उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अंग भी पूर्ण है


गढ़े जीवन अपना अपना -4
एक बार शरीर के सारे अंगों में विवाद हो गया। पांव कहने कहने लगे ‘हम ही श्रेष्ठ है। हमारे आधार पर ही तो सारा शरीर खड़ा होता है।’ हाथ कहने लगे ‘हम तो सारा काम करते है। हमारे कार्य से ही कमाई होती है। कमाई से पोषण। हम ही सर्वश्रेष्ठ है।’ पेट ने अपना तर्क दिया ‘मैं भोजन ना पचाऊ तो सबकी बैटरी डाऊन हो जाएगी।’ हृदय ने कहा, ‘मैं धड़कना बन्द कर दूं क्या?’ मस्तिष्क कह उठा ‘सब मेरे नियत्रंण से ही संचालित होता है। मैं ही सबका राजा हूं।’ फेफड़ों ने कहा कुछ नहीं एक क्षण रूक गये। श्वास रूकी और सब परेशान। सारे अंग अपनी-अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लग गये। कहानी का अंत तो लेखक ने किया आत्मा के विधान द्वारा आत्मा घर छोड़ जाने लगी तो सबकी शक्ति क्षीण हो गई। सब कहने लगे आत्मा ही श्रेष्ठ है क्योंकि इसके बिना तो किसी का कोई अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु आत्मा ने कहा ‘आप सभी अपने आप में श्रेष्ठ हो। प्रत्येक अपने अपने कार्य में श्रेष्ठ है। सब अपना कार्य व्यवस्थित करेंगे। तभी शरीर अपना काम कर सकेगा।’ अंगों का कार्य तथा ध्येय पूरे शरीर के अनुरूप होगा तभी उसका महत्व है। शरीर को जहां जाना है पैरों को उसी दिशा में चलना होगा। अन्यथा पैरों का कार्य निरर्थक ही होगा। अंगों की सार्थकता पूरे शरीर के लक्ष्य-पूर्ति में हैं।
अब हम स्वयं को देखें। हमारा अपना एक सर्वश्रेष्ठ भाव है। जैसे पैरों का कार्य हाथ नहीं कर सकते वैसे यदि हम अपने स्वभाव एवं क्षमता के अनुसार जीवन ध्येय चुनेंगे तो सहज सफलता प्राप्त होगी। हमारी क्षमता व रूचि का मेल होता है उसी के अनुसार हमें काम में आनन्द आता है। पूर्व में जो वर्णव्यवस्था थी वह इसी प्रकार गुण-कर्म पर आधारित थी। आज भी यदि हम अपना जीवनध्येय वैज्ञानिक तरीके से तय करना चाहते है तो हमें अपने स्वभाव का वर्ण पहचानना होगा। हमें आनन्द यदि सेवा में आता है तो उसके अनुसार हमें जीवनध्येय चुनना होगा। यदि हमें लाभ प्राप्ति में रस आता है तो हम व्यापारादि उत्पादक कार्यों में अपना जीवनध्येय तय कर सकते है। शारीरिक बल अथवा नेतृत्व में सहजता से रमनेवाले व्यक्ति को रक्षासेवा, प्रशासनिक सेवा अथवा राजनैतिक सेवा का चयन करना उपयोगी होगा। अन्ततः यदि अध्ययन, अनुसंधान या कला संगीत में रूचि हो उसके अनुसार जीवनध्येय बनाने से सहज सफलता मिलेगी।
इस विचार के बाद भी एक बात बच ही जाती है। केवल अपने स्वभाव एवं शक्ति का निर्णय कर लेने से काम नहीं चलेगा। समग्रता से भी विचार करना होगा। जैसे हाथ-पांव आदि हमारे शरीर के अंग है उसी प्रकार हम भी तो राष्ट्रपुरूष के अंग है। भारतमाता के हम अंग है अतः हमारा जीवनध्येय मां भारती के जीवनधर्म के अनुकुल होगा तब ही वह उपयोगी होगा। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि भारत का जीवनध्येय (मिशन) है विश्व का मार्गदर्शन करना। हम भारत को विश्वगुरू के पद पर आसीन देखना चाहते है। हमारा जीवनध्येय, कर्म और व्यवसाय चुनते समय हम यदि इस बात का ध्यान रखे तो हमारी सफलता राष्ट्र-सेवा का माध्यम बनेगी और यह भाव कर्म की विशेष प्रेरणा देगा।

एक और बात…
व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय न मान बैठे। प्रतिवर्ष लाखों छात्र पीईटी, पीएमटी अथवा आईआईटी की प्रतियोगी परीक्षा में बैठते है। कुछ ही सफल होते है। असफलता छात्र निराशा व हताशा के शिकार हो जाते है। हमने इंजिनियर व डाॅक्टर बनने के व्यावसायिक लक्ष्य को ही जीवनध्येय मान लिया है। व्यवसाय तो साधन है। हमें मुम्बई जाना है। रेल के आरक्षण की लाईन में लगे है। आरक्षण नहीं मिला तो क्या जाना रूक जाएगा? किसी और साधन से चले जाएंगे। हमें अपना ध्येय स्पष्ट होना चाहिए फिर साधन पाने की सफलता अथवा असफलता से निराशा नहीं होगी। डॉक्टर बनना, सीए बनना तो साधन है साध्य अलग-अलग हो सकते है। एक डॉक्टर बनकर सेवा करना चाहता है, दुसरा पैसा कमाना, कोई नया अनुसंधान करना। यदि ध्येय स्पष्ट है तो पी एम टी में असफल रहने पर भी सेवा करने, पैसा कमाने अथवा अनुसंधान करने के वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा सकता है। दूसरी ओर ध्येय स्पष्ट नहीं हो और केवल भेड़चाल में व्यवसायिक लक्ष्य प्राप्त भी कर लिया तब भी जीवन में संतोष नहीं मिल पाएगा। अतः व्यावसायिक लक्ष्यप्राप्ति पर चिंतन करते समय ही उसके द्वारा प्राप्त करने के जीवनध्येय पर भी ध्यान दें। दोनों स्पष्ट हो जाने पर राह सुगम और आनन्दमय हो जाती है।
एक व्यक्ति ने घर पहूंचकर अपनी पत्नि को कहा, ‘आज मैंने पांच रुपये बचाये।’ ‘कैसे?’ ‘मैं बस के पीछे दौड़ता चला आया।’ पत्नि ने कहा, ‘कल टैक्सी के पीछे दौड़कर आना पच्चीस रुपये बचेंगे।’
साधन का मूल्य सुविधा नहीं, पहुंचना है। क्या बड़े व्यवसाय के पीछे भागकर ज्यादा लाभ मिलेगा? उसी प्रकार एक बार ध्येय, मार्ग और वाहन तीनों का चयन कर लेने के बाद फिर जल्दबाजी या तनाव का क्या काम? रेल गाड़ी में चढ़ जाने के बाद भी यदि कोई अपना सामान सिर पर उठाये रखे तो उसे क्या कहेंगे? या फिर कोई रेल में चढ़ने के बाद भी इंजिन की दिशा में दौड़ता रहे तो क्या जल्दी पहुंच जाएगा?

अक्टूबर 28, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 2 टिप्पणियाँ

कर्म के बॉस बनों! पूछो! मै यहाँ तू कहाँ??


कर्मयोग ५:

सुबह कर्मचारी के हाथ से पानी का गिलास गिरा और पानी बिखरा। आवाज से बॉस वहाँ आयें देखकर गुस्सा हुए। डाँट लगाई, ‘‘देख कर काम नहीं कर सकते? इतनी लापरवाही? ध्यान कहा रहता है?’’ बिचारा कर्मचारी सहम गया। संयोग से शाम को बॉस  का हाथ लगकर पानी से भरा गिलास गिर गया, पानी बिखरा। बॉस गुस्से से चिल्लाये, ‘‘किसने यहाँ पानी भरा गलास रखा है? ये कोई जगह है पानी रखने की।’’ सारे कर्मचारी चूप। मन ही मन भले ही हँस रहे हो। पर बाहर तो कुछ नहीं कह पाये। बॉस के जाने के बाद सुबह जिसे डाँट पड़ी थी वह कर्मचारी कुलबुलाने लगा। शिकायत करने लगा। अन्याय की बाते करने लगा। गलती किसी की भी हो डाँट तो हमे ही पड़ेगी, आदि आदि। एक साथी ने हॉल के कोने में लगे एक पोस्टर की ओर उसका ध्यान दिलाया। पोस्टर पर बड़े अक्षरों में छपा था, “This office has 3 rules. 1.Boss is always right. 2. No one can challange the Boss or complain against him. 3. If you feel boss is wrong, …. please refer to Rule number 1.

