उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अद्वितीय! फिर भी सब एक ही है . . .


गढ़े जीवन अपना अपना -6
एक कविहृदय व्यक्ति एक घने जंगल में गया। देखा तो चारों ओर विविधता से नटा संसार। कहीं गगनचुम्बी वृक्ष जिनकी उंचाई को नापना भी असंभव, तो दूसरी और छोटे-छोटे पौधे। वटवृक्ष से विशाल पेड़ जिनके तने को नापना तो छोड़ो पूरा एक साथ देखना भी असंभव। उन्हीं शक्तिशाली बून्धों पर लहराती नाजुक सी बेलें। रंग भी कितने सारे-हल्के हरे से लेकर देवदार के गहरे हरे तक केवल हरे रंग की ही अगणित छटाएं। फूलों के रंग तो इन्द्रधनुष को भी लजा दे। शायद ऐसे ही किसी कवि ने लिखा होगा, ‘ये कौन चित्रकार है?’ सहसा मन इस रचना के रहस्यमय रचनाकार की ओर भी चला जाता है और कोई कवि कह उठता है, ‘जिसकी रचना इतनी सुन्दर वो कितना सुन्दर होगा?’
‘वेब ऑफ़ लाइफ’  के लेखक फ्रिट्जोफ काप्रा इस अद्वितीय विविधता के रहस्य को जानने का अनोखा मार्ग दर्शाते है। ऊपर इतनी विविधता से सजा यह जंगल- प्रत्येक पेड़, पौधा, वल्ली, पत्ता, फूल, फल सब स्वयं में अद्वितीय, कोई भी दो एक समान नहीं। पर कल्पना करें इस जंगल को हम जमीन के अन्दर से देख रहे है, बीस फिट नीचे से। सोचों वहां से कैसा दिखेगा यह जंगल? ठीक कहा! वहां से तो केवल जड़ें ही जड़ें दिखेंगी। मोटी-पतली, लम्बी-छोटी जड़ें ही जड़ें और वह सब भी एक दुसरे में गुथी हुई। एक विशाल जड़ों का जाल एक ही जीवनतत्व का रसपान कर पोषण पाता – एक जीवनजाल। ऊपर जंगल की समस्त विविधता को पोषित करता एक ही तत्व।
एक अंग्रेजी लेखक जिसने बाद में अपना नाम लोबसांग राम्पा रख लिया, अपनी लगन से तिब्बत के बौद्ध मठ में लामा बन गया। ल्हात्सा से ऊपर हिमालय की गहन कन्दराओं में उसने अपने गुरू से दीक्षा प्राप्त की। जीवन की सामान्यसी घटनाओं से गूढ़तम तत्व को समझाने की गुरू की विधि उसे बड़ी रास आती थी। एक दिन गुफा के बाहर हिमालय की एक चोटी पर बैठे थे। शिष्य आकाश में असंख्य तारों को देख आश्र्चयचकित हो रहा था। हिमालय में तो तारे कुछ ज्यादा ही दिखाई देते है। वह अनगिन तारका समुह, उनके चारों ओर भ्रमण करती ग्रहमाला, ऐसे अनेक तारकामण्डलों से प्रचंड निहारिकाओं में विस्तारित होता अंनत आकाश। गुरू ने पूछा, ‘क्या देख रहे हो?’
शिष्य बोला, ‘तारांगण देख रहा हुँ।’
‘अरे उस खाली जगह (रिक्तता) (Space) आकाश को क्या देखते हो?’
शिष्य बोला, ‘आकाश (रिक्तता) कहां है?’
गुरू ने कहा, ‘सर्वत्र वही तो है। दो तारों के बीच क्या है? आकाश! इस आकाश में ही तो ये सब आकाशगंगायें बिखरी हैं। कुल मिलाकर तारों के आकार से कई गुना बड़ा यह भकास, रिक्त आकाश ही तो है।’ शिष्य  आश्चर्यवत देखता रहा। आकाश के अवकाश को निहारता रहा।
