उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता गुरुदेव दत्त


दत्तजयंति पर विशेष :

भगवान दत्तात्रेय के जीवन के अनेक पहलु है जो सामाजिक जीवन में कार्य करनेवाले कार्यकर्ताओ के लिये मार्गदर्शक हैं। दत्तात्रेय के जन्म की कथा ही सामाजिक जीवन में शुचिता का सबसे बडा उदाहरण है। देवताओं के मन में भी जिनके सतित्व के बारे में असुया पैदा हुई ऐसी अत्रि की पतिव्रता अनुसुया। उनके जीवन की पवित्रता की चर्चा सुनकर तीनों महादेवताओं की पत्नियों को ईष्र्या हो गई। सामाजिक जीवन में भी ऐसा अक्सर होता है। आपके अन-असुया, ईष्र्या के विना होने से यह खातरी नहीं है कि लोग आपसे मत्सर नहीं करेंगे। और ऐसा भी नहीं है कि बुरे लोग आपसे ईष्र्या करेंगे। यदि आप समाज के कार्य में लगे है तो फिर बुरे लोग आपका विरोध तो कर सकते हे पर असुया तो आपके अपने साथी ही करेंगे। तो याद रहे कि वे आपके अपने है। अच्छे है इसिलिये आपके अच्छे गुणों व कार्यों से जल रहे है। हाँ! एक और बात! सीधे इस निष्कर्ष पर पहुँचना भी ठीक नहीं कि किसी से आपकी अनबन हो गई तो वह व्यक्ति आपसे ईष्र्या कर रहा है। पहले स्वयं को जाँच लें। आपके कार्य, कार्य के पीछे के भाव को ठीक से समझ लें। कही आपका अहंकार तो आपका संचालन नहीं कर रहा? कही आप अपने व्यवहार से लोगों को अपमानित तो नहीं कर रहे?
अनुसुया का जीवन तो समाज की सेवा मे पूर्णतः रत था। अत्रि का आश्रम समाज को स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाने कार्य कर रहा था। हर स्तर के व्यक्ति को अपने स्तर से उपर उठाने का मार्ग दिखा रहा था। अनुसुया इस सारे कार्य में पूरा सहभाग कर रही थी। वह इसका महत्वपूर्ण हिस्सा थी। फिर भी जगत का सृजन, पालन व संहार का दायित्व धारण करनेवाली शक्तियों के स्वामी ही अपनी सहधर्मचारिणियों के हठ के आगे झुक कर अनुसुया के सतित्व का परिक्षण करने आये। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जगत को चलाने वाली तीन शक्तियों के प्रतीक हैं। ये ही कार्यकर्ताओं की परीक्षा लेते है। सृजन की शक्ति अर्थात अपने जैसे औरों का निर्माण करने की शक्ति। तो इस अर्थ में हर कार्यकर्ता में ब्रह्मा की शक्ति होती है। पालन अर्थात कार्य को स्थायित्व प्रदान करना। अपने होने या ना होने की स्थिति में भी कार्य सतत चलता रहे इस प्रकार की व्यवस्था का निर्माण करना और उसे बनाये रखना। यह प्रत्येक कार्यकर्ता में यह विष्णुत्व होता है। कार्य करते समय अनेक त्याज्य बातें इकðी हो जाती है समय समय पर उनका संहार भी करना होता है। अपने अंदर के विचारों में ऐसी कुण्ठा आ सकती है जो सृजन के स्थान पर सड़ान्ध पेदा करें। कभी कभी अपने अत्यन्त निकट के कोई लाग भी कार्य में बाधा बन सकते है। उनके द्वारा कार्यका नुकसान ना हो इसलिये उनको कार्य से दूर करने का काम भी कार्यकर्ता को करना होता है। यह शिवत्व भी कार्यकर्ता की शक्तियों का महत्वपूर्ण अंग है। ये तीनों सतित्व की रक्षा करने के स्थान सतित्व की परीक्षा करने के लिये अत्रि के आश्रम में आये है। यह दत्तजयंति का दिन है जिस दिन ये ऐतिहासिक घटना हुई।
