उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

या देवी सर्व संघेशु कार्यपद्धति रूपेण संस्थिता …


संगठन की कार्यपद्धतिः
नवरात्री में आज की देवी स्कंदमाता है। तिथिक्षय के कारण आज पाँचवा दिन है। तिथिक्षय का भी विज्ञान होता है, पर वो फिर कभी| स्कंदमाता कुमार कार्तिकेय की माता के रूप में पार्वती जी का ही नाम है। तारकासुर के वध के लिये स्कंद सेनापति का जन्म हुआ था। इनको षण्मुखनाथ और कार्तिकेय के नाम से भी जाना जाता है। जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है। महाकवि कालिदास ने ‘कुमारसम्भव’ में इसका अद्भुत वर्णन किया है। तारकासुर का आतंक बढ़ रहा था। भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि शिवजी के पुत्र को सेनापति बनाओ तो विजय निश्चित है। पर शिवजी तो माता सति के देहान्त के बाद से अविवाहित है, अब कैसे होगा? हिमालय कन्या गिरीजा उनकी सेवा में रत है। उनको पति के रूप में वरण कर चुकी है। अब तप चल रहा है। पर कैलासपति तो ध्यान में रत बैरागी उनको कौन राजी करें? इन्द्र ने प्रार्थना की पर कोई परिणम नहीं। तब कामदेव मन्मथ को कार्य दिया गया। उसने कामबाण से शिवजी के मन में गिरिजा के लिये अनुराग उत्पन्न कर दिया। पर रूद्र के क्रोध का शिकार हो गया। तीसरे नेत्र की ज्वाला ने कामदहन कर दिया। तो कुमार का जन्म कामदहन के बाद हुआ है। स्कंदमाता निष्काम मातृत्व की प्रतिमूर्ति है। उनके संस्कारों ने स्कंद को केवल 16 वर्ष की आयु में सुरसेना का सेनापति बनने लायक बना दिया। इस सब कथा में धर्म संस्थापना के लिये कार्य करनेवाले संगठनों के लिये बोध निहित है।
संगठन का कार्य है जागरण, संकलन, प्रशिक्षण तथा संग्राम अथवा सेवा के रूप में प्रत्यक्ष कार्य। सेवा भी तो गरीबी, अज्ञान, कुरीति, आलस जैसे अवांछनीय तत्वों से संग्राम ही तो है। इस सब को करना सुरसेना के निर्माण का ही तो काम है। ईश्वरीय कार्य के लिये तत्पर सेना व सेनापति के  निर्माण के लिये ही तो स्कंदमाता का जीवन है। संगठन के कार्य को प्रभावी रूप से निरन्तर करने के लिये संगठन को अपनी कार्यपद्धति विकसित करनी होती है। यह कार्यपद्धति ही संगठन का व्यावहारिक रूप होती है। कार्यपद्धति के रूप में कोई निश्चित कार्यक्रम तय किया जाता है। आदर्श कार्यपद्धति भी शिवपुत्र कुमार कार्तिकेय के समान ही षण्मुखी होती है। स्कंद सेनापति के छः मुख प्रभावी कार्य पद्धति के छः आयाम है। प्रथम मुख – सातत्य, कार्यपद्धति नियतकालीक होती है। अर्थात उसकी निरन्तरता तय होजी है जैसे नित्य प्रतिदिन, साप्ताहिक, मासिक। विवेकानन्द केन्द्र की कार्यपद्धति में योग वर्ग नित्य और संस्कार वर्ग व स्वाध्याय वर्ग सामान्यतः साप्ताहिक होते है। आदर्श संस्कार वर्ग भी दैनिक ही होना चाहिये।
द्वितीय मुख – सांघिकता, कार्यपद्धति का स्वरूप सामूहिक होना चाहिये। कार्यक्रम ही ऐसे हो कि समूह का संस्कार मिले। सज्जनशक्ति को एकत्रित आने का अवसर मिले। तीसरा मुख -संस्कार, कार्यपद्धति के द्वारा संगठन से जुड़नेवाले सदस्य का प्रशिक्षण होता है। अतः कार्यक्रम की योजना में संगठन के केन्द्रीय विचार के अनुरूप वैचारिक तथा कार्य के लिये आवश्यक व्यावहारिक दोनों अंगों का समावेश हो। कार्यपद्धति में नियम से सहभाग अपने आप में आध्यात्मिक साधना बन जाता है। संगठनके सदस्य कार्यकर्ता का सर्वांगीण विकास इसके माध्यम से होता है। यह अहं के विस्तार का साधन बन जाती है। संगठन की सामूहिक साधना का भी माध्यम बनती है और लक्ष्य को साधने में सक्षम होती है।
चौथा मुख – सार्वजनिक, आदर्श कार्यपद्धति सबके लिये खुली होती है। सहभाग पर कम से कम प्रतिबन्ध होते है। आयु के अनुसार वर्ग तो हो सकते है किन्तु बहुत अधिक पात्रता की आवश्यकता नहीं होती। राष्ट्रीय संगठनों में जाति, सम्प्रदाय, प्रांत, भाषा आदि का भेद भी ना हो। पाँचवा मुख- सहजता, कार्यपद्धति स्वाभाविक हो। उसमें सहभागी होनेवालों को सरलता से अनुकरणीय हो। सुलभ हो ताकि सभी सम्मिलित हो सके। सर्वगम्य हो सबका सहज समझ में आनेवाली हो। साधन रहित हो, कार्यक्रमों के लिये बहुत अधिक साधनों अथवा धन की आवश्यकता ना पड़े। जैसे संस्कार वर्ग किसी भी खुले स्थान पर बिना किसी उपकरण की आवश्यकता के हो सकता है। छठा मुख – सजीव, कार्यपद्धति जीवन्त होती है। संगठन को जीवन प्रदान करती है। नवीन रक्त का संचार करती है। जीवन्तता के दो लक्षण है। निरन्तर विकास व प्रजोत्पादन। अतः जीवन्त संगठन की कार्यपद्धति का सतत गुणात्मक विकास तो होता है। अपने जैसा दूसरा बनाने की प्रक्रिया से संख्यात्मक विकास भी होता है।
निश्चित कार्यपद्धति के अभाव में उदात्त ध्येय के साथ प्रारम्भ हुए संगठन भी बिखर जाते है। अनेक आंदोलनात्मक संगठनों की कार्यपद्धति  धरना,  हड़ताल, अनशन आदि प्रतिक्रियावादी होती है। सातत्य भी तय नहीं होता आवश्यकता के अनुसार अवधि आदि होती है। ऐसे संगठनों का अवसान कुछ समय में ही हो जाता है। कई संगठन कार्यपद्धति को विकसित करने पर ध्यान नहीं देते जिस कारण उनके ध्येय की पूर्ति से पहले ही मार्ग से भटक जाते है। कई सम्प्रदायात्मक संगठनों की नियमित कार्य पद्धति होती है। किन्तु व्यक्तिगत होती है। जैसे जप, पाठ, पूजा, नमाज। ऐसे संगठन सदियों तक जीवित रहते है। किन्तु उनका प्रभाव सीमित ही रहता है।
स्कन्दमाता का वाहन भी सिंह है। हमारी कार्यपद्धति भी हमारे वीरव्रत का साधन होने के कारण सबके अन्दर के सिंहत्व की सवारी करती है। स्कंदमाता से प्रार्थना कि राष्ट्र जागरण के मानवीय कार्य में लगे सभी संगठनों की कार्यपद्धति का विकास हो व उसमें निरन्तरता बनें।

अक्टूबर 1, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , | 2 टिप्पणियाँ

   

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