उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

कर्म के बॉस बनों! पूछो! मै यहाँ तू कहाँ??


कर्मयोग ५:

सुबह कर्मचारी के हाथ से पानी का गिलास गिरा और पानी बिखरा। आवाज से बॉस वहाँ आयें देखकर गुस्सा हुए। डाँट लगाई, ‘‘देख कर काम नहीं कर सकते? इतनी लापरवाही? ध्यान कहा रहता है?’’ बिचारा कर्मचारी सहम गया। संयोग से शाम को बॉस  का हाथ लगकर पानी से भरा गिलास गिर गया, पानी बिखरा। बॉस गुस्से से चिल्लाये, ‘‘किसने यहाँ पानी भरा गलास रखा है? ये कोई जगह है पानी रखने की।’’ सारे कर्मचारी चूप। मन ही मन भले ही हँस रहे हो। पर बाहर तो कुछ नहीं कह पाये। बॉस के जाने के बाद सुबह जिसे डाँट पड़ी थी वह कर्मचारी कुलबुलाने लगा। शिकायत करने लगा। अन्याय की बाते करने लगा। गलती किसी की भी हो डाँट तो हमे ही पड़ेगी, आदि आदि। एक साथी ने हॉल के कोने में लगे एक पोस्टर की ओर उसका ध्यान दिलाया। पोस्टर पर बड़े अक्षरों में छपा था, “This office has 3 rules. 1.Boss is always right. 2. No one can challange the Boss or complain against him. 3. If you feel boss is wrong, …. please refer to Rule number 1.

यह सामान्य सी बात है। जो स्वामी होगा उसी कि चलेगी। दास को स्वामी की सुननी ही पड़ेगी। अब आपको तय करना है कि आप स्वामी बनना चाहते हे या दास? यदि आप अपनी ईच्छा के अनुसार कर्म करना चाहते है तो आपको स्वामी ही बनना होगा। और सबसे पहला स्वामीत्व स्वयं पर होता है। हम स्वतन्त्रता से कर्म करना चाहते है। कोई दास के रूप में काम नहीं करना चाहता। कर्मयोग हमें स्वतन्त्र होने का रास्ता बताता है। सबसे बड़ी दासता किसकी है? इन्द्रियों की। यदि हमने उनपर नियन्त्रण नहीं किया तो वे हम पर नियन्त्रण करेगी ही।
तीसरे अध्याय में मिथ्याचार को बताने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण इसी का विज्ञान समझाते है।यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभते अर्जुन। इन्द्रियों का मन के द्वारा नियमन करना है। नियम्य का अर्थ नियन्त्रण से भी लिया जा सकता है। पर नियन्त्रण में थोड़ा जबरदस्ती का भाव है। और युवा को कोई बात प्रेम से कह दो मान जायेगा पर वही बात अकड़कर जबरदस्ती करवाने का प्रयास करों तो विद्रोह कर देगा। हमारा मन भी हमेशा युवा होता है। इसलिये उसे भी जबरदस्ती पर विद्रोह की आदत होती है। अतः नियमन अधिक उपयोगी है। मन में प्रचण्ड ऊर्जा होती है और वह इन्द्रियों से सुक्ष्म भी है। अतः उसके माध्यम से ही इन्द्रियों को सही दिशा दी जा सकती है। इन्द्रियों का कार्य ही मन के आधार पर होता है। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयान् उपसेवते।। गी 15.9।। मन के अधिष्ठान बिना इन्द्रियों का कार्य सम्भव ही नहीं है। जैसे जब रास्ते पर वाहन चलाते हुए दुर्घटना हो जाती है तब सामान्य सा संवाद होता है, ‘‘अन्धे हो क्या? दिखता नहीं है? या आँखें बन्द करके चलते हो?’’ या फिर, ‘‘इतना भोंपु बजा रहा हूँ। सुनाई नहीं देता? बहरे हो गये हो क्या?’’ जिसकी गलती होती है वो ना तो बहरा होता है ना ही अंधा। पर उसका एक ही स्पष्टीकरण होता है। भाषा बदल सकती है पर बात यही आयेगी हर बार कि, ‘‘ध्यान नहीं था।’’ इसका क्या अर्थ हुआ। मन कान या आँख के साथ नहीं था। मन के अधिष्ठान के बिना कोई इन्द्रिय कार्य नहीं कर सकती। इसलिये जब हम कहते है कि इन्द्रियाँ नहीं मानती हम वास्तविकता में कह रहे होते है मन नहीं मानता।