तीनों देवता अतिथि बनके आये हैं। अत्रि आश्रम मे अतिथि को ईच्छा भोजन दिया जाता है। अत्रि स्वयं कार्य पर गये है। अनुसुया पर अतिथि सत्कार करने दायित्व था। उसने अतिथि देवता का स्वागत किया पाद्यपूजा के बात पूछा कि क्या इच्छा है ताकि उसे पूरा किया जा सके। सतित्व की परीक्षा लेने आये देवताओं ने अजीब सी इच्छा व्यक्त कर दी। उन्होंने कहा कि हम आपके सौन्दर्य की चर्चा सुनकर आये है और हम चाहते है कि आप निर्वस्त्र होकर हमें भोजन कराये। अतिथियों कि ईच्छा सुनकर अनुसुया के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया। समाज हमारे सम्मूख कई बार इस प्रकार की स्थितियाँ पैदा कर देता है। जहाँ दोनों ओर ही धर्म की हानी होती दिखाई देती है। ऐसे में ही कार्यकर्ता के व्यवहार कुशलता की परीक्षा होती है। संकट में से राह निकालना अपनी शुचिता और चारित्र्य पर निर्भर करता है। अनुसुया के भी चरित्र की परीक्षा थी। यदि अतिथि की इच्छा का सम्मान ना किया जाये तो पति के व्रत में खण्ड पड़ेगा और यदि इच्छा के अनुरुप कार्य किया तो स्वयं का पातिव्रत्य खण्डित होगा। वैसे शास्त्रानुसार धर्म के विपरित माँग को मानने का कोई बन्धन नहीं है। किन्तु सामाजिक कार्य में लगे कार्यकर्ता तर्क में नहीं पड़ सकते। समाज में शील व चरित्र का आदर्श प्रस्तुत करने का दायित्व उनके उपर होता है अतः उन्हें तो धोबी की ‘समझ’ का भी सम्मान कर अपनी प्रियतम निधि का त्याग करने को प्रस्तुत होना होता है। अनुसुया की दुविधा राजाराम से भी बड़ी है। वनगमन अथवा पलायन का कोई अवसर ही नहीं है। कई बार समाज की संवेदनहीनता के कारण निराश, हताश कार्यकर्ता को पलायन का विकल्प सम्मूख दिखाई देता है। यह सरल भी लगता है। जब अपने ही वरीष्ठ परीक्षा लेते है तब सीधे संघर्ष का भी कोई मार्ग भी नहीं होता है। तब अपनी व्यवहार कुशलता व सृजनशक्ति का प्रयोग करना होता है। माता अनुसुया ने मन में संकल्प किया कि ये अतिथि तो मेरे पुत्रों समान है। माता को विवस्त्र देखने की योग्यता तो केवल नवजात शिशु में ही होती है। अतः मै इन्हें ऐसा ही मानकर आहार कराती हूँ। सत्संकल्प बड़ों बड़ों को बौना कर देता है। तीनों महादेवता अनुसुया के तपस से शिशु बन गये और माता ने बड़े प्रेम से उन्हें अपना दुग्धपान कराया।
जिनकी ईष्र्या के कारण यह सब हुआ था वे देवियाँ अब परेशान हो उठी। कहाँ सति अनुसुया के सत्व की परीक्षा लेने चली थी और अब तो अपने पतियों से ही हाथ धोना पड़ गया था। माता अनुसुया ने उनके अनुरोध को बड़ी सहजता से स्वीकार किया और तीनों देवताओं को अपने संकल्प से मुक्त किया। प्रसाद में तीनों ने अपने अंश को एकाकार कर एक बालक माता को दिया। वे ही त्रिमुर्ति दत्तात्रेय है।
