उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

नाभि का संधान !!


एकादशी की सुबह
दशहरा मैदान में
जले रावण की राख समेटते
बूढ़ा वाल्मीकी पोते से बोला
सदियों से हर बार रावण जलता है
और अगले साल फिर
पहले से विशाल चुनौती बन
राम के धर्म के लिए..
इतनी बार जलने के बाद
बचा कहाँ से है रावण आज भी???

आज के रावण अपने अहंकार से
नहीं ललकारते शिव के कैलास को
ना ही है इतना तप
कि अपने हृत्तंत्री  की वीणा से
जटाकटाह  का करे गान
पर हाँ
अपने ऋषितुल्य पिता को
कैद कर वृद्धाश्रम की सलाखों में
जकड़ते अवश्य है!!

भ्रष्ट लूट की नीव पर
सोने की अट्टालिकाओं को
भी उभारते है|
स्वर्ग  तक सीढ़ी लगाने
का स्वप्न भी संजोते है|

आज के रावण
हर सीता की ओर
दुष्ट वासना से देखते हैं
छद्म वेश धारण कर अपहरण के बाद
मंदोदरी के अभाव में
ना जाने आज की अशोक वाटिका
में सत्व और शील की कैसे हो रक्षा??

हर बार जलने के बाद
और अधिक विशाल बन कैसे
आ जाते है फिर
रावण
अपने फैलते साम्राज्य
के दसों मुखों के साथ
आलसी कुम्भकर्ण और
मदमस्त इन्द्रजीत के साथ

राम कहाँ हो??
वानरों की आबादी तो
हर गणना में कोटि कोटि बढ़ती
पर
कौन इन्हें सेना में बाँधेगा?
अनुशासन और संगठन का पाठ
पढ़ायेगा??
यहाँ तो जाम्बवान प्रेरणा के स्थान
पर स्वयं ही सदा
रथ पर सवार

मस्तक तो कई बार गिरे
रावण के
पर फिर वही उन्मत्त अट्टाहास
राम फिर हताश!

भरत पादुका लिए
युग युग से राम के राज्य
की स्थापना कर
कर रहा प्रतीक्षा
रावण है कि हर विजया पर
जलकर भी मरता ही नहीं
दिवाली की जगमग युद्धमय
अ- योध्या चिर प्रतीक्षा में ..

हुश्श
भर एक हताश उछ्श्वास
बोला वाल्मिकी
हे बिभीषण ! कहते है
तुम तो हो चिरंजीव
फिर आओ!
मातली के रथ पर चढ़ जाओ
कहो राम से

राम !! काम नहीं सर काटते
चंद्रमुखी बाणों का
सीधे  साधे  नुकीले
लक्ष्यवेधी शर का करो संधान
प्राणों का केंद्र जहाँ
राक्षस के
उस नाभि को छेदों!

छोटे बड़े कानूनों से नहीं होगा पार
सीधे संविधान पर ही करो अब वार

हे राम!
अब के नाभि का ही हो संधान !!

अक्टूबर 8, 2011 Posted by | कविता, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | 1 टिप्पणी

   

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