गुरू ने उसकी भाव समाधी तोड़ी। बोलें, ‘अरे ऐसे क्या आश्र्चय से देख रहे हो? सर्वत्र यह खाली आकाश ही भरा पड़ा है।’
‘यह क्या है?’ गुरू ने कपड़े की और इशारा करके पूछा।
‘वस्त्र है’।
‘अच्छा ध्यान से देखा और करीब से देखो।’
थोड़ी देर देखकर विचारमग्न हो उसने कहा ‘हां अब समझा यह तो धागे हैं। एक दूसरे में बुने हुए।’
‘बिलकुल ठीक। अब धागों के ताने-बाने को देखो ध्यान से।’
शिष्य ने ध्यान से देखना शुरू किया। आड़े धागे को ताना कहते है और उसमें बुने खड़े धागे को बाना। ताने-बाने के जाल के मध्य खाली स्थान-आकाश। बिना गुरू के कहे ही वह समझ गया यदि सुक्ष्मदर्शी से देखे तो पाएंगे कि कुलमिलाकर धागों के आकार से कई गुना बड़े आकाश (रिक्तता) को इस ताने-बाने के जाल ने जकड़ रखा है और हमें पूर्णतः भरे, पूर्ण अपारदर्शी कपड़े का आभास हो रहा है।
यही हाल ठोस दिखते शरीर का है। आंखें बन्दकर ध्यान से अनुभव करें तो हम देखेंगे कि शरीर विभिन्न प्रणालियों से बना है। श्वसन प्रणाली, पाचन प्रणाली आदि। ये प्रणलियाँ बनीं हैं अवयवों से, अवयव कोशिकाओं से, कोशिकायें भिन्न भिन्न रसायनों से। फिर और सुक्ष्मता से देखें तो ये रसायन बने है अणुओं से, अणु परमाणुओं से। परमाणुओं की रचना तो हम जानते ही है। प्रोटोन व न्युट्रोन से बनें केन्द्र के चारों ओर भ्रमण करते असंख्य इलेक्ट्रोन । देखा हमारे शरीर में भी हम उसी आकाशगंगा के दर्शन कर सकते है जो आसमान में दिखाई दे रही है। तो ठोस दिखते शरीर में भी कितना बड़ा आकाश व्याप्त है।
‘तो क्या हम भी रिक्तता से भरे है? क्या सारा अस्तित्व अधिकांशतः रिक्त है?’ शिष्य ने डरकर पूछा।
गुरू ने मन्द-मन्द मुस्काते उत्तर दिया, ‘पगले! आकाश भी कहां रिक्त है। जिसको तुम ठोस मानते थे वो आकाश से भरा मिला। अब यह समझ लो कि वो सब एक ही चैतन्य से पूर्ण है। जो खाली दिखता है वो भी और जो भरा दिखता है वो भी। सब एक ही चैतन्य है। एक ही ऊर्जा। दिव्य, आलोकित चेतन्य!’
‘ओह। तो यही (God) ईश्वर है। सब कुछ उसी से निकला है।’ शिष्य  ने समझने के आवेश में कहा।
गुरू जोर से हंसे, ‘अब तुम नाम चाहे जो लो, ईश्वर कहो या और कुछ, सब है एक। सब पूर्ण, अंनत, अखण्ड एक! ना खाली, ना भरा, ना विविध, ना भिन्न! जड़ में जाकर देखो सब एक ही है।’
यही सृष्टि का नियम है। प्रत्येक अद्वितीय रचना जड़ में उसी एक पूर्ण का अंग है। अर्थात् हम अद्वितीय तो है पर विलग नहीं। अंनत, अखण्ड, पूर्ण के विविध अद्वितीय अंग है।
जीवन की दिशा तय करते समय इन दोनों बातों का भान रखना होगा। और एक तीसरी बात का भी इस अद्वितीय अंग का अखण्ड एक पूर्ण से संबंध क्या है? देखते है अगली बार…….

नवम्बर 14, 2011 Posted by | आलेख | , , , | 4 टिप्पणियाँ

   

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