उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

जाना है कहाँ?


यात्रा कितनी भी लम्बी क्यों ना हो उसका प्रारम्भ होता है एक कदम से। पहला कदम बड़ा महत्वपूर्ण होता है। पहला कदम अपनी यात्रा की दिशा तय करता है। यात्रा की सफलता पहुंचने में है। सही स्थान पर पहुंचने में। हमें जहां जाना है, चलना भी उसी दिशा में पडे़गा। हमारे पास बडा़ तेज वाहन है। वातानुकुलित, गद्देदार बैठक वाला, बिना आवाज के बड़ी तेज गति से चलने वाला। पर इस सब के होते हुए भी यदि कन्याकुमारी जाने के लिए उत्तर की ओर चल पड़े तो क्या पहुंच पायेंगे? इसलिए पहला कदम बड़ा ही महत्वपूर्ण है।

जीवन भी एक यात्रा ही है। सदा चलनेवाली, कभी न रूकनेवाली। हम बैठे रहे आलस में तब भी जीवनयात्रा तो चलती ही रहेगी। यात्रा निरर्थक नहीं होती उसका उद्देश्य होता है। भटकने के लिए दिशा तय करना जरूरी नहीं है। मन में आए उस ओर चल पड़े। मेरी मर्जी जो बस, रेल मिले उसमें चढ़ जाओ। मेरी मर्जी! जहां मन करे उतर जाओ। मेरी मर्जी! जितनी देर रूकना चाहो रूक जाओ। मेरी मर्जी। फिर जिस ओर मन करें चल पड़े। मेरी मर्जी! ऐसा करके कहां पहुंचेंगे? ऐसे अपनी मनमानी करते जीवन में भटक जायेंगे की पता ही नहीं चलेगा कि ये कहां आ गये हम? फिर शायद जहां से चल पड़े थे वहां तक भी लौट न पाओगे।

वनवासियों में जब नवयुवक जंगल में शिकार खेलने पहली बार जाता है तो बड़े बुजुर्ग उसे यह सीख देते है कि इतना भी दूर न जाना कि लौट ही ना सको। फिर यह भी कि कहां नहीं जाना है। किस और जाना है यह तो वह अपने आप समझ लेता है। हमारा अनुभव हमारा सच्चा मार्गदर्शक होता है। जब जीवन यात्रा में अपने ध्येय के बारे में शंका हो जाए तो पूर्वानुभव ही मार्ग बताता है।

मार्ग शोध……

एक राही चलता-चलता एक चैराहे पर आ पहुंचा। उसे अपना गंतव्य (जहां जाना है) तो पता था। किन्तु चार राहों में कौनसी वहां जाती है यह नहीं जानता था। मार्गदर्शन देनेवाला भी कोई नहीं अर्थात् बिलकुल वर्तमान युवा पीढ़ी के समान स्थिति थी। जिस खम्बे पर दिशासूचक पट्टीका लगी थी वह भी उखड़ कर नीचे गिरा था। चारों मार्ग किस गंतव्य तक जाते है यह उन पट्टिकाओं पर लिखा था किंतु आधार उखड़ जाने से अब उनका कोई अर्थ नहीं रहा। राही सोचता रहा कि पुरूषार्थ से मैं इन पट्टिकाओं को उठा भी लू तो खम्बा किस ओर खड़ा करूं कि दिशा ठीक हो? यदि कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया तो गलत राह पर चल जाऊंगा। मित्रों क्या आप उस राही का समाधान कर सकते है? जरा सोचे तब तक हम कुछ और चर्चा कर लें।

बचपन से ही हमारे सम्मूख अनेक सफल विकल्प रखे जाते हैं कि क्या बनना है। उस समय के सफलतम व्यवसायों में से किसी एक को चुनने का दबाब अभिभावकों पर होता है। उसी आधार पर हमारे मन में जीवन ध्येय का बीजारोपण कर दिया जाता है। उसी ध्येय को पाने के लिए हम जी जान से जूट जाते है। समय के साथ सफलता के आयाम भी बदलते जाते है। और अनेक नये-नये व्यवसाय जुड़ते जाते है। किन्तु जब हम युवा होंगे अर्थात् 15-20 वर्ष शिक्षा पूर्ण करने के बाद उस समय किस प्रकार की योग्यता की मांग होगी इसका विचार ध्येय निर्धारण में नहीं होता। अतः दूरदृष्टि के अभाव में हम जिस योग्यता को कठोर परिश्रम से प्राप्त कर लेते है उस समय तक वह योग्यता अप्रासंगिक हो जाती है। फिर खोज… कि अब क्या करें? कई बार अंततः हम जो बनते है वह अनेक असफलताओं के बाद बचा-खुचा निचोड़ होता है।

भूल कहां हूई? जहां हमने अपने राही मित्र को छोड़ दिया था। उसके पास चार विकल्प थे किन्तु कौनसा मार्ग कहां जाता है बताने के लिए मार्गदर्शक नहीं था। आधारहीन दिशासूचक को सही प्रकार खड़ा करने पर वह विचार कर रहा था। क्या आपने कुछ समाधान सोचा? क्या आप उसकी कोई सहायता कर सकते है?

कठीन से कठिन समस्या का समाधान अक्सर सरलतम सोच में होता है। राही की समस्या का समाधान भी बड़ा ही सरल है। एक खम्बे पर चार मार्गों के दिशासूचक लगे है यदि एक पट्टिका भी सही दिशा में लगा दी तो बाकि तीन तो अपने आप ठीक हो जायेगी। अब जरा सोचे उस राही को एक मार्ग का तो पूरा ज्ञान है ही। जब वह चैराहे पर पहुंचा है तो उन चार मार्गों में से ही किसी एक पर चलकर ही तो पहुंचा होगा। यदि वह अपने आनेवाले स्थान की पट्टिका को उस मार्ग की ओर कर दें जिस ओर से आया है तो अन्य तीन भी सही दिशा में हो जाएंगी।

हम यदि क्या बनना है इस पर सोचने के स्थान पर कैसे बनना है इस विषय पर सोचेंगे तो सभी मार्ग ठीक जाएंगे। हम किस ओर से आकर इस मोड़ पर पहुंचे है यदि इस बात पर चिंतन करेंगे तब हमारे समक्ष आगे के विकल्प स्पष्ट होंगे। निश्चित ही किस ओर आगे बढ़ना है वह निर्णय तो अपने आप नहीं होगा किन्तु निर्णय हेतु उपलब्ध विकल्प तो स्पष्ट होंगे ही।

अक्टूबर 17, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 3 टिप्पणियाँ

   

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