मन के द्वारा इन्द्रिय नियमन का उपाय है हर कर्म को पूर्ण सजगता से करना। ऐसी आदत मन को ड़ल जाये कि कभी किसी काम में यह ना कहना पड़, ‘‘ध्यान नहीं था।’’ सजगता का अर्थ खेल के समय खेल और पढ़ाई के समय पढ़ाई। हम जो कर रहे है उसमें सूक्ष्मतम स्तर पर सजग रहना। आसन प्राणायाम के अभ्यास का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य इस सजगता को बढ़ाने का ही होता है। हम छोटे छोटे कामों को करते समय भी अपने मन को उनमें नहीं लगाते। इसके कारण वास्तविकता में हम उन कार्यों का आनन्द ही नहीं ले पाते। जैसे भोजन के समय हम टी वी देखते है। फिर ध्यान खाने में कहाँ होगा। यदि ये कहा जाय कि अधिकतर लोग भोजन का वास्तविक स्वाद ही नहीं जानते है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। हम में से कितने लोगों ने इस बात पर ध्यान दिया है कि कद्दु मिठा होता है। जी हाँ मिठा! अगली बार खाते समय अपना पूरा ध्यान जिव्हा पर अर्थात स्वादेन्द्रियों पर केन्द्रित करें। तो पता चलेगा, सारे मसालों के मध्य भी कद्दु का मिठापन समझ में आयेगा। यदि किसी योग शिविर में ये प्रयोग करेंगे तो और आसानी होगी। मसालों का व्यवधान भी तो नहीं होगा ना?

आधुनिक युवा कहता है ये योग-वोग मत बताओ हम तो जीवन का पूर्ण आनन्द लेना चाहते है। इतना अनमोल जीवन है उसे ऐसे ही नहीं गवाँना चाहते। पूरा भोग करना चाहते है। पर बिना सजगता के भोग भी कहाँ सम्भव है? जैसे स्वाद का उदाहरण देखा वैसे ही बाकि सब भोगों का भी है। यदि मन एकाग्र नहीं हो तो हम किसी भी विषय का भोग नहीं कर सकते। भोग के लिये भी इतना योग तो करना ही होगा। नहीं तो जैसा हम बोलते भी है भोग के सहायक ‘उपभोग’ से काम चलाना पड़ेगा। उपभोग ना तो भोगी वस्तू का पूर्ण आनन्द देता है ओर ना ही संतोष। इससे तृष्णा भी बढ़ती है और अपूर्णता भी। इसी को आज की भाषा में लोग तणाव (स्ट्रेस) कहते है। और इससे पिण्ड छुड़ाने के लिये ना जाने क्या क्या करते है? तणाव को उत्पन्न होने से ही रोकने का तरिका है-सजगता से कर्म करना।

सजगता का जितना अभ्यास करेंगे उतनी वह सूक्ष्मता तक जायेगी। जैसे योगाभ्यास में हम प्रथम शिथिलीकरण व्यायाम करते है तो उस समय शरीर की मांसपेशियों के बदलाव को ध्यान से देखते है। सजगता ठोस स्तर पर होती है। फिर आसन के समय रक्त के प्रवाह को ध्यान से देखते है। तो सजगता तरल स्तर पर होती है और श्वसन का ध्यान देते समय वायु के स्तर पर होती है। अधिक अभ्यास से स्नायविक स्पन्दन तथा प्राण प्रवाह जैसे और भी सुक्ष्म स्तर पर सजगता का विकास कर सकते है। किन्तु, इन्द्रियों के निग्रह के लिये शारीरिक स्तर पर सजगता पर्याप्त है। पर शरीर की क्रियाओं में सजगता तो केवल अभ्यास के लिये है। जीवन में कर्म के समय अनेक क्रियाओं का समन्वय होता है साथ ही हेतु, प्रक्रिया आदि के बारे में विचार भी चल रहे होते है। इन सबका सम्मिलित ध्यान रखना सजगता है। अलग अलग ध्यान रखना भले ही कठीन हो पर पूरे कर्म को एकसाथ देखने की तो हमें आदत होती है। हर नये काम को सीखते समय हम पूरी प्रक्रिया को ध्यान से देखकर ही करते है। अतः ये आदत बड़ी सहजता से लग सकती है। केवल याद रखना होता है। बीच बीच में अपने आप को पूछते रहना है कि मनिराम कहाँ है? मनिराम की क्षमता होती है कि कहीं भी जा सकता है। पर यही क्षमता यदि नियन्त्रण में ना रहे और अपने आप होने लगे तो सजगता को तोड़ देती है और फिर आप के हाथ में अपने कर्म का स्वामीत्व नहीं रहता है। उपनिषदों का उदाहरण लिया जाय तो रथ को सारथी के स्थान पर घोड़े दिशा देने लगेंगे तो रथ कहाँ जायेगा? फिर पीछे कितना भी बड़ा महारथी क्यों ना हो युद्ध तो घोड़े ओर सारथी में ही होता रहेगा। आधुनिक समय में ऐसीं कारों की कल्पना की जा रही है जो स्वयं अपने आप ही चलेगी। किन्तु गन्तव्य का संचालन भले ही पूर्वनिर्धारित हो करेगा तो मनुष्य ही। यही तो सहगता की आदत से होता है। हम अपने कर्म को सहजता से करते हुए भी उसके बारे में पूर्ण सजग होते है। अवचेतन मन के स्तर पर यह कार्य होता है। यह हमारा अपना चिरपुरातन विश्वासु स्वचालक (Auto Pilot)  है। जब अपने आप अवचेतन कर्म का नियन्त्रण हाथ में ले लेता है तब हम इसे सहज कर्म कहते है। अनायास, बिना किसी प्रयास के। यह मन के भी प्रशिक्षण का विषय है और इन्द्रियों के भी।

