उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

खूब लड़ी…


सुभद्राकुमारी चौहान कि कविता से आज के राजनेताओं की खातिर कुछ पंक्तियाँ हटाई गयी| यह मजाक कवी के साथ नहीं हमारे इतिहास के साथ सदा ही होता रहा है| गद्दारों के वंशज सत्ता पर आसीन होकर देशभक्तों के इतिहास को मिटा देते है| देश वीरता को खोजता रहता है| नेतृत्व के आदर्श छद्म हो जाते है| खोखली अहिंसा भविष्य के दायित्व को कुचल देती है| अन्ना के मंच से नेताजी और सुभाष गायब हो जाते है| बाबा के नेताजी, शिवाजी के समान फरार होने के प्रयास में सावरकर की छलांग की भांति असफल हो जाने को कायरता समझा जाता है| क्या ऐसे आदर्श समाज को सही नेतृत्व दे सकते है? क्या इतिहास से सही सबक सीखे बिना इतिहास से क्षमा मांगी जा सकती है? वैसे भी २३ साल की आयु में जिस परिपक्वता और देशभक्ति का परिचय ताम्बे कुल में जन्मी मनु ने दिया था उसे सभाद्रकुमारी भी कहाँ पकड़ पायी थी अपने हरबोलों के छंदों में? रानी की रणनीति को गोरे भी न समझ पाए न हम भारतीय भी| पुरुष प्रधान परमपराओं के चलते कहो या चरित्रवान लोगों के अहम् विहीन संकोच के कारण कहो — ग्वालियर विजय के बाद नानासाहेब पेशवा को संयुक्त सेना का प्रमुख चुना गया| १५ दिन जश्न मन्नते रहेस्वतंत्रतासेनानी| यदि उस समय तात्या टोपे के प्रस्ताव के अनुसार नेतृत्व रानी लक्ष्मीबाई को सौंपा होता….. मंगल पण्डे के अतिउत्साह से हुई हानि के बावजूद १८५७ का परिणाम कुछ और होता| देश का इतिहास ऐसे अवसरों के झरोखें हमेशा खोलता है|

पर क्या हमारा नेतृत्व तैयार है माँ भारती की नियति को साकार करने??? क्या हम तैयार है नग्न इतिहास का सत्य सामना करने के लिए???

विश्व का सबसे बड़ा आतंकवादी मारा गया इस बात पर सारी दुनिया उत्सव मना रही है। बात भी इतनी महत्वपूर्ण है। इसिलिये इस घटना के भिन्न भिन्न पहलुओं के बारे में लगातार 24 घण्टे प्रसारित हेानेवाले माध्यम अनेक समाचार दिये गए। अमेरिकी चुनावों तक कुछ न कुछ तथ्य धीरे धीरे सामने आते रहेंगे और ये ओसामा को मरने का तमाशा चलता रहेगा| इन सब के बीच में एक कायकर्ता का ध्यान तो पूरे अभियान की सफलता के पीछे लगे पूर्व एवं पूर्ण नियोजन, कठीन परिश्रम तथा सुव्यवस्थित कार्यान्वयन की ओर जाता है। कहते है कि अगस्त 2010 से अमेरिकी गुप्तचर संस्थाओं को ओसामा के ठिकाने के संकेत मिल गये थे। पर पूरी निश्चितता के बाद ही पूरी तैयारी के साथ यह साहसिक अभियान सम्पन्न किया गया। इसिलिये 40 मिनट में ही सफलता मिली। हमारे पड़ोसी के सरकार को भनक तक नहीं लगने दी। ये अलग विषय है कि इस सबके बाद भी विश्व से कट्टरता समाप्त नहीं होने वाली ना ही पाकिस्तान आंतंक को पूरा समर्थन और प्रश्रय देता ही रहेगा। जिहाद की मानसिकता के विरूद्ध जबतक विश्वव्यापी अभिमत नहीं बनाया जाता तब तक आतेकवाद से युद्ध संभव नहीं। जो अमेरिका पाकिस्तान की सार्वभौमिकता को धताबता कर अपने लक्ष्य पूरा कर लेता है वही भारत को धैर्य की सीख देता है। पर उनको क्या दोष दें? हमारे देश में ही आतंक से लड़ने की मानसिकता कहाँ है?

