उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

कर्मयोग का व्यावहारिक मार्ग : विकर्म


मानव को कर्म की स्वतन्त्रता है। कहते है कि अन्य प्राणियों को यह स्वाधीनता नहीं है। उनके कर्म तय कार्यक्रम के अनुसार ही चल सकते है। इस विषय में हम केवल अनुमान ही कर सकते हैं। वह भी अपने निरीक्षण के आधार पर ही। जानवरों की भाषा का ज्ञान न होने के कारण उनके भावों को यथातथ्य जानना हमारे लिये कठीन ही है। निरीक्षण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्राणियों में प्रतिक्रिया तथा क्रिया के विकल्प सीमित ही होते हैं। जैसे यदि आप किसी कुत्ते को पत्थर मारे तो वह क्या करेगा? प्रश्न का उत्तर सरल है साधारणतः 3 विकल्प सम्भव हैं। या तो काटेगा, या भौंकेगा, या भागेगा इन तीनों में से एक, दो या सभी कर सकता है किन्तु चौथा विकल्प नहीं दिखाई देता। हाँ! प्रशिक्षित करने पर कुछ और भी कर सकता है किन्तु वह भी बिलकुल तय व नियत ही होगा। क्रिया की प्रतिक्रिया तय होगी।

पर क्या मनुष्य के बारे में ऐसा कुछ भी निश्चित कह पाना सम्भव है? किसी मनुष्य को पत्थर मारने पर कितनी सम्भावनाये हो सकती हैं? सूचि बनाने से पूर्व भी हम स्वयं कई प्रश्न पूछेंगे। किसने मारा? किसको मारा? किस भाव से मारा? जिसको मारा गया उसकी उस समय क्या मनस्थिति थी? कितनी बाते होंगी जिसपर इस एक क्रिया की प्रतिक्रिया निर्भर करेगी? और फिर उसके बाद भी यह निश्चित नहीं कह सकते कि वही व्यक्ति समान परिस्थिति में एक समान ही प्रतिक्रिया हर बार देगा। बाहरी सब बातें समान होने पर भी मनुष्य का कर्म अलग हो सकता है।

