उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

या देवी सर्वभूतेषु धर्मरूपेण संस्थिता . . .


संगठन का कार्य: माता दूर्गा का जीवनकार्य महिषासुर का वध था। सारी रचना इसी बात को ध्यान में रखकर थी। यदि इस पुराण कथा के प्रतिक को समझने का प्रयत्न करते है तो संस्कारों का शास्त्र हमारे सम्मुख आता है। माता का वाहन सिंह है और शत्रु महिष अर्थात भैंसा। दोनों शक्ति के प्रतिक है। एक संयमित पराक्रम का उदाहरण है तो दूसरा विवेकहीन पाशविकता का। मनुष में ये दोनों बीज रुप में उपस्थित होते है। उसे अपने अंदर के सिंहत्व का पालन करना है और उसे अपने लक्ष्य की ओर जाने का वाहन, साधन बनाना है| अनियन्त्रित कामनाओं का भैंसा भी मन में समय समय पर कुलांचे भरता है। उसका मर्दन करना है।
समाज में भी संस्कारों की सिंहशक्ति और असामाजिक महिषशक्ति दोनों पर्याप्त मात्रा में होती है। संगठन को सज्जन-शक्ति को एकत्रित कर उसके पराक्रम का आह्वान करना है। मानवता के विरुद्ध कार्य करने वाली दुर्जन-शक्ति का विनाश करना है। यह संगठन का कार्य है।
अवतार के कार्य का वर्णन करते हुए भगवान श्रीकृष्ण गीता में यही कह रहे है – रित्राणाय साधुनाम् विनाशायच दुष्कृताम्। सज्जनों को तारने और दूर्जनों के विनाश के लिये और इसी का सम्मिलित नाम दिया है धर्म की संस्थापना। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे। वर्तमान समय में, अर्थात इस युग में संगठन को यही ईश्वरीय कार्य सम्पन्न करना है।
सज्जन शक्ति का आह्वान, फिर उसे एक ध्येय की ओर अग्रेसर कर एकत्रित लाना। विभिन्न राष्ट्रीय संगठन अपने अपने तरिकों से यही कार्य करते है। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता है कि समय समय पर उस युग की आवश्यकता के अनुसार संगठनों का अवतरण होता है। किन्तु यदि कार्य के दूसरे पक्ष पर ध्यान नहीं दिया तो फिर अच्छा कार्य करते हुए भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। असुर शक्ति का विनाश भी आवश्यक है। हमें अपने शत्रुओं को पहचान कर उनका विनाश करने की भी आवश्यकता है। अहिंसा की सम्भ्रमित परिभाषाओं ने इस कार्य में व्यवधान ड़ाला है। विनाश का अर्थ केवल हिंसा से नहीं है। विनाश का अर्थ उन्हें नष्ट करना। अर्थात उन्हें निष्प्रभावी कर देना। उनके प्रभावक्षेत्र को समाप्त करना ही उनका विनाश है।
सज्जन और दूर्जन की पहचान कैसे करेंगे? धर्म के अनुसार कार्य करनेवाला सज्जन। समाज को धारण करनेवाला धर्म| आज के समय में धर्म का सरल सा अर्थ है जो बहुजन हिताय हो। जीवन की बड़ी से बड़ी इकाई के लिये हितकर जो हे वह धर्मानुसार है। उसके सिंहत्व को जागृत करना है और उसे संगठित कर पुष्ट करना है। जो संकुचित है, स्वार्थी है वह धर्म के विरुद्ध है। धर्म के विपरित, विरुद्ध कार्य करनेवाले दुर्जन| उनके प्रभाव को समाप्त करना है। अर्थात या तो ऐसे व्यक्ति में धर्म जागरण कर उसे अपने अन्दर के सिंहत्व का परिचय देना है अथवा यदि उसकी सम्भावना ना हो तो समाज में उसके प्रभाव को समाप्त करना है। महिष का मर्दन करना है | दुर्जन को प्रतिष्ठा ना मिले यह सबसे पहला काम है।

सितम्बर 29, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 8 टिप्पणियाँ

   

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