उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

धर्म रक्षा का पर्व : रक्षाबंधन


श्रावण की इस पुर्णिमा पर रक्षा पर्व की कोटी कोटी शुभकामनायें! वर्षा ऋतु उत्सवों का समय है। लगभग हर दिन का इतिहास है, हर दिन का कोई ना कोई व्रत। वर्षा का समय अंकुरण का समय है। जो बोया है वो बीज तो अंकुरित होगा ही पर प्रेम का गीलापन पाकर बिन बोया, दुर्लक्षित पड़ा, ऐसे ही फेंक दिया, ग्रीष्म की तपन में झुलसा हर बीज भी अपने आप इस ऋतु में अंकुरित हो जाता है। वातावरण में सृजन भरा है। ऐसे में सत्संकल्पों के बीज बोने का भी अवसर है। उत्सव इसीलिये मनाये जाते है।
जिसमें उत्स भरा हो वो उत्सव! अर्थात जो मन को ऊपर की आर ले जाये। अपने मन को लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने के लिये अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करना उत्सवों का लक्ष्य है। नित्य साधना की पुष्टि में यह नैमित्तिक साधना है। हमारे रोज के संकल्प को दृढ़ करने के लिये विशेष संकल्प उत्सवों पर लेना है। उत्सवों के समय सारी सृष्टि ही आपके संकल्प का समर्थन कर रही होती है। ग्रह नक्षत्रों के परस्पर गुरुत्व के सम्बंध एक अपरिमित बल को सकारात्मक दिशा दे रहे होते है। इन ग्रहदशाओं की अनुकुलता का मन के उत्साहवर्द्धन में हो रहा योगदान केवल हर्ष और उल्हास में बीता देने के लिये नहीं है। उत्सव सामूहिक मन को भी केन्द्रित करने का कार्य करते है। पूरा समाज ही एक समान उत्साह के वातावरण में एकसमान संकल्प को धारण करता है। यह परस्पर पूरक शक्ति भी शिवसंकल्प की पूर्ति को निश्चित करती है।
हिन्दू जीवन पद्धति व्यक्तिमूलक होते हुए भी व्यक्तिकेन्द्रित ना होकर समाजाभिमुख है। इसी कारण हमारे पर्व, उत्सव व परम्परायें भी सामूहिक हैं। इन पर्वोंपर लिये जानेवाले संकल्प, किये जानेवाले व्रत, पूजन स्वयं के लिये ना होकर समष्टि के कल्याण के लिये होते है। रक्षाबन्धन के दिन भी संकल्प इसी सामूहिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिये लेना है। संस्कारों की रक्षा, संस्कृति की रक्षा, धर्म की रक्षा अर्थात राष्ट्र की रक्षा। भारत विश्व का एकमात्र ऐसा राष्ट्र जिसकी सोच केवल स्वयं के कल्याण तक सीमित ना होकर जो प्रतिदिन अपनी पूजा मे विश्व मानवता की ही नहीं अपितु पूरे ब्रह्माण्ड मे व्याप्त चराचर के मंगल की प्रार्थना करता है। इसलिये इसकी रक्षा में ही पूरे विश्व की, मानवमात्र की, प्राणीमात्र की, पर्यावरण-प्रकृति की और सारी सृष्टि की रक्षा निहीत है। अतः आइये! इस रक्षाबन्धन के पर्व पर राष्ट्र रक्षा का संकल्प करें।
सभी एक दूसरे को रक्षासुत्र में बांधे और सामूहिक संकल्प को शक्ति प्रदान करें। हाँ सभी ! केवल बहनें भाइयों को नहीं। बहन भाई से रक्षा की अपेक्षा करते हुए उसे रक्षासूत्र बांधे यह तो मध्यकाल की असुरक्षा में विकसित उत्सव का केवल एक पहलु मात्र है। अनादिकाल से रक्षासूत्र का बन्धन एक संकल्प के रूप में होता आया है। यज्ञ के समय सब लोग एक ही संकल्प में मन को पिरोये इसलिये रक्षासूत्र बाँधा जाता है। आज का त्योहार उसी का वार्षिक संस्मरण है। आज जब हम स्वतन्त्र है और नारी अबला नहीं अपितु जीवन के हर क्षेत्र में पुरुष के समकक्ष पूरक भूमिका में सन्नध है तब इस उत्सव का सनातन स्वरूप पुनः प्रस्थापित होता जा रहा है। केवल बहन भाई को नहीं सब एकदूसरे को राखी बाँधने लगे है।
बहनों! के बोले माँ तुमि अबले? बहुबल धारीणि, नमामि तारीणिं! रिपुदलवारीणिं ! मातरम्!! आप तो साक्षात शक्ति स्वरुपा है। आप को संरक्षण की कहाँ आवश्यकता? आप सिंहों में जागरण भर दें आज के दिन कि वे असुरों का नाश कर सकें। और अपने दायित्व को भूल कोई पुरुष भैसा हो जाये, महिष हो जाये तो हे जगदम्बे तुझमें वह भी शक्ति है कि उसका मर्दन कर सकें। तुम इस भारत की युवा शक्ति को आज जाग्रत कर शक्ति दों! बाँधो इस चिरपुरातन नित्य जीवित संस्कृति की रक्षा का कवच सूत्र!
समाज को समरस करने का भी यह अद्भुत अवसर है। आज ही नहीं आज से लेकर अगला पूरा पक्ष, पखवाड़ा, अगले पन्द्रह दिन समारोहपूर्वक समाज में रक्षाबन्धन मनाया जायेगा। कुछ सामाजिक संगठन प्रयत्नपूर्वक विशेषकर हमारे समाज के उन लोगों तक अवश्य जायेंगे जो अपने आप को कटा, वंचित व पीड़ित मानते है। उनके साथ समरसता व बन्धुत्व को पिरोने का यह अवसर है। हिमालय के लोगों ने वृक्षों की रक्षा के लिये उन्हें रक्षासूत्र बाँधा। अरुणाचल में जनजातियाँ अपने सत्व की रक्षा के लिये एकदूसरे को राखी बाँधते है।


