उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

नियम तो नियम ही है ………


गढ़े जीवन अपना अपना -7

‘घास का तिनका कैसे उगता है?’
केन्द्र के आवासीय व्यक्तित्व विकास शिविर में आये जिज्ञासु बालक ने कार्यकर्ता को प्रश्न पूछा कि ‘हम ये भोजन से पहले मंत्र क्यों करतें हैं?’ उत्तर का प्रारम्भ भी प्रश्न से करने से जिज्ञासु अधिक ध्यान से सुनता भी है और समझता भी है। संस्कारों के इस विज्ञान का अनुसरण करते हुए कार्यकर्ता ने प्रति प्रश्न किया था ‘घास का तिनका कैसे उगता है?’
उत्तर जितना लगता है उतना सरल नहीं था। जब कुछ क्षण बालक सोचता रहा तब कार्यकर्ता ने स्वामी विवेकानन्द के ‘ज्ञानयोग’ पुस्तक में पढ़े विचार को बताना शुरु किया, ‘घास के एक तिनके के लिए भी पूरी सृष्टि कार्य कर रही है। सूर्य तपता है, तब सागर, ताल, नदियों का जल बाफ बन बादल बनता है। वायु इन बादलों को अपने साथ सब जगह ले जाता है। पहाड़, पेड़ जब इन बादलों को रोकतें हैं तब वर्षा होती है। बारिश के पानी से धरती के पेट में पड़े सूखे बीज में अंकुर फूटते हैं। धरतीमाता पोषक रसायनों के भंडार से उस अंकुर का पोषण करतीं है तो घास का तिनका उगता है|’
जगत का एक परमाणु भी अपने संग सारी सृष्टि को लेकर ही गति करता है। आधुनिक विज्ञान के नए-नए प्रयोग सिद्ध कर रहें रहे हैं कि सारा जगत आपस में जुड़ा है। पर्यावरण में दीखाई देते परिणाम बताते हैं कि सारा जगत एक दुसरे से सम्बन्ध में बंधा है। जापान में सुनामी से परमाणु सयंत्र में खराबी आती है, प्रशांत महासागर के दुसरे तट पर अमेरिका में दुष्परिणाम देखें जा सकतें हैं। तो ये जगत केवल भौतिक रूप से जुड़ा ही नहीं है इसका आपस में सम्बन्ध भी है। जैविक सम्बन्ध, जैसा शरीर के अंगों का आपस में होता है और इस जगत में सब आपस में एक दूसरे पर निर्भर भी है। जीवन, पोषण और मरण के लिए पूर्णतः निर्भर है।
हमने अपने आप को समझने के प्रयास में सृष्टि के तीन मूलभूत शाश्वत सिद्धान्तों को समझा है –
१.    सारी सृष्टि ‘एक’ ही है। ऊपर दिखने वाली समस्त विविधता उस एक पूर्ण की ही अभिव्यक्ति है।
२.    विविध रूप में प्रगट एक पूर्ण के सब ‘अंग’ अपने आप में अद्वितीय है। कोई भी दो एकसमान नहीं है। हम मनुष्य भी उसी ‘एक’ की अद्वितीय अभिव्यक्ति हैं। हमारी रचना, कार्य व भूमिका तीनों विशिष्ट हैं। हमारे अपने ‘स्व’भाव के अनुसार है। कितना भी प्रयास करें हम किसी की नकल नहीं कर सकते।
३.    यह पूर्ण और सभी अंग- अर्थात सृष्टी में जो भी है वह सब परस्पर, आपस में जुड़े हैं। केवल भौतिक रूप से ही नहीं, जैविक सम्बन्ध में बंधे हैं और अपने अस्तित्व के लिए परस्पर निर्भर भी हैं। औरर एक बात पूर्णत्व से कट कर अंग का कोई अस्तित्व नहीं है| कटते ही वह मर जायेगा| अतः हम पूर्ण से जुड़े बिना नहीं रह सकते|
अस्तित्व के इन नियमों को समझकर उसके अनुरप अपने जीवन के लक्ष्य, दिशा व कार्य को ढालने से जीवन में सफलता एवं सार्थकता दोनों मिल सकते हैं। हमने बात भोजनमंत्र से प्रारम्भ की थी। हमारी थाली में प्राप्त भोजन के पीछे कितने लोगों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष श्रम लगा है। तपते सूरज, बादल, वायु और पहाड़ के साथ ही हम कहाँ जानतें हैं कि किस किसान के पसीने की बूंदों ने धरती से यह अनाज पैदा किया? और कितने मजदूरों की पीठ पर लदकर हमारे घर तक पहुंचा? माँ ने और उसकी सहायता करने वाले लोगों ने उसे पकाया। सुस्वादु, सुपाच्य, रुचिकर बनाकर हमारी थाली तक पहुचांया। इन सब के प्रति अपना आभार व्यक्त करने का प्रयास है-भोजन मंत्र। सबको तो हम जानते नहीं अतः उनके अंदर के सबको जोड़ने वाले तत्त्व ब्रह्म की प्रार्थना करते हैं:-
ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।।
यह जो भोजन के रूप में हमारा जीवन यज्ञ चल रहा है उसमे सबकुछ ब्रह्म ही है। अर्पण करने वाला, आहुति में डाली समिधा-हवि, यज्ञ की अग्नि सबकुछ वही एक ब्रह्म है और इस यज्ञ से प्राप्त उर्जा भी उसी के कर्म में लगें।
प्रत्येक कर्म में जीवन के नियम उतर जाए ऐसा प्रयास है यह भोजन-मन्त्र। अब हममें से कोई कहेगा-हमको ये नियम पता नहीं फिर हम पर तो इसका बंधन नहीं ना है? ये तो ऐसी ही बात हुई कि किसी पथिक को पूछा की सूर्य किधर से उगता है? तो उसने कहा -‘मुझे नहीं पता, मै इस गाँव में नया हूँ।’ हमारे अज्ञान से सृष्टि के नियम तो नहीं बदल जायेंगे? अब कोई कहे मुझे गुरुत्वाकर्षण का नियम नहीं पता। मै नहीं जानता कि उपर से हर वस्तु नीचे ही क्यों गिरती है? ऐसे व्यक्ति को कहे ‘कोई बात नहीं, थोड़ा छत से छलांग लगा कर देखो। टूटी टांग गुरुत्वाकर्षण का नियम सिखा देगी।’ न्यूटन के सिद्धांत को जाने या ना जाने दोनों स्थितियों में नियम तो प्रभावित करेगा ही।
उसी प्रकार अस्तित्व के शाश्वत नियम हमारे जीवन में कार्य कर रहें है। हमारे जाने या अनजाने। यदि हम समझकर इन्हें अपने जीवन में ढाल लेते हैं तो अपना चरित्र गढ़ने लगते हैं।
नियम तो नियम ही है। हम उन्हें जाने। उनका पालन करें इसी में हमारा हित है।

नवम्बर 25, 2011 Posted by | आलेख | 5 टिप्पणियाँ

जाने अपना वर्ण! पहचाने अपना स्वभाव!


