उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

कर्मयोग: चलाये ‘अपनी मर्जी’!


पिछले कुछ दिनों में दो प्रसंग सामने आये। तीन अच्छे रचनाकारों को नियमित लिखने के लिये कहा तो तीनों अपनी व्यस्तता का वास्ता दिया। लिखना केवल स्वयं के लिये ही था। स्वयं के विचारों को स्पष्ट करने के लिये लिखने का सुझाव दिया था। महिने भर तक पीछे पड़ने के बाद भी अभी तक लिखना प्रारम्भ नहीं हुआ है। दूसरी ओर एक मित्र ने पूछ ही लिया आप अपनी आंतरबस्ती (Blog) पर लिखने का समय कैसे निकाल लेते हो? भाईजी कही निकम्मे तो नहीं हो गये?
दोनों बाते मजेदार है। मानव जीवन की समस्त अनिश्चितताओं के मध्य केवल एक बात पूर्णतः सुनिश्चित है, कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के प्रत्येक दिन में 24 घण्टे ही होंगे। कोई ना तो इससे ज्यादा व्यस्त हो सकता है और ना इससे एक क्षण ही अधिक व्यर्थ गवां सकता है। सारा खेल वरीयता का है।
कर्मयोग में कर्म का पहला सिद्धान्त भगवान् श्रीकृष्ण बताते है, न ही कश्चित क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत। एक क्षण भी हम कर्म किये बिना नहीं रह सकते है। हमारा हर क्षण कर्म में ही जाता है। जब हम आराम कर रहे हाते है तो वह भी तो कर्म ही हुआ। जैसे बिना प्रकाश के कोई स्थान नहीं हो सकता या बिना वायु के पूर्ण रिक्तता का होना असम्भव है उसी प्रकार बिना कर्म के रहना भी असम्भव है। इसका अर्थ तो ये हुआ कि हम 24 घण्टे व्यस्त ही होते है। पर क्या हमारे कर्म पर हमारा स्वामीत्व होता है? क्या 24 घण्टे जो कर्म कर रहे है वह अपनी स्वतन्त्रता से कर रहे है? योग तो तभी होगा जब हमारा कर्म हमारे नियन्त्रण में हो । अन्यथा तो विवशता ही हुई, मजबुरी ही हुई। फिर यह तो किसी बंधुआ मजदूर की तरहा का कर्म हुआ। यही बात भगवान ने श्लोक की दूसरी पंक्ति में कही है
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः।।भ. 3.5।।
प्रकृति आपके गुणों के अनूसार आपसे जबरदस्ती, विवशता से कर्म कराती है। यहाँ गुण का अर्थ तामसिक, राजसिक, सात्विक इस स्वभाव विभाजन से है। प्रकृति अर्थात सृष्टि के भौतिक नियम, जिनसे केवल अपनी ईच्छाशक्ति के सायास प्रयोग से ही बचा जा सकता है। तो यह श्लोक हमें कर्म का पहला स्वाभाविक सिद्धान्त बता रहा है। प्रत्येक क्षण आपको कर्म करना ही होगा। जब आप अपनी मर्जी से कर्म नहीं करोगे तो फिर अपने स्वभाववश उसके अधीन, प्रकृति से खींचे हुए कर्म करना ही पड़ेगा। अतः अपने समय को सुव्यवस्थित कर तय करके कर्म करना ही अच्छा है। नहीं तो कर्म तो होगा पर अपने लक्ष्य के अनुरूप नहीं होगा।
अतः समय का नियोजन कर्मयोग का महत्वपूर्ण व्यावहारिक अंग है। नियोजन से ही सफलता सुनिश्चित होती है। कर्मयोग हमे स्वतन्त्र करने के लिये है। हमारा कर्म बन्धा हुआ ना हो। ना ही प्रकृति के अधीन हो ना ही किसी और की इच्छा के अधीन। हमारे कर्म पर हमारा ही नियन्त्रण हो। यही तो ईच्छाशक्ति के विकास का सुनिश्चित तरिका भी हुआ।
जब नियोजन की बात होती है तो हम तुरन्त समय को बांधना शुरु कर देते है। बड़ी कठोर समय सारीणि बना लेते है। इतनी कठोर कि केवल कागज़ पर ही सम्भव हो। फिर एक दिन भी उस समय-सारीणि का पालन नहीं कर पाते। ऐसे तो ईच्छाशक्ति का विकास होने के स्थान पर जो अपनी क्षमता पर थोड़ा बहुत आत्मविश्वास है वह भी जाता रहेगा। यही कारण हे कि युवा समय के नियोजन का नाम लेते ही भागते है। वे बन्धना नहीं चाहते। जो मर्जी आये वो कार्य करना चाहते है। इसमें कोई आपत्ती नहीं है। भगवान कृष्ण को तो कतई नहीं हो सकती। वे स्वयं कहाँ बन्धनों में बन्ध सकें है?
अपनी मर्जी से कार्य करने के लिये ही नियोजन आवश्यक है। नहीं तो खाली समय में प्रकृति आपसे विवश कर्म करायेगी।
