उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

साम्प्रदायिकता का तुष्टीकरण सबसे बड़ा भ्रष्टाचार


मानो इतिहास अपने आप को दोहरा रहा था। लोग और आंदोलन कर्ता भी जिसे आजादी की दूसरी लड़ाई कह रहे थे वह भी वास्तविक स्वतन्त्रता आंदोलन की तरहा ही साम्प्रदायिक विभाजन की ओर बढ़ने लगी है। दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम ने आन्दोलन पर आरोप लगाया कि ये इस्लाम विरोधी है और तर्क था ‘वन्दे मातरम्’ के नारे लगाना इस्लाम के विरूद्ध है। बुखारी को भारतीय मुसलमानों में कोई नहीं मानता और अनेक मुस्लीम राष्ट्रवादियों ने तुरन्त इस बात का खण्डन भी किया। पर भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन का नेतृत्व कर रही अण्णा चमु ने बुखारी को अवास्तव महत्व दिया और उन्हें समझाने जामा मस्जिद तक गये। पहले भी मंच पर से भारतमाता और स्वामी विवेकानन्द की तस्वीरों को हटाने जैसा अविवेकी कदम साम्प्रदायिकता को स्थान ना देने के नाम पर किया गया। क्या भारत माता की तस्वीर लगाना या उसको वन्दन करने के नारे लगाना साम्प्रदायिक है? आर्थिक भ्रष्टाचार से घातक यह वैचारिक भ्रष्टाचार है।
यह तर्कहीन तुष्टीकरण भयावह इतिहास की याद दिलाता है। स्वतन्त्रता संग्राम के एकमात्र सफल ओन्दोलन ‘वंगभंग आन्दोलन’ के समय बंकिमचन्द्र के उपन्यास आनन्दमठ का गीत वन्दे मातरम् एक मन्त्र की तरह उभर कर आया। सारा देश इस गान के साथ एक होकर अंग्रजों के विरोध में खड़ा हुआ। अंग्रेजों को अपना बंगाल विभाजन का निर्णय बदलना पड़ा। कलकत्ता से राजधानी भी हटानी पड़ी। यह वन्दे मातरम् के मन्त्र ने कर दिखाया था। पर खिलाफत आंदोलन के बाद मुसलमानों ने इस गान का विरोध करना प्रारम्भ किया और तुष्टीकरण की नीति पर चलते हुए वन्दे मातरम् के पूरे गायन को 1937 के कलकत्ता काँग्रेस कार्यसमिति की बैठक में निर्णय कर रोका गया। वन्दे मातरम् का विभाजन हुआ केवल प्रथम कड़ी ही गाई जाने लगी। यदुनाथ सरकार व आर. सी. मुजुमदार जैसे प्रसिद्ध इतिहासकार मानते है कि सम्भवतः यह विभाजन ही भारत के विभाजन का बीज था। आज फिर एक बार इतिहास की भूलों को दोहराया जा रहा है।
             1 अप्रैल 1977 को किये गये 42 वे संविधान संशोधन के द्वारा तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गांधी ने आपात्काल लागू करते हुए नागरिकों के मूलभूत अधिकारों को निरस्त किया था। इसी संविधान संशोधन में संविधान के मूल स्वरूप को बदलते हुए उसकी उद्देशिका में ही परिवर्तन कर दिया और ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, लोकतन्त्रात्मक गणराज्य’ में गणराज्य के विशेषणों में दो और ‘समाजवादी, पंथनिरपेक्ष’ ये जोड़ दिये। अंग्रेजी में पंथनिरपेक्ष को सेक्यूलर लिखा गया। इस शब्द का अपना इतिहास है। योरोप में पोप के नियन्त्रण से राज्यसत्ता को मुक्त करने के लिये इस संकल्पना का जन्म हुआ। और इसका शब्दकोषीय अर्थ है जो उपासना, आध्यात्म व ईश्वर से ना जुड़ा हो। इसे पवित्र (Sacred) के विलोम के रुप में प्रयोग किया जाता है। इसलिये राज्य को चर्च से अलग करने के लिये राजनीति में इसका प्रयोग किया जाने लगा। भारत में इसका कोई औचित्य ही नहीं है। भारत में कण कण में ईश्वर को देखा जाता है अतः हमारे लिये सबकुछ ही पवित्र है कुछ भी धर्म के निरपेक्ष, ना जुड़ा हुआ नहीं है। पर हमने राजनीतिक लाभ के लिये इस शब्द का अर्थ ही बदल दिया। आज बताया ये जाता है कि सेक्यूलर का अर्थ है सब पंथों के प्रति समान व्यवहार। राज्य पंथ सम्प्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा और सब पंथों को समान अधिकार प्राप्त होंगे। इसके लिये भारतीय संस्कृति में, सनातन धर्म पर आधारित हिन्दूत्व दर्शन में अधिक प्रभावी व सर्वसमावेशक विचार है- सर्वपंथ समभाव। हमारे संविधान में यह निहित है। सभी उपासना की पद्धतियों को ईश्वर तक पहुँचनेवाले भिन्न भिन्न मार्ग के रुप में हम देखते है। पर सेक्यूलर विचारधारा ने इसको बदल दिया और अपनी पुरातन संस्कृति से जुड़ी हर बात को नकारने के लिये इसका प्रयोग किया जाने लगा। और धीरे धीरे यह हिन्दु विरोध के रुप में प्रगट होने लगा।
मजेदार बात है कि आपात्काल के बाद संसद ने 43 वे तथा 44 वे संविधान संशोधन से 42 वे संशोधन की लगभग सभी बातों को पूर्ववत कर दिया, केवल उद्देशिका के परिवर्तन को छोडकर। और तब से इस संकल्पना ने भारत की राजनीति को परिभाषित करना प्रारम्भ किया। पूरे विमर्श को बहुसंख्य और अल्पसंख्य के रुप में बदल दिया गया। जिस देश का बहुसंख्य समाज मतपरिवर्तन में विश्वास न रखने वाले विश्व के सबसे सहिष्णु धर्म हिन्दु को माननेवाला हो वहाँ अल्पसंख्यों के विशेषाधिकारों की बात करना अनावश्यक ही है। फिर भी वोटों की राजनीति ने इसे पूरे समाज का विमर्श बना दिया। मूलतः सहिष्णु होने के नाते सामान्य हिन्दु भी इस बात के झांसे में आ गया। और ‘क्यों औरों की भावनाओं को दुखाना’ इस तर्क से अपने इतिहास के तथ्यों को भी अपनी नई पीढ़ि को बताने से कतराने लगा। परिणामतः आज हमारे देश का वास्तविक इतिहास हमारे बच्चों को नहीं पता। और जैसा विल डुरांड ने कहा है जो समाज अपने इतिहास को याद नहीं रखते वे अपनी भूलों को अवश्य दोहराते है।
फिर इतिहास केवल गुजरे कल की बात नहीं रह जाता वो आनेवाले कल को भी प्रभावित करने लगता है। आज हम इसी नाजुक परिवर्तन से गुजर रहे है। हमने अपने अन्दर ही इतना विघटन कर लिया हे कि पुनः मातृभुमि के विभाजन का खतरा मंढ़राने लगा है। राजनेता अपने स्वार्थ के लिये इस विपदा से मुख मोड़ रहे है पर समाज के सजग चिंतक चिंतित है।

