उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अन्नागिरी कही फिर गांधीगिरी ही न बन जाये??


अन्ना के अनशन का ८ व दिन है| सरकार कि संवेदनहीनता और मीडिया के जोरदार प्रसारण ने आन्दोलन को जबरदस्त प्रतिसाद मिल रहा है| इससे अधिक बड़े आन्दोलन तो केवल रामजन्मभूमि और जे पि की समग्र क्रांति ही थे| उनमे इससे अधिक लोग सड़कों पर उतारे थे| पर एक अंतर है वो दोनों आन्दोलन संगठित प्रयास का परिणाम थे| आज के आन्दोलन में लोगों का गुस्सा फुट रहा है| ये अधिक स्वयं स्फूर्त है| इसी कारण मीडिया भी TRP की दौड़ में लग गया है| पर जागरण जोरदार हुआ है| यह बड़ा ही महत्वपूर्ण पहलू है| जो सबसे ऊपर है| इसका श्री जितना अन्ना को है उतना ही सरकार की मुर्खता को भी है|
अनेक साथी प्रश्न पूछ रहे है | सोचा की एकसाथ उत्तर देकर लिख दिया जाये|
आन्दोलन के तप्त वातावरण में भी वैचारिक चिंतन जरुरी है क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरि है|
१)कांग्रेस आखिर जन लोकप्र बिल पास से क्यों दर रही है???
जन लोकपाल बिल तो कोई पार्टी जैसे के तैसे पास नहीं करेगी| अन्ना जैसे चाहते है वैसा लोकपाल बन जाये तो सारा काम ही ठप्प हो जायेगा| केवल भ्रष्टाचार ही नहीं सारा सरकारी काम ही ठप्प होगा| कोई भी अधिकारी कुछ भी नहीं करेगा | काम भी नहीं भ्रष्टाचार भी नहीं| अन्ना का आन्दोलन वाकई बढ़िया है| उसका कोई विरोध नहीं है| पर
उनकी मांग थोड़ी अधिक कठोर है| पर ये आन्दोलन की जरुरत है| एक तो ठोस मांग होना आवश्यक है| यहीं बाबा की गफलत हो गयी थी| दूसरा मांग कठोर होंगी तो बातचीत में कुछ ठीक ठाक बात पर सफलता मिल जाएगी| अतः उनके स्तर पर ये ठीक है पर जो लोग पूछते है की कांग्रेस नहीं तो BJP ही इस बिल को support कर दे वो इसकी बारीकी को नहीं समझते| अभी वर्त्तमान में भी जो इमानदार लोग है वो आरोपों के दर से काम नहीं कर रहे| सोचते मेरे retire होने तक टांग देता हूँ इस file को | इस रवैये के कारण सेना को आवश्यक हथियार नहीं मिल पा रहे| और जिसमे भ्रष्ट लोगों का हित जुड़ा है ऐसे निर्णय हो रहे है| सबसे महंगे इटालियन हलिकोप्टर हमने इसी साल ख़रीदे| सही परिवार को हिस्सा मिल गया निर्णय हो गया| अन्ना के लोकपाल के बाद तो और स्थानों पर भी इमानदार लोग निर्णय लेने से डरेंगे|
वैसे भी कानून से तो भ्रष्टाचार बढ़ता है| कानून घटाने से भ्रष्टाचार घटेगा| डिमांड क़ानूनी हस्तक्षेप कम करने की होनी चाहिए| एक और नया कानून ये समाधान नहीं है| CVC के समय यही तर्क दिए थे कि ७०% भ्रष्टाचार कम होगा| क्या हुआ?? RTI के समय के अन्ना के विडियो दिखाए जा सकते है| उनके अनुसार इस कानून से पूरी पारदर्शिता आ जाएगी| क्या हुआ? आज इस का सबसे ज्यादा दुरूपयोग अधिकारी एक दुसरे से बदला लेने में और उद्योगपति अधिकारीयों को ब्लैक मेल करने के लिए कर रहे है| लोकपाल का भी ऐसे हो सकता है| दहेज़ और हरिजन कानून का भी यही हाल है|
२) कोई राजनीतिक पार्टी अपनी छबि स्वयं ख़राब करेगी ???
उनको लग रहा है की उनके साथ BJP की भी छवि ख़राब हो रही है तो फिर कोई ज्यादा नुकसान नहीं| भ्रष्टाचार चुनावी मुद्दा नहीं है|
३) क्या कांग्रेस की छबि (सोनिया सहित सभी मंत्रियों की )ख़राब नहीं हुई ??
यदि अन्ना के सामने झुक जायेंगे तो रही सही भी ख़राब हो जाएगी| इसलिए तो राहुल कार्ड खेला है| राहुल की छवि चमकने के लिए ही सही मान जाये कोंग्रेस! पर ये देश के लिए ठीक नहीं होगा|
४) क्या राहुल गाँधी की इस आन्दोलन से साख कमनही हुई??
उसकी कोई साख नहीं है| सब विज्ञापन जैसे बने है तो वो तो अं चुनाव के वक्त पर फिर बना लेंगे Media manage करके|
५)क्या आम जनता मै भ्रस्टाचार के खिलाफ जागरूकता पैदा नहीं हुई ???
ये ही एकमात्र फायदा इस आन्दोलन से हुआ है| १ जनता जागरूक हुई और सडकों पर आई| और २. उसमे विश्वास पैदा हुआ कि भ्रष्टाचार दूर हो सकता है| अन्ना और बाबा कि ये बहुत बड़ी सफलता है| अब राजनैतिक पार्टियों को एक ठोस agenda प्रस्तुत करना चाहिए भ्रष्टाचार के खात्मे का|
६) क्या अन्ना की तुलना किसी भ्रस्टाचारी से करना सही है ??
बिलकुल गलत है| अन्ना बाकि कुछ भी हो सकते है पर भ्रष्टाचारी नहीं है| वो एक इमानदार व्यक्ति है| कुछ गलत लोगों से घिरे है| समझौता कर लेते है| जैसे भारतमाता, स्वामी विवेकानंद, सुभाष और भगतसिंह के फोटो हटाकर केवल गांधीजी का रखना| ये समझौता है| फिर बुखारी पर टीका करने कि जगह उसको समझाने अपने लोगों को भेजना | ये वही गलतियाँ है जो गाँधी बाबा ने भी कि थी|

