उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

श्रद्धांजलि : जीवन मुक्त आजाद


कल २३ जुलाई देश के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद की जयंती थी| किसी अखबार में सरकारी विज्ञापन तो नहीं छपे पर पुरे राष्ट्र ने, युवा शक्ति ने उनके बलिदान को नामा किया | उत्तरापथ इस अद्भुत आलेख को उधार लेकर अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है| माँ भारती हम में  से ऐसे सैंकड़ो आजाद पुनः अवतरित करें इस प्राथना के साथ सदर …

साभार : वीरेश्वर उपाध्याय, हरिद्वार

चंद्रशेखर आजाद भी जीवन मुक्त आत्मा थे| ये इस संकल्प से आये थे कि हम तो सशस्त्र प्रतिरोध करेंगे और कुछ लोग कह रहे थे कि हम बौद्धिक प्रतिरोध करेंगे| तो भगवान् से  जिसे जैसा कार्य सौंपा गया था वो वैसा कार्य कर रहे थे|

आजाद ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि :-

मैं आजाद हूँ और आजीवन आजाद ही रहूँगा कभी पकड़ा नहीं जाऊंगा कोई पुलिस वाला मेरे जीवित शरीर को हाथ नहीं लगा पायेगा और न ही जेल खाने में बंद कर पायेगा |

उन्होंने एक और प्रतिज्ञा भी मन ही मन की थी कि :-

कभी किसी भारतीय पुलिस वाले को जान से नहीं मारूंगा

जब राजगुरु ने सांडर्स को मारा था तब उन्होंने भगत और राजगुरु को कवर देने के लिए भी उनका पीछा कर रहे हवलदार चनन सिंह द्वारा को कई  बार चेतावनी देने के बाद उसके पांवो में गोली मारी| अल्फ्रेड पार्क में भी विश्वेश्वर नामक पुलिस वाले द्वारा कई बार उन्हें भड़काने के उदेश्य से गाली देने पर ऐसा निशाना लगा की उसका जबड़ा ही टूट गया जान नहीं गई | मरते दम तक आजाद अपने हर प्रण पर कायम रहे इसकी प्रशंसा उनके शत्रुओं ने भी दिल खोलकर की|

आजाद स्वभाव से ही अन्याय और जोर जुल्म के विरोधी थे स्वयं खतरा उठाकर भी वे अन्याय पीड़ितों का पक्ष लेते थे और दुष्टों से भिड़ जाते थे इस बात के उदाहरण  उनके क्रांतिकारी जीवन में ही नहीं मिलते वरन जब वे काशी में संस्कृत के सामान्य विद्यार्थी थे तब भी यह विशेषता उनमें देखी जाती थी|  वहां एक गुंडा राह चलती बहु बेटियों को छेड़ा करता था| वह पुलिस से भी मिला रहता था इसलिए लोग उससे डरते थे |और उसकी जोर जबरदस्ती सहन करते थे |एक बार उसने बाजार में एक लड़की को छेड़ा और उसका हाथ पकड़ लिया| आजाद ने जो उसी मार्ग से जा रहे थे यह दृश्य देखा और उस गुंडे को डांटा|

वह आजाद हंसकर से कहने लगा –

” अपने रास्ते चला जा एक तमाचा मारूंगा तो बत्तीसों झड़ जायेंगे “

यद्यपि आजाद उस समय लड़के ही थे पर संयम तथा व्यायाम की बदोलत उनका शरीर काफी तगड़ा हो गया था| साहस उनके स्वभाव में सदा से ही था बस उन्होंने गुंडे को ललकारा और पटखनी देकर उसकी छाती पर बैठ गए और कहा की जब तक इसे बहिन कह कर नहीं पुकारेगा तब तक नहीं हटूंगा| अंत में गुंडे को ऐसा ही करना पड़ा| ऐसा जीवन भर उन्होंने कई बार किया| अन्याय करने वाला कोई भी हो ऐसी घटनाओं पर उन्हें क्रोध आ जाता था|

ये तरुण क्रांतिकारी जो संसार के सबसे अधिक प्रभावशाली ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकारियों से टक्कर लेने को खड़े हुए थे कितने साधन हीन थे| इन सुशिक्षित और अच्छे घरों के नवयुवकों ने देश की खातिर केवल अपने जीवन को ही खतरे में नहीं डाला वरन खाने पीने तक का इतना कष्ट उठाया| यह एक ऐसी बात है जिससे आज के सभी सार्वजानिक कार्यकर्त्ता प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं|

सेवा के क्षेत्र में वही कुछ ठोस कार्य कर सकता है जो सब तरह के शौकों  और आराम का ख्याल छोड़ कर सादगी का जीवन बिता सकता है|  अन्यथा जो लोग ऐसे कार्यों में भाग लेकर भी भोग विलास की भावना रखते हैं वे सेवा और परोपकार का कार्य तो दूर रहा उल्टा अपने और दूसरों के पतन का कारण बनते हैं|

क्रांतिकारी दल में ही कैलाशपति का उदाहरण इस तथ्य को स्पष्ट कर देता है| वह कहता था कि एक क्रांतिकारी के लिए चार-पांच सौ रुपिया मासिक खर्च चाहिए| उसने अपने ही एक साथी की पत्नी को फंसा लिया था और उसके लिए पचास खद्दर कि साड़ियाँ लाकर रख दी थी| पकडे जाने पर सबसे पहले वही मुखबिर बना|  उच्च आदर्शों से अनभिज्ञ और भोग विलास की अभिलाषा रखने वाले ऐसे महान कार्यों में अगर भाग लेते हैं तो ऐसा ही नतीजा होता है|

सार्वजानिक क्षेत्र में सेवा करने वालों के लिए त्यागवृति और कष्ट सहन की शिक्षा दी जानी अनिवार्य है |आजाद इसके प्रत्यक्ष उदाहरण थे| भगवती चरण की धरमपत्नी दुर्गा भाभी ने आजाद के अंतिम समय का वर्णन करते हुए नर्मदा के विशेष अंक में लिखा था –

” आजाद भैया सरल स्वभाव के थे| दाव पेंच और कपट की बातों में उनका दम घुटता था| उस समय देश में एक संगठन था और उसके केंद्र आजाद थे| काम के लिए हम सभी सच्चे और ईमानदार थे| किन्तु साधारण वातावरण दूषित होने लगा था| क्रांतिकारियों के संख्या बढ  गयी थी|पर हर तरह के व्यक्ति उसमें आने लगे थे और झगडे-झंझट भी बढ़ रहे थे |भैया का जीवन इस प्रकार पैदा हुई समस्याओं से उलझने लगा था| वे खिन्न और दुखित रहने लगे थे| कई मित्रों उनसे ( कैलाशपति और वीरभद्र ) प्रतिघात किया और वह कलाकार संसार से रूठ कर चला गया| “

नि:संदेह सच्चे क्रांतिकारियों के मनोभाव और सिद्धांत ही उनके सर्वोपरि होते हैं| उन्ही की खातिर वे हँसते-हँसते अपना बलिदान कर देतें हैं| चन्द्रशेखर आजाद का वास्तविक सम्मान हम तभी कर सकते हैं | जब देश और समाज के कल्याण के लिए अपने को खपा दें|

जुलाई 24, 2011 Posted by | चरित्र | , , , , | 2 टिप्पणियाँ

   

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