उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

नियम तो नियम ही है ………


गढ़े जीवन अपना अपना -7

‘घास का तिनका कैसे उगता है?’
केन्द्र के आवासीय व्यक्तित्व विकास शिविर में आये जिज्ञासु बालक ने कार्यकर्ता को प्रश्न पूछा कि ‘हम ये भोजन से पहले मंत्र क्यों करतें हैं?’ उत्तर का प्रारम्भ भी प्रश्न से करने से जिज्ञासु अधिक ध्यान से सुनता भी है और समझता भी है। संस्कारों के इस विज्ञान का अनुसरण करते हुए कार्यकर्ता ने प्रति प्रश्न किया था ‘घास का तिनका कैसे उगता है?’
उत्तर जितना लगता है उतना सरल नहीं था। जब कुछ क्षण बालक सोचता रहा तब कार्यकर्ता ने स्वामी विवेकानन्द के ‘ज्ञानयोग’ पुस्तक में पढ़े विचार को बताना शुरु किया, ‘घास के एक तिनके के लिए भी पूरी सृष्टि कार्य कर रही है। सूर्य तपता है, तब सागर, ताल, नदियों का जल बाफ बन बादल बनता है। वायु इन बादलों को अपने साथ सब जगह ले जाता है। पहाड़, पेड़ जब इन बादलों को रोकतें हैं तब वर्षा होती है। बारिश के पानी से धरती के पेट में पड़े सूखे बीज में अंकुर फूटते हैं। धरतीमाता पोषक रसायनों के भंडार से उस अंकुर का पोषण करतीं है तो घास का तिनका उगता है|’
जगत का एक परमाणु भी अपने संग सारी सृष्टि को लेकर ही गति करता है। आधुनिक विज्ञान के नए-नए प्रयोग सिद्ध कर रहें रहे हैं कि सारा जगत आपस में जुड़ा है। पर्यावरण में दीखाई देते परिणाम बताते हैं कि सारा जगत एक दुसरे से सम्बन्ध में बंधा है। जापान में सुनामी से परमाणु सयंत्र में खराबी आती है, प्रशांत महासागर के दुसरे तट पर अमेरिका में दुष्परिणाम देखें जा सकतें हैं। तो ये जगत केवल भौतिक रूप से जुड़ा ही नहीं है इसका आपस में सम्बन्ध भी है। जैविक सम्बन्ध, जैसा शरीर के अंगों का आपस में होता है और इस जगत में सब आपस में एक दूसरे पर निर्भर भी है। जीवन, पोषण और मरण के लिए पूर्णतः निर्भर है।
हमने अपने आप को समझने के प्रयास में सृष्टि के तीन मूलभूत शाश्वत सिद्धान्तों को समझा है –
१.    सारी सृष्टि ‘एक’ ही है। ऊपर दिखने वाली समस्त विविधता उस एक पूर्ण की ही अभिव्यक्ति है।
२.    विविध रूप में प्रगट एक पूर्ण के सब ‘अंग’ अपने आप में अद्वितीय है। कोई भी दो एकसमान नहीं है। हम मनुष्य भी उसी ‘एक’ की अद्वितीय अभिव्यक्ति हैं। हमारी रचना, कार्य व भूमिका तीनों विशिष्ट हैं। हमारे अपने ‘स्व’भाव के अनुसार है। कितना भी प्रयास करें हम किसी की नकल नहीं कर सकते।
३.    यह पूर्ण और सभी अंग- अर्थात सृष्टी में जो भी है वह सब परस्पर, आपस में जुड़े हैं। केवल भौतिक रूप से ही नहीं, जैविक सम्बन्ध में बंधे हैं और अपने अस्तित्व के लिए परस्पर निर्भर भी हैं। औरर एक बात पूर्णत्व से कट कर अंग का कोई अस्तित्व नहीं है| कटते ही वह मर जायेगा| अतः हम पूर्ण से जुड़े बिना नहीं रह सकते|
अस्तित्व के इन नियमों को समझकर उसके अनुरप अपने जीवन के लक्ष्य, दिशा व कार्य को ढालने से जीवन में सफलता एवं सार्थकता दोनों मिल सकते हैं। हमने बात भोजनमंत्र से प्रारम्भ की थी। हमारी थाली में प्राप्त भोजन के पीछे कितने लोगों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष श्रम लगा है। तपते सूरज, बादल, वायु और पहाड़ के साथ ही हम कहाँ जानतें हैं कि किस किसान के पसीने की बूंदों ने धरती से यह अनाज पैदा किया? और कितने मजदूरों की पीठ पर लदकर हमारे घर तक पहुंचा? माँ ने और उसकी सहायता करने वाले लोगों ने उसे पकाया। सुस्वादु, सुपाच्य, रुचिकर बनाकर हमारी थाली तक पहुचांया। इन सब के प्रति अपना आभार व्यक्त करने का प्रयास है-भोजन मंत्र। सबको तो हम जानते नहीं अतः उनके अंदर के सबको जोड़ने वाले तत्त्व ब्रह्म की प्रार्थना करते हैं:-
ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम् ।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।।
यह जो भोजन के रूप में हमारा जीवन यज्ञ चल रहा है उसमे सबकुछ ब्रह्म ही है। अर्पण करने वाला, आहुति में डाली समिधा-हवि, यज्ञ की अग्नि सबकुछ वही एक ब्रह्म है और इस यज्ञ से प्राप्त उर्जा भी उसी के कर्म में लगें।
प्रत्येक कर्म में जीवन के नियम उतर जाए ऐसा प्रयास है यह भोजन-मन्त्र। अब हममें से कोई कहेगा-हमको ये नियम पता नहीं फिर हम पर तो इसका बंधन नहीं ना है? ये तो ऐसी ही बात हुई कि किसी पथिक को पूछा की सूर्य किधर से उगता है? तो उसने कहा -‘मुझे नहीं पता, मै इस गाँव में नया हूँ।’ हमारे अज्ञान से सृष्टि के नियम तो नहीं बदल जायेंगे? अब कोई कहे मुझे गुरुत्वाकर्षण का नियम नहीं पता। मै नहीं जानता कि उपर से हर वस्तु नीचे ही क्यों गिरती है? ऐसे व्यक्ति को कहे ‘कोई बात नहीं, थोड़ा छत से छलांग लगा कर देखो। टूटी टांग गुरुत्वाकर्षण का नियम सिखा देगी।’ न्यूटन के सिद्धांत को जाने या ना जाने दोनों स्थितियों में नियम तो प्रभावित करेगा ही।
उसी प्रकार अस्तित्व के शाश्वत नियम हमारे जीवन में कार्य कर रहें है। हमारे जाने या अनजाने। यदि हम समझकर इन्हें अपने जीवन में ढाल लेते हैं तो अपना चरित्र गढ़ने लगते हैं।
नियम तो नियम ही है। हम उन्हें जाने। उनका पालन करें इसी में हमारा हित है।

नवम्बर 25, 2011 Posted by | आलेख | 5 टिप्पणियाँ

   

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