यह सामान्य सी बात है। जो स्वामी होगा उसी कि चलेगी। दास को स्वामी की सुननी ही पड़ेगी। अब आपको तय करना है कि आप स्वामी बनना चाहते हे या दास? यदि आप अपनी ईच्छा के अनुसार कर्म करना चाहते है तो आपको स्वामी ही बनना होगा। और सबसे पहला स्वामीत्व स्वयं पर होता है। हम स्वतन्त्रता से कर्म करना चाहते है। कोई दास के रूप में काम नहीं करना चाहता। कर्मयोग हमें स्वतन्त्र होने का रास्ता बताता है। सबसे बड़ी दासता किसकी है? इन्द्रियों की। यदि हमने उनपर नियन्त्रण नहीं किया तो वे हम पर नियन्त्रण करेगी ही।
तीसरे अध्याय में मिथ्याचार को बताने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण इसी का विज्ञान समझाते है।यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभते अर्जुन। इन्द्रियों का मन के द्वारा नियमन करना है। नियम्य का अर्थ नियन्त्रण से भी लिया जा सकता है। पर नियन्त्रण में थोड़ा जबरदस्ती का भाव है। और युवा को कोई बात प्रेम से कह दो मान जायेगा पर वही बात अकड़कर जबरदस्ती करवाने का प्रयास करों तो विद्रोह कर देगा। हमारा मन भी हमेशा युवा होता है। इसलिये उसे भी जबरदस्ती पर विद्रोह की आदत होती है। अतः नियमन अधिक उपयोगी है। मन में प्रचण्ड ऊर्जा होती है और वह इन्द्रियों से सुक्ष्म भी है। अतः उसके माध्यम से ही इन्द्रियों को सही दिशा दी जा सकती है। इन्द्रियों का कार्य ही मन के आधार पर होता है। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयान् उपसेवते।। गी 15.9।। मन के अधिष्ठान बिना इन्द्रियों का कार्य सम्भव ही नहीं है। जैसे जब रास्ते पर वाहन चलाते हुए दुर्घटना हो जाती है तब सामान्य सा संवाद होता है, ‘‘अन्धे हो क्या? दिखता नहीं है? या आँखें बन्द करके चलते हो?’’ या फिर, ‘‘इतना भोंपु बजा रहा हूँ। सुनाई नहीं देता? बहरे हो गये हो क्या?’’ जिसकी गलती होती है वो ना तो बहरा होता है ना ही अंधा। पर उसका एक ही स्पष्टीकरण होता है। भाषा बदल सकती है पर बात यही आयेगी हर बार कि, ‘‘ध्यान नहीं था।’’ इसका क्या अर्थ हुआ। मन कान या आँख के साथ नहीं था। मन के अधिष्ठान के बिना कोई इन्द्रिय कार्य नहीं कर सकती। इसलिये जब हम कहते है कि इन्द्रियाँ नहीं मानती हम वास्तविकता में कह रहे होते है मन नहीं मानता।

मन के द्वारा इन्द्रिय नियमन का उपाय है हर कर्म को पूर्ण सजगता से करना। ऐसी आदत मन को ड़ल जाये कि कभी किसी काम में यह ना कहना पड़, ‘‘ध्यान नहीं था।’’ सजगता का अर्थ खेल के समय खेल और पढ़ाई के समय पढ़ाई। हम जो कर रहे है उसमें सूक्ष्मतम स्तर पर सजग रहना। आसन प्राणायाम के अभ्यास का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य इस सजगता को बढ़ाने का ही होता है। हम छोटे छोटे कामों को करते समय भी अपने मन को उनमें नहीं लगाते। इसके कारण वास्तविकता में हम उन कार्यों का आनन्द ही नहीं ले पाते। जैसे भोजन के समय हम टी वी देखते है। फिर ध्यान खाने में कहाँ होगा। यदि ये कहा जाय कि अधिकतर लोग भोजन का वास्तविक स्वाद ही नहीं जानते है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। हम में से कितने लोगों ने इस बात पर ध्यान दिया है कि कद्दु मिठा होता है। जी हाँ मिठा! अगली बार खाते समय अपना पूरा ध्यान जिव्हा पर अर्थात स्वादेन्द्रियों पर केन्द्रित करें। तो पता चलेगा, सारे मसालों के मध्य भी कद्दु का मिठापन समझ में आयेगा। यदि किसी योग शिविर में ये प्रयोग करेंगे तो और आसानी होगी। मसालों का व्यवधान भी तो नहीं होगा ना?

आधुनिक युवा कहता है ये योग-वोग मत बताओ हम तो जीवन का पूर्ण आनन्द लेना चाहते है। इतना अनमोल जीवन है उसे ऐसे ही नहीं गवाँना चाहते। पूरा भोग करना चाहते है। पर बिना सजगता के भोग भी कहाँ सम्भव है? जैसे स्वाद का उदाहरण देखा वैसे ही बाकि सब भोगों का भी है। यदि मन एकाग्र नहीं हो तो हम किसी भी विषय का भोग नहीं कर सकते। भोग के लिये भी इतना योग तो करना ही होगा। नहीं तो जैसा हम बोलते भी है भोग के सहायक ‘उपभोग’ से काम चलाना पड़ेगा। उपभोग ना तो भोगी वस्तू का पूर्ण आनन्द देता है ओर ना ही संतोष। इससे तृष्णा भी बढ़ती है और अपूर्णता भी। इसी को आज की भाषा में लोग तणाव (स्ट्रेस) कहते है। और इससे पिण्ड छुड़ाने के लिये ना जाने क्या क्या करते है? तणाव को उत्पन्न होने से ही रोकने का तरिका है-सजगता से कर्म करना।

सजगता का जितना अभ्यास करेंगे उतनी वह सूक्ष्मता तक जायेगी। जैसे योगाभ्यास में हम प्रथम शिथिलीकरण व्यायाम करते है तो उस समय शरीर की मांसपेशियों के बदलाव को ध्यान से देखते है। सजगता ठोस स्तर पर होती है। फिर आसन के समय रक्त के प्रवाह को ध्यान से देखते है। तो सजगता तरल स्तर पर होती है और श्वसन का ध्यान देते समय वायु के स्तर पर होती है। अधिक अभ्यास से स्नायविक स्पन्दन तथा प्राण प्रवाह जैसे और भी सुक्ष्म स्तर पर सजगता का विकास कर सकते है। किन्तु, इन्द्रियों के निग्रह के लिये शारीरिक स्तर पर सजगता पर्याप्त है। पर शरीर की क्रियाओं में सजगता तो केवल अभ्यास के लिये है। जीवन में कर्म के समय अनेक क्रियाओं का समन्वय होता है साथ ही हेतु, प्रक्रिया आदि के बारे में विचार भी चल रहे होते है। इन सबका सम्मिलित ध्यान रखना सजगता है। अलग अलग ध्यान रखना भले ही कठीन हो पर पूरे कर्म को एकसाथ देखने की तो हमें आदत होती है। हर नये काम को सीखते समय हम पूरी प्रक्रिया को ध्यान से देखकर ही करते है। अतः ये आदत बड़ी सहजता से लग सकती है। केवल याद रखना होता है। बीच बीच में अपने आप को पूछते रहना है कि मनिराम कहाँ है? मनिराम की क्षमता होती है कि कहीं भी जा सकता है। पर यही क्षमता यदि नियन्त्रण में ना रहे और अपने आप होने लगे तो सजगता को तोड़ देती है और फिर आप के हाथ में अपने कर्म का स्वामीत्व नहीं रहता है। उपनिषदों का उदाहरण लिया जाय तो रथ को सारथी के स्थान पर घोड़े दिशा देने लगेंगे तो रथ कहाँ जायेगा? फिर पीछे कितना भी बड़ा महारथी क्यों ना हो युद्ध तो घोड़े ओर सारथी में ही होता रहेगा। आधुनिक समय में ऐसीं कारों की कल्पना की जा रही है जो स्वयं अपने आप ही चलेगी। किन्तु गन्तव्य का संचालन भले ही पूर्वनिर्धारित हो करेगा तो मनुष्य ही। यही तो सहगता की आदत से होता है। हम अपने कर्म को सहजता से करते हुए भी उसके बारे में पूर्ण सजग होते है। अवचेतन मन के स्तर पर यह कार्य होता है। यह हमारा अपना चिरपुरातन विश्वासु स्वचालक (Auto Pilot)  है। जब अपने आप अवचेतन कर्म का नियन्त्रण हाथ में ले लेता है तब हम इसे सहज कर्म कहते है। अनायास, बिना किसी प्रयास के। यह मन के भी प्रशिक्षण का विषय है और इन्द्रियों के भी।