कर्मयोग 7:

स्वधर्म पर आधारित कर्म से ही जीवन में परिपूर्णता एवं संतुष्टि प्राप्त हो सकती है। यही गीता का संदेश है। इसको जीवन में उतारना कर्मयोग है और यही सच्चा भक्तियोग भी है। यदि इसे आचरण में नहीं लायेंगे और केवल कृष्ण कृष्ण का नाम रटन करते रहेंगे तो वह पाखण्ड ही होगा। भक्ति नहीं। स्वामी रंगनाथानन्दजी द्वारा उद्धृत श्लोक है, जिसका सही सन्दर्भ अभी नहीं मिल पाया है। स्वामीजी ने डॉ राधाकृष्णन् के हवाले से इसे विष्णुपुराण में होना बताया है। पर स्वामीजी स्वयं ही स्पष्ट कहते है कि विष्णुपुराण की उपलब्ध प्रकाशनों में उसे नहीं खोज पाये है। पर श्लोक बड़ा मार्मिक है –
स्वधर्म कर्म विमुखाः कृष्ण कृष्णेति वादिनः।
ते हरेर्द्वेषिणा मूढ़ाः धर्मार्थं जन्म यत् हरेः।।
कृष्ण कृष्ण रटते रहे पर स्वधर्म से विमुख हो तो ऐसे लोग हरि के विरोधी और मूर्ख हैं। क्योंकि हरि का जन्म ही धर्मकार्य के लिये हुआ था। तो उनकी भक्ति करने के लिये हमें भी धर्मकार्य ही करना होगा। स्वधर्म को पहचानने की शास्त्रीय विधि वर्णधर्म पर आधारित है। जब हम स्मृतिग्रंथों का अध्ययन करते है तो पाते है कि वर्ण ही हमारे समाज का आधार रहा है। स्मृतियों में चाहे व्यक्ति व्यवहार हो, वर्ण व्यवहार हो या राज व्यवहार तीनों मूलतः वर्ण के अनुसार ही बताये गये हैं। वर्ण का समाज में असर 20 वी शती के प्रारम्भ तक दिखाई देता है। महात्मा गांधी का समग्र साहित्य 120 खण्डों में प्रकाशित है ओर उसमें बार बार वर्ण के आधार पर सामाजिक सुधार की बात गांधी करते हैं। 1914 में कैथोलिक बिशप्स के साथ वार्ता में एक प्रश्न के उत्तर में वे कहते है, ‘‘ब्राह्मण राजनीति में तो आ सकते है किन्तु उन्हें सत्ता व चुनाव की राजनीति नहीं करनी चाहिये।’’ भारत के मूल विचार को ठीक से समझनेवाले गिने चुने महापुरूषों में से एक गांधी के अनुसार वर्णव्यवस्था एक वैज्ञानिक सामाजिक रचना थी जिसे स्वार्थी नेतृत्व ने विकृत बना दिया।
आज यदि कोई केवल वैज्ञानिकता के आधार पर वर्णव्यवस्था की पुनस्र्थापना की वकालत करने लगे तो उसका चहुओर से विरोध ही होगा। ऐतिहासिक अनुभव व राजनयीक कुप्रचार के कारण सार्वजनिक चिंतन में वर्णव्यवस्था अत्यंत घृणित हो गई है। इसलिये इसके पुनरुज्जीवन की बात करना तो बेमानी है। जब समाज इसके विषय में सुनने को ही तैयार नहीं है तो युगानुकूल परिवर्तन के साथ इसको लागु करने की बात भले ही कितनी भी तार्किक क्यों ना हो अव्यावहारिक हो जाती है। किन्तु केवल समाज में अस्वीकार्य होने से कोई विज्ञान अप्रासंगिक नहीं हो जाता। समय के साथ पुनः इसका महत्व सबको पता चलता है। जैसे आजकल आयुर्वेद की ओर सबकी फिरसे रुचि बढ़ने लगी है। सम्भव है वर्णव्यवस्था के साथ भी ऐसा कुछ हो। आज तो हम केवल व्यक्तिगत स्तर पर इसका प्रयोग कर सकते है। वह भी औरों के साथ सामाजिक व्यवहार के लिये नहीं अपितु अपने स्वभाव को पहचानने के लिये। स्वधर्म के अनुसार कर्म का चयन करने के लिये हमें अपने स्वभाव को जानना होगा। हमने पिछली बार देखा था कि स्वभाव द्वारा नियत कर्म करना कर्मयोग की एक मूलभूत अनिवार्यता है। भगवद्गीता स्वभाव को अध्यात्म मानती है। गीता के आठवे अध्याय में अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान कहते है-
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावो अध्यात्म उच्चते।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म संज्ञितः।।गी 8.3।।
जिसका कभी नाश नहीं होता वह ब्रह्म है, उसको जानने का मार्ग स्वभाव है और जिस बल के प्रवाह से अथवा त्याग से सृजन होता है वह कर्म है। कितनी परिपूर्ण व्याख्या है! अनाशवान् ईश्वर अथवा ब्रह्म अपने आदि संकल्प ‘‘मै एक हूँ बहुत हो जाऊँ। एकोSहम् बहुस्याम।’’ के द्वारा विश्वरूप हो गया। स्वयं ही प्रत्येक के अन्दर प्रगट हुआ है। यही स्वभाव है। हमारा हृदयस्थ ईश्वर और इसे प्रगट करने का माध्यम है कर्म जिसकी परिभाषा यहाँ की गई – सृजनशील विसर्ग। विसर्ग का एक अर्थ है स्वयं होकर प्रवाहित बल और दूसरा अर्थ है त्याग, विसर्जन का कर्म। दोनों ही ईश्वरत्व के प्रगटीकरण के माध्यम है। स्वभाव को जानकर उसके अनुसार कर्म करने अर्थात त्याग करने अर्थात समाज में योगदान करने से ही हम अपने स्वस्वरुप केा पा सकते है। यही सर्वोत्तम उपलब्धि है। सबसे बड़ा सृजन।
कर्म केवल स्वयं के स्तर तक सीमित नहीं होता। कर्म में हमारा औरों से व्यवहार जुड़ा होता है। अतः बिना इस सम्बन्ध का निर्वाह किये हमारा कर्म सफल व संतुष्टिदाता नहीं हो सकता। इसीलिये इस बार हम वर्ण के विज्ञान द्वारा स्वभाव को पहचानने की विधि को समझने का प्रयत्न करते है। गीता के चैथे अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं को चातुर्वण्र्य व्यवस्था का जनक बताते है-
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् गुणकर्म विभागशः।
तस्य कर्तारपि माम् विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।गी 4.13।।
गुण ओर कर्मों के अनुसार समाज की संरचना बनती है। चार वर्ण अर्थात चार प्रकार से मानव समाज में कार्य करता है। किंतु जिसने ईश्वर साक्षत्कार कर लिया वह इन सब कर्मों से परे है। इस श्लोक से यह भाव निकलता है कि वर्णव्यवस्था मानव के स्वभाव के अनुसार कर्म के चयन द्वारा निर्मित प्राकृतिक समाजरचना है। यह अपने आप, स्वतः ही विद्यमान होती है। यदि समाज में धर्म प्रस्थापित हो अर्थात प्रत्येक अपने कर्तव्य का पालन करते हुए औरों के लिये योगदान कर रहा हो तो अपने आप समाज इन चार प्रकार के कार्य विभाजन में संचालित होने लगता है। वर्तमान लेख में हमारा उद्देश्य हम अपने स्वभाव को कैसे पहचाने यह जानना है। उसके लिये हमें अपने वर्ण को पहचानना होगा। इसका जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। किस जाति में जन्म हुआ उससे स्वभाव वर्ण निर्धारित करने की स्थिति वर्तमान समय में समाज में नहीं है। अतः हमें इन वर्णों के लक्षणों को जानकर किस वर्ण के लक्षण हम में अधिक दिखाई देते है उसका निर्धारण करना है। यह जानने से पूर्व एक बात ध्यान में रखनी होगी। प्रत्येक वर्ण अपने आप में महत्वपूर्ण है और उनमें उच-नीच का भेद नहीं है। हमारे स्वभाव के लिये हमारा वर्ण ही सर्वश्रेष्ठ है और उसके अनुसार कर्म का चयन ही हमारे लिये श्रेयस्कर है।
शमो दमस्तपः शौचं क्षांतिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्।।गी 18.42 ।।
सौम्यता, संयम, तपस्या, शुद्धि, ध्यैर्य तथा ऋजुता अथवा सरलता, ज्ञान व उसके विशेष प्रयोग- विज्ञान तथा ईश्वर पर विश्वास यह ब्राह्मण के स्वभाव विशेष हैं। इसी के द्वारा ब्राह्मण के स्वकर्म का निर्धारण होगा। इस वर्ण के स्वभाव वाले व्यक्ति का प्रत्येक कार्य को करने के पीछे ‘ज्ञानप्राप्ति‘ का उद्देश्य होता है। इस स्वभाव का व्यक्ति गलती से किसी अन्य कर्म यथा व्यापार, सुरक्षा अथवा सेवा में चला भी जाये तो उसे उस काम में भी ज्ञान पाने की अभिलाषा होगी। ब्राह्मण स्वभाव वाले व्यक्ति का स्थायी प्रेरक ‘त्याग’ होता है। त्याग से ही उसे कर्म करने की आकांक्षा व कर्म से आनन्द की अनुभूति होती है। सहजता से योगदान करना ऐसे लोगों की आदत होती है। इनके निर्णय का आधार ‘धर्म-अधर्म विचार’ होता है। अर्थात किसी भी कार्य का चयन करते समय इनका विचार होगा कि मेरा कर्तव्य क्या है? कार्य करणीय है अथवा नही? इससे समष्टि का हित होगा या नुकसान? क्योंकि धर्म हमारा समाज के पति कर्तव्य ही तो है। ऐसे स्वभाव वाले व्यक्ति को पठन-पाठन, अध्यापन, अनुसंधान, लेखन, पत्रकारिता आदि व्यवसायों में सहज सफलता मिलेगी साथ ही स्वभाव के अनुकुल कार्य करने के कारण संतुष्टि भी।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षत्रं कर्म स्वभावजम्।।गी 18.43।।