यही हमारा कर्म स्वातन्त्र्य है। प्रत्येक स्थिति में मनुष्य के पास मोटे मोटे तीन विकल्प होते है। कर्म- कुछ करें, अकर्म- कुछ भी ना करें और तिसरा विकर्म- कुछ अलग प्रकार से करें। शेक्सपियर के नाटक ‘हैम्लेट’ का नायकदुविधा में कहता है – ‘करु या ना करु?’ (To do or not to do??)। हमारे पास तीन विकल्प हैं। कर्तुं – करें, अकर्तुं – न करें, अन्यथा कर्तुं – अलग तरिके से करें। ये तीसरा विकल्प एक ना होकर असीमित सम्भावनाओें को खोलने वाला है। हम यदि इस कर्मरहस्य को समझ लें तो कभी भी स्वयं को मजबुर नहीं पायेंगे। सामान्यतः हम अपनी कर्म स्वाधीनता का विचार किये बिना हमारे प्रति होनवाली क्रिया की प्रतिक्रिया दे देते है। ऐसे में हमारा जीवन पूर्व निर्धारित परिपाठी के अनुसार चलता है और कोई भी हमारी प्रतिक्रिया का अनुमान कर उसके अनुसार स्थितियों को संचालित कर हमें ठग सकता है।
जैसे यदि हमारे गुस्सा होने के कारणों का अनुमान किसी को हो जाये तो वह जब चाहे हमको गुस्सा दिला सकता है। शकुनि ने भीम की इसी कमजोरी का उपयोग कर द्यूत में परास्त किया था। जरासंध की अस्थियों से कौडिया बनवाई और हर बाजी से पहले भीम को गुस्सा दिलाया। तो कौड़िया थरथराई और कौरव जीत गये।
किन्तु यदि हम प्रत्येक स्थिति को स्वतन्त्रता से ग्रहण करते हुए उस समय के सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प को चुनने का स्वभाव बना लेते है तब हमारी प्रतिक्रिया का पूर्वानुमान लगाना लगभग असम्भव सा हो जाता है। ऐसे स्वतन्त्र व्यक्ति का कोई कपट से लाभ नहीं उठा सकता। इतना ही नहीं हमारा कार्य भी प्रभावी हो जाता है।
यह स्वाधीनता केवल विकट परिस्थिति में अथवा शत्रु या प्रतिस्पद्र्धी के साथ व्यवहार में ही उपयोगी नहीं है तो अपनों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार में भी इस स्वतन्त्रता का सही प्रयोग करना आवश्यक है। अधिकतर माताओं को यह शिकायत होती है कि उनके बच्चें उनका कहना नहीं मानते। इसका कारण ही यह है कि हमने अपनी कर्म करने की स्वतन्त्रता को खो दिया है और केवल प्रतिक्रिया के रूप में ही कार्य करते है। जब हम सीमित प्रतिक्रियाओ में स्वयं को बांध लेते है तब फिर जो हम चाहते है वैसा परिणाम नहीं मिलता। यदि हमारा डाँटना एक स्वतन्त्रता से चयनित विकल्प होने के स्थान पर क्रोध से नियन्त्रित प्रतिक्रिया है तो उसका असर होना असम्भव है। कई बार पूरा दूर्लक्षित करना अधिक प्रभावी हो सकता है। जब बच्चा डाँट की अपेक्षा कर रहा हो तब माँ यदि अपने क्रोध का प्रगटन प्रतिक्रिया के स्थान पर मौन से करती है तो वह अधिक प्रभावी हो सकता है। पर हर समय ऐसे अकर्म से ही काम चलेगा ऐसा भी नहीं है। कभी डाँटने का कर्म कभी मौन का अकर्म तो कभी किसी अन्य प्रकार से गलती का बोध कराने का विकर्म। यह तीनों का समुचित प्रयोग हमें सदैव प्रभावी रख सकता है। केवल क्रोध ही नहीं स्नेह, प्रेम के व्यवहार में भी इन तीनों का विवेकपूर्ण उपयोग आपके सम्बन्धों को सतत नवीन ऊर्जा  प्रदान करता रहेगा।

गीता में भगवान कृष्ण बताते है

कर्मणि एव बोधव्यम् बोधव्यम् विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोधव्यम् गहना कर्मर्णो गतिः।।

