उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

भगीनी निवेदिता का मातृमन्त्र – भारत भक्ति ही सच्चा धर्म


रामकृष्ण मठ चेन्नई से प्रकाशित सितम्बर 2011 के वेदान्त केसरी में श्री प्रमथ रंजन पाल के अनुभवों पर आधारित आलेख छपा है। उसका यह हिन्दी भवानुवाद प्रस्तुत है।
भगीनी निवेदिता पर अथक अनुसंधान करनेवाले श्री शंकरी प्रसाद बसु ने बांग्ला में 2 खण्डों में ‘लोकमाता निवेदिता’ नाम से भगीनी की जीवनी लिखी। उसके दूसरे खण्ड में यह प्रसंग आता है जिसमे स्वामी विवेकानन्द की इस आध्यात्मिक मानसपुत्री के भारत प्रेम का मार्मिक दर्शन हम लोग पाते है। श्री शंकरी प्रसाद बसु से श्री पाल का सम्पर्क 1968 से 1970 के बीच प्रारम्भ हुआ तब इनकी आयु 84 वर्ष की थी। 1903 में स्थापित स्वामी विवेकानन्द बोर्डिंग हाउस नामक छात्रावास में श्री प्रमथ रंजन पाल छात्र के रूप में रहा करते थे। उस समय के प्रसंग का यहा वर्णन है।
छात्रावास में रहनेवाले 40 छात्रों को भगीनी निवेदिता का सत्संगलाभ अनेकों बार मिलता था। ये सभी युवा भगीनी निवेदिता के व्यक्तित्व से अभिभूत थे। इन सबको राष्ट्रकार्य में प्रवृत्त करने के लिये भगीनी स्वयं अनेक प्रयास करती होगी। वे सभी निवेदिता के निवास पर जाकर उनसे अनेक विषयों पर प्रायः चर्चा करते थे। वहाँ इन छात्रों की भेट अनेक महान विभूतियों से होती थी।
प्रस्तुत प्रसंग में एक दिन अचानक भगीनी निवेदिता छात्रावास को भेट देती है और इन युवाओं को उलाहना देती है कि वे बहुत दिनों से घर नहीं आये। जब छात्र अपनी व्यस्तता के बारे में बताते हे तो उनकी गतिविधियों से वे प्रसन्न भी होती है। पर उन लोगों को शाम को अपने निवास पर आने का आमंत्रण देती है।
शाम के समय जब पाल जी के साथ 6-7 छात्र उनके निवास पहुँचते है तो वे प्रसन्नता से उन सबका स्वागत करती हैं। उन्हें रसगुल्ले खिलाती है। उनके साथ बेठकर बातों ही बातों में उनके स्वास्थ, पढ़ाई व कठिनाइयों के बारे में पूछती है। इस आत्मीय संवाद से युवाओं का मन जीत लेती है। वे सब उनको वीणापाणी सरस्वति के रुप में ही देखते है। भगीनी की शुभ्र वेशभूषा, उनके जटाभार जैसे बाल व गले में बड़े बड़े रुद्राक्षों की माला, पवित्रता की प्रतिमूर्ति। छात्रों से डाॅन सोसायटि के बारे में बात होती है। वे उसके संस्थापक श्री सतीशचन्द्र मुखर्जी के बारे में आदरयुक्त बाते छात्रों को बताती हैं। बातो ही बातों में विषय धार्मिक उपदेश पर आता है तो भगीनी छात्रों को पूछती है धर्म क्या है? प्रत्येक छात्र को उत्तर देना है। सब अपनी अपनी व्याख्या बताते है। एक धर्म को सर्वशक्तिमान ईश्वर पर विश्वास बताता है, एक बड़ों के आज्ञापालन को, तिसरा उपासना, कर्मकाण्ड के पूर्ण कठोर पालन को; चैथा छात्र प्रामाणिक व्यवहार को धर्म बताता है तो पाँचवा दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार को। एक छात्र जो संस्कृत का विद्यार्थी है मनुस्मृति के श्लोक को पठन कर बताता हे कि जो धारण करता है वही धर्म।