आज देश जग गया है किन्तु आन्दोलन ही समाधान नहीं हो सकता| यदि बातचीत होकर कुछ बाते मन ले सरकार तो क्या उससे व्यवस्था परिवर्तन आ जायेगा? आखिर इन राजनैतिक प्रश्नों का राजनैतिक हल जरुरी है| केवल एक कानून से बात नहीं बनेगी| पुरे संविधानिक ढांचे पर ही चर्चा करनी होगी| एक नै स्कृति के लिखने का समय आ गया है| क्या अन्ना या बाबा चाणक्य बन सूत्र लिखने को तत्पर है? नहीं तो फिर किसी न किसी को तो इस भूमिका में आना होगा| गाँधी बाबा भी यही रुक गए अंग्रेजों को तो भगा दिया पर अपने संविधान “हिंद स्वराज” को लागु नहीं करवा पाए| पटेल के स्थान पर नेहरु को देश पर थोप दिया अपनी जिद से और देश में अपना स्व नहीं आ पाया तंत्र में?? अग्निवेश और भूषण को साथ लेकर अन्ना फिर वही गलती तो नहीं दोहरा रहे| अब तो विनायक सेन और मेधा पाटकर जैसे बचे खुचे भी आ गए| बस अरुंधती ही विरोध में है| भगवन ने कृपा की| नहीं तो गिलानी भी रामलीला में नमाज पढ़ते दिखता|

अन्ना आप पर जनता को विश्वास है भारत माता को विश्वास है| कह तो रहे है आप आज़ादी की नै लड़ाई बना भी देना और पुरानी भूलों से बचके रहना… नहीं तो ये सारी शक्ति भी गांधीगिरी ही बनी रह जाएगी!!