कर्म, विकर्म और अकर्म तीनों को जानना होगा। अर्थात तीनों पर पूण स्वामीत्व प्राप्त करना होगां क्योंकि कर्म की गति, अर्थात दिशा एवं चाल गूढ़ है। रहस्यमय है क्योंकि पूर्वानुमान सम्भव नहीं है। इसलिये तीनों का प्रयोग करने में कुशलता लानी होगी। राह में कोई नोट पड़ा मिला। क्या करेंगे? सामान्य स्तर की चेतना से कर्म या अकर्म का विकल्प होगा। उठायेंगे या नहीं उठायेंगे। जिस प्रकार का संस्कार अथवा प्रशिक्षण मिला हो उस प्रकार की प्रतिक्रिया होगी। किन्तु विकर्म के लिये चेतना के अलग स्तर पर जाकर कार्य करना होगा। लोभ के वशीभूत होकर स्वयं के लिये उस नोट को उठायेंगे भी नहीं किन्तु नोट दिख जाने के बाद दूसरे को ललचाने के लिये वैसे ही छोड़ देंगे तो वह भी गलत है। यदि ऐसी चेतना पर मन कार्य करने लगे। तब फिर अपनी सर्जकता का प्रयोग करना पड़ेगा। ऐसा विकल्प तैयार करना होगा जिसमें लोभवश स्वयं के अधिकार के बिना लाभ लेने का अधर्म भी ना करना पड़े और देखकर अनदेखा करने का निष्क्रियता दोष भी ना लगे। अपनी अपनी सर्जकता के अनुसार अनेक विकल्प सामने आयेंगे। कोई उठाकर मन्दिर की हुण्डी में चढ़ा देगा। या किसी अच्छे कार्य के लिये समर्पण के रूप में दे देगा। कोई अपने प्रयास से उसके सही स्वामी को खोजकर उसे लौटाने का यत्न करेगा। कोई पास के ही किसी भूखे, प्यासे को भोजन कराने में उसको काम में ले लेगा। देखा विकर्म ने कितने विकल्प खोल दिये। यह सूचि कभी समाप्त नहीं हो सकती। जितने लोग उतनी नवनवीन विकल्प। यही नहीं एक के पास भी अनेक विकल्प। कहते है मानव एक क्षण में किसी भी कार्य को करने के 9 विभिन्न विकल्प सोच सकता है। इसे ही नवनवोन्मेषी प्रतिभा कहते है। नये नौ विकल्प क्षणार्द्ध में सोच सकने की प्रतिभा। हम में से प्रत्येक के पास यह प्रतिभा है। पर हम उसका प्रयोग नहीं करते इस कारण बुद्धि की यह क्षमता कुन्द हो जाती है और हम भी पशुवत् पूर्व निर्धारित प्रतिक्रियाओं के सीमित विश्व में सीमट जाते है।
विकर्म हमें वास्त्विक रूप में स्वतन्त्र कर देता है। भेड़चाल, उबाउ कार्यों, बासी सम्बन्धों से बचाता है। जीवन का प्रत्येक क्षण नयापन लेकर आता है। प्रत्येक परिस्थिति एक नवीन अवसर परोसती है। और मन इस चुनौति को नयेपन से स्वीकार कर अपनी चेतना के स्तर को और अधिक उठाकर सोचने लगता है। यही सतत प्रगति का मार्ग है। कोई चुनौति ऐसे कर्मयोगी को विचलित नहीं करती।
इसे अपने जीवन में कैसे लाये? प्रारम्भ तो अपनी स्वाधीनता को स्वीकार करने से होगा। यह समझना होगा कि हम अपने कार्यों को कुछ सीमित प्रकार से करने या ना करने के लिये बन्धे नहीं है। स्वयं को यह स्मरण सतत कराते रहना होता है। हमारा मन स्वभावतः नीचे की ओर गति करता है और पशुचेतना की ओर बार बार पतन करता है। अतः एक बार यह समझ लेने से ही काम नहीं होगा अपितु बार बार इस स्वतन्त्रता का स्मरण करना होगा। दूसरा चरण है – निर्णय लेते समय सदा एकाधिक विकल्पों पर विचार करना। सामान्यतः हम बिना बहुत अधिक विचार किये ही निर्णय ले लेते है। सीधे सामने दिख रहे सबसे सरल, लाभकारी विकल्प को स्वीकार कर लेते है। यह निर्णय की प्रक्रिया बहुदा अवचेतन में ही बहुत अधिक प्रगट चिन्तन के बिना हो जाती है। प्रतिदिन सुबह जग जाने के बाद भी उठे या ना उठे? ऐसे शुल्लक निर्णय से प्रारम्भ कर अपने जीवन में क्या जीवनध्येय के लिये कार्य करें? यहाँ तक सारे निर्णय हम सहज, सुलभ, सरल विकल्पों को चुनकर बिना बहुत अधिक