उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

आसक्ति कैसे जा सकती है?


कर्मयोग 8:
आठवी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची ने पत्र में पूछा, ‘‘भैया ये आसक्ति क्या होती है?’’ सुसंस्कृत परिवार था। घर में पाठ, स्वाध्याय होता रहता था। इसलिये ऐसे शब्द सुन रखे थे। अर्थ पता नहीं था पर किसी से पूछने का साहस भी नहीं कर पायी होगी। अब विश्वास बना कि कोई बता सकता हे तो बेझिझक पूछ लिया। पर उत्तर देना इतना सहज नहीं था। वैसे भी इन सूक्ष्म संकल्पनाओं को समझना और समझाना कठीन ही होता है। यहाँ तो 12-13 साल की बच्ची वह भी बड़ी कठीन परिस्थिति का सामना कर रही है। कुछ ही दिनों में माँ की गंभीर शल्य-चिकित्सा (Surgery)  होनेवाली थी। ऐसे समय वह बालिका जानना चाह रही है कि आसक्ति क्या है?
गीता में बार बार कहा गया है -अनासक्त होकर कर्म करें। ‘‘तस्मात असक्तः सततं।। गी 3.19।।’’ सदैव आसक्ति से मुक्त रहो। ‘‘संगं त्यक्त्वा धनंजय।। गी 2.48।।’’ हे धनंजय! आसक्ति का त्याग कर। ‘‘कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगं असक्तः स विशिष्यते।।गी 2.7।।’’ कर्मेन्द्रियों में आसक्ति ना होना ही कर्म को कर्मयोग बनाता है। ‘‘मुक्तसंगः’’ आसक्ति से जो मुक्त है वह सात्विक कर्ता है। आदि अनेक स्थानों पर इस महत्वपूर्ण बात का उल्लेख मिलता है। कर्मयोग की परिभाषा का यह महत्वपूर्ण घटक है। अतः कर्मयोग के विविरण में यह बार बार आता है। किन्तु बारवे अध्याय में जहाँ भक्ति योग का विवरण है वहाँ भी भक्तों के लक्षणों में ‘‘समः संगविवर्जितः।। गी 12.18।।’’ सभी द्वन्द्वों को समान दृष्टि से देखनेवाला के साथ ही आसक्ति को जिसने छोड़ दिया है यह भी आता है। गीता का महत्वपूर्ण संदेश है आसक्ति को छोड़ो। यह ऐसा केवल इसलिये नहीं है कि अर्जुन की आसक्ति गीता का निमित्त बनीं और उसको युद्ध के लिये प्रेरित करने के लिये अनासक्त होना आवश्यक था अतः भगवान् श्रीकृष्ण बार बार आसक्ति के छोड़ने पर बल दे रहे है। यह तात्कालिक कारण कितना भी मोहक लगता हो किन्तु गीता का निमित्त भले ही तात्कालिक धर्मयुद्ध और अर्जुन का उसके प्रति विरक्त होना हो किन्तु गीता का विषय सार्वकालिक है। सनातन धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों की गीता सार्वभौम, सार्वकालिक, व्यावहारिक व्याख्या है। कर्मकौशल का योग समझाने वाली गीता को अनासक्ति, असंग, संगरहितं, संगत्याग आदि पर बल देना अनिवार्य हो जाता है क्योंकि सब बन्धनों, दबावों तथा समस्याओं से मुक्त होकर स्वतन्त्र कर्म करने के लिये आसक्ति का हटना प्रथम आवश्यकता है। इसी कारण विनोबा भावे गीता का विषय अनासक्ति योग है ऐसा बताते है।
यह सब विशेषता तो ठीक है पर मूल प्रश्न तो वही बना रहा, ‘‘आसक्ति है क्या?’’ हमारे मन में सदा ये प्रश्न आता है। अनासक्त होना तो असम्भव है। मनुष्य है तो भावनायें भी होंगी ही। ऐसे निष्ठुर, कठोर हृदय थोड़े ही हो जायेंगे कि अपने परिवार, परिजन से कोई लगाव ही ना हो? ये कैसे सम्भव है? और सम्भव हो भी तो क्यों करना? क्या पत्थरदिल हो जाना ही जीवन है। ऐसा सब करके सफल हो भी गये तो ये सफलता किसके लिये? अपनों से आत्मीयता ही नहीं रही तो फिर जीवन ही निरर्थक हो जायेगा। ऐसी अनेक बातें हमारे विचारों में आ जाती है जब