कुछ लोग कह सकते है ये बड़ा झंझट का काम है। वैसे ऐसा है नहीं। बस थोड़ा याद ही तो रखना है कि अपना मन वही हो जहाँ हमारी इन्द्रियाँ है। और यदि थोड़ा कठीन भी है तब भी पर्याय क्या है? ये लड़ाई वाकई आर-पार की है। यदि आप के पास स्वामीत्व नहीं होगा तो वो इन्द्रियों के हाथ में चला जायेगा। जिसके कर्म का स्वामीत्व इन्द्रियों के पास चला गया है उसको भगवान श्रीकृष्ण इन्द्रियराम नाम देते है। और कहते है कि पाप की आयु भरे ऐसे इन्द्रियराम का जीवन ही व्यर्थ है। अघायुः इन्द्रियारामों मोघं पार्थ स जीवति।।गी 3.16।।

यदि हम अपने जीवन को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहते तो फिर अपने कर्म की ड़ोर अपने हाथ में लेनी होगी। बड़ा सरल है- जहाँ हम है वही हमारा मन हो। सजगता से अपने मनिराम को पूछते रहना है -‘‘मै यहाँ तू कहाँ??‘‘ और यदि पता चले कि भाईसाब कहीं घुमने गये है तो तुरन्त वापिस बुलाना है। ‘‘आ S आ S  आ S Sजा ’’। अब केवल गाना गाने से तो मन नियन्त्रण में नहीं आ जायेगा। कर्मयोग हमें इसका व्यावहारिक मार्ग बताता है। इसका व्यावहारिक मार्ग है अपने शरीर को ध्यान से देखना, महसूस करना। अपने अंगों का ऐक दूसरे से होता स्पर्श, काम करते समय मांसपेशियों में होती हलचल, कपड़ों का शरीर से होता स्पर्श इन सब पर ध्यान देने से मनिराम तुरन्त वापिस आ जाता है। धीरे धीरे अभ्यास से ये बड़ा आनन्ददायी हो जाता है। थकान तो आती ही नहीं यदि दिन में दो तीन बार भी इस प्रकार अपना ध्यान एकाग्र कर ले। तणाव का नाम ही नहीं रहता। यही तो कर्मयोग है। प्रसन्नता से कर्म करने की कला। व्यस्त रहते हुए भी मस्त रहना।

अक्टूबर 22, 2011 Posted by | योग | , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

जाना है कहाँ?


यात्रा कितनी भी लम्बी क्यों ना हो उसका प्रारम्भ होता है एक कदम से। पहला कदम बड़ा महत्वपूर्ण होता है। पहला कदम अपनी यात्रा की दिशा तय करता है। यात्रा की सफलता पहुंचने में है। सही स्थान पर पहुंचने में। हमें जहां जाना है, चलना भी उसी दिशा में पडे़गा। हमारे पास बडा़ तेज वाहन है। वातानुकुलित, गद्देदार बैठक वाला, बिना आवाज के बड़ी तेज गति से चलने वाला। पर इस सब के होते हुए भी यदि कन्याकुमारी जाने के लिए उत्तर की ओर चल पड़े तो क्या पहुंच पायेंगे? इसलिए पहला कदम बड़ा ही महत्वपूर्ण है।

जीवन भी एक यात्रा ही है। सदा चलनेवाली, कभी न रूकनेवाली। हम बैठे रहे आलस में तब भी जीवनयात्रा तो चलती ही रहेगी। यात्रा निरर्थक नहीं होती उसका उद्देश्य होता है। भटकने के लिए दिशा तय करना जरूरी नहीं है। मन में आए उस ओर चल पड़े। मेरी मर्जी जो बस, रेल मिले उसमें चढ़ जाओ। मेरी मर्जी! जहां मन करे उतर जाओ। मेरी मर्जी! जितनी देर रूकना चाहो रूक जाओ। मेरी मर्जी। फिर जिस ओर मन करें चल पड़े। मेरी मर्जी! ऐसा करके कहां पहुंचेंगे? ऐसे अपनी मनमानी करते जीवन में भटक जायेंगे की पता ही नहीं चलेगा कि ये कहां आ गये हम? फिर शायद जहां से चल पड़े थे वहां तक भी लौट न पाओगे।

वनवासियों में जब नवयुवक जंगल में शिकार खेलने पहली बार जाता है तो बड़े बुजुर्ग उसे यह सीख देते है कि इतना भी दूर न जाना कि लौट ही ना सको। फिर यह भी कि कहां नहीं जाना है। किस और जाना है यह तो वह अपने आप समझ लेता है। हमारा अनुभव हमारा सच्चा मार्गदर्शक होता है। जब जीवन यात्रा में अपने ध्येय के बारे में शंका हो जाए तो पूर्वानुभव ही मार्ग बताता है।

मार्ग शोध……

एक राही चलता-चलता एक चैराहे पर आ पहुंचा। उसे अपना गंतव्य (जहां जाना है) तो पता था। किन्तु चार राहों में कौनसी वहां जाती है यह नहीं जानता था। मार्गदर्शन देनेवाला भी कोई नहीं अर्थात् बिलकुल वर्तमान युवा पीढ़ी के समान स्थिति थी। जिस खम्बे पर दिशासूचक पट्टीका लगी थी वह भी उखड़ कर नीचे गिरा था। चारों मार्ग किस गंतव्य तक जाते है यह उन पट्टिकाओं पर लिखा था किंतु आधार उखड़ जाने से अब उनका कोई अर्थ नहीं रहा। राही सोचता रहा कि पुरूषार्थ से मैं इन पट्टिकाओं को उठा भी लू तो खम्बा किस ओर खड़ा करूं कि दिशा ठीक हो? यदि कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया तो गलत राह पर चल जाऊंगा। मित्रों क्या आप उस राही का समाधान कर सकते है? जरा सोचे तब तक हम कुछ और चर्चा कर लें।

बचपन से ही हमारे सम्मूख अनेक सफल विकल्प रखे जाते हैं कि क्या बनना है। उस समय के सफलतम व्यवसायों में से किसी एक को चुनने का दबाब अभिभावकों पर होता है। उसी आधार पर हमारे मन में जीवन ध्येय का बीजारोपण कर दिया जाता है। उसी ध्येय को पाने के लिए हम जी जान से जूट जाते है। समय के साथ सफलता के आयाम भी बदलते जाते है। और अनेक नये-नये व्यवसाय जुड़ते जाते है। किन्तु जब हम युवा होंगे अर्थात् 15-20 वर्ष शिक्षा पूर्ण करने के बाद उस समय किस प्रकार की योग्यता की मांग होगी इसका विचार ध्येय निर्धारण में नहीं होता। अतः दूरदृष्टि के अभाव में हम जिस योग्यता को कठोर परिश्रम से प्राप्त कर लेते है उस समय तक वह योग्यता अप्रासंगिक हो जाती है। फिर खोज… कि अब क्या करें? कई बार अंततः हम जो बनते है वह अनेक असफलताओं के बाद बचा-खुचा निचोड़ होता है।

भूल कहां हूई? जहां हमने अपने राही मित्र को छोड़ दिया था। उसके पास चार विकल्प थे किन्तु कौनसा मार्ग कहां जाता है बताने के लिए मार्गदर्शक नहीं था। आधारहीन दिशासूचक को सही प्रकार खड़ा करने पर वह विचार कर रहा था। क्या आपने कुछ समाधान सोचा? क्या आप उसकी कोई सहायता कर सकते है?

कठीन से कठिन समस्या का समाधान अक्सर सरलतम सोच में होता है। राही की समस्या का समाधान भी बड़ा ही सरल है। एक खम्बे पर चार मार्गों के दिशासूचक लगे है यदि एक पट्टिका भी सही दिशा में लगा दी तो बाकि तीन तो अपने आप ठीक हो जायेगी। अब जरा सोचे उस राही को एक मार्ग का तो पूरा ज्ञान है ही। जब वह चैराहे पर पहुंचा है तो उन चार मार्गों में से ही किसी एक पर चलकर ही तो पहुंचा होगा। यदि वह अपने आनेवाले स्थान की पट्टिका को उस मार्ग की ओर कर दें जिस ओर से आया है तो अन्य तीन भी सही दिशा में हो जाएंगी।

हम यदि क्या बनना है इस पर सोचने के स्थान पर कैसे बनना है इस विषय पर सोचेंगे तो सभी मार्ग ठीक जाएंगे। हम किस ओर से आकर इस मोड़ पर पहुंचे है यदि इस बात पर चिंतन करेंगे तब हमारे समक्ष आगे के विकल्प स्पष्ट होंगे। निश्चित ही किस ओर आगे बढ़ना है वह निर्णय तो अपने आप नहीं होगा किन्तु निर्णय हेतु उपलब्ध विकल्प तो स्पष्ट होंगे ही।