इस पर्व के अवसर पर हम सब भी आपस में रक्षासूत्र में बंधें! एक संकल्प के सूत्र में! हमारी यह चिरपुरातन भारती को पुनः जगत् गुरु के रुप में प्रस्थापित कर विश्वशांति का सुत्रपात करने का संकल्प! इस सर्वसमावेशक विचार में बाधक हर व्यक्ति, विचार अथवा संगठित प्रयास को सामूहिक शत्रु मानकर उसके निःपात का संकल्प! क्योंकि रक्षा केवल आक्रमण के प्रत्युत्तर में ही नहीं, शत्रु को हतबल कर आक्रमणमें अक्षम बनाने में अधिक है। चाणक्य का आदर्श है कि बिना युद्ध के शत्रु का संहार करना ही सबसे बड़ी विजय है। आज हम बौद्धिक स्तर पर विश्व के सर्वशक्तिमान राष्ट्र के रुप में उभर चुके है। आर्थिक रुप से भी हम सक्षम है। सामरिक बल में और अधिक पूष्टि की आवश्यकता है। पर सर्वाधिक आवश्यक है चरित्र का आत्मबल! यह बल हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा ही दे सकती है। आज राष्ट्र के प्रबुद्ध नेतृत्व में यह आध्यात्मिक, सांस्कृतिक जागरण अत्यधिक आवश्यक हो गया है। यही इस वर्ष के रक्षाबन्धन का सामूहिक संकल्प हो! सब ओर यह सत्य गुंजायमान कर दें — सनातन संस्कृति की रक्षा में ही इस राष्ट्र का उत्कर्ष निहित है!

अगस्त 13, 2011 Posted by | Uncategorized | 3 टिप्पणियाँ

   

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