गुरु दत्त पूर्ण कार्यकर्ता है। संकट में से मार्ग निकालने के फलस्वरुप जन्म हुआ। सृजन, पालन और संहार की महाशक्ति के अंश को धारण किया। और सारे जीवन तप किया। भ्रमण और तप के द्वारा समाज का संगठन। यही तो एक संगठक का कार्य होता है। भारत के कोने कोने में अनेक तीर्थस्थानों पर हमें दत्तात्रेय की तपोभूमि मिलती है। चाहे माउण्ट आबू हो या महाराष्ट्र का माहुर या त्र्यम्बकेश्वर, या आसाम का कोई तीर्थ सबसे उँची चोटी पर दत्तात्रेय की तपोस्थली मिलेगी। चरैवेति चरैवेति के मन्त्र को साकार कर पूरे राष्ट्र को एक सुत्र में बान्धने का कार्य दत्तात्रेय ने किया है। कहते है कि उनके 24 गुरु थे। 24 की सूची में सब स्तर के मानव ही नहीं पशु, पक्षी और अन्य स्थावर-जंगम वस्तुएँ भी है। जब जीवनदर्शन का मूल तत्व पकड़ में आ जाता है तो उसे आचरण में लाने की शिक्षा सभी से ली जा सकती है। यह महाशिष्यत्व सामाजिक कार्यकर्ता के लिये अनिवार्य है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति व जीवन के प्रत्येक अनुभव से शिक्षा प्राप्त करने की तत्परता व क्षमता दोनों ही हमारे लिये आवश्यक है। साथही जब हमको पता होता है कि हमने कितने लोगों की कृपा से यह ज्ञान व कौशल प्राप्त किया है तो अहंकार के बढ़ने की सम्भावना भी कम होती है। सीखते तो हम सभी है अपने परिवेष से, पर उसका भान नहीं रखते और इस कारण श्रेय को भी बाँटने की जगह स्वयं का ही मान लेते है। दत्तात्रेय का जीवन हमे बताता है कि छोटी से छोटी शिक्षा को देने वाले के गुरुत्व को स्वीकार करों। इसी गुण के कारण वे स्वयं आदर्श गुरु भी है। प्रत्येक कार्यकर्ता को ये दोनों दायित्व निभाने होते है। सारे जीवन पर्यन्त हम शिष्य भी बने रहते है और गुरु भी।
गुरु दत्तात्रेय ने अनेक रूपों में अवतरित होकर कार्य निरन्तर रखा। दत्तजयंति से पूर्व सप्ताह के रूप में पढ़े जाने वाले गुरु चरित्र में श्रीपाद श्रीवल्लभ व नृसिंह सरस्वति इन दो अवतारों का बड़ा ही विस्तृत विवरण हमें मिलता है। जगत के कल्याण के लिये, धर्म को स्थापित करने का कार्य ऐसे ही अनेक रूपों में करने की आज अत्यधिक आवश्यकता है। सामाजिक कार्य में रत कार्यकर्ता को भी अनेक दायित्वों का निर्वाह ऐसे ही अवतारों के समान करना होता है।
तापसी जीवन अपरिग्रह का भी आदर्श है। अकिंचन भाव से बिना किसी भी सुविधा की अपेक्षा लिये आनन्द से जीवनयापन करते हुए समाज को सर्वस्व देने का उदाहरण है श्री गुरुदत्त। इसी के साथ समाज में तिरस्कृत ऐसे आवारा, रुग्ण कुत्तों को वे सदा साथ में लेकर चलते है। प्राणियों में श्रेष्ठतम गोमाता की पूजा के साथ ही इन पशुओं में निम्नतर माने जानेवाले श्वान को भी वे अपने संग से पूजनीय बना देते है। एक आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता में समाज के श्रेष्ठतम जनों के साथ उनके स्तर पर संवाद व सम्पर्क करने की क्षमता तो होनी ही चाहिये साथ ही समाज के वंचित, दुर्लक्षित वर्ग को भी उतनी ही आत्मीयता से अपनाने की तत्परता भी होनी चाहिये। यह भी सीख दत्तात्रेय के जीवन से हमें मिलती है।
आईये भगवान् दत्तात्रेय के जन्मदिवस पर उनकी शिक्षा को अपने जीवन में उतारने का संकल्प उनके चरणों में अर्पित कर अपने जीवन को सार्थक करें  . . .
गुरुदेव दत्त।।

दिसम्बर 10, 2011 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 5 टिप्पणियाँ

   

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