वीरता, तेज, अड़ीगता, दक्षता, युद्ध से कभी पलायन ना करना, दान तथा स्वामीत्व अथवा नेतृत्व का बोध यह क्षत्रीय वर्ण के स्वभाव लक्षण है। क्षात्रवर्ण का स्वभाव होने पर व्यक्ति के कर्म का उद्देश्य ‘प्रतिष्ठा’ होता है। इस स्वभाव का व्यक्ति ज्ञानार्जन भी प्रतिष्ठा के लिये करेगा। अपनी आन की खातिर जीवन तक लगा देने की तैयारी क्षत्रीय की होती है। इस वर्ण का स्थायी प्रेरक ‘वीरता’ है। वीर्य के लिये इस स्वभाव का व्यक्ति हर कर्म करता है और इस वीरभाव की तुष्टि से ही आनन्द प्राप्त करता है। इस वर्ण में नेतृत्व का गुण सहज होता है। अतः कार्य के निर्णय का आधार ‘न्याय-अन्याय विचार’ होता है। किसी भी विषय में निर्णय लेते समय यह न्यायकारी है अथवा नहीं यह विचार चयन का आधार बनता है। इस वर्ण स्वभाव के व्यक्ति को सुरक्षा बल, प्रशासन कार्य, राजनीति अथवा क्रीड़ा क्षेत्र में व्यवसाय करने से सहज सफलता व संतुष्टि प्राप्त होगी।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।गी 18.44।
इस श्लोक की पहली पंक्ति में वैश्य के कर्म का बखान है। कृषि, पशुपालन तथा व्यापार यह वैश्य वर्ण के स्वभावगत कर्म है। कृषि अर्थात सर्व प्रकार का मौलिक उत्पादन। वर्तमान अर्थव्यवस्था में ऊपरी चलन से वित्त के जनन का भ्रम निर्माण किया जाता है और जब यह बुलबुला फूटता है तो अभी के समान मंदी की स्थिति बनती है। वास्तव में एक बीज से अनेक का निर्माण कर मूलभूत उत्पादन कार्य तो किसान ही करता है। बाकी सारे औद्यागिक उत्पादन कृषि व खनन से प्राप्त वस्तुओं के रुपांतरण ही होते है। श्री के निर्माण का मूल कार्य कृषि व पशुपालन करता है। यह केवल अन्न का ही नहीं पूरे औद्योगिक उत्पादन के लिये कच्चे माल का भी निर्माण कार्य है। तो वैश्य का कार्य है श्री का सृजन, उत्पादन व उसका व्यापार। इस स्वभाव के व्यक्ति का कार्य के पीछे उद्दीष्ट लाभ का होता है। हर कार्य से क्या मिलेगा इस विचार से ही इस वर्ण का व्यक्ति कार्य करता है। कर्म का स्थायी प्रेरक ‘स्वर्ण’ अर्थात आर्थिक लाभ होता है। इस वर्ण के स्वभाव वाले व्यक्तियों के निर्णय का आधार भी ‘लाभ-हानी’ विचार होता है। वर्तमान समय में युग का प्रभावी वर्ण वैश्य होने के कारण इस स्वभाव का सर्वत्र चलन दिखाई पड़ता है। लोक प्रभाव में हम भी ऐसे चिंतन को स्वयं पर आरोपित करने की भूल कर सकते है। अतः सकर्तता से अपने स्वभाव को जाँचना होगा। यदि बाहरी प्रभाव के अलावा आंतरिक रुप से भी हमारा स्वभाव वैश्य वर्ण का हो तो फिर उत्पादन, विपणन, व्यापार आदि व्यवसाय हमारे लिये अनुकूल होंगे। इस वर्ण के कर्मों में कृषि को सर्वश्रेष्ठ कहा है। इसके बाद अन्य उत्पादक व्यवसाय तथा सबसे अंत में व्यापार अर्थात अन्य किसी के द्वारा उत्पादित वस्तु का विपणन। वर्तमान में वित्तीय सेवा, लेखा सेवा व विज्ञापन ये नये क्षेत्र भी वैश्य कर्म में बने है। इस वर्ण स्वभाव के व्यक्ति को इन सभी व्यवसायों में से अपनी क्षमता, रुचि व शिक्षा के अनुसार चयन करना चाहिये।
परिचर्यात्मकं कर्मं शुद्रस्यापि स्वभावजम्।।गी18.44।।
शुद्र वर्ण के लोगों का स्वभाव सेवाकार्य करने का होता है। सेवा के भी भिन्न भिन्न प्रकार हो सकते है किंतु जो व्यक्ति स्वभावतः किसी और के आदेशों के अनुसार कार्य करने में सहजता का अनुभव करते है वे भी आवश्यक होते है। यदि समाज में सभी लोग नेतृत्व करने लगे तो समस्या हो जायेगी वे नेतृत्व करेंगे किसका? अतः सभी समय में समाज में बहुसंख्य लोग स्वभावतः ऐसे होते है कि जो स्वयं निर्णय लेने की जिम्मेवारी नहीं उठाना चाहते अपितु किसी और के लिये निर्णयों पर बड़े सेवाभाव से अमल करते है। किसी भी संस्थान में ऐसे व्यक्ति संस्थाके निष्ठावान कर्मचारी होते है। संस्थान की उत्पादकता, प्रभाव व वाणिज्यिक सफलता ऐसे लोगों की कुशलता पर निर्भर करती है। सेवा अथवा परिचर्या के उद्दीष्ट से कार्य करनेवाले व्यक्ति का स्वभाव शुद्र वर्ण का होता है। इस वर्ण के व्यक्ति स्वभावतः तमसप्रधान होने के कारण इनका स्थायी प्रेरक ‘भय’ होता है। किसी की डाँट के भय से हम में से अनेक लोग अधिक कौशल व क्षमता का प्रदर्शन कर पाते है। यह कोई न्यून नहीं है अपने आप में प्रकृतिजन्य स्वभाव है। इस वर्ण स्वभाव के लागों का निर्णय ‘हिताहित विचार’, स्वयं के प्रत्यक्ष एवं तुरंत हित व अहित के विचार पर निर्भर होता है। समाज में इस वर्ण की सभी युगों में बहुलता होती है। अतः यदि हमारा स्वभाव इस श्रेणी में आता है तो उसमे लज्जा की कोई बात नहीं। वर्तमान समय में सवार्धिक अवसर इसी स्वभाव के लोगों के लिये है। ऐसे लोग नौकरी के लिये सर्वोत्तम होते है। किसी भी चमु में (टीम)  में इनके सफलता की सम्भावना अधिक होती है। आज सभी क्षेत्रों में चमुत्व का बड़ा महत्व है अतः शुद्र स्वभाव के लोगों की सफलता का यह युग है। स्वामी विवेकानन्द कहते है कि आनेवाले युग में शुद्रवर्ण का राज होगा। अर्थात सेवाभाव प्रभावी भाव होगा।
चारों वर्णों के स्वभावविशेष को जान लेने के बाद भी स्वयं के स्वभाव का निर्णय करना इतना सहज नहीं होता है। जीवन में अलग अलग समय पर भिन्न भिन्न परिस्थिति में हम अपने आप में अलग अलग वर्ण स्वभाव का प्राधान्य देखते है। अतः सम्भ्रम हो सकता है। निर्णायक यह होगा कि हमे आंतरिक आनन्द किस वर्णस्वभाव के उद्देश्य को पूर्ण करने से होता है? ज्ञान से? प्रतिष्ठा से? लाभ से? या सेवा से? दूसरा संकेत प्रेरक तत्वों का है। कार्य का प्रेरक क्या है? त्याग? वीरता अर्थात आन-शान? स्वर्ण अर्थात पैसा? या असफलता, डाँट का भय ? स्वभाव का निर्णय कर लेने के बाद यदि हम अपनी आजीविका के व्यवसाय का सही चयन करेंगे तो कम प्रयास में अधिक सफलता सुनिश्चित है। वर्ण स्वभाव जान लेने के बाद उपलब्ध अवसरों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कर निर्णय लेना चाहिये। नियत कार्य को चुनने के लिये कोई भी समय अनुचित नहीं है। केवल अनेक वर्षों से ठीक ठाक परिणाम के साथ कोई कार्य कर रहे है इसलिये वही हमारा नियत कार्य हो यह आवश्यक नहीं। यदि जीवन के किसी भी पाड़ाव पर यह ध्यान में आये कि हम अपने स्वभाव के विपरित अथवा अन्यथा कर्म में फँसे हुए है तो ऐसी स्थिति में 1. या तो इसी कर्म को अपने स्वभाव के अनुरूप करने का पर्याय चुने 2. चाहे जितनी जोखिम उठानी पड़े अपने स्वभाव के अनुसार कार्य हाथ में ले ले। आदर्श तो दूसरा पर्याय ही है किन्तु हमारी आजीविका अपने परिवार व अन्य अनेक लोगों के जीवन से जुड़ी होती है अतः निर्णय व्यक्तिगत ना होकर सामूहिक होना चाहिये। विश्लेषण के समय से ही सभी सम्बधितों को विचार प्रक्रिया में सम्मिलित करना चाहिये।