अगस्त 23, 2011 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , ,

4 टिप्पणियाँ »

  1. Be optimist. They never fail who fought for greater cause

    टिप्पणी द्वारा Abhay Gore | अगस्त 23, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. आपके विश्लेषण में जो सर्वाधिक सार्थक तथ्य स्पष्ट हुआ वह है जितना अधिक जटिल कानून उतना ही अधिक भ्रष्टाचार और दूसरी बात जो मै इस आन्दोलन के प्रारंभ से ही मन से बाहर करना चाह रहा था वह थी संविधान की सर्जरी| अब मेरा भी मन हल्का हो गया कि आज देश के संविधान की ही सर्जरी आवश्यक हो गई है इस विचार को आप जैसे चिन्तक भी सही मानते हैं| बास्तव में ऐसा संविधान जो लोकहित में कानून के सरलीकरण में किन्तु परन्तु को प्रश्रय दे उसके प्रावधानों पर फिर से चर्चा होनी चाहिए और अनावश्यक बाधाएँ संशोधित होनी ही चाहिए| जैसे कि विधेयक पारित करने कि जटिलता| अब इसका सरलीकरण आवश्यक हो गया है|

    टिप्पणी द्वारा Bhanwar Singh Rajput | अगस्त 23, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. इस अन्नामाय आन्दोलन के संदर्भ मै केबल जनजागृति ही एक प्रमुख उपलब्धि ही मान सकते है जब जब भारत मैं आन्दोलन हुए है तब तब भारतीय जनमानस पर समझौते ही थोपे गए है और कालांतर ये ( ज्यादातर )समझोते ही समाज के लिए नासूर बने / अगर किसी भी रोग को समूल ठीक करना है तो अच्छे बैध की देख रेख मे सही औसधी का और सही समय पर उपयोग ही करना पड़ेगा / आज समाज मे असंख्य बीमारियाँ है जैसे तैसे समाज भी जागृत ( कुछ समय के लिए ) हो रहा है अब यहाँ बैध्य ( डॉक्टर ) अधिक संख्या मे हो गए है अब बेचारा रोगी क्या करे ……..वैसे भारतीय समाज हमेसा चिरनिद्रा मे ही रहता है
    जैसा की गाँधी जी के नेतृत्व मे ( प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ) जो आन्दोलन ,समझौते और फिर जो धुन धुनी ( अस्पष्ट) स्वतंत्रता थोपी गयी उस के परिणाम समाज आज भुगत रहा है और आगे भी पूरी उम्मीद लगरही है ( अगर तंत्र मे सुधर नहीं हुआ तो ) हाँ यहाँ भी अन्ना जी ने ( उनकी टीम के द्वारा ) अपने मंच से भारत माता,और चन्द्रसेखर , भगत सिंह आदि महापुरसों की तस्वीर हटा कर अपने आप को सक के कटघरे मे खड़ा करदिया है और अब तो कांग्रेस के सांसदों के द्वारा भी कुछ संकेत मिल रहे है अन्ना का समर्थन करके /
    प्रश्न यहाँ यह खड़ा होता है की अब भारतीय जनमानस क्या करेगा ????
    १) पहले गाँधी जी के साथ चले क्या मिला ??? ( अधूरी आजादी का झुनझुना जो पूरे भारत देश मे भी नहीं बजता )
    २) अभी अन्नाजी के साथ भी जनता कोसिस कर रही है यहाँ भी गाँधी जी की तरह अन्ना के साथ भी यमदूत लगे हुए है
    ३) क्या भविष्य मे गाँधी जी और अन्ना जी के बाद ( अच्छे परिणाम न मिलने की स्थिति मे ) आम जन किसी भी अहिंसात्मक आन्दोलन मे विस्वास करेगे ???
    आज बेचारे जागरूक तोते क्या करे एक कहानी है जो हम सभी ने सुनी और पड़ी है —
    एक जंगल मे एक महात्मा होते है उनके आश्रम मे कुछ तोते होते है वो अपने आश्रम के तोतों के माध्यम से सिक्षा देते है की – “शिकारी आएगा दाना डालेगा , हमें दाने नहीं खाना है और जाल मे भी नहीं फसना है ” कुछ दिनों के बाद जंगल मे शिकारी आया उसने दाना भी डाला और बेचारे तोते जल मे बैठे बैठे बोल रहे थे “शिकारी आएगा दाना डालेगा , हमें दाने नहीं खाना है और जाल मे भी नहीं फसना है”
    आज समाज की दशा भी कुछ इसी के आस पास है समाज मानसिक रूप से उलझा है तथाकथित आन्दोलनों मे पर अभी वास्तविक आन्दोलन कोसों दूर है
    और अगर आन्दोलनों की यही निरंतरता बनी रही और अच्छे परिणाम नहीं निकले तो तो मुझे लगता है भ्रस्टाचार , घूसखोरी और बिभिन्न अपराध समाज का अभिन्न अंग बन जायेगें तब समाज भी इन आन्दोलनों को कम अहिमियत देगा / कई बार कुछ तथाकथित महापुरुस बिभिन्न आन्दोलनों के माध्यम से समाज की नब्ज टटोलते रहते है और उनको अच्छा जन समर्थन भी मिलता है पर समाज का हित नहीं होता कारन वो केबल समाज की नब्ज देख रहेथे …..और जब बास्तविक आन्दोलन की जरूरत होती है तब वो तथाकथित महापुरुस अलग धलग पद जाते है यहाँ भी एक कहानी है —-
    एक गाँव मे एक ब्रद्ध व्यक्ति रहता था उसके मन मे भी कुछ बिचार आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा —-“कोई मुझे बचाओ मेरे घर मे शेर आगया है और मुझे खा रहा है ”
    गाँव के लोग दौड़कर आये देखा तो वह कोई भी नहीं था यही क्रम ३-४ बार चला अब गाँव बाले जानचुके थे की ये आधमी झूठ बोलता है कालांतर उस ब्रद्ध आधमी के घर वास्तविक शेर आ जाता है अब शेर अपना कम आराम से करता रहा और वो आधमी भी चिल्लाता रहा /
    कहने का अभिप्राय है अब —
    आम जनता क्या करे ?????? ….. हाँ अब तो संबिधान की सल्य क्रिया ही करनी पड़ेगी ……… कृपया मार्गदर्सन करें …………..(इन्द्रजीत शर्मा)

