उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

प्रेरणा परशुराम की


भारत का आर्थिक महाशक्ति के रुप में विश्व में दबदबा बढ़ ही रहा है। एक तो स्वयं भारत की सामाजिक ताकद अपने आप को आर्थिक सुदृढ़ता के रुप में अभिव्यक्ति कर रही है साथ ही योरोप व अमेरिका वैश्विक मंदी तथा जापान में सुनामी के प्रभावों को झेल कर पूर्णतः कमजोर हो रहे है। गत माह ही अमेरिका का ऋण $14.7 ट्रीलियन डालर्स तक पहुँच गया है जो उसके सकल घरेलु उत्पाद GDP $13.6 ट्रीलियन डालर्स से भी अधिक है। यह एक अत्यन्त गंभीर आंताराष्ट्रीय घटना है जो भारत में भ्रष्टाचार के आन्दोलनों के मध्य समाचारों में दबकर रह गयी है। वास्तव में ये गंभीर वैश्विक स्थिति भारत को कालेधन और भ्रष्टाचार के भयावह परिणाम को अधोरेखित करने के लिये सबक सिखाती है। आज तो हमारे मध्यमवर्ग की उद्यमिता एवं बचत की आदत के भरोसे भारत महंगाई, बेरोजगारी व अव्यवस्था जैसी व्याधियों के बावजूद भी दृढ़ता से विकास पथपर अग्रेसर है। किन्तु इन बिमारियों के मूल में छिपे विकार का यदि निदान व उपचार नहीं किया गया तो फिर ये सुखकर स्थिति बहुत अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। यह जीवन शैली का विकार है। जिस जीवन शैली के कारण युनान से प्रारम्भ कर अमेरिका तक सारी विकसित अर्थव्यवस्थायें चरमरा रही है उसीका अनुसरण हम भारत में तेजी से करते जा रहे है। समाज में पाश्चात्य जीवनमूल्य प्रचण्ड गति से प्रतिष्ठा पा रहे है। फिर भी जैसे भारत की सनातन संस्कृति की मौलिक विशेषता है इस बाह्य परिवर्तन में भी हमारा समाज अपने मूल तत्व को संजोये रखने का सफल प्रयास कर रहा है। किन्तु राज्यव्यवस्था में हिन्दु तत्वों का आविर्भाव ना होने के कारण हम वैश्विक दबावों में अपनी व्यवस्था को भी उन्हीं आत्मघाती प्रभावों की ओर जाने से नहीं रोक पा रहे है।

सत्ता जब सार्वजनीन जनहित के स्थान पर स्वयं को ही बनाये रखने में व्यस्त हो जाती है तब प्रजातन्त्र के होते हुये भी विरोध असह्य हो जाता है और दमन अवश्यम्भावी। वैसे तो भारतीय संस्कृति में राजतन्त्र में भी क्षत्रीय का धर्म प्रजापालन ही होने के कारण राजा का प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व सर्वोपरि था। जब राजा का राज्याभिषेक होता था तो एक रिवाज में राजा कहता था ‘अदण्डोस्मि’ अब मै सार्वभौम हो गया हूँ और मुझे कोई दण्ड नहीं दे सकता। तब राजगुरू उसके मस्तक पर धर्मदण्ड का स्पर्श कराकर कहते थे ‘धर्मदण्डोसि’। तुम धर्म के अधीन हो और यदि धर्म के विपरित कार्य करोगे तो धर्म तुम्हें दण्डित करेगा। आज तो प्रजातन्त्र के शीर्षस्थ सत्ताधीश स्वयं को लोकपाल की पूछताछ के अधीन करने से भी कतरा रहे है। व्यवस्था में हिन्दु जीवनमूल्यों अर्थात धर्म के ना होने का ही यह परिणाम है।
धर्मदण्ड को ना माननेवाली सत्ता को सबक सीखाने का सामथ्र्य भी धर्मरक्षक धर्मात्माओं के पास था। जब क्षत्रीय अपने धर्म से च्युत हो गये तो भगवान् परशुराम ने 21 बार पूरी पृथ्वि को निःक्षत्रीय कर दिया। यह सत्ता पर धर्मको प्रस्थापित करने का कार्य था। परशुराम का चरित्र आज के समय में बड़ा ही मार्गदर्शक है। बचपन में पिता जमदग्नि की आज्ञा का पालन करते हुए माता रेणुका का शिरच्छेद करने का साहस और प्रसन्न पितासे माता के जीवन का वरदान मांगने की संवेदनशीलता; सत्ता के मद को धर्म का पाठ पढ़ाने का प्रयास करते जनआन्दोलनों में अनुशासन, आज्ञापालन व संवेदनशीलता का यह समन्वय वर्तमान समय की मांग है। परशुराम को हमारे शास्त्रों में विष्णु का अवतार माना गया है। भगवद्गीता के अनुसार अवतार का कार्य साधु अर्थात सज्जनों की रक्षा तथा दूष्टशक्ति अर्थात दूर्जनों के विनाश के द्वारा धर्मसंस्थापना का है। भगवान् परशुराम में हम देखते है कि जब दूर्जनशक्ति सत्ता में केन्द्रित हो जाये तो अपने पराक्रम के द्वारा उसको भी सही स्थान दिखाया जा सकता है।