नवम्बर 17, 2011 Posted by | योग | , , , | 2 टिप्पणियाँ

अद्वितीय! फिर भी सब एक ही है . . .


गढ़े जीवन अपना अपना -6
एक कविहृदय व्यक्ति एक घने जंगल में गया। देखा तो चारों ओर विविधता से नटा संसार। कहीं गगनचुम्बी वृक्ष जिनकी उंचाई को नापना भी असंभव, तो दूसरी और छोटे-छोटे पौधे। वटवृक्ष से विशाल पेड़ जिनके तने को नापना तो छोड़ो पूरा एक साथ देखना भी असंभव। उन्हीं शक्तिशाली बून्धों पर लहराती नाजुक सी बेलें। रंग भी कितने सारे-हल्के हरे से लेकर देवदार के गहरे हरे तक केवल हरे रंग की ही अगणित छटाएं। फूलों के रंग तो इन्द्रधनुष को भी लजा दे। शायद ऐसे ही किसी कवि ने लिखा होगा, ‘ये कौन चित्रकार है?’ सहसा मन इस रचना के रहस्यमय रचनाकार की ओर भी चला जाता है और कोई कवि कह उठता है, ‘जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा?’
‘वेब ऑफ़ लाइफ’  के लेखक फ्रिट्जोफ काप्रा इस अद्वितीय विविधता के रहस्य को जानने का अनोखा मार्ग दर्शाते है। ऊपर इतनी विविधता से सजा यह जंगल- प्रत्येक पेड़, पौधा, वल्ली, पत्ता, फूल, फल सब स्वयं में अद्वितीय, कोई भी दो एक समान नहीं। पर कल्पना करें इस जंगल को हम जमीन के अन्दर से देख रहे है, बीस फिट नीचे से। सोचों वहां से कैसा दिखेगा यह जंगल? ठीक कहा! वहां से तो केवल जड़ें ही जड़ें दिखेंगी। मोटी-पतली, लम्बी-छोटी जड़ें ही जड़ें और वह सब भी एक दुसरे में गुथी हुई। एक विशाल जड़ों का जाल एक ही जीवनतत्व का रसपान कर पोषण पाता – एक जीवनजाल। ऊपर जंगल की समस्त विविधता को पोषित करता एक ही तत्व।
एक अंग्रेजी लेखक जिसने बाद में अपना नाम लोबसांग राम्पा रख लिया, अपनी लगन से तिब्बत के बौद्ध मठ में लामा बन गया। ल्हात्सा से ऊपर हिमालय की गहन कन्दराओं में उसने अपने गुरू से दीक्षा प्राप्त की। जीवन की सामान्यसी घटनाओं से गूढ़तम तत्व को समझाने की गुरू की विधि उसे बड़ी रास आती थी। एक दिन गुफा के बाहर हिमालय की एक चोटी पर बैठे थे। शिष्य आकाश में असंख्य तारों को देख आश्र्चयचकित हो रहा था। हिमालय में तो तारे कुछ ज्यादा ही दिखाई देते है। वह अनगिन तारका समुह, उनके चारों ओर भ्रमण करती ग्रहमाला, ऐसे अनेक तारकामण्डलों से प्रचंड निहारिकाओं में विस्तारित होता अंनत आकाश। गुरू ने पूछा, ‘क्या देख रहे हो?’
शिष्य बोला, ‘तारांगण देख रहा हुँ।’
‘अरे उस खाली जगह (रिक्तता) (Space) आकाश को क्या देखते हो?’
शिष्य बोला, ‘आकाश (रिक्तता) कहां है?’
गुरू ने कहा, ‘सर्वत्र वही तो है। दो तारों के बीच क्या है? आकाश! इस आकाश में ही तो ये सब आकाशगंगायें बिखरी हैं। कुल मिलाकर तारों के आकार से कई गुना बड़ा यह भकास, रिक्त आकाश ही तो है।’ शिष्य  आश्चर्यवत देखता रहा। आकाश के अवकाश को निहारता रहा।
गुरू ने उसकी भाव समाधी तोड़ी। बोलें, ‘अरे ऐसे क्या आश्र्चय से देख रहे हो? सर्वत्र यह खाली आकाश ही भरा पड़ा है।’
‘यह क्या है?’ गुरू ने कपड़े की और इशारा करके पूछा।
‘वस्त्र है’।
‘अच्छा ध्यान से देखा और करीब से देखो।’
थोड़ी देर देखकर विचारमग्न हो उसने कहा ‘हां अब समझा यह तो धागे हैं। एक दूसरे में बुने हुए।’
‘बिलकुल ठीक। अब धागों के ताने-बाने को देखो ध्यान से।’
शिष्य ने ध्यान से देखना शुरू किया। आड़े धागे को ताना कहते है और उसमें बुने खड़े धागे को बाना। ताने-बाने के जाल के मध्य खाली स्थान-आकाश। बिना गुरू के कहे ही वह समझ गया यदि सुक्ष्मदर्शी से देखे तो पाएंगे कि कुलमिलाकर धागों के आकार से कई गुना बड़े आकाश (रिक्तता) को इस ताने-बाने के जाल ने जकड़ रखा है और हमें पूर्णतः भरे, पूर्ण अपारदर्शी कपड़े का आभास हो रहा है।
यही हाल ठोस दिखते शरीर का है। आंखें बन्दकर ध्यान से अनुभव करें तो हम देखेंगे कि शरीर विभिन्न प्रणालियों से बना है। श्वसन प्रणाली, पाचन प्रणाली आदि। ये प्रणलियाँ बनीं हैं अवयवों से, अवयव कोशिकाओं से, कोशिकायें भिन्न भिन्न रसायनों से। फिर और सुक्ष्मता से देखें तो ये रसायन बने है अणुओं से, अणु परमाणुओं से। परमाणुओं की रचना तो हम जानते ही है। प्रोटोन व न्युट्रोन से बनें केन्द्र के चारों ओर भ्रमण करते असंख्य इलेक्ट्रोन । देखा हमारे शरीर में भी हम उसी आकाशगंगा के दर्शन कर सकते है जो आसमान में दिखाई दे रही है। तो ठोस दिखते शरीर में भी कितना बड़ा आकाश व्याप्त है।
‘तो क्या हम भी रिक्तता से भरे है? क्या सारा अस्तित्व अधिकांशतः रिक्त है?’ शिष्य ने डरकर पूछा।
गुरू ने मन्द-मन्द मुस्काते उत्तर दिया, ‘पगले! आकाश भी कहां रिक्त है। जिसको तुम ठोस मानते थे वो आकाश से भरा मिला। अब यह समझ लो कि वो सब एक ही चैतन्य से पूर्ण है। जो खाली दिखता है वो भी और जो भरा दिखता है वो भी। सब एक ही चैतन्य है। एक ही ऊर्जा। दिव्य, आलोकित चेतन्य!’
‘ओह। तो यही (God) ईश्वर है। सब कुछ उसी से निकला है।’ शिष्य  ने समझने के आवेश में कहा।
गुरू जोर से हंसे, ‘अब तुम नाम चाहे जो लो, ईश्वर कहो या और कुछ, सब है एक। सब पूर्ण, अंनत, अखण्ड एक! ना खाली, ना भरा, ना विविध, ना भिन्न! जड़ में जाकर देखो सब एक ही है।’
यही सृष्टि का नियम है। प्रत्येक अद्वितीय रचना जड़ में उसी एक पूर्ण का अंग है। अर्थात् हम अद्वितीय तो है पर विलग नहीं। अंनत, अखण्ड, पूर्ण के विविध अद्वितीय अंग है।
जीवन की दिशा तय करते समय इन दोनों बातों का भान रखना होगा। और एक तीसरी बात का भी इस अद्वितीय अंग का अखण्ड एक पूर्ण से संबंध क्या है? देखते है अगली बार…….

नवम्बर 14, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 4 टिप्पणियाँ

जीवन में संतुष्टी चाहिए तो स्वधर्म आधारित कर्म करें !