बड़े धैर्य और स्नेह से सबकी बाते सुनने के बाद भगीनी निवेदिता उनसे कहती है – ‘‘मैने तुम्हारी बाते सुनी और तुम्हारी व्याख्या से प्रसन्न भी हूँ। निश्चित ही सनातन धर्म हमें ये सारी बाते सिखाता है। किन्तु तुम्हारी धर्म के बारे इन सब धारणाओं से अधिक महान व ऊँची व आप सबके जीवन के लिये अत्यन्त पवित्र बात बताने जा रही हूँ। मेरा आप लोगों से आग्रह है कि इसे आप अपने जीवन में लागू करें, अपने सबसे उदात्त एवं महान दायित्व के रूप में सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ आचरण में लायें।
आपकी सबसे पहली आवश्यकता है कि अपनी महान मातृभुमि को जानो! अपनी महान माता! भारतमाता! अपनी माँ व मातृभुमि में कभी भेद ना करना। मै आपको सलाह दूंगी कि जाओ इसे देखो, माँ की प्रदक्षिणा करों, लागों को जानों; उनकी उपासना, संस्कृति, साहित्य, भाषा, रुढियाँ व परम्परायें; एक शब्द में कहें तो उनका समग्र इतिहास जानों। बार बार जब भी अवसर मिले उनसे आत्मीयता से मिलो और प्रेम करों।
जैसे बेटा या बेटी अपनी माँ से निःसंकोच आत्मीयता से घुलते-मिलते है वैसे ही आप मातृभुमि को प्रेम करों, आदर करों, सेवा करों, सर्वौच सम्मानजनक अभिवादन से उसकी पूजा करों! वन्दे मातरम्’’
उन्होंने वन्दे मातरम् का उच्चारण शुद्ध संस्कृत में किया और शांत बैठ गई। सभी छात्र अभिभूत से उन्हें देखते रहे।
सब लोग उनके मुखमण्डल को देख रहे थे। जब वे भारतमाता का बखान कर रही थी तब उनके चेहरे पर अकथनीय दिव्य आलोक की आभा थी। कुछ देर बाद उन्होंने सब छात्रों को यह कहते हुए रवाना किया, ‘‘अपने स्थान पर जाकर इस बात पर ध्यान करों। गंभीरता से सोचो और इस सर्वाधिक उदात्त मन्त्र पर विचार करों। वन्दे मातरम्!’’
सब एक उच्च भावावस्था में छात्रावास लौटे। भगीनी निवेदिता का भारतप्रेम अगाध था। वे अंग्रेजी में बोलते हुए कभी भी मातृभुमि के लिये ‘इट’ सर्वनाम का प्रयोग नहीं करती थी। हमेशा ‘हर’ कहती थी, अर्थात भारतमाता उनके लिये निष्प्राण भूखण्ड नहीं साक्षात जागृत देवता थी। उस दिन शाम को सब इसी चर्चा में डूबे रहे। जो छात्र उपस्थित नहीं थे उनको सब निवेदिता के निवास पर हुई बातचित का वर्णन बार बार बता रहे थे। सब को लग रहा था उनके गुरुदेव की आत्मा ही उनके द्वारा कार्य कर रही थी। आनन्दमठ के काव्य को भगीनी ने जीवित कर दिया था। मूल से भी अधिक प्रभावी कर दिया था।
अगले दिन दोपहर की न्याहारी के समय अचानक किसी छात्र ने सूचना दी कि भगीनी निवेदिता की घोड़ागाड़ी आई है। सब छात्र सभाकक्ष में एकत्रित हुए। निवेदिता ने गार्ड को कहकर गाड़ी में से एक बड़ा सा पुलिंदा मंगवाया। व्यवस्थापक भी दौडकर पहुँचे। भगीनी ने निदेशक स्वामी जी को भी बुलाने को कहा। उनके आने पर भगीनी ने पूरे घुटने टिकाकर स्वामी सच्चिदानन्द जी को प्रणाम किया।