भगवान परशुराम सात चिरंजीवों में आते है अर्थात यह तत्व सार्वकालीक है। सदा ही रहनेवाला है। किन्तु सदा रहने से भी अपनी बदलती भुमिका के प्रति वे सजग है। अतः रामायण में हम पाते है कि भगवान् राम के प्राकट्य के बाद मिथिला में शिवधनुष्य पर श्रीराम के प्रभुत्व का समाचार पाते ही परशुराम ने परीक्षा कर कोदण्ड के साथ ही अवतार का दायित्व रामजी को सौंप दिया। महाभारत में तो हम परशुराम जी की भुमिका और भी हाशियेपर देखते है। केवल कर्ण को ब्र्रह्मास्त्र का प्रशिक्षण तथा बादमें श्रापद्वारा विस्मरण में ही उनकी सक्रीय भूमिका दिखाई देती है। परशुराम के समान विराट व्यक्तित्व का समयानुकुल भूमिकाओं में समेटना भी वर्तमान समय में अनुकरणीय है।

आज पुनः जन जन में परशुराम का सत्व जागृत होने की महती आवश्यकता है। प्रजातन्त्र में सैद्धांतिक रूप से तो जन ही सार्वभौम है किन्तु व्यवहार में जब प्रशासन में सत्ता केन्द्रित हो जाये तब परशुराम को पुनः धर्मदण्ड धारण करना पड़ेगा।  व्यवस्था में सनातन तत्वों को सम्मिलित करने में हममें से प्रत्येक सहभागी हो सकता है। सरकार अपने नीति निर्धारण में जनता को योगदान करने का अवसर प्रदान करती है। प्रत्येक नये विधेयक के अनुलेखन में समाज को प्रतिक्रिया देने का अवसर दिया जाता है। केन्द्र भारती के जागरूक नागरिकों का कर्तव्य है कि ऐसे अवसरों का समुचित उपयोग करें। अभी काले धन पर जनता की राय जानने के लिये अणुडाक की घोषणा की गई है – bm-feedback@nic.in आज के परशुराम का परशु हमारी लेखनी, संगणक और वाणी ही है। इन उपकरणों के विवेकपूण प्रयोग से हम सत्ता को सन्मार्ग पर लाने का कर्तव्य निर्वाह कर सकें यह समय की मांग है|

जून 28, 2011 - Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , ,

4 टिप्पणियाँ »

  1. sach me Anna ji Aur Ramdev baba Parshuram ke hi avtar hain

    टिप्पणी द्वारा Murari Gupta | जून 29, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. bhaiya,
    ram ram,
    bhagwan parshuram ka smaran aaj shayad pratham bar raj vyavastha ko suvyavasthit karne ki drishti se kisi ne yad kiya hai . nishchay hi parshuram bhagvan ke jeevan uddeshya va karmayog ko samaj man me punaha sthapit karne ki aaj aavashyakta hai. is abhinav prayatna ke liye vinamra sadhuvad. bharat wani ke madhyam se is jagriti abhiyan ke vistar ke liye sakriya pahal hogi.
    vande mataram,
    lakhesh,
    sampadak – bharat wani
    nagpur.

    टिप्पणी द्वारा lakhesh chandrawanshi | जुलाई 2, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. आपका आलेख अत्यंत ज्ञानवर्धक और सही दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है ,परंतु माफ कीजिये भाई साहब, भगवान परशुराम को क्षत्रियों के विनाश के रूप में ही सदैव प्रस्तुत किया जाता रहा है । विशेषकर राजनीति में । जबकि जिस समय परशुराम जी का जन्म हुआ जन्म से जाति का निर्धारण नहीं होता था कर्मणा जाति तय की जाती थी। विशेषकर गुरु अपने छत्र का स्वभाव,गुण धर्म देखकर निर्धारित करते थे । इस दृष्टि से हम देखें तो परशुराम को क्षत्रिय ही माना जाना चाहिए ।

    टिप्पणी द्वारा Ram bhuwanSingh kushwah | जुलाई 4, 2011 | प्रतिक्रिया

    • कोई आपत्ति नहीं | पर सच्चा क्षत्रिय! जिसने सत्ता का न तो मोह किया न भोग| जब भी मदांध सत्ताधीशों को परस्त किया साडी जीती हुई भूमि को दान कर दिया और स्वयं साधना के लिए चल पड़े|

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | जुलाई 5, 2011 | प्रतिक्रिया


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