इसका एक महत्वपूर्ण कारण है इतिहास के बारे में अनभिज्ञता या गलत जानकारी। इतिहास हमें वर्तमान में राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिये सीख देता है। वीर सावरकर ने 20 शती के प्रारम्भ में युवाओं में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिये अलख जगाने हेतु 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम का इतिहास लिखा था। विश्व इतिहास में एकमात्र पुस्तक जिसको छपने से पहले ही निषिद्ध (Ban) कर दिया गया। आज भी हमारे विश्वविद्यालयों में इस स्वतन्त्रता संग्राम को सिपाही विद्रोह के रूप में पढ़ाया जाता है। अंग्रजों द्वारा यह कहा जाना तो ठीक था कि ये विद्रोह है पर हम भी यदि यही कहेंगे तो इसका अर्थ है अंग्रेजी शासन को हम अपना मानते है और अपने देशवासियों को विद्रोही। वैसे भी ‘कमल रोटी’ के गुप्त संदेश से सुनियोजित 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम का ठीक से अध्ययन करने पर हम जानेंगे कि सैनिकों द्वारा अंग्रजों के विरूद्ध क्रांति तो 4 वर्षों के जन जागरण का सहज परिणाम मात्र था।

मंगल पाण्डे के अनियंत्रित भाव-विस्फोट ने सुनियोजित क्रांति को 20 दिन पहले ही प्रारम्भ कर दिया था। कई बार व्यक्तिगत आक्रोश राष्ट्रीय महत्व के कार्य को किस प्रकार की हानी पहुँचा सकता है इसका यह सबसे बड़ा उदाहरण है। 31 मई को सारे देश में एकसाथ जनआंन्दोलन शुरू होने की तैयारी थी। सूदूर दक्षिण में मैसूर में भी इस योजना के अनुसार ही 31 मई को युद्ध प्रारम्भ हुआ था, ये बहुत ही कम लोग जानते है। इस सब योजना को 4 वर्षों के कठोर परिश्रम से बनाया गया था। सुत्रधार थी मात्र 20 वर्षीय युवती झांसी की विधवा रानी लक्ष्मीबाई। दत्तक पुत्र दामोदर को डलहौजी ने मान्यता नहीं दी इसलिये केवल अपनी झांसी की रक्षा के लिये अर्थात केवल अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिये झांसी की रानी ने संग्राम किया ऐसा लिखनेवाले इतिहासकार अंग्रेजी सेनापति कर्नल ह्यू रोज की दैनंदिनी में रानी के बारे में टिप्पणियों को अवश्य पढ़ ले। रानी की वीरता, रणनीति कुशलता व नियोजन से वह अनुभवी सेनापति भी अचंभित था।

Original photo1857 के समर की योजना का सुत्रपात रानी की तीर्थयात्रा के समय हुआ। क्योंकि तीर्थयात्रा तो अनेक राजाओं, पेशवा बन्धु, अवध के नबाब की रानी हजरत महल व बहादुर शाह झफर की बेगम झीनत महल से सम्पर्क का माध्यम था। तात्या टोपे ने अन्य अनेक राजाओं से अपना सम्पर्क बनाया था। सभी का सकारात्मक रूख देख योजना बनने लगी। अगले वर्ष दत्तक पुत्र दामोदर के जन्मदिन को झांसी की रानी ने धुमधाम से मनाया। अनेक राजाओं को निमन्त्रण दिया था। यहां विशेष मंत्रणा हुई। मई-जून 1857 का समय तय हुआ ताकि इतनी गति से क्रांति हो कि वर्षा से पूर्व सब जगह अंग्रेजी सेना ना पहुँच सके। राजपुताना के कुछ घरानों व पंजाब से तात्या को सकारात्मक संकेत नहीं मिले थे। अतः योजना की गुप्तता को ध्यान में रखते हुए इनको क्रांति से अलग ही रखा गया।

झांसी की रानी की अपनी गुप्तचर सेना थी। दिवंगत पति के शौक को पुरा करने वाली नर्तकियों को रानी ने देशप्रेम से अपनी कला का प्रयोग देशसेवा में करने को तत्पर कर लिया था। अंग्रेज अंत तक नहीं जानते थे कि रानी की गुप्तचर सेना की नेता मोतीबाई थी। कर्नल ह्यू रोज के सी आई डी अफसर की रिपोर्ट में इस गुप्तचर प्रमुख का नाम एक पुरूष के रूप में मोती सांई दर्ज है। मोतीबाई और उसकी नर्तकियों ने अंग्रेजी छावनियों में नांच गानों के माध्यम से कमल रोटी का संदेश पहुँचाया था। मेरठ से भोपाल तक सभी छावनियाँ क्रांति के लिये तत्पर थी। इतनी अद्भूत रणनीति एकसाथ देशव्यापी संग्राम छेड़ना और ठीक उसी समय अंग्रजी सेना में भी विद्रोह याने दोनों तरफ से शत्रु का पराजय निश्चित था। इसलिये संगाम के प्रारम्भ में क्रांतिकारियों को अभूतपूर्व सफलता मिली थी। मंगल पाण्डे के क्रोध से अंग्रजों को मिले 20 अतिरिक्त दिन और 31 मई के नियत तिथि की गुप्तता का भंग होना यह पूर्ण विजय के सबसे बड़े बाधक बनें। रानी ने अंतिम बलिदान तक हार नहीं मानी। उनके शरीर को भी शत्रु छू तक ना सका।