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | अगस्त 24, 2011 | प्रतिक्रिया

  4. I have some questions about this so called Anna aandolan Why Anna want Jan lokapal widheyak as He himself thinks right? Sansad ne isaka simit rup man to liya tha fir ye aagraha kyu? Kya sach me Bharat ke logo ne Bhrashtachar ke khilaf aavaj uthai hai ya badhati hui mehengai ka krodh bahar nikala hai? Ye doosara swatantrya yuddha kaise ho sakata hai jab khud Anna bhi nahi janate ki woh kya chahate hai! Ye doosare Gandhi hi banenge kyo ki aaj bhi hum kisi bhi parivartan ke liye taiyyar nahi hai! Parivartan lane ke liye neev rakhana jaroori hai jo aaj bhi koyi dekh nahi pa raha aur nahi usake bare me soch raha hai!
    Brashtachar ke khilaf vahi log aandolan kar sakate hai jinhone aapani jindagi me ek bhi niyam ko todane ka vicharbhi man me nahi laya… Bharat me niyam banate hi todane ke liye hai aur ye har aadami ki soch ho gayi hai..
    Change starts from myself not anybody else… and nobody thinks like that now a days… So… Any way..Sanvidhan me badlav to aana chahiye but I think this is not the proper way or the proper time for it!

    टिप्पणी द्वारा prashansa puranik | सितम्बर 15, 2011 | प्रतिक्रिया


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