कर्मयोग 6:
चंगु की अच्छी खासी नौकरी है, ठीक ठाक कमाई भी। स्नेहमय, सुखी, समझदार, सहयोगी परिवार; तेजस्वी, प्रखर बुद्धि, आज्ञाकारी पुत्र भी है। अब यह सब जिसके पास हो उसके तो बड़ा ही भाग्यशाली कहा जायेगा ना? समाज भी चंगु को सफल ही मानेगा। मित्र प्रशंसा व सराहना भी करेंगे और जिसके जीवन में एक इन में से एक भी न्यून होगा वह मन ही मन यह भी साचेगा कि काश मै भी इतना भाग्यवान होता। कुछ परिचित अथवा सम्बन्धी जलन का भी अनुभव कते होंगे। पर जरा स्वयं चंगु से तो पूछो कि क्या वह संतुष्ट है जीवन से? उसे स्वयं भी कारण पता नहीं पर सोचता है कि कुछ तो कमी है ही। कुछ खोजता रहता है।
मंगु एक सफल चिकित्सक है। अच्छी ग्राहकी है। उसके निदान व उपचार से उसके नियमित रोगी प्रसन्न है। वह स्वयं भी सदा प्रसन्न रहता है। हाँ ! बाकि चिकित्सकों से उसको समय जरा ज्यादा लगाना पड़ता है अपने चिकित्सालय में। एक तो रोगियों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक रहती है और प्रत्येक रोगी के निदान में समय भी अधिक लगता है। उनके उपचार कक्ष में वे एकसाथ 5-6 रोगियों को बुला लेते है। फिर प्रत्येक का ठीक से परिक्षण भी करते है। वर्तमान युग में विकार प्रयोगशालाओं (Pathology Labs) पर निर्भर रहनेवाले चिकित्सकों के विपरित डॉ मंगु स्वयं हस्त परिक्षण में अधिक विश्वास रखते है। पूरे समय रोगी को रोग के बारे में समझाते भी रहते है। रोग के कारण, निदान व उपचार के साथ ही दवा व पथ्य की भी पूरी जानकारी देते है। बाकि 4-5 रुग्णों का भी ज्ञानवर्द्धन हो जाता है। कोई जिज्ञासा, शंका या प्रश्न पूछ ले तो फिर तो और आनन्द की बात है। ये सफल भी है और प्रसन्न भी, जीवन से पूर्ण संतुष्ट भी लगते है और यदा कदा आवश्यकतानुसार सामाजिक कार्य के लिये समय भी निकाल लेते है। लगता हे इनकी खोज पूरी हो गई है। पा गये है जो पाना चाहते थे। किसी निवृत्त प्राचार्य ने एक बार कहा था, ‘‘आप गलती से डॉक्टर बन गये, आपको तो शिक्षक बनना चाहिये था। आपका स्वभाव ही शिक्षक का है।’’ डॉ मंगु केवल मुस्कुरा दिये, मानो कह रहे हो, ‘मै और क्या करता हूँ ? ये रोगी मेरे छात्र ही तो है। उपचार से अधिक शिक्षण से ही इनका रोग दूर होता है।’
चंगु और मंगु भले ही काल्पनिक नाम हो पर ये व्यक्तित्व काल्पनिक नहीं है। हमारे आसपास ऐसे अनेक चुगु मंगु हमने देखें होंगे। हो सकता है कुछ कुछ हमारे जीवन की ही कहानी हो ये। लोग कहते है संतुष्ट होने के दो ही मार्ग है। या तो वह कार्य करों जो आपको प्रिय हो या जो कार्य कर रहे हो उसे प्रेम करों। पर कर्मयोग ऐसे, वा, अथवा, किन्तु, परन्तु ओं को नहीं मानता। उसका तो सीधा सपाट आदेश है। नियतं कुरु कर्म त्वम्।। गी 3.8।। अपने लिये तय किया हुआ कार्य करोगे तभी सफलता, संतुष्टी और परिपूर्णता का अनुभव होगा। नियत किया कार्य। किसके द्वारा नियत किया? ईश्वर, विधाता अथवा विधि विधान जैसी बाते तो भक्तों वा भाग्यवादियों की हो सकती है। कर्मयोगी तेा पुरुषार्थ पर विश्वास करता है। अपने पौरुष, पराक्रम से जीवन पर विजय पाने का नाम कर्मयोग है। और गीता का नेपथ्य तो रणभूमि है। उसका उद्देश्य अर्जुन को युद्धार्थ तत्पर करना है। अतः जीवन संग्राम की प्रेरणा का व्यावहारिक मर्मज्ञान गीता देती है। जब गीता नियत कर्म करने का आदेश दे रही है तो वह किसी और द्वारा कार्य नियत करने जैसी दासता की बात नहीं कर रही। गीता तो स्वतन्त्रता का गान है। अतः नियत का मर्म भी हमे गीता के श्लोक में ही मिलेगा। स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गी 18.47।। स्वभाव द्वारा तय किये गये कर्म को करने से कोई भी कलंक, पाप अथवा अवगुण नहीं लगता। स्वभाव का आधार है स्वधर्म। स्वधर्म गीता की टेक है। टेक अर्थात बार बार दोहराया जाने वाला मर्मवाक्य। जैसे राम चरित मानस के गायन में दोहे, चैचाई, छंद और सोरठे के परिवर्तन के बीच ‘मंगल भुवन अमंगल हारी’ अथवा ऐसी ही कोई और टेक का प्रयोग होता है। वैसे ही गीता की टेक है स्वधर्म, उत्तिष्ठ और युध्यस्व। इनमें स्वधर्म सबसे महत्व का है क्योंकि यह गीता का मुख्य विषय है। संस्कृत ग्रंथों के विषयवस्तु को जानने के लिये एक विधि है पहले और अंतिम शब्द को जोड़कर देखना। इस विधि से देखने पर गीता का पहला श्लोक है ‘‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता ……’’ तो प्रथम शब्द हुआ ‘धर्म’। अंतिम श्लोक की अंतिम पंक्ति है- ‘‘धृवा नीतिर्मतिर्मम।’’ तो अंतिम शब्द हुआ ‘मम’। इनको जोड़कर गीता का विषय बनता है – ‘‘मम धर्म’’