दो विचित्र घटनायें गत सप्ताह सामने आई। दिल्ली उच्च न्यायालय परिसर में हुए आतंकी हमले के कारण इनपर अधिक चर्चा नहीं हो सकी। बांग्लादेश के दौरे पर माननीय प्रधानमन्त्री जी ने बड़े गर्व से सदियों से लटके सीमा विवाद का निपटारा किया। अपनी भुमि का दान देकर। इस मामले में सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि इस विवादित सीमा का कारण बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा आसाम के कुछ हिस्सों को अवैध रूप से घेरना था। अब हमारी सरकार दावा कर रही है कि सीमा के युक्तीकरण के बाद घुसपैठ को रोकना सम्भव होगा। पर जो 2 करोड़ से अधिक बांग्लादेशी अभी भारत मे रह रहें है उनको लौटाने को लेकर सीमा समझौता मौन है। यह घुसपैठ कितनी घातक है यह हमें दिल्ली के आतंकी हमले से पता चला। यदि वाकई ये हमला हुजी के आतेकियों ने किया है तो उनको प्रश्रय दिल्ली में बसें बांग्लादेशियों से ही मिला होगा। ये मुद्दा भविष्य में देश के इतिहास और भुगोल दोनों को बिगाड़ने की सम्भावनाओं से भरा है।