विचार किये ले लेते है। अपनी इस आदत से ही हम स्वयं को अपने ही मन के पिंजरे में कैद कर लेते है। हमारी अपनी ही धारणायें बना लेते है कि हम यह नहीं कर सकते। इससे अधिक नहीं कर सकते। स्वयं ही स्वयं की क्षमता को सीमित कर लेते है। इससे स्वाधीनता विकर्म देता है। हर निर्णय के समय सामने दिखने वाले प्रत्यक्ष विकल्प के अलावा भी कुछ विकल्पों पर विचार करना यह हमारी आदत बन जाये। फिर भले ही अंत में हम वहीं करें जो विकल्प पहले से सामने दिख रहा था। पर अब हम स्वतन्त्रता ये उस कर्म को कर रहे है। अब यह हमारा चुनाव है न कि मजबुरी। विकल्पों का चिंतन हमारी मजबुरी को स्वतन्त्रता में बदल देता है। अनहोनी कि स्थिति में यदि स्थपित विकल्प असम्भव भी हो जाये तब भी उचित परिणाम पाने के अन्य विकल्प हमारे लिये उपलब्ध रहते है।
तीसरा उपाय है – प्रतिक्रिया के स्थान पर पुरोक्रिया। (Proaction in place of Reaction) किसी भी परिस्थिति में प्रतिक्रिया के विकल्प सीमित ही होते है। सामान्यतः करें या ना करें ऐसे दो विकल्प ही दिखाई देते है, कर्म और अकर्म। प्रतिक्रिया का स्वभाव होता है जल्दबाजी। प्रतिक्रिया शीघ्र कर्म मांगती है और यह जल्दबाजी हमें सम्मूख सीमित विकल्पों में से एक का चयन करने के लिये मजबूर करती है। अतः समझदार कर्ता या स्वतन्त्र कर्ता प्रतिक्रिया की जल्दबाजी में नहीं पड़ता। क्षणभर विराम (Pause) लेता है और विकर्म पर चिन्तन करता है। इस छोटे से विराम से बड़ा अंतर होता है। मजबूरी समाप्त हो जाती है और स्वतन्त्रता अनेक नये दरवाजे खोलती है। यह स्वयं कर्म करना है किसी और क्रिया की मात्र प्रतिक्रिया नहीं। यह एक तरहा से आगे बढ़कर कर्म करने जैसा है। अतः हम इसे पूरोक्रिया कहेंगे। विराम के कारण मिली स्वतन्त्रता से हम अपने चित्त के स्तर को उपर उठा लेते है और आगे की क्रिया करते है। यह पुरोक्रिया निश्चित ही अधिक प्रभावी होती है।
कलात्मक अभिव्यक्ति का अभ्यास भी विकर्म को जीवन में उतारने का आनन्ददायी उपाय है। हम में से प्रत्येक में किेसी ना किसी कला के प्रति अभिरूचि होती है। कला की साधना हमें अपनी चेतना को सर्जकता का अवसर देती है। कला का एक और परिणाम है मौलिकता। बचपन से ही सीखने के लिये हम अनुसरण का आधार लेते है क्योंकि वह सबसे सहज विधि लगती है। अभिभावक भी इसी को बढ़ावा देते हैं। अतः बचपन से ही नये प्रयोगों को दबाया जाता है। मौलिकता सुरक्षा की बलि हो जाती है। बालक तो ऊर्जा  की अधिकता के कारण नये नये प्रयोग करना चाहता है पर इसमे उसको क्षति होने की सम्भावना भी होती है। अतः इसे रोका जाता है। यह विकर्म की विशेषता है। अलग ढ़ंग से करने के कारण परिणाम भी पूर्वनियोजित नहीं होते। विकर्म मौलिकता का पोषण करना है। अनुकरण के स्थान पर स्वयं के अन्दर से मौलिक विकल्प ढ़ूंढ़ने की आदत भी विकर्म को बढ़ावा देगी।
कर्मयोग को व्यवहार में उतारने का माध्यम है विकर्म का अभ्यास। पर याद रहे भगवान कृष्ण कर्म, अकर्म और विकर्म तीनों को जानने की बात कर रहे है। अतः बलात् कुछ अलग करने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ विकल्पों पर सोचने के बाद भी कर्म अथवा अकर्म ही उचित प्रतीत होता है तब उसका चयन करने का साहस भी आवश्यक है| सफलता चयन के विकल्प पर निर्भर करती है। प्रेय के स्थान पर श्रेय को जानना और उस मार्ग का चयन करना। यह विवेक धर्म के मर्म को पहचानने से आता है। इसे योग की अगली व्याख्या में समझेंगे।

