उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

जीवन में संतुष्टी चाहिए तो स्वधर्म आधारित कर्म करें !


कर्मयोग 6:
चंगु की अच्छी खासी नौकरी है, ठीक ठाक कमाई भी। स्नेहमय, सुखी, समझदार, सहयोगी परिवार; तेजस्वी, प्रखर बुद्धि, आज्ञाकारी पुत्र भी है। अब यह सब जिसके पास हो उसके तो बड़ा ही भाग्यशाली कहा जायेगा ना? समाज भी चंगु को सफल ही मानेगा। मित्र प्रशंसा व सराहना भी करेंगे और जिसके जीवन में एक इन में से एक भी न्यून होगा वह मन ही मन यह भी साचेगा कि काश मै भी इतना भाग्यवान होता। कुछ परिचित अथवा सम्बन्धी जलन का भी अनुभव कते होंगे। पर जरा स्वयं चंगु से तो पूछो कि क्या वह संतुष्ट है जीवन से? उसे स्वयं भी कारण पता नहीं पर सोचता है कि कुछ तो कमी है ही। कुछ खोजता रहता है।
मंगु एक सफल चिकित्सक है। अच्छी ग्राहकी है। उसके निदान व उपचार से उसके नियमित रोगी प्रसन्न है। वह स्वयं भी सदा प्रसन्न रहता है। हाँ ! बाकि चिकित्सकों से उसको समय जरा ज्यादा लगाना पड़ता है अपने चिकित्सालय में। एक तो रोगियों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक रहती है और प्रत्येक रोगी के निदान में समय भी अधिक लगता है। उनके उपचार कक्ष में वे एकसाथ 5-6 रोगियों को बुला लेते है। फिर प्रत्येक का ठीक से परिक्षण भी करते है। वर्तमान युग में विकार प्रयोगशालाओं (Pathology Labs) पर निर्भर रहनेवाले चिकित्सकों के विपरित डॉ मंगु स्वयं हस्त परिक्षण में अधिक विश्वास रखते है। पूरे समय रोगी को रोग के बारे में समझाते भी रहते है। रोग के कारण, निदान व उपचार के साथ ही दवा व पथ्य की भी पूरी जानकारी देते है। बाकि 4-5 रुग्णों का भी ज्ञानवर्द्धन हो जाता है। कोई जिज्ञासा, शंका या प्रश्न पूछ ले तो फिर तो और आनन्द की बात है। ये सफल भी है और प्रसन्न भी, जीवन से पूर्ण संतुष्ट भी लगते है और यदा कदा आवश्यकतानुसार सामाजिक कार्य के लिये समय भी निकाल लेते है। लगता हे इनकी खोज पूरी हो गई है। पा गये है जो पाना चाहते थे। किसी निवृत्त प्राचार्य ने एक बार कहा था, ‘‘आप गलती से डॉक्टर बन गये, आपको तो शिक्षक बनना चाहिये था। आपका स्वभाव ही शिक्षक का है।’’ डॉ मंगु केवल मुस्कुरा दिये, मानो कह रहे हो, ‘मै और क्या करता हूँ ? ये रोगी मेरे छात्र ही तो है। उपचार से अधिक शिक्षण से ही इनका रोग दूर होता है।’
चंगु और मंगु भले ही काल्पनिक नाम हो पर ये व्यक्तित्व काल्पनिक नहीं है। हमारे आसपास ऐसे अनेक चुगु मंगु हमने देखें होंगे। हो सकता है कुछ कुछ हमारे जीवन की ही कहानी हो ये। लोग कहते है संतुष्ट होने के दो ही मार्ग है। या तो वह कार्य करों जो आपको प्रिय हो या जो कार्य कर रहे हो उसे प्रेम करों। पर कर्मयोग ऐसे, वा, अथवा, किन्तु, परन्तु ओं को नहीं मानता। उसका तो सीधा सपाट आदेश है। नियतं कुरु कर्म त्वम्।। गी 3.8।। अपने लिये तय किया हुआ कार्य करोगे तभी सफलता, संतुष्टी और परिपूर्णता का अनुभव होगा। नियत किया कार्य। किसके द्वारा नियत किया? ईश्वर, विधाता अथवा विधि विधान जैसी बाते तो भक्तों वा भाग्यवादियों की हो सकती है। कर्मयोगी तेा पुरुषार्थ पर विश्वास करता है। अपने पौरुष, पराक्रम