             दूसरा मुद्दा है विवादित ‘साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक’। भला हो देश के कुछ निष्पक्ष विद्वानों का जिन्होंने पिछले कुछ दिनों से वातावरण निर्मिति कर विधेयक के खतरों से जनमानस को अवगत कराया जिसके कारण सर्वपक्षीय बैठक में विधेयक का विरोध दोनों ओर से हुआ। यह विधेयक पूरे समाज को विभाजित करने का माद्दा रखता है। अब सरकार इसको बदलने को तैयार है। ऐसे समय आवश्यकता है कि राष्ट्रहित का ध्यान रखकर ही इसे बनाया जाये किसी समुदाय विशेष का नहीं। ऐसे समय समाज के योगदान का बड़ा महत्व होता है। विधेयक नेट पर उपलब्ध है। हम इसका अध्ययन कर उसमे सुधार सुझा सकते है। भावनात्मक विरोध प्रदर्शन और जनता के अभिमत को संसद तक पहुँचाना जितना जरूरी है उतना ही कानून के बनने की प्रक्रिया में सहभागी होना। विधेयक के विवादित मुद्दों के लिए – https://www.facebook.com/notes/vidhu-rawal/nine-reasons-why-the-communal-violence-bill-is-itself-communal-/2282887705006
साम्प्रदायिकता का प्रश्न हमारे अस्तीत्व से ही जुड़ा हुआ है। यदि अभी नहीं जागे तो देर हो जायेगी। हम पुनः एक बार मातृभुमि के विभाजन के दोषी होंगे। सत्य का स्पष्ट कथन और सद्भाव से उसका स्वीकार ही इस समस्या से बचने का एकमात्र मार्ग है।

सितम्बर 14, 2011 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , ,

4 टिप्पणियाँ »

  1. Till what time we will live with this ; doing compromise and only compromise with our MOTHER LAND , .
    How many pieces we will do of our HIND. Today our prime minster MNS give land to Bangladesh, then they give more and one day ASSAM . And after that Kashmir, our HIND will become India that is only Delhi.
    WHAT they want.