अक्टूबर 17, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 3 टिप्पणियाँ

महीयसी लोकमाता निवेदिता को समाधि शताब्दी पर विनम्र श्रद्धांजलि


भारत की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े बिना भारत को समझना और उससे प्रेम करना असम्भव है। स्वामी विवेकानन्द के आहवान पर भारत की सेवा करने भारत आयी मार्गारेट नोबल के लिये भी यह इतना सहज नहीं था। पर अपने गुरु के अद्भुत प्रशिक्षण व स्वयं की अविचल श्रद्धा से उन्होंने इस दुष्कर कार्य को सम्पन्न किया। इस प्रशिक्षण के मघ्य कई बार उन्हें स्वामीजी के क्रोध का सामना करना पड़ा। जब एक बार किसी सन्दर्भ में अनजाने में बिना किसी हेतु के उनके मुख से भारतीयों के लिये ‘ये भारतीय’ ऐसा पराया सम्बोधन निकला। किन्तु स्वामीजी ने अत्यन्त गम्भीरता से झिड़की दी, ‘‘तुम यदि भारत को अपना नहीं मानती तो अपने ब्रिटीश अभिमान के साथ वापिस जा सकती हो। यदि यहाँ रहना है तो अपने अन्दर से सारा ब्रिटीशपन, सारी अंग्रेजियत निकाल दों’’ अपना सबकुछ छोड़कर भारत की सेवा के लिये भारत आयी मार्गारेट के अहंकार पर यह भयंकर चोट थी। उन्होंने अपनी मन की पीड़ा को अपने पत्रों में व्यक्त किया है। पर इसके बाद भारत, भारतीय और हर हिन्दु चीज के लिये उनके मुख से अपनेपन के अलावा कुछ नही निकला। भारत को अंग्रेजी में भी वे कभी ‘इट’ सर्वनाम नहीं लगाती, अत्यन्त व्यक्तिगतता से ‘हर’ ही कहती। उनके हिन्दुत्व को अपनाने के सन्दर्भ में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकूर ने कहा था, ‘‘आजतक इस भूमि पर जन्म लिये किसी भी अन्य हिन्दू से भगीनी निवेदिता अधिक हिन्दू थी।’’ उनके इस समर्पण को ही स्वामीजी ने उनके दिक्षित नाम में अभिव्यक्त किया था – ‘निवेदिता’। नवधा भक्ति के अंतिम सोपान आत्मनिवेदन को दर्शाता पूर्ण समर्पण।
भगीनी निवेदिता वास्तव में लोकमाता हो गई थी। जो भी उनके सम्पर्क में आता उसका जीवन वे आलोकित कर देती। अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों को उन्होंने केवल प्रेरणा व सम्बल ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर सब प्रकार की सहायता की। उनके स्वयं के विचार गरम दल के निकट होने बाद भी नरम दल के सभी काँग्रसियों से उनके आत्मीय सम्बन्ध थे। उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते समय गोपाल कृष्ण गोखले अत्यन्त भावविभोर हो गये थे। डॉ जगदीश चन्द्र बसु के साथ लण्डन में हो रहे अन्याय का उन्होंने घोर विरोध किया। हताश बसु के साथ बैठकर उनके प्रबन्धों का लेखन करवाया। भारतीय कलाकारों को स्वदेशी कलाओं के विकास के लिये प्रेरित किया। नन्दलाल बोस, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे अनेक कलाकारों को पुरातन भारतीय कला के पुनरुज्जीवन के कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान किया। सुब्रह्मण्यम् भारती के विख्यात भारतभक्ति स्तोत्र की प्रेरणा निवेदिता ही थी। श्री अरविन्द के क्रांतिकारियों को संगठित करने के कार्य में भी भगीनी निवेदिता का सम्बल व मार्गदर्शन था। उनकी अनुपस्थिति में ‘वन्दे मातरम्’ के सम्पादन का कार्य भी निवेदिता ने ही सम्हाला।
जब कोई विदेशी विद्वान भारत और हिन्दुत्व के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते वे उसका पूरजार खण्डन करती। उनके द्वारा लिखित पुस्तके हिन्दु जीवन पद्धति को समझने के लिये आवश्यक पठन है। ‘हिन्दुत्व की पालना कथायें’ (Cradle tales of Hinduism) ‘भारतीय जीवन जाल’ (Web of Indian Life), ‘काली हमारी माता’ (Kali The Mother) और ‘आक्रामक हिन्दूत्व’ (Aggressive Hinduism) ये कुछ ऐसी रचनाये है जिन्हें प्रत्येक भारतीय युवा को अनिवार्य रुप से पढ़ना चाहिये। दूर्भाग्य है कि अभी तक भगीनी निवेदिता के अधिकतर साहित्य का हिन्दी अनुवाद नहीं हो पाया है। Religion & Dharma का अनुवाद पथ ओर पाथेय के नाम से हुआ है। श्री शंकरी प्रसाद बसु जैसे अभ्यासु अन्वेषक के प्रयासों से उनका समग्र साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध है। किन्तु उन्ही के द्वारा दो खण्डों में रचित जीवनी ‘लोकमाता निवेदिता’ अभी बांग्ला में ही उपलब्ध है।
वर्तमान में जब भारत की युवा पीढ़ि भारत की जड़ों से कटने की कगार पर है और धर्म की सही व्याख्या भी उपलब्ध नहीं है तब इस समर्पित महीयसी के जीवन के माध्यम से भारत का भारत से परिचय कराने का प्रयास भगिनी निवेदिता के साहित्य को घर घर तक पहुँचाने से हो सकता है|यह वर्ष भगीनी निवेदिता की समाधि का शताब्दी वर्ष है।

आज ही के दिन १०० साल पहले 13 अक्टूबर 1911 को वे दार्जिलिंग में अपने गुरुतत्व में सदा के लिये लीन हो गई। उनका जन्मदिन भी इसी माह आता है 28 अक्टूबर। 13 से 28 अक्टूबर के पखवाड़े को हम निवेदिता पखवाड़े के रुप में मनाये ओर पूरे भारत को पुनः उनका स्मरण करायें।         स्वामीजी के स्वप्न को साकार कर माँ भारती को विश्वगुरु के पद पर पुनः आसीन करने के लिये हर घर में निवेदिता अवतरित हो इस प्रार्थना के साथ सादर . . .

अक्टूबर 13, 2011 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | टिप्पणी करे

भले कर्मकाण्डी बनो! पर मिथ्याचारी नहीं!!


