उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

आहुति अष्टसिद्धियों की . . .


समर्पण:
कार्यकर्ता की सफलता उसके समर्पण पर निर्भर करती है। जितना अधिक समर्पण होगा उतना ही कार्याकर्ता प्रभावी होगा। कार्यकर्ता की सिद्धी के क्या मापदण्ड होंगे? सबसे महत्वपूर्ण तो यही कि संगठन के लक्ष्य को प्राप्त करने में उसका कितना योगदान है? दूसरा संगठन की चमु में वह किस प्रकार अपने आप को सही भूमिका में व्यवस्थित कर पाता है। इसके लिये उसको विशेष गुण विकसित करने होते है। अतः कार्यकर्ता के मूल्यांकन में जितना संगठनात्मक सफलता का भाग है उतना ही विचार उसके व्यक्तिगत विकास का भी है। कार्यकर्ता की स्वयं की दृष्टि से देख जाये तो वह जितना अधिक अपने आप को संगठन के कार्य में समर्पित करता जाता है उतना ही उसके व्यक्तित्व का भी विकास होते जाता है।
महानवमी की देवी का नाम सिद्धीदात्री है। सारे देवता उसकी पूजा करते है और अष्टसिद्धियों का वरदान प्राप्त करते है। हनुमानजी के पास भी ये अष्टसिद्धियाँ थीं इन्हीं के बलबूते पर वे आदर्श कार्यकर्ता के रूप में ख्यात हैं। अष्टसिद्धियों की व्याख्या करने पर हम आदर्श कार्यकर्ता के गुणों की सूचि प्राप्त कर सकते है।
1.    अणिमा – अणु जितना छोटा रूप धारण करने की क्षमता। अनेक बार चमु के कार्य में कार्यकर्ता को स्वयं छोटा बनना पड़ता है। उसी से चमु अपना कार्य कर सकती है। अतः स्वयं को छोटा करने की सिद्धी कार्यकर्ता के लिये अत्यावश्यक है। हनुमानजी ने सुरसा के मुख से बचने के लिये इस सिद्धी का प्रयोग किया था।
2.    महिमा – चाहे जितना बड़ा आकार धारण करने की क्षमता। समाज का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिये संगठन को विराट रूप धारण करना पड़ता है। विशाल कार्यक्रमों का आयोजन कर समाज का सज्जनशक्ति में विश्वास बनाना पड़ता है। विवेकानन्द केन्द्र ने सामूहिक सूर्यनमस्कार के विशाल आयोजन कर यह कर दिखाया। विश्व में सर्वाधिक संख्या की योग कक्षा का गिनीज़ विश्व विक्रम केन्द्र की ग्वालियर शाखा के नाम है। ऐसे में प्रत्येक कार्यकर्ता को शारीरिक स्तर पर महान क्षमता का परिचय देना पड़ता है। एक एक कार्यकर्ता ने एक दिन में 5-5 विद्यालयों में जाकर सूर्यनमस्कार का प्रशिक्षण दिया। यह महिमा ही तो है।
3.    गरिमा – अपने वजन को आवश्यकता के अनुसार बढ़ाने की क्षमता। कई बार कार्यकर्ता को अपने वज़न को बढ़ाना होता है। संगठन ही उसको वज़न देता है। पर उसके साक्षात्कार व प्रयोग की आवश्यकता होती है। 10 वीं में पढ़नेवाला कार्यकर्ता बिना किसी संकोच के जिलाधिकारी के कार्यालय में प्रदर्शनी की अनुमति मांगने जाता है। उसके साहस और स्पष्ट अभिव्यक्ति से प्रभावित होकर अनुमति मिल गई। जब कार्यकर्ता को पूछा तूमको भय नहीं लगा तो उसका उत्तर था, ‘‘देशभर के सालह लाख केन्द्र कार्यकर्ता का सम्बल मेरे साथ था फिर किस बात का ड़र?’’ यह है अपने वज़न को बढ़ाना। यह संगठनात्मक आत्मबल है।
4.    लघिमा – अपने आप को पूर्णतः भारहीन बना देना। कार्य की आवश्यकता के अनुसार बाहर भले ही वज़न दिखाना हो संगठन के अन्दर अपने आपको बिलकुल भारहीन बनाना होता है। केवल अहंकार रूपी भार की ही बात नहीं है, कई बार यदि कार्यकर्ता अपने आप को दायित्व के अनुसार ढ़ालने में सफल नहीं होता है, अपनी आदतों में बंधा रहता है तो वह संगठन पर भार ही बन जाता है। अतः आदतों में लचीलापन तथा श्रेय को बाँटने की तैयारी हो तो कार्यकर्ता संगठन में भारहीन हो जाता है।
5.    प्राप्ति –  इस सिद्धी का अर्थ है किसी भी स्थान पर प्रवेश पाने की क्षमता। संगठन के कार्य के लिये बन्द द्वारों को खोलने की क्षमता अत्यन्त आवश्यक है। कार्यकर्ता यह बहाना नहीं बना सकता कि किसी काम के लिये राह नहीं मिली। माननीय एकनाथजी रानडे का जीवन इस सिद्धी का साक्षात उदाहरण है। विवेकानन्द शिलास्मारक के निर्माण में अनेक द्वार बन्द होते गये पर हर बार माननीय एकनाथजी ने अपनी व्यवहारकुशलता से मार्ग बना लिया।
6.    प्रकाम्य – प्रत्येक इच्छा को पूर्ण करने की सिद्धी। संगठन के कार्य में समर्पित प्रत्येक कार्यकर्ता को यह सिद्धी प्राप्त को जाती है। भव्य स्वप्न देखना व साकार करना उसका नियमित कार्य हो जाता है। केवल एक ही शर्त होती है इच्छा संगठनात्मक हो व्यक्तिगत नहीं। यदि व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति का प्रयास प्रारम्भ हो जाता हे तो ना केवल सिद्धी चली जाती है संगठन ही बिखरने लगता है।
7.    ईशत्वं – सबका स्वामीत्व धारण करने की क्षमता। भौतिक संसाधनों के साथ ही अनेक मनुष्यों के जीवन के निर्णयों का स्वामीत्व दायित्व बढ़ने के साथ ही कार्यकर्ता के पास आता जाता है। इसको पचाने की क्षमता ही उसे अपने दायित्व का सही निर्वाह करने में सहायक होती है। वास्त्विकता में संगठन का आधार प्रेम व आदर होने के कारण यह स्वामीत्व भावात्मक अधिक होता है, विधिक अथवा अधिकारात्मक नहीं। गुटबाजी व अपने पराये के भेद से आदर खो देने के कारण दायित्व के होते हुए भी यह स्वामीत्व तो नष्ट हो ही जाता है। और ऐसा अधिकारी संगठन को आत्मघात की ओर ले जाता है।
8.    विशत्वं – सर्वस्व समर्पित करने की सिद्धी। यह सबसे महत्वपूर्ण गुण है। सब कुछ अपने स्वामीत्व में आये यह तो ठीक लगता है किन्तुु इस सबको समर्पित किये बिना कार्य नहीं हो सकता। यदि अपना व्यक्तिगत अधिकार मान लिया तो सब खो जायेगा।
इन आठों सिद्धियों को प्राप्त कर संगठन को समर्पित कर सके। माता सिद्धीदात्री के चरणों में इस प्रार्थना के साथ यह नवरात्री लेखमाला सुफल सम्पूर्ण करते है। विजयादशमी की मंगलकामनाओं के साथ !!! जय माता दी !!