अगस्त 30, 2011 - Posted by | योग

12 टिप्पणियाँ »

  1. सार्थक पोस्ट…

    टिप्पणी द्वारा induravisinghj | अगस्त 30, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. Je ne comprend pas l’ hindi. sorry ! But KARMA interests me. Wath to do ?

    टिप्पणी द्वारा Claire Simoneau | अगस्त 30, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. पहली बात आज जो हमारे समाज में प्रत्तेक स्तर ( शारीरिक ,मानसिक ) वास्तविक व्यावहारिकता के स्थान पर हमें जो देखने को मिल रहा है वह वास्तविक कर्म न होकर कर्म की अवधारणा मात्र है ऐसी स्थिति मै एक व्यक्ति और पूरा समाज (ये सूत्र कही भी लागू होगा ) कब तक अपने मूलरूप को भूलकर ढककर रह(कालनेमि की तरह ) सकता है जबतक रहेगा घुटेगा ,टूटेगा और अनत मै मरेगा दूसरे सब्दो में कहे तो दिखावा करते करते उसी मै विलय हो जायेगा / ( इसको हम प्रत्यक्ष रूप से एक व्यक्ति से लेकर एक समाज तक देख सकते है चाहे पश्चात संस्कृति पर भारतीय संस्कृति और भारतीय संस्कृति पर पाश्चात संस्कृति का ही आवरण क्यों न हो परिणाम सब को पता है )
    दूसरी बात जीव जिस देशकाल वातावरण में और जिस स्थिति मै रहे है वह नित्य कर्मशील है स्वास लेना भी कर्म कर्म और ये सोचना भी कर्म ही है अब कर्म करना और कर्म का बोध होना दोनों अलग अलग बाते है जैसे राजा जनक , जड़ भारत इत्त्यादी की कथाये हमसब ने सुनी है /
    ऐसे महापुरुस कर्म तो करते थे पर अनासक्त भाव से क्युकि किसी कर्म में आसक्ति सुख दुःख का कारन ही होती है और जहा द्वन्द की स्थिति बनजाती है द्वन्द की स्थिति मै समत्व की कल्पना व्यर्थ ही है
    तीसरी बात ; आज हम सब समत्वा और सहजकर्म की केबल बातें मात्र तक ही सीमित दिखते है परन्तु वास्तविकता के धरतन पर स्थिति नगण्य है हर कर्म पूर्ण समर्पण के साथ ( अच्छे और बुरे ) हम नहीं कर पा रहे है हर पल जब अनासक्त भाव से जीते है ( जीने का भी बोध न हो ) तब कुछ हो सकता है वो भी ईस्वरको पूर्ण समर्पण के साथ ( ऑफिस मै हूँ समय भी कम है इसलिए )
    एक छोटे से प्रयास के साथ …….इन्द्रजीत

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | अगस्त 31, 2011 | प्रतिक्रिया

  4. विकर्म के इस मार्ग ने तो मन में और अधिक हलचल पैदा कर दी| इससे तो कर्म या अकर्म तक कि समझ पर्याप्त थी| या तो यह कर्म करे या न करें| कर्म की स्वतंत्रता तो थी पर इस विकर्म की डगर तो अत्यधिक कठिन है| कर्म योग को व्यवहार में उतारने का अभ्यास करते करते तो जीवन ही बीत जायेगा तब भी यह संभव नही लगता| अनशक्त भाव से कर्म कर पाना कैसे संभव है ? कोई भी कर्म हम करेगे तो इसमे आसक्ति तो होगी ही अन्यथा व्यक्ति कर्म क्यों करेगा ? यदि उसे साँस लेने का कर्म करना होगा तो उसमें भी स्वार्थ तो है ही क्योकि जीवित रहने के लिए यह आवश्यक है| इसलिए साँस लेने में आसक्ति हुई| इसे हम निश्काम कर्म तो नही कह सकते ना| साँस लेना या नही लेना अब तीसरा विकल्प कैसे और कौनसा चुनेगे कृपया इस स्थिति में विकर्म का कोई मार्ग हो तो बताएगा|