माँ बेटी के साथ बैठकर टी वी देख रही है। भौंडे भौंडे संवाद और वेष सब दोनों एकसाथ देख रही हैं। दादी ने या किसी ने आपत्ति की तो तथाकथित आधुनिक मम्मी का उत्तर था। ‘मै पाखंड (Hypocrisy)  में विश्वास नहीं करती हूँ। मेरे साथ नहीं देखेगी या मे मना भी कर दूँगी तो क्या छिपके नहीं देखेगी?’ बात में तो दम लगता है। पाखण्ड को तो सभी बुरा मानेंगे। पर क्या हमने सोचा है जिसे हम पाखण्ड का नाम दे रहे हे उस ‘लज्जा’ के कारण हमारे समाज में मूल्यों की रक्षा कैसे हुई है? माँ के साथ बैठकर खुलेआम देखने और छिप छिप कर देखने में मन पर संस्कार का अंतर है। पहले प्रसंग में माँ की अनुमति के कारण जो देखा जा रहा है उसका भी अनुमोदन हो रहा है। और इस कारण उसके अनुसरण में भी कोई हिचक नहीं रहेगी। चोरी छिपे देखने में प्रक्रिया में ही बोध निहित है कि जो देखा जा रहा है वह ठीक नहीं है। सामाजिक दृष्टि से वर्जित है। अतः मन में यह विचार कम ही आयेगा कि स्वयं भी ऐसा कुछ करें। युवा अपनी संगत के कारण धुम्रपान करने लगता है। पर संस्कारों के चलते जो ‘आँख की शरम’ के कारण इतनी मर्यादा रखता है कि अपने से बड़ों के सामने धुम्रपान नहीं करता। पिता या उनके समकक्ष कोई दिखने पर धुम्रदण्ड को छिपाने लगता है। अब इस प्रक्रिया में व्यसनमुक्ति की सम्भावना निहित है। पर यदि आधुनिकता व खुलेपन के नाम पर पिता ही युवा पुत्र के साथ बैठकर व्यसनानन्द लेने लगे तो फिर तो सुधार की सम्भावना ही समाप्त। अब बताओ ऐसा पाखण्ड ठीक है या नहीं?
भाषा में पदों के अर्थ तो होते है पर वे अपने आप में अच्छे या बुरे नहीं होते। सन्दर्भ, संस्कृति व कर्म का उद्देश्य तय करेगा कि वह कर्म किस श्रेणी में आयेगा। केवल अच्छे-बुरे का श्वेत-श्याम विभाजन ही नहीं होता, मानव स्वभाव के कई रंग और छटायें होती है। उन्हीं के अनुसार शब्दों के अर्थ होते है। पर गत कुछ वर्षों में हमने शब्दों को भी गुटों में बाँट दिया है। साम्प्रदायिकता का अर्थ था सम्प्रदाय को मानने वाला। यह अत्यन्त सकारात्मक बात थी सम्प्रदाय आपकी आध्यात्मिक साधना को अनुशासित करने का कार्य करते है और सम्प्रदाय का अंग होने के नाते उसके प्रति आपकी निष्ठा अपने आप में एक दायित्व भी होती है। साम्प्रदायिक साधक, गुरू, उपासना और स्थान का भारत में बड़ा सम्मान था। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में हमने इस शब्द का अर्थ ही बदल दिया। ऐसी ही स्थिति कर्मकाण्ड की है। साधना में नित्य कर्म का बड़ा ही महत्व है। मन को संस्कारित करने के लिये नियमित रूप से तय कर्म करना अत्यावश्यक होता है। इसी नियमबद्ध उपासना का नाम कर्मकाण्ड है। इसी के द्वारा कठीन समय में साधक की रक्षा होती है। हमारे इतिहास में भी आक्रांताओं के अत्याचारों में जब धर्म का प्रगट पालन भी सम्भव नहीं था तब ज्ञान काण्ड की चर्चा करना तो सोच भी नहीं सकते थे। ऐसे में कर्मकाण्ड ने ही धर्म की रक्षा की। पर गत एक शताब्दी से इस शब्द को हिन्दू धर्म के विकार के रूप में ही प्रयोग किया जाता है और सारी अन्धश्रद्धाओं का पर्यायवाची। बिना अर्थ अथवा पीछे के विज्ञान को जाने केवल कर्मकाण्ड करना सराहनीय निश्चित नहीं है। किन्तु ज्ञान व कर्म दोनों ही ना करने से कुछ एक करना तो अच्छा ही है ना? और जानकर करेंगे तो फिर यह कर्म काण्ड तारक बन जायेगा।
कर्मयोग में कर्म के पीछे के हेतु का बड़ा महत्व होता है। सामान्य जीवन में भी कर्म का महत्व उसके उद्देश्य से ही तय होता है। बड़ा सरल उदाहरण है। एक ही क्रिया – बन्दुक उठाई, निशाना लगाया, घोड़ा दबाया। अगले व्यक्ति के छाति में गोली लगी, तुरन्त प्राण निकल गये। इसी कार्य के लिये एक व्यक्ति को फांसी की सजा दी जाती है तो दूसरे को इसी कार्य के लिये परमवीर चक्र प्रदान किया जाता है। शारीरिक क्रिया भले एक ही हो कर्म अलग अलग था क्योंकि भाव अलग अलग थे। बिना मन के केवल इन्द्रियों से ही तो कर्म नहीं होता। इसी बात को भगवान कृष्ण बड़ी दृढ़ता से बताते है।
तीसरे अध्याय का प्रारम्भ अर्जुन के प्रश्न से हुआ है।
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।। गी 3.1।।
जब एक ओर आप बता रहे है कि बुद्धि कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मुझे क्यों इस घोर कर्म में ढ़केल रहे हो? आगे यहाँ तक भी कह देता हे कि ऐसे मिश्रित वचनों से मुझे भ्रमित क्यों कर रहे हो? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान कृष्ण ने कर्मयोग का विवरण प्रारम्भ किया है। निष्क्रियता जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकती। ऐसा सम्भव भी नही है, कर्म तो करना ही होगा। केवल कर्मेन्द्रियों का नियन्त्रण कर उनको बन्द कर देने से कर्म नहीं बन्द हो जाता क्योंकि मन तो सोचता ही रहता है ओर सोचना भी तो कर्म है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन।
इन्द्रियार्थान् विमूढ़ात्मा मिथ्याचारः स उच्चते।। गी 3.6।।
इसको भगवान् श्रीकृष्ण ने मिथ्याचार कहा है। यह पाखण्ड से घातक है। पाखण्ड दूसरे के प्रति असत्य आचरण है। मिथ्याचार तो स्वयं को ही धोखा देने का प्रयास है। यह तो व्यक्तित्व को ही विभाजित कर देगा। सामान्यतः इन्द्रियों को नियन्त्रित करना कठीन बताया जाता है। पर यहाँ ऐसी स्थिति का वर्णन है जहाँ उपर से कर्मेन्द्रियों को तो रोक लिया है कर्म करने से किन्तु मन के स्तर पर कर्म जारी है। इस मिथ्याचार से बचने के लिये एक उपाय तो हमने देखा है। स्वयं को पूर्ण व्यस्त रखना। अपनी मर्जी से काम करना।
यहाँ मन के संस्कार की बात हो रही है। मन को संस्कारित करना कर्म से भागकर सम्भव नहीं है। अर्जुन इसी भागने की बात कर रहा है और भगवान लड़ने की। दूसरे अध्याय में बताया है – इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।। गी 2.60।। इन्द्रियाँ बलवान् होती है व मन का भी बलपूर्वक अपहरण करने की क्षमता रखती है। जब इन्द्रियों में मन को खीचने की शक्ति है तब उसी का प्रयोग मन को उपर की ओर ले जाने के लिये क्यों ना किया जाये? पतंग और डोर के समान ये सम्बन्ध है। सामान्यतः पतंग का नियन्त्रण डोर के द्वारा किया जाता है पर हवा का जोर होने पर, यदि पतंग संतुलित हो, तो वह डोर को खींच सकती है। भगवान कह रहे है – तानि सवार्णि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।।गी 2.61।। इन इन्द्रियों को संयमित कर मुझमे लगा दो। अब ये करे कैसे?
बड़ा ही सरल सा मार्ग हमारे महापुरुषों ने बताया। जब श्री रामकृष्ण परमहंस को पूछा कि ये काम क्रोधादि रिपुओं, शत्रुओं से कैसे लड़ा जाये। व्यावहारिक एवं सहज उपाय बताने के आदी ठाकुर ने कहा, ‘‘सब विकारों को ईश्वरार्पित कर दो। क्रोध करना है उनपर करों। लोभ, प्रेम, स्नेह करना है उनसे करों।’’ हमने अपनी संस्कृति में यह कर दिखाया। केवल कहा ही नहीं इशवास्यं इदं सर्वं। पर सब विकारों को इश्वरोन्मुखी कर उदात्त कर दिया। बलि के पीछे भी यही तत्व है। मांसाहार करना है तो देवता को अर्पित कर प्रसाद के रुप में ग्रहण करों। बलि प्रथा को अमानवीय कहकर उसका विरोध करने वाले लोग पंचसितारा होटेलों में भोग के लिये कटते लाखों प्राधियों के प्रति दया क्यों नहीं दिखाते। कुछ भैरों मंदिरों में और जनजातीय  परम्पराओं में शराब को भी प्रसाद के रुप में अर्पित कर फिर प्राशन किया जाता है। भोग और उन्माद के लिये सोमपान कर समाज में बलवा करने से तो ये भला ही है। खजुराहों के मंदिरों के शिल्प भी इसी सिद्धान्त का उदाहरण है। काम को इश्वराभिमुख कर उसका उदात्तीकरण।
इन्द्रियों की प्रचण्ड कर्षण शक्ति का सदुपयोग करने के लिये हमें उनको उदात्त आदते डालनी होगी। उदात्त का अर्थ है उंचे ध्येय की ओर। ऐसे शब्दों से ही कभी कभी डर लगता है। पर यदि अपने जीवन को अपने सामने पवित्र रखना है, मिथ्याचार के अपराध बोध से बचना है तो इन्द्रियों को नित्य कर्म में बांध दो। उन्हें कुछ अच्छे कामों की आदत डाल दो। इसे ही कर्मकाण्ड कहते है। इससे कर्म का भाव शुद्ध हो जायेगा। एक बार संकल्प लेते समय उदात्त ध्येय का ध्यान करने से प्रतिदिन कर्म में वहीं भाव अनायास, अवचेतन के स्तर पर कार्य करने लगेगा। यही इन्द्रियों के माध्यम से मन को सही मार्ग पर रखने की सरलतम विधि है। जितना लगता है उतना यह उदात्तीकरण कठीन नहीं है। बड़ा ही सरल है। कई काम हम प्रतिदिन करते ही है। पर संकल्प के साथ नहीं करते। बस इतना ही करना है, संकल्प करना है। संकल्प भाव की शुद्धि करेगा और आदतन कर्म के समय मन को उदात्त करेगा।
तो आज ही तय कर लो क्या क्या प्रतिदिन करेंगे। छोटी छोटी बातें ही बड़ा परिणाम देती है। जैसे प्रतिदिन हनुमान चालिसा का पाठ, 50 सूर्यनमस्कार, कुछ व्यायाम, प्राणायाम, जप। यहाँ तक की नियमित स्नान करना भी एक आदत हो सकती है। कमसे कम पाँच – छः आदते नित्य संकल्प के रूप में ले ही लेनी चाहिये। 2 शरीर के स्तर पर जैसे व्यायाम, स्नान आदि। कम से कम दो भाव के स्तर पर जैसे जप, स्तोत्र पाठ आदि और कम से कम दो बौद्धिक स्तर पर जैसे स्वाध्याय, लेखन, श्रवण आदि। हाँ! बिना चुके, बिना एक दिन भी खण्ड पड़े करना है। फिर देखो मन कैसे उदात्त गगन में विचरण करने लगता है। आपको ही आश्चर्य होगा कि कितना पवित्र, हलका और उर्जावान अनुभव कर रहे हैं।

अक्टूबर 9, 2011 Posted by | योग | , , , , , | 12 टिप्पणियाँ

नाभि का संधान !!