बड़ी कील व हथोड़ी मंगवाई गई और स्वामीजी की अनुमति से दिवार के मध्य कील को गाड़ा गया। पुलिंदे को खोला गया तो उसमे से भारत का विशाल मानचित्र निकला 5 फीट चैड़ा और 6 फीट लम्बा। खरीद की रसीद भी नीचे गिरी। 25 रु का वह मानचित्र था। उस समय के 25 रु। नक्शे को दीवार पर टांगा गया।
भगीनी ने स्वामीजी को पहले दिन शाम का पूरा वार्तालाप बताया और कहा, ‘‘इन युवाओं ने सनातन धर्म की अति सुन्दर व्याख्या की पर मैने इन्हें बताया कि उनके लिये, भारत की तरुणाई के लिये मातृभुमि को अपने माँ के स्थान पर सोचना, मानना और पूजना ही धर्म का वास्तविक अर्थ है। स्वामीजी आपकी अनुमति से मै इन छात्रों को कुछ कहना चाहती हूँ।
स्वामीजी ने हर्ष से अनुमति प्रदान की। भगीनी निवेदिता ने बोलना प्रारम्भ किया,
‘‘मेरे प्यारे बच्चों, आपने विद्यालय में भूगोल का अध्ययन किया है। आपने भारत के केवल भौतिक संरचना का अध्ययन किया, जैसे पर्वत, पहाड़, नदियाँ, झीलें, रेगिस्तान आदि। ये जो मानचित्र यहाँ दीवार पर टंगा आप देख रहे है वह केवल बड़े कागज पर मुद्रित चित्र नहीं है, आपकी माँ का चित्र है। कश्मिर से कुमारिका तक वह जीवित, स्पंदित व्यक्तित्व है। पर्वत पहाड़ तुम्हारी माँ की हड्डियाँ है और नदी-नाले उसकी धमनियाँ ओर शिरायें। जो खाली जगह देख रहे हो वह केवल मिट्टी, कीचड व रेत के टीले नहीं माँ का मांस है। पेड़-पौधे उसके केश है।
आपकी यह पवित्र धरा युगों युगों से अतूलनीय महाकाव्यों के रचयिता महापुरुषों के अवतरण से प्रसादित हुई है। आपके पूर्वजों वाल्मिकी, वशिष्ठ, विश्वामित्र, वेदव्यास आदि ने आपकी संस्कृति के मूल इतिहास का लेखन किया है। मनु व याज्ञवल्क के नीतिशास्त्र ने जगत में हलचल मचा दी। अर्थशास्त्र के जगत को नवीन अर्थ प्रदान करनेवले चाणकय के कौटिल्य अर्थशास्त्र की मौलिकता व व्यावहारिक ज्ञान से सब चकित है। कुरुक्षेत्र में गाई गई गीता विश्व में अतूलनीय है। भारतीय अपनी इस युग युग की सम्पदा पर गर्व कर सकतें हैं।
यह भारत कुम्भ मेले का पुजारी है जहाँ महापर्व में लाखों लोग जुटते हैं। पवित्र धारा में स्नान कर पापों को मिटाने की क्या अद्भूत सामाजिक परम्परा हे यह! यह मेला अनादि काल से उज्जैन, नासिक, हरिद्वार व प्रयाग इन चार तीर्थों पर प्रत्येक 12 साल में लगता है।
शांति के महादूत गौतम बुद्ध का महानिर्वाण यही भारत में हुआ। आचार्य श्ंाकर, रामानुज और चैतन्यदेव जैसे धार्मिक आचार्यों का इस भुमि में दिया उपदेश व संदेश सारे विश्व को प्रकाशित कर रहा है। रामप्रसाद बैरागी के भक्तिगीत यहाँ के देशवासियों को भावविभेर करते आये है। श्रीरामकृष्ण नव युग के अवतार के रुप में अवतरित हुए है। उनके सरल, सहज किन्तु गहन उपदेशों ने अनेक देशों में हलचल मचायी है। उनके शिष्य तथा प्रखर अनुयायी स्वामी विवेकानन्द ने इस सत्य का सभी जगह प्रचार किया है; ओर इस महान धर्म की प्रतिष्ठा को जगत में शतगुणित किया है।