कुछ लोग कह सकते है ये बड़ा झंझट का काम है। वैसे ऐसा है नहीं। बस थोड़ा याद ही तो रखना है कि अपना मन वही हो जहाँ हमारी इन्द्रियाँ है। और यदि थोड़ा कठीन भी है तब भी पर्याय क्या है? ये लड़ाई वाकई आर-पार की है। यदि आप के पास स्वामीत्व नहीं होगा तो वो इन्द्रियों के हाथ में चला जायेगा। जिसके कर्म का स्वामीत्व इन्द्रियों के पास चला गया है उसको भगवान श्रीकृष्ण इन्द्रियराम नाम देते है। और कहते है कि पाप की आयु भरे ऐसे इन्द्रियराम का जीवन ही व्यर्थ है। अघायुः इन्द्रियारामों मोघं पार्थ स जीवति।।गी 3.16।।

यदि हम अपने जीवन को व्यर्थ नहीं गँवाना चाहते तो फिर अपने कर्म की ड़ोर अपने हाथ में लेनी होगी। बड़ा सरल है- जहाँ हम है वही हमारा मन हो। सजगता से अपने मनिराम को पूछते रहना है -‘‘मै यहाँ तू कहाँ??‘‘ और यदि पता चले कि भाईसाब कहीं घुमने गये है तो तुरन्त वापिस बुलाना है। ‘‘आ S आ S  आ S Sजा ’’। अब केवल गाना गाने से तो मन नियन्त्रण में नहीं आ जायेगा। कर्मयोग हमें इसका व्यावहारिक मार्ग बताता है। इसका व्यावहारिक मार्ग है अपने शरीर को ध्यान से देखना, महसूस करना। अपने अंगों का ऐक दूसरे से होता स्पर्श, काम करते समय मांसपेशियों में होती हलचल, कपड़ों का शरीर से होता स्पर्श इन सब पर ध्यान देने से मनिराम तुरन्त वापिस आ जाता है। धीरे धीरे अभ्यास से ये बड़ा आनन्ददायी हो जाता है। थकान तो आती ही नहीं यदि दिन में दो तीन बार भी इस प्रकार अपना ध्यान एकाग्र कर ले। तणाव का नाम ही नहीं रहता। यही तो कर्मयोग है। प्रसन्नता से कर्म करने की कला। व्यस्त रहते हुए भी मस्त रहना।

अक्टूबर 22, 2011 - Posted by | योग | , , , , ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. aapke is blog se kafi kuch sikhne ko mila.

    टिप्पणी द्वारा SinhaG | अक्टूबर 25, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. ham adhikansh samay indriyaram hote he, par abhyas dwara nischit sajagta lai ja sakti he..

    टिप्पणी द्वारा lokesh | अक्टूबर 25, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. karma yog pustak muze bhopal me kaha se uplabdha ho sakti h

    टिप्पणी द्वारा pavan chandravanshi | अक्टूबर 26, 2011 | प्रतिक्रिया


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