    टिप्पणी द्वारा Bhanwar Singh Rajput | अगस्त 31, 2011 | प्रतिक्रिया

    • राजपूत जी, इतना कठिन बना दिया क्या ? फिर तो मेरे लिखने में कुछ त्रुटी रह गयी| वास्तव में विकर्म कर्म का ही विशेष रूप है| यह कर्म को अधिक विकल्प देकर सबसे सरल विकल्प चुनने का अवसर देता है|
      वैसे इस लेख में अनासक्ति की बात नहीं आई है फिर भी यह भी बड़ा सरल है| संकीर्णता को छोड़ दे तो जो विकसित लगाव है वह आसक्ति नहीं होगा| प्रबुद्ध स्वार्थ को ही एकनाथजी निःस्वार्थ कहते है|
      श्वास लेने में विकर्म है प्राणायाम का अभ्यास| तब श्वास पर अपना नियंत्रण होगा| स्वतंत्रता होगी मज़बूरी नहीं|

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | अगस्त 31, 2011 | प्रतिक्रिया

  5. Karam aur Vikarm me antar ho gaya ki
    yadi kirya ki swabhabhik pratikriya di to wo karm aur sochkar di to wo vikarm
    yadi nahi di to wo akarm

    Abhi ye antar to saaririk pratikriya dene par hoga..

    Parantu karm to bohut se star par hota hain..

    yadi isi blog ko padne ka udharan le to karm to hua… abhi ye karm ki sheni me aayega ki vikarm ki.

    Koi bhi padne se pehele aur padne ke baad kuch to sochega hi.
    Blog ko padna kya hua karm ya vikarm

    Padne ke baad comment na dena ko akarm manenge kya?

    Ek aur udharan clear kare.

    Paisa uthane ke udharan se laga ki jo aadat ya swabhav se pratikriya hui wo karm.
    aur jisse socha gaya aur fir kiya wo vikarm.

    Isse to doubt uththe hain.

    1) Agar aadat aur swabhav se pratikriya hui ki nahi uthana to wo akarm kyo aur karm kyo nahi. ( buddhi ne to karm kiya hi )

    2) kya vivek se kiya gaya har kaam vikarm hoga. Aur yadi vivek ye bole ki sharirik pratikriya nahi deni to wo vikarm me aayega ya akarm me aur kyo??