बुंदेलखण्ड में कहते है, ‘रानी वह है जो केवल छुकर मिट्टी के ढ़ेलों से वीर उपज दे और हर पत्थर से शोला।’ प्रत्येक व्यक्ति में राष्ट्रभक्ति जगाकर उसे वीर सैनिक बना देना यह रानी की विशेषता थी। सखियों में से वीरांगनाओं की टूकड़ी बना दी। सागरसिंह जैसे बागी डकैत से वीर बलिदानी। नर्तकियों से गुप्तचर सेना का निर्माण और तो और केवल रानी के दर्शन से ही प्रेरित हो वंचित वर्ग की सामान्य गृहिणी झलकारी बाई बलिदान को तत्पर होती है।

वीरता, संग्राम व बलिदान की वर्तमान युग में भी महती आवश्यकता है। देश पुनः अपने सत्य अस्तीत्व की लड़ाई लड़ रहा है। ऐसे में यह जानना आवश्यक है कि इतिहास केवल ग्रंथों और पाठ्यक्रम में नहीं होता। जिन लोगों और ग्रामों में इतिहास घटित हुआ है वहाँ उसे जीवित रखना पड़ता है। रानी के स्पर्श से पावन हर स्थान उनकी स्मृति से प्रेरणा प्रदान करनेवाला तीर्थ बन जाये। झांसी के तो कोने कोने में रानी की कथायें है। झांसी से निकल रातोरात रानी जहाँ पहुँची उस भाण्डेर में पहूच नदी के किनारे रानी की स्मृति में प्रतिवर्ष मेला लगता है। बड़ी संख्या में महिलायें पहाड़ी पर बने देवी मंदिर पर मेले में आती है। आपस में कहती है, ‘‘यहीं कहीं रानी ने पूजा की थी। यही दामोदर को दूध पिलाया था।’’ इतिहास जीवित हो उठता है। आइये अपने गाव, जिले, निकट पडौस के राष्ट्रभक्त को ऐसे ही पुनर्जीवित करें। हुतात्माओं की चिताओं पर फिर लगें मेले इसी प्रार्थना के साथ सादर . . .

जुलाई 5, 2011 - Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , ,

5 टिप्पणियाँ »

  1. (Agrejo ke mitra sindhiya ne chhodi rajdhani thi) ye lekh books se hata diya hai…….iske bare me peaper mai pada tha…..kuchh or detaila chahiye

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | जुलाई 5, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. Jhansi ke kile ke andar talhati me ak Sfatik ki Shivling hai or aisi manyata ki vahi Ranai Laxmibai Roj pooja karne ati thi……..waha jate hi kafi anubhav ho jate haii………( Vrindavan lal varma ka ak upanyass hai ” Jhash ki rani” usme kafi Nayi jankari milti hai)……..jo mene BA I think 1year me padha tha………

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | जुलाई 5, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. Bahut prernadayi hai ye lekh.

    Sacchai ko samane lane ka net ek bahut sashakt madhyam hai;

    Aaj ke deshdrohi Itihas ko kitabo me kitna bhi bigad le, ab itihas to net par aakar aur aap jaiso ke pyas se sare vishwa me surya prakash ki tarah apni sacchai ka sabut denga..

    zhansi ki rani laxmibai ki jay.

    टिप्पणी द्वारा mahesh | जुलाई 6, 2011 | प्रतिक्रिया

  4. The photo referred as of Rani Laxmi Bai is of someone else. The collector of this photograph is avoiding to accept the truth for fear of the slashed price after exposure of the fact !

    टिप्पणी द्वारा Dr Alok Gupta | अगस्त 8, 2011 | प्रतिक्रिया

    • If you know whose photo it is, please tell. This was taken from Swaraj Bhavan Bhopal exhibition. So considered to be authentic. Who is the owner of the photograph. Please clarify.

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | अगस्त 8, 2011 | प्रतिक्रिया


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