट है। बाबा के अनश्न को तोड़ने के लिये कोई ठोस प्रयत्न ना करना शासन के अंहकार को ही दर्शाता है। मूल मूद्दों को छोडकर साम्प्रदायिकता की बाते करना, व्यक्तिगत आक्षेप लगाना ये दर्शाता है कि सरकार बूरी तरहा से ड़र गयी है। सत्ता का दंभ सोचता है कि चरित्र हनन, सौदेबाजी अथवा दमन से आन्दोलन के नेतृत्व को दबा देने से परिवर्तन टल जायेगा। इसी के अन्तर्गत पतंजली योग पीठ पर कारवाई की जारही है। पर इस आंदोलन की सर्वव्यापकता ने अनेक युवाओं को नेतृत्व का प्रशिक्षण दे दिया है। गांव गांव में समर्पित युवा संकल्प के साथ कटिबद्ध हो गये है। 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन व 1974 के जे पी आन्दोलन के समान ही इस काले धन विरोधाीआन्दोलन ने युवा नेतृत्व को जन्म दिया है। आक्रोश और क्रोध सुलग रहा है। इसे दबाया नहीं जा सकता।
रविवार रात की घटना के बाद सोमवार की सुबह दिल्ली का एक आॅटो वाला कहता है कल रात केवल बाबा का अपमान नहीं हुआ हम सब का अपमान हुआ है सारी जनता का अपमान हुआ है। इसका परिणाम चुनाव में दिखेगा। जब उसे बताया कि चुनाव अभी दूर है तो वो बोला अगले साल दिल्ली के तो है ना? हम दिखा देंगे। नया भारत जाग गया है। इस वर्ष के विधानसभा चुनावों में हमने देखा कि बड़ी संख्या में लोग मतदान के लिये आगे आये। 80-85 प्रतिशत मतदान सब जगहा हुआ। लोकतन्त्र के उपकरणों पर आज भी भारत का धार्मिक समाज विश्वास रखता है। और उसी के माध्यम से देश के भवितव्य को बदलने की मंशा रखता है।
भारत में अचानक क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होतें हमने हर बार व्यवस्था को व्यवस्था के उपकरणों का प्रयोग करके ही बदला है। यहां तक की स्वतन्त्रता का आंदोलन भी औपनैवेशिक संविधान के अन्तर्गत ही हमने किया। आज उसी को बदनले का यह प्रसव पीड़न चल रहा है। व्यवस्था बदलेगी चुनाव के प्रस्थापित तन्त्र के द्वारा। पर क्या हमारा राजनैतिक नेतृत्व इस प्रसव को धारण कर नवीन को जन्म देने के लिये तैयार है। जनता के आक्रोश से हुआ सत्ता परिवर्तन क्या व्यवस्था परिवर्तन बनेगा? क्या विपक्ष व्यवस्था का विकल्प समाज के सामने रख पायेगा? क्या भारत के हजारों वर्षों के ऐतिहासिक अनुभव पर आधारित सच्ची स्वदेशी व्यवस्था का जन्म हो पायेगा?
बाबा और अण्णा के आंदोलन देश की संवेदनशील मेधा के सम्मूख ये प्रश्न छोड़ गये है। राजनीति तो परिवर्तन का माध्यम बनती है पर उससे पूर्व विचारकों के स्तर पर पूर्ण मंथन होना आवश्यक है। इस मंथन में देश के प्रबुद्ध वर्ग को सक्रीय होना होगा। भारत के महाशक्ति बनने में सबसे बड़ी बाधा यह विदेशी, कालातीत, भ्रष्ट व्यवस्था है। समर्थ भारत विश्व का नेतृत्व करने के लिये सन्नध हो रहा है उसी का अंग यह व्यवस्था परिवर्तन है। संवेदनशील, इमानदार व सर्वस्पर्शी विकास को धारण करने वाली व्यवस्था को भारत को लाना ही होगा।

जून 13, 2011 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | ,

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