    टिप्पणी द्वारा jainvarun | अगस्त 31, 2011 | प्रतिक्रिया

    • वरुण,
      कर्म अकर्म और विकर्म ३ नहीं एक ही है| करने में विकल्प विकर्म है| न करना भी कर्म हो सकता है| यदि बुद्धि के निर्णय से हो| पर बुद्धि कह रही है करो और न करे तो अकर्म| जैसे रोज सुबह उठाने में होता है|
      विकर्म केवल सोचकर करने में नहीं है| ये वास्तव में मज़बूरी के बिना करने में है| प्राणियों के समान केवल संस्कारों से संचालित होंगे तो वो सामान्य कर्म ही होगा| blog पढ़ने में ही देखो, तुरंत तो नहीं पढ़ा, सोच कर समय निकल कर पढ़ा| फिर हो सकता था कि जब भैया पीछे पड़े है तो अभी पढ़ लेता हूँ| तो ये मज़बूरी होती| पर विकर्म ने स्वतंत्रता दी| किसी के पास सब जगह नेट नहीं होगा| विकर्म विकल्प देगा| कॉपी कर के document बना लो, प्रिंट ले लो|
      पैसे उठाने में या न उठाने में यदि केवल संस्कार ही काम कर रहे है तो कर्म या अकर्म ही रह जायेगा| पशु के समान, पर यदि स्वतंत्रता से क्रिया है तो विकर्म होगा| न उठाने का भी विकल्प हो सकता है विकर्म में| किनारे बैठकर देखे लोग क्या प्रतिक्रिया देते है| यह निरिक्षण बड़ा ही बढ़िया अध्ययन हो सकता है| ऐसे में न उठाना भी विकर्म है|
      ये केवल शारीरिक ही नहीं सब स्टारों पर होता है| मूलतः मन के स्तर पर है|
      इसलिए वैकल्पिक चिंतन कि आदत, विराम pause लेकर निर्णय करना, और सर्जकता creativity ये विकर्म अभ्यास के ३ अयाय्म बताये है|

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | अगस्त 31, 2011 | प्रतिक्रिया

  6. जी धन्यवाद ! प्रतिकिया देते लमय प्राणायाम का तो वास्तव में स्मरण ही नही आया कि प्राणायाम से हम वास्तव में स्वास को भी नियंत्रित् तो करते ही है| अति उत्तम ! आगे योग की अगली व्याख्या की प्रतीक्षा में …….!!!!!!!!!!!

    टिप्पणी द्वारा Bhanwar Singh Rajput | अगस्त 31, 2011 | प्रतिक्रिया

  7. कर्मयोग का व्याव्हरिक मार्ग विकर्म ! अवश्य पढ़ें !

    टिप्पणी द्वारा Bhanwarsingh Rajput | अगस्त 31, 2011 | प्रतिक्रिया

  8. छंदोज्ञोपनिषद में कहा है-
    “यदेव विद्ययाकरोमि श्राद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति”
    ( अर्थात -जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योग से युक्त किया जाए वही प्रवलतर है)छंदोज्ञोपनिषद(१।१।१० )
    श्रीमदभगवतगीता के अनुसार यह विकर्म है। यदि कर्ता का जीवन व्यवस्थित है, उसमें कर्म, कर्मफल और कर्मफल का प्रतिफल का बोध है तो उसका प्रत्येक कर्म विकर्म के रूप में भलें हीं दूसरे को दिखे पर उस कर्ता का तो वह सहज कर्म ही है।
    अक्ष्युपनिषद में कहा गया है –
    ” योगस्य कुरु कर्माणि नीरसों वय मा कुरु ”
    ( अर्थात -योगस्य होकर कर्म करो । नीरस होकर कर्म मत करो ) इसका सीधा और सरल अर्थ यह है कि जिस कर्म में कर्ता आनंदित हो, परिणाम सुनिश्चित रूप से अच्छा हो । वह योगस्य कर्म है, सामान्य जन के लिए वह भलें हीं विकर्म हो योगी के लिए वह कर्म ही है।
    एक काम मुझे करना है, मैं नहीं करता, वह अकर्म होकर विकर्म हो सकता है। (क्योंकि मुझे उसके करने में परिणाम की सुनिश्चितता का पता नहीं है, अतः वह मेरे लिए नीरस है। मैं नहीं करता और मेरा वह अकर्म होते हुये भी विकर्म ही है। वही कर्म समान्यजन का विकर्म होते हुये भी योगी के लिए कर्म ही है। इसलिए कहा गया है – ‘कर्मो गहनों गति’

    टिप्पणी द्वारा Ram Bhuwan Singh Kushwah | सितम्बर 1, 2011 | प्रतिक्रिया

  9. कर्मयोग की अति सुन्दर समय के सापेक्ष व्याख्या………..

    टिप्पणी द्वारा Dilip | अक्टूबर 22, 2011 | प्रतिक्रिया


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