उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

महीयसी लोकमाता निवेदिता को समाधि शताब्दी पर विनम्र श्रद्धांजलि


भारत की सांस्कृतिक व आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े बिना भारत को समझना और उससे प्रेम करना असम्भव है। स्वामी विवेकानन्द के आहवान पर भारत की सेवा करने भारत आयी मार्गारेट नोबल के लिये भी यह इतना सहज नहीं था। पर अपने गुरु के अद्भुत प्रशिक्षण व स्वयं की अविचल श्रद्धा से उन्होंने इस दुष्कर कार्य को सम्पन्न किया। इस प्रशिक्षण के मघ्य कई बार उन्हें स्वामीजी के क्रोध का सामना करना पड़ा। जब एक बार किसी सन्दर्भ में अनजाने में बिना किसी हेतु के उनके मुख से भारतीयों के लिये ‘ये भारतीय’ ऐसा पराया सम्बोधन निकला। किन्तु स्वामीजी ने अत्यन्त गम्भीरता से झिड़की दी, ‘‘तुम यदि भारत को अपना नहीं मानती तो अपने ब्रिटीश अभिमान के साथ वापिस जा सकती हो। यदि यहाँ रहना है तो अपने अन्दर से सारा ब्रिटीशपन, सारी अंग्रेजियत निकाल दों’’ अपना सबकुछ छोड़कर भारत की सेवा के लिये भारत आयी मार्गारेट के अहंकार पर यह भयंकर चोट थी। उन्होंने अपनी मन की पीड़ा को अपने पत्रों में व्यक्त किया है। पर इसके बाद भारत, भारतीय और हर हिन्दु चीज के लिये उनके मुख से अपनेपन के अलावा कुछ नही निकला। भारत को अंग्रेजी में भी वे कभी ‘इट’ सर्वनाम नहीं लगाती, अत्यन्त व्यक्तिगतता से ‘हर’ ही कहती। उनके हिन्दुत्व को अपनाने के सन्दर्भ में गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकूर ने कहा था, ‘‘आजतक इस भूमि पर जन्म लिये किसी भी अन्य हिन्दू से भगीनी निवेदिता अधिक हिन्दू थी।’’ उनके इस समर्पण को ही स्वामीजी ने उनके दिक्षित नाम में अभिव्यक्त किया था – ‘निवेदिता’। नवधा भक्ति के अंतिम सोपान आत्मनिवेदन को दर्शाता पूर्ण समर्पण।
भगीनी निवेदिता वास्तव में लोकमाता हो गई थी। जो भी उनके सम्पर्क में आता उसका जीवन वे आलोकित कर देती। अनेक स्वतन्त्रता सेनानियों को उन्होंने केवल प्रेरणा व सम्बल ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर सब प्रकार की सहायता की। उनके स्वयं के विचार गरम दल के निकट होने बाद भी नरम दल के सभी काँग्रसियों से उनके आत्मीय सम्बन्ध थे। उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते समय गोपाल कृष्ण गोखले अत्यन्त भावविभोर हो गये थे। डॉ जगदीश चन्द्र बसु के साथ लण्डन में हो रहे अन्याय का उन्होंने घोर विरोध किया। हताश बसु के साथ बैठकर उनके प्रबन्धों का लेखन करवाया। भारतीय कलाकारों को स्वदेशी कलाओं के विकास के लिये प्रेरित किया। नन्दलाल बोस, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ऐसे अनेक कलाकारों को पुरातन भारतीय कला के पुनरुज्जीवन के कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान किया। सुब्रह्मण्यम् भारती के विख्यात भारतभक्ति स्तोत्र की प्रेरणा निवेदिता ही थी। श्री अरविन्द के क्रांतिकारियों को संगठित करने के कार्य में भी भगीनी निवेदिता का सम्बल व मार्गदर्शन था। उनकी अनुपस्थिति में ‘वन्दे मातरम्’ के सम्पादन का कार्य भी निवेदिता ने ही सम्हाला।
जब कोई विदेशी विद्वान भारत और हिन्दुत्व के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते वे उसका पूरजार खण्डन करती। उनके द्वारा लिखित पुस्तके हिन्दु जीवन पद्धति को समझने के लिये आवश्यक पठन है। ‘हिन्दुत्व की पालना कथायें’ (Cradle tales of Hinduism) ‘भारतीय जीवन जाल’ (Web of Indian Life), ‘काली हमारी माता’ (Kali The Mother) और ‘आक्रामक हिन्दूत्व’ (Aggressive Hinduism) ये कुछ ऐसी रचनाये है जिन्हें प्रत्येक भारतीय युवा को अनिवार्य रुप से पढ़ना चाहिये। दूर्भाग्य है कि अभी तक भगीनी निवेदिता के अधिकतर साहित्य का हिन्दी अनुवाद नहीं हो पाया है। Religion & Dharma का अनुवाद पथ ओर पाथेय के नाम से हुआ है। श्री शंकरी प्रसाद बसु जैसे अभ्यासु अन्वेषक के प्रयासों से उनका समग्र साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध है। किन्तु उन्ही के द्वारा दो खण्डों में रचित जीवनी ‘लोकमाता निवेदिता’ अभी बांग्ला में ही उपलब्ध है।
वर्तमान में जब भारत की युवा पीढ़ि भारत की जड़ों से कटने की कगार पर है और धर्म की सही व्याख्या भी उपलब्ध नहीं है तब इस समर्पित महीयसी के जीवन के माध्यम से भारत का भारत से परिचय कराने का प्रयास भगिनी निवेदिता के साहित्य को घर घर तक पहुँचाने से हो सकता है|यह वर्ष भगीनी निवेदिता की समाधि का शताब्दी वर्ष है।

आज ही के दिन १०० साल पहले 13 अक्टूबर 1911 को वे दार्जिलिंग में अपने गुरुतत्व में सदा के लिये लीन हो गई। उनका जन्मदिन भी इसी माह आता है 28 अक्टूबर। 13 से 28 अक्टूबर के पखवाड़े को हम निवेदिता पखवाड़े के रुप में मनाये ओर पूरे भारत को पुनः उनका स्मरण करायें।         स्वामीजी के स्वप्न को साकार कर माँ भारती को विश्वगुरु के पद पर पुनः आसीन करने के लिये हर घर में निवेदिता अवतरित हो इस प्रार्थना के साथ सादर . . .

अक्टूबर 13, 2011 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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