    टिप्पणी द्वारा Devendra Panwar | सितम्बर 14, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. “इतिहास अपने आप को दोहराता है अगर उसकी गलतिओं को न सुधार जाये ” और आज स्थिति हमारे सामने है “बंदेमातरम ” बोलने मात्र से ही किसी भी धर्म संप्रदाय आदि के नियमों का किसी भी प्रकार का उलंघन होता है या पहले भी हुआ है यह बात काफी हास्यास्पद है हाँ आपसी sadbhavna और देश विभाजन अवस्य हुआ है और आज देश पुनः उसी स्थति पर खड़ा है सर्ब धर्म समभाव की ओट मै जो तात्कालिक नेताओ ने भारतीय समाज के साथ जो घिनोना खेल खेला ( जैसे – मंदिरों मै कुरान व बाइबल की आयते और हिन्दू देवताओ के नाम में “बादसाह ” व “बेगम ” का प्रयोग आदि ) ,जिन्हें आज देश के ऊपर “पितामह’ के रूप मै थोप दिया गया है उसी प्रकार कुछ “संविधान संसोधन” का भी दिखावा हुआ / वास्तविकता की धरातल पर स्थति और भयावह है हमें सब भुलाया जा रहा है और हम ज्यादातर अपने बच्चों को सर्वधर्म सम्भाव की घुट्टी( बिभिन्न माधयमों ) पिलाने मै लगे है और इसका पूरा फायदा वो लोग ही ले रहे है जिनको बंदेमातरम बोलने से आपत्ति है ,जो भारत देश को एक सराय मानते है , मातृभूमि ,rastarabhakti आदि उनके लिए कोई मायने नहीं रखते / आज भारत में जितने (घुसपैठिये )अप्रवासी और सरनार्थी है और उनलोगों के नेताओ के भारतीय संस्कृति के दुस्मानो से प्रगाड़ सम्बन्ध है और (बंगलादेशी आदि घुसपैठिये ) इनके दुस्परिनाम हम एक महीने में दो बार देख चुके है ( मनमोहन सिंह जी का बंगलादेश दौरा व् सीमा समझोता और दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट के रूप मे ) इनका समर्थन कोई और नहीं भारतीय दुसमन ( आंतरिक और बह्य) ही कर रहे है /
    इसी प्रकार हिंदी चीनी भाई भाई -अब चीनी भाई भारतीय सीमा के अन्दर धड्दले से अपने हेलिकोप्टर लेके प्रवेश कर जेते है भारतीय बंकरो को दो किलो मीटर ( २ किमी ) तक नस्ट करके लाल रंग से चिन्हित कर जाते फिर भी ये देश के सुभ्चिन्तकों के लिए कोई बड़ी बात नहीं है और उनके कानो पर जूं तक नहीं रैगता / .
    आज भारतीय एकता और अखंडता को तार तार करने के लिए अनेक सैकड़ों बरसों अभिनव प्रयोग किये जा रहे है इसी क्रम में क्रम मे अनेकों सब्दों का जाल बनाया गया इनमे अलपसंख्यक और बहुसंख्यक भी हो सकते है का प्रयोग ( मात्र वोट राजनीती के लिए ) आज एक प्रक्षेपात्र के रूप में किया जा रहा है और इसका खामियाजा केबल और केबल हिन्दुओ को ही भुगतना पड़ रहा है “साम्प्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक” इसी क्रम मे एक और प्रक्षेपात्र है इसके नाम से प्रतीत होता है की सभी सम्प्रदायों की हिंसात्मक समस्याओं को ध्यान मे रखकर ये बिधेयक बनाया गया हो पर वास्तव में यह बिधेयक भारतीय संस्कृति को नस्ट करने व ईसा-मूसा को पुष्ट करने के लिए ही बनाया गया है और इसे पास करने के लिए पुरजोर प्रयास ( राजनैतिक और हिंसात्मक ) भी हो रहे है और निकट भविष्य में भी बहुसंख्यकों को बाहुबली बताने के लिए भरसक प्रयास किये जायेगे ऐसी मुझे आसा ही नहीं बल्कि पूर्ण विस्वास है पर हमें इतिहास की गलतियों को नहीं दोहराना है …………..इन्द्रजीत …

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | सितम्बर 15, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. लेकिन समस्या यह है मात्र वोट राजनीती के लिए भारत में जो धर्मनिरपेक्ष तबका है वह Antihinduism ( घोर हिन्दू विरोध ) को ही धर्मनिरपेक्षता मानता है |
    किन्तु इसके बाद भी संवैधानिक तौर पर भारत भले ही धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हो पर सामाजिक तौर पर नहीं।
    भारतीय धर्मनिरपेक्षता की परम्परा सकारात्मक रूप में सर्वधर्मसमभावष् का पोषण करती है।

    टिप्पणी द्वारा Satish Chandra Pal | सितम्बर 17, 2011 | प्रतिक्रिया

  4. इस विषय पर जागरुकता होना बहुत आवश्यक है। आज भी ज्यादातर लोग इस बात से अनभिज्ञ है। अपने आस-पास के वातारण में जहाॅं भी हम इस विषय में बात करते है सामान्य लोगों के इस बारे में जानकारी ही नहीं है जबकि इस बिल में कई बहुत खतरनाक प्रावधान है। मुझे लगता है इस बारे में और लिखा पढ़ा जाना चाहिए तथा इसके प्रावधानों के बारे में भी और विस्तार से लेख लिखे जाने चाहिए जैसे कि एक प्रावधान जो मुझे पता है उसे मैं बताना चाहता है कि अगर किसी अन्य सम्प्रदाय का व्यक्ति किसी बहुसंख्य के बारे में शिकायत दर्ज करता है तो उस शिकायत के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा और स्वयं को निर्दोश साबित करने की जिम्मेवारी उस बहुसंख्य समुदाय के व्यक्ति की होगी। ये इतना खतरनाक प्रावधान है कि कोई भी अल्पसंख्य समूदाय का व्यक्ति अपने सीमित स्वार्थ की पूर्ति हेतु इसका उपयोग कर सकता है।

    टिप्पणी द्वारा प्रदीप खिमनानी | अक्टूबर 1, 2011 | प्रतिक्रिया


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