नियोजन करना है मर्जी का भी और कार्य का भी। समय तो सतत बहती नदी है उसका नियोजन में हमारे हाथ में नहीं है। हाँ! उसके उपयोग का ही हम नियोजन कर सकते है। जब आप प्रतिदिन अपनी मर्जी को परिभाषित कर कुछ काम तय करने लगेंगे तो पायेंगे कि आपके पास समय बहुत है काम कम। सारी व्यस्तता गायब हो जायेगी। अपने आप को सतत व्यस्त रखना अधिक कठीन है। समय के नियोजन में खाली समय का सदुपयोग करना सबसे बड़ी चुनौति होती है। हमारे जो तय कर्म होते है जिन्हें हम मर्जी पर नहीं छोड़ सकते उनके बीच बीच में बहुत खाली समय होता है। जैसे जो पढ़ाई कर रहे है वो विद्यालय या महाविद्यालय में जाने या ना जाने में अपनी मर्जी तो नहीं चला सकते। पर हाँ क्या सारा समय पराया होता है। कतई नहीं। इस तय समय के बीच भी बहुत सारा खाली समय होता है। जिसके उपयोग के बारे में हम नहीं सोचते। ये ही तो अपनी मर्जी चलाने का समय होता है। दो कालांश के बीच का समय, कभी कभी खाली मिला कालांश। कैंटीन में मित्रों की प्रतीक्षा करनी पड़े तब का समय। ऐसा बहुत समय होता है। यदि हम इस समय के लिये काम निकाल कर नहीं रखेंगे तो फिर प्रकृति की मर्जी चलेगी। इसी को हम उबना कहते है। ‘‘बोर हो गया।’’ इस जुमले का अर्थ है मेरी मर्जी कि जगह प्रकृति की मर्जी चली।
व्यवसाय, नौकरी आदि में भी ऐसा बहुत समय होता है। दुकानदार को कई बार ग्राहक की प्रतीक्षा करनी होती है। रात को काम समेटते समय बाकि लोगों के दायित्व पूरे होने तक कई बार प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कार्यालयीन काम में भी ऐसा बहुत समय होता है। विपणन के काम मे जो सम्पर्क करते है उनको कई बार जहाँ मिलने जाते है वहाँ प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जो महानगरों में रहते है उनको रोज घर के कार्यस्थल की यात्रा का समय। बस, ट्रेन अथवा कार में बहुत समय होता है। जिसके लिये काम तय करके नहीं रखने से प्रकृति की मर्जी चलेगी।
तो कर्म-नियोजन का अर्थ है कि हम अपनी मर्जी के काम ढूँढ के रखे। ऐसी सूचि तैयार हो और उसके लिये आवश्यक उपकरण भी साथ रख ले। पर इन कामों का निश्चित समय तय नहीं करें। जहाँ भी समय मिला कर लिया। जैसे बहुत दिनों से इच्छा है भगवद्गीता का अध्ययन करने की पर क्या करें समय ही नहीं मिलता। तो अपने पास सदा गीता रहे। और जहाँ मौका मिला पढ़ना शुरू। लिखने का शौक कई लोगों को होता है पर समय ही नहीं मिलता। तो तैयार रहे सदा ओर जहाँ समय मिला कुछ लिख लिया। अरे हाँ सब जगह लिख नहीं सकते, पर सोच तो सकते है। प्रकृति को ठेंगा दिखाना है तो अपने सोचने के लिये भी विषय निकाल कर रखे। बस में बैठने की जगह नहीं मिली, पढ़ भी नहीं सकते तो क्या हुआ खड़े खड़े अगले आंतरबस्ती का विषय तो सोच ही सकते है ना। लिखने में भी आजकल बड़ी सुविधा है। चल संगणकों के कई रूप हममें से कइयों के पास उपलब्ध है। ओर तो और अब तो चलदूरभाष, मोबाइल में भी टंकन, टाइप की व्यवस्था है। कुछ नहीं तो जेब में एक छोटी पुस्ती, पाॅकेट डायरी तो रखनी ही चाहिये। बस से उतरते ही सोचे हुए विषयबिन्दु टीप ले।
केवल बौद्धिक काम ही नहीं ऐसे समय में भावनात्मक काम भी कर सकते है। कई बार हमको लगता हे कि कोई गीत, गाना हमें याद होना चाहिये। तो ये खाली समय इस काम के लिये सबसे उपयुक्त है। आप अंत्याक्षरी में कभी नहीं हारेंगे। शारीरिक कार्य भी हो सकते है। सुक्ष्म व्यायाम करने के लिये ये समय हो सकता है।
सामान्यतः व्यस्त दिनचर्या वाले लोगों को जप, प्राणयाम आदि तो ऐसे समय ही करना चाहिये। कुल मिला के सूचि असीमित है क्योंकि हमारी मर्जी की भी तो कोई सीमा नहीं। स्वामी विवेकानन्द ने जीवन को ‘‘प्रकृति के साथ सतत संघर्ष’’ ऐसे परिभाषित किया है। कर्मयोग का यह सतत कर्मरत रहने का नियम हमें बताता है कि प्रकृति की चुनौति 24 घण्टे आपके समक्ष है। अब आप तैयार हो अपनी मर्जी का काम करने के लिये? आपके पास काम ना हुआ तो प्रकृति झपट लेगी। हमारे पास ना तो मर्जी की कमी है ना काम की केवल तैयारी की कमी है। तो हो जाओ तैयार!
चलते चलते: ये लेख भी ऐसे ही खाली समय में, ट्रेन में लिखा है।

सितम्बर 19, 2011 Posted by | योग | , , , , , , | 11 टिप्पणियाँ

   

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