इसी श्लोक की पूर्वपंक्ति में भगवान कहते है- श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।।गी 18.47।। स्वधर्म में कुछ न्यून होने पर भी किसी और के धर्म का पालन करने से स्वधर्म अधिक श्रेयस्कर है। कर्म की अपनी गुणवत्ता अथवा उपयोगिता कर्म के चयन का आधार नहीं हो सकती। यदि जीवन में सफलता के साथ संतुष्टी और परिपूणता को प्राप्त करना है तो 1. स्वकर्म का चयन स्वधर्म व स्वभाव के आधार पर करना होगा। अथवा 2. प्राप्त कर्म को अपने स्वभाव के अनुसार ढ़ाल कर उसके माध्यम से स्वधर्म का निर्वाह करना। डॉ मंगु का स्वभाव शिक्षक का है और परिस्थितिवश वे चिकित्सा कार्य में आ गये। तो उसे भी अपने स्वभावानुसार ही निर्वाह कर अपने स्वधर्म का पालन कर रहे है। प्रयत्नपूर्वक यदि चिकित्सा महाविद्यालय में अध्यापक बन गये तो और अधिक आनन्द की बात होगीं भले ही आर्थिक रुप से कमाई कुछ कम हो।
स्वधर्म का पालन सबसे प्रमुख बात है। यदि यह नहीं कर पाये तो बाकि सारी उपलब्धियाँ शून्य हो जाती है और चंगु भाईसाब की भाँति जीवन में अधुरापन बना ही रहता है। सामान्यतः हम मानते है कि सबसे बड़ा भय तो मृत्यु का होता है किन्तु भगवान गीता में परधर्म को अर्थात स्वधर्म के अतिरिक्त किसी भी कर्म को मृत्यु से भी अधिक भयावह बता रहे है। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। गी 3.35।। स्वधर्म के पालन में मृत्यु भी परधर्म से अधिक श्रेयस्कर है। श्रेय शास्त्रों का पारिभाषिक पद है। इसका बड़ा ही गहन अर्थ है। अभी तो श्री की ओर ले जाने वाल श्रेय अर्थात कल्याणकारी इतना पर्याप्त है। फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। इस श्लोक की पूर्वपंक्ति भी वही है जो 18 वे अध्याय के 47 वे श्लोक की है। किसी और के अधिक उपयोगी कार्य की तुलना में स्वधर्म में कुछ कमी, बुराई हो तो भी वह हमारे लिये श्रेष्ठ ही होगा। एक ही विधान के दो निष्कर्ष का अर्थ है दोनों निष्कर्ष भी आपस में ही जुड़े है। एक में स्वधर्म के लिये निधन की बात है तो दूसरे में स्वभाव द्वारा निर्धारित कर्म के पवित्रता का दाखला है। इन दोनों को जोड़कर समझने का प्रयत्न करते है तो ये बात निकलकर आती है कि स्वभाव के अनुसार कर्म करना ही स्वधर्म पालन है।
गीता माता स्वभाव व स्वधर्म को जानने का व्यववहारिक मार्ग भी बताती है। उसे हम अगली बार देखेंगे। आज इतना आत्मपरिक्षण कर ले कि क्या हम अपने जीवन के कार्य से संतुष्ट है? बाहरी सफलता की बात नहीं है। आंतरिक परिपूर्णता के अनुभव की बात है। तृप्ति, प्रसन्नता ये कुछ मापदण्ड हो सकते है पर सबसे महत्वपूर्ण परिमाण यह होगा कि क्या हमारा योगदान है? उन सबके लिये जो हमसे प्रत्यक्ष जुड़े है और जो थोड़े परोक्ष रुप से। क्योंकि धर्म का इस सन्दर्भ में अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म ही सम्बन्धों का वास्तविक आधार है। भारतीय संस्कृति में अधिकार का कोई सक्रीय स्थान नहीं है। कर्तव्य सक्रीय है उनके परोक्ष परिणाम के रुप में अधिकारों की रक्षा हो ही जाती है। अतः अपने स्वभाव को जानने से पूर्व अपने सम्बन्धों का परीक्षण करना होगा। अपने सबसे निकट परिवार से प्रारम्भ कर सकते है। हमारी औरों से क्या अपेक्षायें होती है इसका चिंतन करने से स्वभाव तक नहीं पहुँच पायेंगे। अपेक्षायें तो क्वचित, कभी कभार ही वास्तविक होती है। अतः ना तो अपनी औरों से अपेक्षा का मूल्यांकन और ना ही सब परिवार जनों की हमसे अपेक्षा का ज्ञान स्वभाव को जानने के चिंतन में उपयुक्त होगा। तो फिर सम्बन्धों का आत्मावलोकन कैसे करना है? सरल है। सम्बन्ध का अर्थ है आत्मीयता का प्रगटन। तो इसका चिंतन करना है। आत्मीयता के बिन्दुओं को खोजना है। परिवार, मित्र मण्डली, साथी और परिचित भी इनमें किनके साथ अधिक आत्मीयता का अनुभव होता है। किन गुणों, आदतों अथवा व्यवहार में आत्मीयता का स्पन्दन अनुभव होता है? ये विचारणीय बिन्दु हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क अपनी विदूषी पत्नि मैत्रेयी को बड़े प्रेम से समझाते है, ‘‘न वा अरे मैत्रेयी पतिकामांस पति प्रियो भवति आत्मकामांस्तु एव’’ अरी मैत्रेयी पति की कामना से पति प्रिय नही होता वह तो अपनी आत्मा के प्रकाश के कारण प्रिय होता है। अर्थात वह मेरा पति है इस बात से प्रेम हेाता है। यही सब सम्बन्धों के बारे में बताते है। बड़ा ही आत्मीय संवाद है।
सम्बन्ध दर्पण के समान होते है। अपने आप को स्वयं के अंदर स्पष्टता से देखना बड़ा कठीन होता है। सम्बन्ध अनजाने में भी हमें अपना दर्शन करवाते है। अतः स्वभाव को समझने का प्रथम सोपान है अपने सम्बन्धों को जानना। आईये इस सप्ताह इस यथार्थ गृहकार्य को करें फिर आगे गीता की स्वभाव निर्धारण तकनिक को समझेंगे।