मेरा आज का उद्देश्य अधुरा रहेगा यदि मैं भारतमाता के उन महान सपुतो का नाम न लूँ जिन्होंने सामाजिक व शैक्षिक सुधारों के द्वारा विश्व के सम्मूख देश का गौरव बढ़ाया है। ये अनेक है। पर उनमें सबसे अग्रणी है राजाराम मोहन राॅय जो सति प्रथा के समाप्ति के लिये सदा जाने जायेंगे। उन्होंने हजारो विधवाओं को जीने का अधिकार दिया। पर विधवाओं के अश्रु केवल इसी से नही सूखते। क्रूर सामाजिक बंधनों व समाज के नेताओं की उद्दण्डता से उनका जीवन पराकाष्ठा के दूख से भरा ही था। तब ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आये, जिन्होने मुक्ति के मन्त्र के साथ विधवा पुनर्विवाह का प्रारम्भ किया। समाज के क्रूर आघातो से जिनका जीवन खिलने से पहले ही कुम्हला दिया जाता उन बच्चियों को उन्होने जगत का आनन्द लेने का अवसर दिया। पूणे के महादेव गोविन्द रानडे, डा पुरुषोत्तम वाजपेयी, गोपाल कृष्ण गोखले, बंगाल के जगदीश चन्द्र बसु इन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में नया प्रकाश दिया है।
ऐसे और अनेक महापुरुष है जिनको आप धीरे धीरे जानोगे ओर उनके ज्ञान की गहराई व प्रामाणिकता से आयचर्यचकित हो जाओगे।
आपको जब भी अवसर मिले भारत के विविध स्थानों की यात्रा करना। इन यात्राओं से ही आप मातृभुमि का वास्तविक स्वरुप समझ पाओगे। जहाँ भी आप जाओ वहाँ के वासियों से बातचित कर उस स्थान के बारे में, वहाँ की रुढ़ियों, पूजा पद्धतियों, आदतो, उपासना आदि के बारे में विस्तार से जानें। आप भविष्य में शिक्षा और व्यापार के लिये दुनिया के अनेक भागों मे जाओगे। पर एक बात याद रखना – जिस भी देश में जाओ, आपके हृदय से भारत माता की छवि धूसर नहीं होनी चाहिये। जहाँ भी आप जाओ यह चित्र आपके हृदय में अंकित हो और आपके विचार माँ की स्मृतियों से भरे हो।’’
भगीनी का स्वर भावना से थरथराया। वें कुछ देर मानचित्र को अपलक देखती रही। सब श्रोता उनके शब्दों में ही ड़ूबे थे। वे फिर बोली, ‘‘सब अपनी आँखें मुन्द लों। आपके अन्तर्चक्षुओं को भारतमाता के चरणों पर स्थिर कर दों। वहाँ प्रणाम अर्पित करों। और मेरे स्वर में स्वर मिलाकर गाओं – वन्दे मातरम्!’’
सबके समवेत स्वर में गाये वन्दे मातरम् ने पूरे छात्रावास की दीवारों को गुँजायमान कर दिया। और सभी के हृदयों को स्पन्दित कर दिया।
उस अविस्मरणीय क्षण के साक्षी श्री प्रमथ रंजन पाल कहते है – 1903 में उस छात्रावास में उच्चारित वह मन्त्र आग की तरहा सारे देश में फैल गया। निवेदिता ने बंकिम के उपन्यास से उस मातृपूजा के मन्त्र को चुना और उसमें प्राण प्रतिष्ठित कर दिये।

You can see the original article at

http://www.chennaimath.org/edownloads/emagazines/vedanta-kesari

It starts on page 15 of September 2011 issue.

 

सितम्बर 4, 2011 - Posted by | चरित्र

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