भी काई आसक्ति को छोड़ने की बात करता है। यह ठीक अर्जुन का तर्क है। पहले अध्याय में यही सारे तर्क उसने युद्धविमुख होने की अपनी कायरता को उदात्त बताने के लिये दिये है। इन शंकाओं का समाधान पाने के लिये हमें आसक्ति, प्रेम, आत्मीयता आदि में भेद को समझना होगा। वास्तव में आसक्ति या संग, प्रेम या आत्मीयता के विलोम है। एक के होने से दूसरा नहीं हो सकता। अतः जब तक आसक्ति होगी हम वास्तव में प्रेम, लगाव, आत्मीयता आदि उदात्त भावों का अनुभव ही नहीं कर पायेंगे और इन्द्रियों के स्तर पर कीचड़ में खेलने को ही आनन्द मान बैठेंगे।
गीता के दूसरे अध्याय में स्थितःप्रज्ञ लक्षणों में भगवान् अत्याधुनिक प्रबन्धकों की प्रस्तुतियों के समान ही एक प्रवाह रेखांकन (Flow Chart) दिखा रहे है। पतन का प्रवाह चित्रण है यह। कैसे थोड़ी सी असावधानी पूर्ण पतन का कारण बन सकती है इसका यह व्यावहारिक वर्णन है। इसमें ही हमें संग अथवा आसक्ति की परिभाषा व परिणाम दोनों देखने को मिलते है।
ध्यायतो विषयान् पुंसः संगस्तेषुपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते।।गी 2.62।।
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात्समृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।।गी 2.63।।
विषयों के बारे में सोचने से संग अर्थात इन्द्रिय विषयों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से वासनाओं का जन्म होता है। इच्छाओं की पूर्ति न होने से क्रोध और क्रोध से भ्रम पैदा होते है। सम्मोह का अर्थ है सही मार्ग के प्रति भ्रमित हो जाना। इस भ्रम से स्मृति विकृत हो जाती है। जो बाते जैसी है उस प्रकार याद नहीं आती। इस के कारण बुद्धि का आधार ही नष्ट हो जाता है। बुद्धि का कार्य विश्लेषण का है। नयी जानकारी का विश्लेषण स्मृति में संचित जानकारी के साथ तुलना द्वारा ही सम्भव है। जब स्मृति ही सुव्यवस्थित नहीं होगी तो बुद्धि विश्लेषण किस आधार पर करेगी? और जब बुद्धि ही नष्ट हो गयी तो बचा ही क्या यह तो पूर्ण विनाश ही है।
इस पतन के क्रम का प्रारम्भ ‘संग’ से है। उससे पहले उसका कारण है ‘विषयों का ध्यान’। यह अपने आप में प्रक्रिया है परिणाम तो है संग अर्थात आसक्ति। तो इस आधार पर इन्द्रियजन्य चिन्तन से उत्पन्न राग को, चाह को आसक्ति कहा है। सम्बन्धों को शरीर के स्तर पर देखना एक बाध्यकारी आकर्षण को जन्म देता है। यही पतन का प्रारम्भ है। जब हम जीवन का उद्देश्य भोग बना लेते है और प्रत्येक वस्तु व व्यक्ति को उसका साधन तब जीवन इस चक्र में फँस जाता है। यह लिप्सा, चिपकना जीवन की कीचड़ है। जैसे भैंस कीचड़ में और सुअर गंदी नाली में सुख का अनुभव करता है वही स्थिति आसक्ति में फँसे मनुष्य की होती है। किसी शराबी की तरहा वह बार बार अपने को रोकने का प्रयास करता है पर इन्द्रियाँ उसे बलपूर्वक पतन की ओर खींच कर ले जाती है। यह चिकनी ढ़लान पर पैर फिसलने के समान है। एक बार पैर फिसला तो बीच में रूकना असम्भव है। जो भी सावधानी बरतनी है फिसलने से पूर्व ही बरतनी है। मन को विषयों के चक्र में फँसने से पूर्व ही बचाना होगा। प्रेम, आत्मीयता यह उदात्त भाव है। उसमें चिपकना नहीं होता मुक्ति होती है। मजबुरी नहीं होती। पर हम सामान्यतः फिल्मी प्रभाव में वासना, आकर्षण जैसी आसक्तिजन्य भाव-लहरों को प्रेम मान लेते है और पतन की फिसलपट्टी पर सरपट पसर जाते है।