नवम्बर 10, 2011 Posted by | योग | , | 6 टिप्पणियाँ

System Works


Today I am sharing one rare experience with all of you. It is a very pleasing experience for a change. With a simple combination of technology and human efficiency we can have a functioning system even in a government enterprise. It was very urgent to book Tickets for Ma Parameswaranji using Tatkal facility. The irctc somehow gets jammed up at 8 am. Hence decided to go personally to the railway station for reservations. It was after many years that this opportunity had presented itself. Ready to push the way in when the door open at 8 AM I reached the reservation complex in Thiruvananthpuram Central Railway Station at about 7:45 AM. A pleasant surprise was in waiting. The main gates were open and after climbing the stair I found that around 100 persons were already waiting in the waiting hall. But there was no mayhem usually scene. No need to scout for the smallest queue. All were very calmly seating in chairs and waiting for the counters to start the business of the day. After few enquiries I was directed to the waiting Token machine. Pressing a red button I received a token numbered 103. It had the date and time. The token issuing had started at 7:30.  Looking at the token number I felt the cause was lost and I may not get the desired lower birth when my turn came.

The system was simple. 10 counters had small monitors for display of token no. But you need not be worried where your no will come. There was a big screen in the centre of the hall displaying a chart showing the table of counter numbers with the token number being attended to. The next three numbers were also alerted. The system was efficient and working. When the counters started working the clerks were also as efficient as the machines. The main factor being there was no queue in front of them, no quarrels, and no bickering only one customer to attend to. They were smiling and attending very efficiently and the whole service was fast.

I was totally awestruck and mesmerized by the whole working and more so when within 10 minutes my number was on the screen and the mission was accomplished within few seconds. It was a day full of pleasant surprises I got the lower birth ticket for Parameswaranji even being 103 in the waiting list.

On the whole the experience was an eye-opener. Yes with just a little systematic management of technology and human efficiency can do wonder. Yes this can happen in Bharat. Even the government systems can work. They are working at least here in the reservation centre at Thiruvananthapuram Central.

नवम्बर 8, 2011 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , | 3 टिप्पणियाँ

ललकार


It was beginning of Monsoon in 1989 when we went to Ratnagiri in western coast of Maharashtra. My younger brother Makarand had completed his Diploma in Metallurgy and was to join an industry their on his first job. I had gone with him to settle him down. He was just 17 then, he is 3 years younger. After making arrangement for his monthly lodging in food etc and visiting the factory we went to visit the Birth place of Lokamanya Bal Gangadhar Tilak and also the house in which Veer Vinayak Damodar Savarkar was kept in house arrest. From there we went to the seashore. It was almost the sunset time. The atmosphere was very heavy. Everything was gray. Sand also black with lot of iron in it. The sea was rough with waves roaring high. There was a cloud cover and it was very bleak and intimidating experience. Sun was as if fighting to shine through the gray clouds.

