उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

खबर क्या बनेगी?


१८ जून की शाम ५ बजे राजघाट का दृश्य बड़ा विश्वास बढ़ाने वाला था | कितने भिन्न भिन्न विचारधारा के लोग एक मुद्दे पर एकमत होकर उत्साह के साथ किन्तु पूर्ण अनुशासन में विरोध प्रदर्शित कर रहे थे| भारतीय लोकतंत्र की यह ताकद है| यहाँ जन जन अपनी बात को शांति से रखने का साहस रखता है| बात शासन द्वारा इसी अधिकार के दमन की ही थी| क्या शांति से विरोध प्रगट करने का अधिकार भी लोकतंत्र खो देगा? यह प्रश्न था| ४ जून की रात रामलीला मैदान में हुई रावणलीला के प्रति अपना विरोध दर्ज करने विभिन्न मुद्दों पर काम करने वाले कार्यकर्ता आये थे| सबका प्रेम भाईचारा देखने लायक था| गोविन्दाचार्य, आरिफ मोहम्मद खान और रामबहादुर राय जैसे राष्ट्रीय स्तर के स्थापित नेताओं के साथ २०-२२ साल के देवेन्द्र पई, तेजिन्द्र्पल सिंह और अनूप जैसे कार्यकर्ता सहजता से अपनी बात कर पा रहे थे|
पि वि राजगोपाल थे जो वनवासियों के मध्य आन्दोलन करते है और अपने वाम झुकाव के बारे में स्पष्ट है| पर उनके मन में गोविन्दजी जिनको मिडिया लगातार संघ के सूत्र के रूप में प्रचारित कर रहा है उनके प्रति आदर व स्नेह देखने लायक था| छद्म सेकुलर वाद के विरुद्ध उच्चतम न्यायलय से लेकर सभी मंचों पर अपने विचार स्पष्टता से रखने वाली अधिवक्ता श्रीमती मीनाक्षी लेखी भी मंच पर थी| अपने स्पष्ट सिद्धांतो के लिए ख्यातनाम जे एस राजपूत जी भी थे| भोपाल से अनिल सौमित्र भी आये थे तो दीनदयाल शोध संस्थान  के  अतुल जैन भी थे| अर्थात परिवार की भी पूरी उपस्थिति थी|  १९७४ के जे पि आन्दोलन के अनुभवी संजय पासवान भी आये थे | रामदेव बाबा के अनुयायी भी बड़ी संख्या में थे| श्री श्री रविशंकर जी के अनुयायी भी थे| नेताजी सुभाषचंद्र बोस आई एन ए ट्रस्ट के ब्रिगेडियर छिक्कारा और त्यागीजी आझाद हिंद सेना की टोपी लगाकर चमक रहे थे| वो अपने साथ ५० टोपियाँ भी लाये थे और सब आन्दोलनकारियों में इन टोपियों के प्रति आकर्षण था| मुंबई से लोकसत्ता दल के सुरेन्द्र श्रीवास्तव भी आये थे| तो मंच और फुटपाथ की चर्चा दोनों में जोश में रहने वाले चन्द्र विकाश भी थे| कुल मिलकर गोविन्दजी के व्यक्तित्व और राष्ट्रिय स्वाभिमान आन्दोलन के कार्यकर्ता सुरेन्द्र बिष्ट, सुरजीत, सुदेश, अतुल अग्रवाल, राकेश दुबे, रमेश कुमार जी की मेहनत देश के अनेक लोगों को एक मंच पर लाने में सफल हुई|

जब विभिन्न वक्ता अपने विचार व्यक्त कर रहे थे, कोने में बैठकर सामान्य लोगों के विचार सुनना बड़ा आनंददायी था| कुछ मिडिया के मित्र भी थे इन्ही लोगों में| तब तक ये बात स्पष्ट हो गयी थी की पुलिस ने शांति मार्च को अनुमति नहीं दी है| मिडिया के मित्र इस बात से बड़े निराश थे| कह रहे थे ये लोग तो बड़े शांति से आन्दोलन कर रहे है | न तो लाठी चार्ज होगा ना और कुछ, तो खबर क्या बनेगी?  हुआ भी ऐसा ही पुलिस ने मार्च को सांकेतिक रूप से होने दिया २०० कदम मौन चलने के बाद पुलिस ने कहा हम आगे नहीं जाने देंगे| आन्दोलनकारियों ने गिरफ्तारी दी| गोविन्दजी, वैदिक जी सबने शांति से बैठने को कहा| ५०० लोग बैठ गए ना नारे लग रहे थे ना कुछ केवल हाथ में लगी तख्तियां और मुह पर बंधी कलि पट्टी चिल्ला चिल्ला कर लोकतान्त्रिक अधिकारों की दुहाई दे रही थी|  बसों का इंतज़ार बैठकर हुआ| प्रेम से बस में सब बैठ गए और दरियागंज थाने में गए| 

सरकार ३ किमी के मार्च को भी नहीं होने देना चाहती| किस बात से डरती है| इतना अनुशासित आन्दोलन फिर भी ये दमन? दाल में कुछ काला नहीं सारी दाल ही काली है|  हाँ सब लोग इकट्ठा आ गए ये जरुर सरकार के लिए खतरे की घंटी है| बड़ी  मेहनत से मिडिया पर खर्चा कर बाबा – अन्ना में फूट की खबरे बना ली थी| अब तो सब फिर एक हो रहे है| आन्दोलन अब और सर्वव्यापी होगा| दमन करके इसे दबाया नहीं जा सकता| युवा जाग उठा है| अब वो नेतृत्व की प्रतीक्षा नहीं करेगा, स्वयं नेतृत्व प्रदान करेगा| गोविन्दाचार्य जी जैसे संयोजक ऐसे युवा नेतृत्व का पोषण कर उन्हें जोड़े रखेंगे तो पूरा देश एक होगा|  शनिवार को राजघाट पर बात सत्ता बदलने की नहीं व्यवस्था बदलने की हो रही थी| राज्य की नहीं राष्ट्र के निर्माण की बात है| कोई राजनीती नहीं| फिर मिडिया के लिए क्या होगा? रविवार को हिंदी अखबारों ने तो खबर दी आन्दोलन की पर अंग्रेजों के लिए तो प्रश्न शायद यही रहा ऐसे शांतिपूर्ण निरामिष वेज आन्दोलन में खबर क्या बनेगी?

जून 19, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 5 टिप्पणियाँ

   

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