अक्टूबर 6, 2011 - Posted by | सामायिक टिपण्णी

2 टिप्पणियाँ »

  1. संघठन की दृष्टि से नवरात्री को पहली बार देखा और नवरात्री का वास्तविक उद्देश्य भी समझ आया…वैसे हिन्दू धर्म में सभी त्यौहार संघठन की दृष्टि से ही बनाये गये है..
    सबका एक ही उद्देश्य है की हिन्दू संघठित हो…वैसे अब जिस प्रकार से नवरात्री को आपने समझाया है उसी प्रकार अन्य त्यौहारों पर भी प्रकाश डाले…
    अष्ट सिद्धिया कार्यकर्ता के गुण है और कार्यकर्ता के गुण पर कभी सत्र लेना होगा तो इसका उपयोग ही श्रेष्ठ होगा…हनुमान जी का और अन्य कार्यकर्ताओं के उदाहरण सुन कर
    पुरानी यादे ताज़ा हो गई…
    इस नयी दृष्टि के लिए धन्यवाद…आगे भी ऐसे ही विशेष अवसरों पर नयी दृष्ठि प्रदान करे…जय माता दी…

    टिप्पणी द्वारा Anand Gupta | अक्टूबर 6, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. bharat desh ke liye ek ise pathpardarsak ki jroorat hain jo ki apne deshwasiyo ko adhikaro ke santh kartwao ka bhi gayan kar sake. Aasha ki ja sakti hain ki aap jayse hi kuchh kar sakte hain.

    टिप्पणी द्वारा RADHEYSHYAM SHARMA | अक्टूबर 7, 2011 | प्रतिक्रिया


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