 

It was as if the nature was challenging one’s core of being.  Unexpectedly some words exploded. I still remember shouting at the waves to overcome the roar and challenging. I think at that time the words were in Marathi. I feel I had written them down somewhere but… even though the poem was not always available to be read but the sense remained always alive and whenever there were tough times it surfaced. The nature challenging and the inner core responding. Its the rebel expressing itself. This time when the feelings manifested the words were in Hindi. . . . .

हे सागर तू क्या अपनी
उद्दाम लहरों से
मुझे  ललकारे?

याद नहीं मैंने अगस्ति बन
तेरे जुड़वाँ गंगासागर को
पी लिया  था . . . .
अबके रत्नाकर तुझे
तेरे अनुपम भंडार
सहित
पूरा ही पचा जाऊंगा
छेड़ना मत!

ओ मदमस्त सह्याद्री
भूल गया शिवा के घोड़े की तापों को
मत ललकार अपनी गर्वोन्नत ऊंचाई से
बौना कर दूंगा
सदा के लिए
जैसे किया था कभी विन्ध्याद्री को
है आज भी वही तपोबल
कायम

और हे तेजोमणि दिनकर
काली बदली फाड़ झांक रहा
मत ललकार अपनी आग से
अबकी बार छलांग लगा
फल के सामान खाने नहीं आऊंगा
कर लूँगा तेरे तेज को प्राशन
और लगा दूंगा
आग अपने ही हृदय में
वासुदेव, बाल और विनायक
के सामान . . . . .

नवम्बर 6, 2011 Posted by | कविता, English Posts | , , , | टिप्पणी करे

तुम सा नहीं देखा ….


गढ़े जीवन अपना अपना -5

चार्ल्स  की उर्जा को दिशा देना उसकी माँ के बस का नहीं था। 10 साल का बालक और इतने प्रश्न। माँ ने अपने भाई के पास चार्ल्स को भेज दिया। मामा एक चर्च में पादरी थे। बच्चों को काम देना, अनुशसित करना इसका उन्हें बड़ा अनुभव था। वे समझ गये चार्ल्स उस भूत की तरह है जिसे काम में न लगा पाये तो लगातार प्रश्न ही पूछता रहेगा। उन्होंने चर्च के ग्रंथालय में बकाया कामो में चार्ल्स को लगा दिया। कपाटों की सफाई, ग्रंथों का रखरखाव ऐसे अनेक काम थे उनके पास। पर चार्ल्स तो चार-चार मजदूरों का काम अकेले कर जाता। मामा ने जिस काम के लिए महीने भर की छुट्टियों का समय तय किया था, चार्ल्स ने उसे एक सप्ताह में ही पूरा कर दिया।

अब मामा के सामने समस्या थी। भांजा खाली था और खाली दिमाग तो शैतान का घर होता है। इस शैतान के पास तो प्रश्नों की  खदान थी। पादरी मामा जहाँ जाते वहीं उनके पीछे पहुँच जाता और तरह तरह के प्रश्न पूछता रहता। मामा ने चार्ल्स को व्यस्त रखने के लिए अनूठा काम दे दिया। ‘जाओ बगीचे में से किसी भी पेड़ के दो पत्ते ले  आओ। हाँ! दोनों बिल्कुल एक जैसे होने चाहिए। कोई  भी अंतर नहीं।’ चाल्र्स को लगा ये तो बड़ा सरल काम है। दौड़ कर बगीचे में गया और एक जैसे दिखने वाले दो पत्ते ले आया। मामा ने गौर से देखा और अंतर ढूँढ लिया। सिलसिला चल पड़ा। चार्ल्स पत्ते ले आता और मामा कोई न कोई अंतर दिखा ही देते। किसी की डंठल में भेद था तो किसी का आकार, किसी का रंग गहरा होता तो कभी शिराओं की रचना भिन्न निकल आती।

अब चार्ल्स सुबह से शाम तक बाग में अटका रहता। उसने मामा के पास भी जाना बंद कर दिया। अब वो स्वयं ही कोई न कोई अंतर पकड़ लेता। अब तो ये खेल हो गया कि एक समान लगने वाले पत्तों में अंतर ढूँढों। खेल-खेल में चार्ल्स को सृष्टि के अद्भुत नियम का साक्षात्कार हुआ। विश्व में लाखों पत्तें हैं। लाखों पेड़ पर कोई भी दो एक से नहीं हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में अद्वितीय है। ईश्वर की ईस अनुपम सर्जनात्मकता का आनंद लेते लेते चार्ल्स सोचने लगा इसके रहस्य के बारे में। इस सृष्टि की अद्वितीय रचना के बारे में। उसके चिंतन में उसे तो विशेष बना ही दिया। यही चार्ल्स बड़ा होकर -‘विकासक्रम के सिद्धांत’  –  Theory of Evolution का जनक चार्ल्स डार्विन बना। हाँ! वही डार्विन जिसने बंदरों को हमारा पूर्वज बताया।

हमारी रूचि डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत में नहीं है पर उसके बचपन के अनुभव ने सिखाए सृष्टि के शाश्वत सिद्धांत में अवश्य है। जब पेड़ के दो पत्ते एक जैसे नहीं होते, विश्व की 6 अरब आबादी में से किन्ही भी दो लोगों की उंगलियों के निशान भी एक दुसरे से नहीं मिलते; केवल अभी जीवित है उनके ही नहीं जो मर गये उनके भी। तो इन सब तथ्यों से ये तो स्पष्ट हुआ कि हम में से प्रत्येक अपने आप में अद्वितीय हैं। अतः जीवन का ध्येय व लक्ष्य निर्धारित करते समय किसी और जैसा बनाने का विचार तो बेमानी ही है। जब हम अद्वितीय ही हैं तो हमें अपने स्वयं के ही वैशिष्ठ्य को खोजना होगा ना?

यह अद्वितीय होना नाक नक्श या उंगुलियों के निशान जैसी शारीरिक बनावट तक सिमित नहीं है, तो हमारे जीवन का उद्देश्य अद्वितीय है। इस विशिष्ट उद्देश्य के लिए केवल हमारा ही जन्म हुआ है। पर इतराने की कोई बात नहीं क्योंकि जितने अद्वितीय हम है उतने ही अन्य सभी है। हाँ इसी कारण जीवन की इस अद्भुत लीला में हमारी भूमिका अद्वितीय है। जिस प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग का अपना कार्य है उसी प्रकार हमारा भी कार्य अद्वितीय है।

हमारा जीवन ध्येय व कर्मक्षेत्र इस अद्वितीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, अद्वितीय भूमिका को निभाने अपने अद्वितीय कार्य को करने का माध्यम होगा। अतः आत्मविश्वास से ये जान ले कि कोई हमें कुछ भी कहे पर सृष्टि का सिद्धांत तो ये ही कह रहा है – ‘तुम सा नहीं देखा’।
        

नवम्बर 3, 2011 Posted by | आलेख | , | 10 टिप्पणियाँ

   

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