एकादशी की सुबह
दशहरा मैदान में
जले रावण की राख समेटते
बूढ़ा वाल्मीकी पोते से बोला

सदियों से हर बार रावण जलता है
और अगले साल फिर खड़ा
पहले से विशाल चुनौती बन
राम के धर्म के लिए..
इतनी बार जलने के बाद
बचा कहाँ से है रावण आज भी???

आज के रावण अपने अहंकार से
नहीं ललकारते शिव के कैलास को
ना ही है इतना तप
कि अपने हृत्तंत्री की वीणा से
जटाकटाह का करे गान
पर हाँ
अपने ऋषितुल्य पिता को
कैद कर वृद्धाश्रम की सलाखों में
जकड़ते अवश्य हैं!!

भ्रष्ट लूट की नींव पर
सोने की अट्टालिकाओं को
भी उभारते हैं|स्वर्ग तक सीढ़ी लगाने
का स्वप्न भी संजोते हैं|

आज के रावण
हर सीता की ओर
दुष्ट वासना से देखते हैं|
छद्म वेश धारण कर अपहरण के बाद
मंदोदरी के अभाव में
ना जाने आज की अशोक वाटिका
में सत्व और शील की कैसे हो रक्षा??

हर बार जलने के बाद
और अधिक विशाल बन कैसे
आ जाते हैं फिर
रावण
अपने फैलते साम्राज्य
के दसों मुखों के साथ
आलसी कुंभकर्ण और
मदमस्त इंद्रजीत के साथ

राम कहाँ हो??
वानरों की आबादी तो
हर गणना में कोटि कोटि बढ़ती
पर
कौन इन्हें सेना में बाँधेगा?
अनुशासन और संगठन का पाठ
पढ़ाएगा??
यहाँ तो जाम्बवान प्रेरणा के स्थान
पर स्वयं ही सदा
रथ पर सवार

मस्तक तो कई बार गिरे
रावण के
पर फिर वही उन्मत्त अट्टहास
राम फिर हताश !

भरत पादुका लिए
युग युग से राम के राज्य
की स्थापना कर
कर रहा प्रतीक्षा
रावण है कि हर विजया पर
जलकर भी मरता ही नहीं
दिवाली की जगमग युद्धमय
अ-योध्या चिर प्रतीक्षा में …

हुश्श
भर एक हताश उच्छ्वास
बोला वाल्मिकी
हे विभीषण ! कहते हैं
तुम तो हो चिरंजीव
फिर आओ !
मातली के रथ पर चढ़ जाओ
कहो राम से

राम !! काम नहीं सर काटते
चंद्रमुखी बाणों का
सीधे साधे नुकीले
लक्ष्यवेधी शर का करो संधान
प्राणों का केंद्र जहाँ
राक्षस के
उस नाभि को छेदों !

छोटे-बड़े परिवर्तनों से नहीं होगा पार
सीधे विदेशी शिक्षा पर ही करो अब वार

हे राम !
अब के नाभि का ही हो संधान !!

अक्टूबर 8, 2011 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | 1 टिप्पणी

आहुति अष्टसिद्धियों की . . .


समर्पण:
कार्यकर्ता की सफलता उसके समर्पण पर निर्भर करती है। जितना अधिक समर्पण होगा उतना ही कार्यकर्ता प्रभावी होगा। कार्यकर्ता की सिद्धी के क्या मापदण्ड होंगे? सबसे महत्वपूर्ण तो यही कि संगठन के लक्ष्य को प्राप्त करने में उसका कितना योगदान है? दूसरा संगठन की चमु में वह किस प्रकार अपने आप को सही भूमिका में व्यवस्थित कर पाता है। इसके लिये उसको विशेष गुण विकसित करने होते हैं। अतः कार्यकर्ता के मूल्यांकन में जितना संगठनात्मक सफलता का भाग है उतना ही विचार उसके व्यक्तिगत विकास का भी है। कार्यकर्ता की स्वयं की दृष्टि से देखा जाये तो वह जितना अधिक अपने आप को संगठन के कार्य में समर्पित करता जाता है उतना ही उसके व्यक्तित्व का भी विकास होते जाता है।
महानवमी की देवी का नाम सिद्धिदात्री है। सारे देवता उसकी पूजा करते हैं और अष्टसिद्धियों का वरदान प्राप्त करते हैं। हनुमानजी के पास भी ये अष्टसिद्धियाँ थीं। इन्हीं के बलबूते पर वे आदर्श कार्यकर्ता के रूप में ख्यात हैं। अष्टसिद्धियों की व्याख्या करने पर हम आदर्श कार्यकर्ता के गुणों की सूचि प्राप्त कर सकते हैं।

  1. अणिमा – अणु जितना छोटा रूप धारण करने की क्षमता। अनेक बार चमु के कार्य में कार्यकर्ता को स्वयं छोटा बनना पड़ता है। उसी से चमु अपना कार्य कर सकती है। अतः स्वयं को छोटा करने की सिद्धी कार्यकर्ता के लिये अत्यावश्यक है। हनुमानजी ने सुरसा के मुख से बचने के लिये इस सिद्धी का प्रयोग किया था।
  2. महिमा – चाहे जितना बड़ा आकार धारण करने की क्षमता। समाज का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिये संगठन को विराट रूप धारण करना पड़ता है। विशाल कार्यक्रमों का आयोजन कर समाज का सज्जनशक्ति में विश्वास बनाना पड़ता है। भारतीय शिक्षण मंडल ने उजैन के महर्षि सांदीपनि राष्ट्रीय वेदविद्या प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में 28 से 30 अप्रैल 2018 को ‘अंतरराष्ट्रीय विराट गुरुकुल सम्मेलन’ का आयोजन किया जिसमें भारत और अन्य देशों से 8000 से भी अधिक गुरुकुलों का प्रतिनिधित्व रहा। 3700 से अधिक प्रतिभागियों की उपस्थिति में यह भव्य दिव्य सम्मेलन हुआ। सामूहिक सूर्यनमस्कार के विशाल आयोजनों से भी यही सिद्ध हुआ। विश्व में सर्वाधिक संख्या की योग कक्षा का गिनीज़ विश्व विक्रम विवेकानंद केन्द्र की ग्वालियर शाखा के नाम है। ऐसे में प्रत्येक कार्यकर्ता को शारीरिक स्तर पर महान क्षमता का परिचय देना पड़ता है। एक-एक कार्यकर्ता ने एक दिन में 5-5 विद्यालयों में जाकर सूर्यनमस्कार का प्रशिक्षण दिया। यह महिमा ही तो है।
  3. गरिमा – अपने वजन को आवश्यकता के अनुसार बढ़ाने की क्षमता। कई बार कार्यकर्ता को अपने वज़न (प्रभाव) को बढ़ाना होता है। संगठन ही उसको वज़न देता है। पर उसके साक्षात्कार व प्रयोग की आवश्यकता होती है। 10वीं में पढ़नेवाला कार्यकर्ता बिना किसी संकोच के जिलाधिकारी के कार्यालय में कार्यक्रम की अनुमति मांगने जाता है। उसके साहस और स्पष्ट अभिव्यक्ति से प्रभावित होकर अनुमति मिल जाती है। जब कार्यकर्ता को पूछो तुमको भय नहीं लगता तो उसका उत्तर होता है, ‘‘देशभर के लाखों कार्यकर्ताओं का सम्बल मेरे साथ हो तो फिर किस बात का ड़र?’’ यह है अपने वज़न को बढ़ाना। यह संगठनात्मक आत्मबल है।
  4. लघिमा – अपने आप को पूर्णतः भारहीन बना देना। कार्य की आवश्यकता के अनुसार बाहर भले ही वज़न दिखाना हो संगठन के अन्दर अपने आपको बिलकुल भारहीन बनाना होता है। केवल अहंकार रूपी भार की ही बात नहीं है, कई बार यदि कार्यकर्ता अपने आप को दायित्व के अनुसार ढ़ालने में सफल नहीं होता है, अपनी आदतों में बंधा रहता है तो वह संगठन पर बोझ ही बन जाता है। अतः आदतों में लचीलापन तथा श्रेय को बाँटने की तैयारी हो तो कार्यकर्ता संगठन में भारहीन हो जाता है।
  5. प्राप्ति –  इस सिद्धी का अर्थ है किसी भी स्थान पर प्रवेश पाने की क्षमता। संगठन के कार्य के लिये बन्द द्वारों को खोलने की क्षमता अत्यन्त आवश्यक है। कार्यकर्ता यह बहाना नहीं बना सकता कि किसी काम के लिये राह नहीं मिली। माननीय एकनाथजी रानडे का जीवन इस सिद्धी का साक्षात् उदाहरण है। विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण में अनेक द्वार बन्द होते गये पर हर बार माननीय एकनाथजी ने अपनी व्यवहारकुशलता से मार्ग बना लिया।
  6. प्रकाम्य – प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करने की सिद्धी। संगठन के कार्य में समर्पित प्रत्येक कार्यकर्ता को यह सिद्धी प्राप्त हो जाती है। भव्य स्वप्न देखना व साकार करना उसका नियमित कार्य हो जाता है। केवल एक ही शर्त होती है – इच्छा संगठनात्मक हो, व्यक्तिगत नहीं। यदि व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति का प्रयास प्रारम्भ हो जाता है, तो ना केवल सिद्धी चली जाती है अपितु संगठन ही बिखरने लगता है।
  7. ईशत्वं – सबका स्वामित्व धारण करने की क्षमता। दायित्व बढ़ने के साथ ही भौतिक संसाधनों के साथ-साथ अनेक मनुष्यों के जीवन के निर्णयों का स्वामित्व कार्यकर्ता के पास आता जाता है। इसको पचाने की क्षमता ही उसे अपने दायित्व का सही निर्वाह करने में सहायक होती है। वास्त्विकता में संगठन का आधार प्रेम व आदर होने के कारण यह स्वामित्व भावात्मक अधिक होता है, विधिक अथवा अधिकारात्मक नहीं। गुटबाजी व अपने पराये के भेद से आदर खो देने के कारण दायित्व के होते हुए भी यह स्वामित्व तो नष्ट हो ही जाता है। और ऐसा अधिकारी संगठन को आत्मघात की ओर ले जाता है।
  8. विशत्वं – सर्वस्व समर्पित करने की सिद्धी। यह सबसे महत्वपूर्ण गुण है। सब कुछ अपने स्वामित्व में आये यह तो ठीक लगता है किन्तुु इस सबको समर्पित किये बिना कार्य नहीं हो सकता। यदि अपना व्यक्तिगत अधिकार मान लिया तो सब खो जाएगा।