अब आता है व्यावहारिक प्रश्न। आसक्ति के फेरे से बचे कैसे? कई बार प्रवचन आदि सुनकर लगता है कि ये तो बड़ा ही कठीन है। पर वास्तव में इससे सरल कुछ नहीं है। मानव को मानव के रूप में रहना कैसे कठीन हो सकता है? किन्तु यदि हम पशुवत आनन्द की ओर बढ़ गये तो फिर मुश्किल होती है। इसमें अपूर्णता भी रहती है आनन्द से ज्यादा कष्ट भी होता है। सच्चा और स्थायी आनन्द तो मानवीय ही होगा ना? मानवीय आनन्द आसक्ति रहित कार्य से ही सम्भव है। प्रश्न फिर वही है आसक्ति से कैसे बचे? इसका सरल सा मार्ग है – उदात्तीकरण। शब्द बड़ा भारी भरकम लगता है पर अर्थ सरल है – उपर उठना। जमीन पर चलते समय रास्ते के गढ्ढ़े पीड़ादायक होते है और मन भी त्रस्त होता है किन्तु जब पहाड़ी की चोटी पर पहुँच जाते हे तो वहाँ से जो दृश्य दिखाई देता है उसमे उतार चढ़ाव नही होते। वैसे ही जीवन के उदात्त ध्येय को महत्व देना शुरू कर देते है तो मन फिर इन क्षुद्र चीजों में नहीं लगता। तुलसीदास जी के विवाह के बाद वे अपनी पत्नि के मोहपाश में ऐसे बन्ध गये कि जब वो मायके गई तो पीछे-पीछे पहुँच गये। मन काम में ऐसा लगा था कि कुछ भी सुध नहीं। बाढ़ के पानी में कूद पड़े, बहती लाश पर बैठकर नदी पार की। पत्नि के घर रात को पहुँचे। खिड़की से कोई रस्सी लटक रही है ऐसा समझकर सांप को पकड़ कर उपर चढ़ गये। पत्नि ने धिक्कारा ये कैसा काम? इतनी लगन राम में लगाई होती तो भगवान के दर्शन हो गये होते। इस झिड़क से इन्द्रिय भोग का नशा उतर गया। जीवन का उदात्तीकरण हो गया और अब मन राम मे रम गया। मानस में रामजी प्रगटे और स्वयं हनुमानजी ने रामकथा सुनाई। सारी दुनिया को रामचरित मानस की निधि प्राप्त हो गई। आसक्ति का बल अगाध होता है उसे उपर की ओर मोड़ देते है तो उसी गति से अनासक्त मन बड़े कार्य में लग जाता है।
जब हम किसी कार्य में पूरे रम जाते है तो स्वयं को भूल जाते है। यदि पूरा जीवन ही किसी उदात्त कार्य में रस लेने लगे तो फिर इन्द्रियों के खेल को भूलना सहज हो जाता है। साथ ही इन्द्रियों का प्रशिक्षण भी आवश्यक है जो हमने पूर्व के आलेख ‘‘भले ही कर्मकाण्डी बनों . . .’’ में देखा ही है। उदात्त ध्येयगामी कार्य और इन्द्रियनिग्रह के सतत प्रयास दोनों का निरन्तर चलना जीवन को आनन्ददायी, संगरहित, अनासक्त बना देता है। यही तो कर्मयोग का रहस्य है। सामान्य कार्य को भी सहज योग बना देना।
आठवी की बहना के पत्र के उत्तर में तो सहज लिख दिया था कि ”आसक्ति वो है जो कभी भी आ सकती है और आये तो जकड़ भी सकती है। इसलिये अपने को भगवान में ही आसक्त कर लो ताकि जकड़े तो रामजी ही जकड़े।” आज 18 वर्ष बाद उस पत्र को याद कर के ये उपाय लिखे है। पर याद रहे दोनों उपाय करने सतत होंगे। क्योंकि आसक्ति कभी भी आ सकती है। पर योगयुक्त जीवन के नियमित अभ्यास से ही जा सकती है।

दिसम्बर 8, 2011 - Posted by | योग | , , ,

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  1. bhai ji tulsidass ji nahin wo kavi kali dass thay. aapne galti say naam galat likh diya hai.. tulsidass ji to bramchari thay…

    टिप्पणी द्वारा Ram-Parshu-Ram | दिसम्बर 26, 2011 | प्रतिक्रिया


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