से जीवन पर विजय पाने का नाम कर्मयोग है। और गीता का नेपथ्य तो रणभूमि है। उसका उद्देश्य अर्जुन को युद्धार्थ तत्पर करना है। अतः जीवन संग्राम की प्रेरणा का व्यावहारिक मर्मज्ञान गीता देती है। जब गीता नियत कर्म करने का आदेश दे रही है तो वह किसी और द्वारा कार्य नियत करने जैसी दासता की बात नहीं कर रही। गीता तो स्वतन्त्रता का गान है। अतः नियत का मर्म भी हमे गीता के श्लोक में ही मिलेगा। स्वभाव नियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।गी 18.47।। स्वभाव द्वारा तय किये गये कर्म को करने से कोई भी कलंक, पाप अथवा अवगुण नहीं लगता। स्वभाव का आधार है स्वधर्म। स्वधर्म गीता की टेक है। टेक अर्थात बार बार दोहराया जाने वाला मर्मवाक्य। जैसे राम चरित मानस के गायन में दोहे, चैचाई, छंद और सोरठे के परिवर्तन के बीच ‘मंगल भुवन अमंगल हारी’ अथवा ऐसी ही कोई और टेक का प्रयोग होता है। वैसे ही गीता की टेक है स्वधर्म, उत्तिष्ठ और युध्यस्व। इनमें स्वधर्म सबसे महत्व का है क्योंकि यह गीता का मुख्य विषय है। संस्कृत ग्रंथों के विषयवस्तु को जानने के लिये एक विधि है पहले और अंतिम शब्द को जोड़कर देखना। इस विधि से देखने पर गीता का पहला श्लोक है ‘‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता ……’’ तो प्रथम शब्द हुआ ‘धर्म’। अंतिम श्लोक की अंतिम पंक्ति है- ‘‘धृवा नीतिर्मतिर्मम।’’ तो अंतिम शब्द हुआ ‘मम’। इनको जोड़कर गीता का विषय बनता है – ‘‘मम धर्म’’
इसी श्लोक की पूर्वपंक्ति में भगवान कहते है- श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।।गी 18.47।। स्वधर्म में कुछ न्यून होने पर भी किसी और के धर्म का पालन करने से स्वधर्म अधिक श्रेयस्कर है। कर्म की अपनी गुणवत्ता अथवा उपयोगिता कर्म के चयन का आधार नहीं हो सकती। यदि जीवन में सफलता के साथ संतुष्टी और परिपूणता को प्राप्त करना है तो 1. स्वकर्म का चयन स्वधर्म व स्वभाव के आधार पर करना होगा। अथवा 2. प्राप्त कर्म को अपने स्वभाव के अनुसार ढ़ाल कर उसके माध्यम से स्वधर्म का निर्वाह करना। डॉ मंगु का स्वभाव शिक्षक का है और परिस्थितिवश वे चिकित्सा कार्य में आ गये। तो उसे भी अपने स्वभावानुसार ही निर्वाह कर अपने स्वधर्म का पालन कर रहे है। प्रयत्नपूर्वक यदि चिकित्सा महाविद्यालय में अध्यापक बन गये तो और अधिक आनन्द की बात होगीं भले ही आर्थिक रुप से कमाई कुछ कम हो।
स्वधर्म का पालन सबसे प्रमुख बात है। यदि यह नहीं कर पाये तो बाकि सारी उपलब्धियाँ शून्य हो जाती है और चंगु भाईसाब की भाँति जीवन में अधुरापन बना ही रहता है। सामान्यतः हम मानते है कि सबसे बड़ा भय तो मृत्यु का होता है किन्तु भगवान गीता में परधर्म को अर्थात स्वधर्म के अतिरिक्त किसी भी कर्म को मृत्यु से भी अधिक भयावह बता रहे है। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।। गी 3.35।। स्वधर्म के पालन में मृत्यु भी परधर्म से अधिक श्रेयस्कर है। श्रेय शास्त्रों का पारिभाषिक पद है। इसका बड़ा ही गहन अर्थ है। अभी तो श्री की ओर ले जाने वाल श्रेय अर्थात कल्याणकारी इतना पर्याप्त है। फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। इस श्लोक की पूर्वपंक्ति भी वही है जो 18 वे अध्याय के 47 वे श्लोक की है। किसी और के अधिक उपयोगी कार्य की तुलना में स्वधर्म में कुछ कमी, बुराई हो तो भी वह हमारे लिये श्रेष्ठ ही होगा। एक ही विधान के दो निष्कर्ष का अर्थ है दोनों निष्कर्ष भी आपस में ही जुड़े है। एक में स्वधर्म के लिये निधन की बात है तो दूसरे में स्वभाव द्वारा निर्धारित कर्म के पवित्रता का दाखला है। इन दोनों को जोड़कर समझने का प्रयत्न करते है तो ये बात निकलकर आती है कि स्वभाव के अनुसार कर्म करना ही स्वधर्म पालन है।
गीता माता स्वभाव व स्वधर्म को जानने का व्यववहारिक मार्ग भी बताती है। उसे हम अगली बार देखेंगे। आज इतना आत्मपरिक्षण कर ले कि क्या हम अपने जीवन के कार्य से संतुष्ट है? बाहरी सफलता की बात नहीं है। आंतरिक परिपूर्णता के अनुभव की बात है। तृप्ति, प्रसन्नता ये कुछ मापदण्ड हो सकते है पर सबसे महत्वपूर्ण परिमाण यह होगा कि क्या हमारा योगदान है? उन सबके लिये जो हमसे प्रत्यक्ष जुड़े है और जो थोड़े परोक्ष रुप से। क्योंकि धर्म का इस सन्दर्भ में अर्थ होता है कर्तव्य। धर्म ही सम्बन्धों का वास्तविक आधार है। भारतीय संस्कृति में अधिकार का कोई सक्रीय स्थान नहीं है। कर्तव्य सक्रीय है उनके परोक्ष परिणाम के रुप में अधिकारों की रक्षा हो ही जाती है। अतः अपने स्वभाव को जानने से पूर्व अपने सम्बन्धों का परीक्षण करना होगा। अपने सबसे निकट परिवार से प्रारम्भ कर सकते है। हमारी औरों से क्या अपेक्षायें होती है इसका चिंतन करने से स्वभाव तक नहीं पहुँच पायेंगे। अपेक्षायें तो क्वचित, कभी कभार ही वास्तविक होती है। अतः ना तो अपनी औरों से अपेक्षा का मूल्यांकन और ना ही सब परिवार जनों की हमसे अपेक्षा का ज्ञान स्वभाव को जानने के चिंतन में उपयुक्त होगा। तो फिर सम्बन्धों का आत्मावलोकन कैसे करना है? सरल है। सम्बन्ध का अर्थ है आत्मीयता का प्रगटन। तो इसका चिंतन करना है। आत्मीयता के बिन्दुओं को खोजना है। परिवार, मित्र मण्डली, साथी और परिचित भी इनमें किनके साथ अधिक आत्मीयता का अनुभव होता है। किन गुणों, आदतों अथवा व्यवहार में आत्मीयता का स्पन्दन अनुभव होता है? ये विचारणीय बिन्दु हैं। बृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क अपनी विदूषी पत्नि मैत्रेयी को बड़े प्रेम से समझाते है, ‘‘न वा अरे मैत्रेयी पतिकामांस पति प्रियो भवति आत्मकामांस्तु एव’’ अरी मैत्रेयी पति की कामना से पति प्रिय नही होता वह तो अपनी आत्मा के प्रकाश के कारण प्रिय होता है। अर्थात वह मेरा पति है इस बात से प्रेम हेाता है। यही सब सम्बन्धों के बारे में बताते है। बड़ा ही आत्मीय संवाद है।
सम्बन्ध दर्पण के समान होते है। अपने आप को स्वयं के अंदर स्पष्टता से देखना बड़ा कठीन होता है। सम्बन्ध अनजाने में भी हमें अपना दर्शन करवाते है। अतः स्वभाव को समझने का प्रथम सोपान है अपने सम्बन्धों को जानना। आईये इस सप्ताह इस यथार्थ गृहकार्य को करें फिर आगे गीता की स्वभाव निर्धारण तकनिक को समझेंगे।

नवम्बर 10, 2011 Posted by | योग | , | 6 टिप्पणियाँ

   

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