उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मै कौन हूँ ?…….


संस्कार वर्ग के सबसे छोटे बालक को कार्यकर्ता ने अपने पास बुलाकर कहा-जाओ मैदान के पार उस पेड़ को छू कर आओ। पांच-छः साल का वह छोटा बालक तुरंत दौड़कर नहीं गया। उसने उल्टा प्रश्न किया-क्यों? क्यों जाऊ दौड़कर? मै ही क्यों जाऊं?

कार्यकर्ता मुस्कुराया सबकी ओर देख कर हसतें हुए बोला -देखो यह छोटू भी कोई काम उसका उद्देश्य जाने बगैर नहीं करता चाहता। आप लोग भी ऐसा ही करते हो न? माँ कुछ करने के लिए कहे तब भी पूछते हो -क्यों? और पिताजी कुछ करने को मना करते है तब भी पूछते हो -क्यों? पर आपने कभी अपने आप से ये प्रश्न पूछा है, इतने वर्षों से मै जी रहा हूँ, साँसे ले रहा हूँ, खाना खा रहा हूँ, जीवित हूँ -क्यों? किसलिए? किस उद्देश्य से…………

मै कौन हूँ? क्यों जन्म लिया मैंने? जब हम अपने आप से ये प्रश्न पूछते हैं तभी वास्तव मै हमारा जन्म होता है। इस प्रश्न का उत्तर तुरंत मिले ऐसा नहीं है। पर प्रश्न पूछना आवश्यक है। हमेशा यह प्रश्न पूछते रहना है। एक उत्तर मिलेगा। उस पर कुछ दिन अमल करेंगे तो यही प्रश्न हमारे सामने आयेगा। फिर कुछ प्रयोग करेंगे तो और बातें स्पष्ट होंगी। ऐसा करते करते हम अपने स्वभाव का परिचय पाएंगे। यह स्वभाव ही हमारी पहचान है।

जिस किसी ने अपने आप से यह प्रश्न किया उसका जीवन परिवर्तित हो गया। 13 साल का सुभाष छात्रावास में रहता था, अंग्रेजों के राज में। उसके पिता चाहते थे कि वह बड़ा होकर अंग्रेजी अधिकारी बने। भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण करें। पर सुभाष के मन में प्रश्न गूँज उठा -मै कौन हूँ? मेरा जन्म किसलिए हुआ है? उसने अपने माँ को पत्र लिखा -माँ तुने मुझे जन्म दिया है। अब तू ही बता इसका उद्देश्य क्या है? मुझे जीवन में क्या करना है?

इन प्रश्नों ने सुभाष का जीवन बदल दिया। जिसको बचपन से ही अंग्रेजों का भक्त बनाने का पूरा प्रयास किया गया था। जिस के मन में कूट-कूट कर भरा गया था कि तेरे जीवन का उद्देश्य अधिकारी बनाना और पैसे कमाना है -वही सुभाष अब इसके बिल्कुल विपरीत सोचने लगा। अपने जीवन का उद्देश्य खोजने लगा। अपने स्वभाव को पहचानने का प्रयत्न करने लगा। और वही आगे चलके ‘आजाद हिंद सेना’ का निर्माता, महान राष्ट्रभक्त सुभाषचन्द्र बोस बना।

बड़े होकर इन्ही प्रश्नों के द्वारा उन्होंने युवाओं को झकझोर दिया। सब को अपने अपने जिवनोद्देश्य के प्रति सजग किया। ऐसे ही जाग्रत युवाओं के माध्यम से आजाद हिंद सेना का निर्माण हुआ।

एक बात तो स्पष्ट है बाहर से जीवन का उद्देश्य थोपा नहीं जा सकता। माता-पिता भी अपनी इच्छा से बच्चे को उसके जीवन का उद्देश्य नहीं बता सकते वह तो प्रत्येक को खोजना पड़ता है। स्वयं का जीवनोद्देश्य खुद के खोजने से ही मिलता है।

प्रत्येक महापुरुष के जीवन में इसी प्रश्न ने परिवर्तन किया। इसी की खोज में उनके कार्य इतने महान हो गए कि उनके मृत्युके अनेक वर्षों के बाद भी उनको याद किया जाता है। जन्मतः तो प्रत्येक व्यक्ति महान होता है किन्तु जब तक अपने जीवन का उद्देश्य नहीं पा जाता तब तक वह महानता ढकी रह जाती है। अनेक लोग सारी जिंदगी अपने आप से यह प्रश्न ही नहीं पूछते कि मै कौन हूँ? किसलिए पैदा हुआ हूँ? सारा जीवन ऐसे ही बीत जाता है अपने आप को जाने बिना….. ऐसा निरुद्देश्य जीवन तो पशुवत् ही है।