इन आठों सिद्धियों को प्राप्त कर संगठन को समर्पित कर सके। माता सिद्धिदात्री के चरणों में इस प्रार्थना के साथ यह नवरात्री लेखमाला सुफल संपूर्ण करते हैं।

विजयादशमी की मंगलकामनाओं के साथ !!! जय माता दी !!!

अक्टूबर 6, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 4 टिप्पणियाँ

महागौरी उपासना : प्रबुद्ध वर्ग की वैचारिक क्रांति


वैचारिक आंदोलनः

हमने मधु-कैटभ को आधुनिक मिड़िया के साथ जोड़कर देखा था। उसी तारतम्य में शुम्भ-निशुम्भ को भी समझना होगा। शुम्भ का अर्थ होता है प्रकाशित या चमकदार और निशुम्भ का मतलब है मारक, प्राण हरनेवाला। जब दोनों को साथ में देखते हैं तो इस दानव जोड़ी का अर्थ होता है – विघातक लोग जो प्रसिद्धि पा गये हैं। वर्तमान समय में एक पद चल पड़ा है – आयकॉन। इसका अनुवाद तो कठिन है पर निकटतम् पर्याय होगा प्रतीक। हमारे माध्यम समाज में प्रतीकों को स्थापित करते हैं और फिर उनके माध्यम से विचारों को प्रसारित करते हैं। यह आवश्यक नहीं कि जिस बात के लिये ख्याति हो उसका प्रसार के विषय से कोई संबंध हो। जैसे सचिन तेण्डुलकर भले ही खिलाड़ी हो पर पेप्सी से सिमेण्ट तक सब बेचता है। वस्तु बेचने से अधिक खतरनाक है विचार बेचना, वह भी केवल पैसे के लिये। अरूंधति रॉय, विनायक सेन, तीस्ता सेतलवाड़, प्रशांत भूषण जैसे देशद्रोहियों के स्वयंभु प्रवक्ता शुम्भ-निशुम्भ की सेना ही है।
असुर सेना के नामों में भी संकेत हैं। धुम्रलोचन – आँखों में धुआं झोंकनेवाला; चण्ड – पाशविक बल ही है दिमाग नहीं, हिंसा का प्रवक्ता; मुण्ड – धड़ नहीं है केवल मुख, बिना आधार के बातें करनेवाला – दिग्विजय सिंह जैसा। रक्तबीज का तो नाम ही बताता है – इनका उत्पादन करने वाली संस्थाएँ। हमारे अनेक विश्वविद्यालय देश का पैसा काम में लेकर उसी के विरोध में अनुसंधान किये जा रहे हैं। गत दिनों दिल्ली में एक शोधार्थी के आवेदन में उसके अनुसंधान का विषय लिखा था – ‘‘बड़े पड़ोसी देश से छोटे देश को खतरे और उनके द्विपक्षीय संबंध – विशेष संदर्भ भारत-बांग्लादेश संबंध’’। अब आप बताएँ इस अध्ययन की भारत में क्या प्रासंगिकता है? ढ़ाका विश्वविद्यालय में इस बात पर शोध हो तो ठीक है पर दिल्ली के प्रतिष्ठित जे.एन.यु. में ऐसा होता है तो उस मार्गदर्शक और शोधार्थी दोनों को रक्तबीज की संतान ही कहना होगा। ये संस्थान ऐसा कार्य कई वर्षों से कर रहे हैं। राष्ट्रहित में कार्य करनेवाले वैचारिक संगठनों को इसका उत्तर देना होगा।
महाअष्टमी को महागौरी की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप भी बड़ा प्रतीकात्मक है। गौरी जब तप और श्रम से धूलधुसरित हो जाती है तो स्वयं शिवजी उनको गंगा जल से नहलाते हैं। जब स्वयं भगवान ही शुद्धि करें तो क्या कहना? भगवती गौरी का स्वरूप चमकने लगता है और वे महागौरी बन जाती हैं। उनके वस्त्र भी शुभ्र हैं और सारे आभूषण भी चांदी के। पूरा स्वरूप ही शुचिता की प्रतिमूर्ति है। वाहन है सफेद बैल, शुद्धि के साथ श्रम व शक्ति का प्रतीक।
संगठन को भी महागौरी का ही पूजन करना है। प्रबुद्ध वर्ग के बुद्धि की शुद्धि करनी है। पर यह लगातार श्रम का काम है। श्रम व शक्ति के द्वारा वैचारिक परिवर्तन करना है। आज की महाअष्टमी की पूजा से वैचारिक क्रांति का सूत्रपात करना होगा। वर्तमान युग ज्ञानयुग है। ज्ञान की उपासना से ही धर्म की आदर्श व्यवस्था की स्थापना हो सकती है। अतः प्रबुद्ध वर्ग की वैचारिक क्रांति ही महागौरी की सच्ची उपासना है।

अक्टूबर 4, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 2 टिप्पणियाँ

या देवी सर्व भूतेषु दायित्व रूपेण संस्थिता . . .


