उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

सत्य पथ


सत्य का पथ
कहते है कि बडा
कन्ट्काकीर्ण होता है
सत्य का पथ !

पर
अनुभव तो है ये कि
सत्यपथ सदाही
मनोहर होता है।

हां बाधायें तो निश्चित
अधिक आयेंगी।
पर हौसला भी तो
औरों से अधिक होगा।
साथी भी भले
संख्या में कम लगे
पर होंगे सच्चे और पक्के।
सत्यपथ के
सहपथिक ही
साथी कहलाते है।

तो साथी कभी
अकेला
ना अनुभव करना।
चाहे देनी पडे
सैंकडों बार
अग्निपरीक्षा !

या किसी  धोबी के
भौंकने से
करना पडे बार बार
वनगमन!

हे मेरे सत्यपथी
छोडना न साथ
सत्य का
तोड़ना न व्रत
धर्म का …

जून 25, 2011 - Posted by | कविता

3 टिप्पणियाँ »

  1. In prose very nice poetry Sir G. The truth is always truth whether you like or not like.

    टिप्पणी द्वारा Babulal | जून 25, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. bhaiya ye to pta hi tha ki ap speech or article writing mein unbeatable hai but ap to poetry mein bhi unbeatable hai.
    And i m completely agreed with babulal bhaiya

    टिप्पणी द्वारा Deepesh | जुलाई 11, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. जहाँ राम का धनुष उठा हो धर्म की प्राण प्रतिष्ठा में,
    जहाँ कृष्ण ने चक्र चलाया सत्य विजय की निष्ठा में !!
    वसुधा का कल्याण हो जिससे ऋषियों ने वो काम किये,
    सुखी रहे जन जीवन जिससे प्रकृति ने वरदान दिए !!
    जहाँ की मिटटी का कण कण भी हमको ज्ञान सिखाता है,
    वीर प्रसविनी जग की जननी अपनी भारत माता है !!

    टिप्पणी द्वारा ABHINESH | नवम्बर 8, 2011 | प्रतिक्रिया


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