सड़क पर आवारा कुत्ता भी अपना पेट पाल लेता है। छोटी सी चींटी भी प्रयास करके अपना पेट पालती है। मच्छर भी बच्चे पैदा करते हैं। मनुष्य का जन्म लेने के बाद भी यदि हम भी केवल पेट भरने के लिए ही जिए तो हम में और पशुओं में क्या भेद रह जायगा?

ईश्वर कि दुनिया में तो पशु भी निरुद्देश्य नहीं है किन्तु उनका स्वभाव उनके कर्म में अनायास ही प्रगट होता है अतः बिना प्रयास के ही उनका जीवनोद्देश्य पूर्ण होता है। मानव को बुद्धि दी गई है। वह सोचता है अतः कर्म भी अनेक प्रकार से कर सकता है इसलिए उसका जीवन अधिक महत्वपूर्ण है। पशुओं की तरहा उसका जीवन आचरण स्वभाववश नहीं होता। वह अपनी मर्जी से अपना आचरण बदल सकता है। इसलिए उसका स्वभाव भी विशेष होता है।

प्रत्येक को अपने स्वभाव को खोजना होता है और फिर उसके अनुसार कर्म का निर्णय करना होता है। आजकल हम स्वभाव को पहचानने से पूर्व ही अपना काम तय कर लेते हैं। फिर हमारे जीवन का लक्ष्य होता है कुछ बनना। वास्तविकता यह है कि हम तो अपने आप में बने हुएं ही हैं। हमें तो अपने प्रयत्न से उसको प्रगट मात्र करना है।

जैसे लालटेन की कांच पर कालिख जमा हो जाती है और उसके कारण उसका प्रकाश बाहर नहीं आ पाता है उसी प्रकार मानव के शुद्ध स्वभाव की लौ बाहरी आचरण के आवरण से ढक जाती है। कालिख दूर करते ही अंधकार भाग जायेगा उसके लिए प्रकाश को बनाने की आवश्यकता नहीं है। अपने अंदर के सत्य स्वरूप को जानना और उसे प्रगट करना यही हमारे जीवन का उद्देश्य है।

सितम्बर 25, 2011 - Posted by | आलेख

3 टिप्पणियाँ »

  1. में कौन हू ?? हम ये प्रश्न कब पूछते है??? मुझे लगता है की ये तो अपने आप ही होता है..मन में से आवाज आती है…
    आज में अपने आप से यह प्रश्न पुछु तो उसका कोई मतलब नहीं होगा क्योकि यह प्रश्न अन्दर से नहीं आया है बस सबसे सुना हिया तो मैंने भी पूछ लिया…

    ऐसा कब होता है की ये प्रश्न हमारे मन में से स्वयं आये ???

    टिप्पणी द्वारा Anand Gupta | सितम्बर 29, 2011 | प्रतिक्रिया

    • ये प्रश्न सहजता से सबके मन में कई बार प्रगटता है| पर हम अपने तय कार्यक्रम की आपाधापी में उसे पीछे धकेल देते है| दुनिया में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसके मन में ये प्रश्न न उठा हो| जिनको हम पागल समझते है वो भी इस प्रश्न से नहीं छूटते| बस चेतन मन से संकल्प के साथ इस प्रश्न पर चिंतन बहुत कम लोग करते है| उत्तर पाने तक पीछे जो पड़ते है उनको उत्तर मिले न मिले प्रश्न के पीछे पड़ने से ही जीवन सुधर जाता है|
      तुम अपने ब्लॉग को याद करो| तुमने भी तो ये प्रश्न पूछा था| बस पीछा नहीं किया शायद| बिच में छोड़ दिया|
      या अभी भी पीछे पड़े हो?

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | सितम्बर 30, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. हां मुझे अपना वो ब्लॉग याद है…मैंने वो प्रश्न पूछा थे लेकिन लगता है जब तक लक्ष्य नहीं होता तो किसी भी काम के पीछे लगातार नहीं लगा जा सकता है…
    कुछ किया कुछ नहीं…बस ऐसे ही चलता रहता है….

    टिप्पणी द्वारा Anand Gupta | अक्टूबर 2, 2011 | प्रतिक्रिया


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