दायित्व:

देवी भागवत में शुम्भ-निशुम्भ की कथा आती है। ये दोनों मधु-कैटभ के ही वंशज हैं। उनके वध का प्रतिशोध लेना चाहते हैं। अपना सशक्त साम्राज्य बना लिया है। ब्रह्माजी से तपस्या कर वरदान पा लिया कि कोई नर, चाहे मानव हो या पशु के हाथों मृत्यु नहीं होगी। उनको दंभ है कि कोई मादा, नारी से क्या ड़र। वे माता की शक्ति से अपरिचित हैं क्योंकि स्त्री को मादा के रूप में ही देखते हैं। यह असुर विचार का एक लक्षण है – नारी को मादा के रूप में भोग का साधन समझना। भारतीय संस्कृति में हर बाला को माँ के रूप में ही देखा जाता है।

आज सप्तमी है। कुमारी पूजा का दिन है। स्वामी विवेकानन्द स्वयं कुमारी के अन्दर दिव्यता के दर्शन कर कुमारी पूजा करते थे। कश्मीर में क्षीरभवानी में आसपास जब कोई हिन्दू बालिका नहीं थी तो नाववाले मुसलमान की बेटी की स्वामीजी ने कुमारी पूजा की थी। वो नाववाला भी गद्गद् हुआ था। आज भी कश्मीर के मुसलमान अपने आप को पंडितों के वंशज मानते हैं। राजनीति और पाकिस्तान के हस्तक्षेप से मामला बिगड़ा हुआ है।

तो शुम्भ-निशुम्भ के आतंक से पीड़ित देवताओं ने माता दुर्गा की प्रार्थना की। पार्वती ने देवताओं पर दया कर कौशिकी का रूप लिया। उसे काली या कालरात्री भी कहते हैं। कहीं-कहीं काली को उनकी सहायक के रूप में भी बताया गया है। वैसे इस युद्ध में सभी देवताओं की शक्तियाँ देवी के साथ लड़ी थी। कुल सात देवियों ने मिलकर धुम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज सहित लाखों असुर सेना का नाश कर दिया। चमुत्व (Team) की शक्ति का यह चमत्कार था। धुम्रलोचन के साथ सबसे पहले युद्ध हुआ। उस समय कौशिकी माता ने अकेले ही अपने वाहन सिंह के साथ 60000 असुरों का वध कर दिया। फिर चण्ड-मुण्ड अनेक मायावी दानवों की सेना लेकर आये। तब सातों देवियों ने मिलकर उनका निःपात किया। इसी से देवी का एक नाम चामुण्डा पड़ा। रक्तबीज का वरदान विचित्र था। उसके रक्त की बून्द जमीन पर गिरने से उसमें से और दानव उत्पन्न हो जाते। क्लोनिंग की कितनी उन्नत विधि! तो देवी ने काली को दायित्व दिया कि अपने खप्पर में रक्तबीज के रक्त की हर बूंद को धरती पर गिरने से पहले ही पकड़ लो। और देवी ने उसके मस्तक का छेद कर दिया।

यह चमुत्व संगठन की शक्ति को कई गुणा बढ़ा देता है। कम कार्यकर्ता भी बड़े-बड़े चमत्कार कर देते हैं। शिवाजी की सेना की सफलता का यही रहस्य था। चमु में सबका दायित्व स्पष्ट होना आवश्यक होता है। संगठन में प्रत्येक कार्यकर्ता का तय दायित्व हो ताकि कोई भ्रम अथवा कार्य का दोहराव ना हो। सब अपना-अपना दायित्व निभाते हुए एक-दूसरे के पूरक बनें। दायित्व ही कार्यकर्ता का परिचय हो जाता है। इससे कार्य में व्यक्तिगतता नहीं आती। कार्य व्यक्ति निरपेक्ष हो जाता है। अपने दायित्व से कार्यकर्ता का आत्मबल, क्षमता और प्रभाव बढ़ता है। अन्यथा सामान्य गुणोंवाला कार्यकर्ता भी असामान्य परिणाम देता है।
कालरात्री का वाहन गर्दभ है। कार्यकर्ता भी चाहे जिस श्रेणी का हो दायित्व रूपी देवी की सवारी बनते ही वह भी पूजनीय हो जाता है। दायित्ववान कार्यकर्ता संगठन को अपने लक्ष्य की ओर अग्रेसर करता है। आदर्श चमु में हर दायित्व के लिये कार्यकर्ता और हर कार्यकर्ता के लिये दायित्व होता है। हम अपने दायित्व का पूर्ण निर्वाह करते हुए कालरात्री की पूजा करें। यही हमारा कुमारी पूजन है। इसी से वर्तमान असुर सेना का नाश होगा। खप्परवाली का खप्पर खाली ना रहें। कोई कार्यकर्ता दायित्व बिना न रहें!

अक्टूबर 3, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 2 टिप्पणियाँ

कार्यकर्ता : कृपा कात्यायनी की . . .


कार्यकर्ताः
बड़ी प्रचलित कहावत है, ‘‘भगतसिंह पैदा तो हो पर पड़ोसी के घर में।’’ देशभक्तों की सब प्रशंसा तो करते हैं पर उनके बनने की प्रक्रिया की प्रसव पीड़ा को कोई नहीं सहना चाहता। महान त्याग से ही महान कार्य संपन्न होते हैं। पर आज परिवार त्याग के स्थान पर अपने बच्चों को सुरक्षित मार्ग से सहज, सफल जीवन जीने का ही प्रशिक्षण दे रहा है। केवल अपना देखो, दूसरों के बीच में मत पड़ना। सामने अन्याय होता हुआ दिखे तब भी लफड़े में मत पड़ना यह आज की माता का अपने लाड़ले लल्लू को सतत परामर्श होता है। वीरप्रसवा भारत भूमि में जीजाबाई जैसी माताएँ कहाँ चली गयीं?

नवरात्री के छठे दिन की देवी कात्यायनी है। ऋषि कात्यायन का साहस देखो। देवी से इसी आग्रह के साथ तप किया कि मेरे घर जन्म लो। देवी को परिवार में धारण करने की तैयारी। घोर तपस से प्रसन्न हो देवी ने ऋषि कात्यायन के घर जन्म लिया इसी से नाम पड़ा कात्यायनी।

संगठन में दिव्यता को अपने में जन्म देने की तैयारी वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है। वास्तव में ऐसे समर्पित कार्यकर्ता ही संगठन बनाते हैं। वे ही संगठन का आधार होते हैं। जितनी अधिक मात्रा में ऐसे कार्यकर्ता संगठन के पास होंगे उतना ही संगठन का विस्तार होगा। कुछ संगठनों में अपना पूर्ण जीवन संगठन को अर्पित करनेवाले पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की व्यवस्था होती है। उन संगठनों में ये पूर्ण समर्पित कार्यकर्ता संगठन की रीढ़ बनते हैं। फिर अगले चक्र में ऐसे कार्यकर्ता होते हैं जो पूरा समय तो नहीं दे पाते किन्तु समर्पण पूर्ण होता है। अपने व्यवसाय व परिवार के साथ बराबर की वरीयता व महत्व ये कार्यकर्ता संगठन को देते हैं। संगठन के कार्य के लिये समय भी नियमित रूप से निकालते हैं। संसाधनों को एकत्रित करने में भी ऐसे कार्यकर्ताओं का बड़ा योगदान होता है। पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं की संख्या कितनी भी अधिक हो जाएँ वह सीमित ही होगी। अतः दूसरे चक्र के कार्यकर्ता कार्य को स्थायित्व प्रदान करते हैं। संगठन की समाज में प्रतिष्ठा भी ऐसे कार्यकर्ताओं के आचरण पर निर्भर होती है। समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति यदि किसी संगठन के साथ जुड़ जाते हैं तो अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संगठन की साख में वृद्धि करते हैं।

तीसरी श्रेणी में ऐसे कार्यकर्ता आते हैं जो नियमित समयदान अथवा वैचारिक योगदान भी नहीं करते किन्तु पूरी श्रद्धा से मुख्य कार्यकर्ताओं का नैतिक समर्थन करते हैं और समय पड़ने पर आवश्यकता के अनुसार समय, श्रम और अन्य संसाधनों का योगदान भी करते हैं। एक चौथी परत भी होती है संगठन से जुड़ने वालों की। इन्हें कार्यकर्ता तो नहीं कहा जा सकता किन्तु होते ये भी महत्वपूर्ण हैं। इन्हें आप संगठन के शुभचिंतक कह सकते हैं। ये संगठन के विचार, लक्ष्य व कार्य को समझते हैं और इससे सहमत भी होते हैं। किन्तु भिन्न वरीयताओं के कारण प्रत्यक्ष योगदान नहीं देते। समाज में संगठन का अच्छा प्रभाव बनें इसमें सहायक होते हैं। सहज चर्चा में संगठन के प्रति सहानुभूति के शब्दों से समाज का सकारात्मक अभिमत बनाने का कार्य करते हैं। इनकी भी संगठन की प्रगति में अपनी भूमिका है।

कात्यायन सी तपस्या सभी संगठकों को करनी पड़ती है। अच्छा कार्य करते हैं तो विघ्नसंतोषी लोग विरोध भी करेंगे। संगठक को ऐसे लोगों से भी कुशलता से व्यवहार करना होता है। विरोध की धार बोथी हो ऐसा प्रयास करना होता है। जो दूरस्थ हैं वे निकट आएँ, सहानुभूति रखनेवाले सक्रिय हो, जो सक्रिय हैं वे नियमित हो यह तपस्या है। इसी के द्वारा संगठन में अधिक कार्यकर्ता जुड़ते हैं अर्थात कात्यायनी माता की कृपा होती है।

अक्टूबर 2, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | 7 टिप्पणियाँ

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