उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

क्या हम तत्पर है?


गढ़े जीवन अपना अपना -10
एक गुरुकुल में दो शिष्य थे सुहृत और सुकृत। सुकृत बड़ा विद्वान था। जो भी पाठ पढ़ाया जाता तुरन्त याद कर लेता। अतिरिक्त भी बहुत पढ़ता रहता। आचार्योंसे चर्चा में भी आगे ही रहता था। सुहृत पढ़ने में तो साधारण था पर कुलगुरु का बड़ा प्रिय था। वे अक्सर कहा करते थे कि ये तो धर्म का मर्म जानता है। दोनों गहरे मित्र थे। फिर भी सुकृत के मन में बार बार आता था कि ऐसा क्या है जो सुहृत को गुरुजी का प्रिय बनाये हुए है। मैने सारे धर्मशास्त्र पढ़ लिये है मित्र से अधिक सुत्र मुझे याद है पर फिर भी सम्भवतः मर्म को मै नहीं जान पाया। ये मर्म क्या है? एक बार किसी अत्यावश्यक कार्य से सुकृत को पास के किसी नगर भेजा गया। जाने से पहले उसने सुहृत को कहा कि वो भी साथ चले ताकि साधन भजन में सहायता हो जायेगी। सुहृत ने जो उत्तर दिया उससे स्पष्ट हो गया कि वो क्यों सबका प्रिय है। उसने कहा, ‘मै साथ तो चल सकता हूँ। भजन जप भी साथ में कर सकता हूँ किन्तु सहायता कि कोई सम्भावना नहीं है। इस मामले में कोई किसी की सहायता नहीं कर सकता। ना गुरु ना शास्त्र ना मित्र। ये सब अधिक से अधिक साधना का पथ बता सकते है पर चलना तो स्वयं को ही पड़ेगा। स्वयं के चलने से ही लक्ष्य तक पहुँचेंगे।’ यही है धर्म का मर्म – ‘हम स्वयं ही अपने सहायक है।’ और हाँ गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते है अपने शत्रु भी हम आप ही है। आत्मैव आत्मनो बन्धुः आत्मैव रिपुरात्मनः।
चरित्र गठन की प्रक्रिया को समझने में हमने भी अभी तक के अध्यायों में ये देखा की जीवन का निश्चित उद्देश्य है, लक्ष्य है। यह प्रत्येक का अपना अलग अलग है, अद्वितीय है। एक दिव्य तत्व से ही उपजे ओर जुड़े इस संसार में प्रत्येक की भुमिका अपने आप में विशिष्ट है ओर उसे पहचान कर निभाने में ही जीवन की सार्थकता है। ये भी कि हमारा जीवन अपनी ही बड़ी इकाईयों से जुड़ा होने के कारण हमें अपना जीवनध्येय और कार्य अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के ध्येय व कार्य के अनुरूप रखना होगा। इससे चरित्र गठन में सहजता भी होगी और हमारी उपलब्धियों की पूरे विश्व में सार्थकता भी होगी। पर इस सबको करने के लिये हमारा एकमात्र साधन है हमारा अपना व्यक्तित्व। यही हमारा वाहन है जो हमें गन्तव्य तक पहुँचायेगा। यही हमारा अस्त्र है जिससे हमें लक्ष्यवेध करना है।
हमारे व्यक्तित्व के विकास के बारे में विचार करते समय हमने सबसे पहले आंतरिक उपकरणों पर विचार किया था। हनुमानजी की जलधि लांघती छलांग से हमने देखा था कि प्रेरणा, वीरता, ध्यैर्य और विवेक इनके बल पर हम भी अपने जीवन सागर को और उसमें आने वाली समस्त बाधाओं को लीलया-खेल खेल में पार कर सकते है। आप जैसे आधुनिक साथी पूछना चाहेंगे कि ये सब तो ठीक है किन्तु इन आंतरिक उपकरणों का विकास कैसे किया जाये? तो हनुमानजी को ही पूछते है कि इतना कठिन कार्य उन्होंने कैसे कर लिया? जब वानरदल माता सीता के खोज का शुभसमाचार लेकर किष्किंधा पहुँचां तो महाराज सुग्रीव के साथ सब रामजी के पास पहुँचे। सारा समाचार सुनकर भगवान का हृदय बजरंग बली के प्रति प्रेम से भर आया और वो उनसे सारा वृत्त विस्तार से समझना चाहते थे। कैसे महाबली रावण की लंका को भस्मसात् कर आये। हनुमानजी सारा श्रेय श्रीराम को ही देते है। प्रभु इसमें मेरी कोई बढ़ाई नहीं है यह सब आपका ही प्रभाव है। मै तो क्या कर सकता हूँ जन्म का बन्दर हूँ शाखा से शाखा जाते रहता हूँ वैसे ही छलांग वहाँ भी लगा दी। इस उत्तर में व्यक्तित्व के आंतरिक विकास का रहस्य छिपा है।
स्वामी विवेकानन्द जी कहते है, ‘‘अन्तःकरण में सारे चमत्कारों की सम्भावना है और इस चमत्कारी शक्ति का रहस्य है श्रद्धा! श्रद्धावान् मनुष्य बाधाओं के हिमालय सहज पार कर लेता है। समुद्र को पी जाने की शक्ति रखता है। नचिकेता के समान हँसते हँसते मृत्यु का सामना कर लेता है।’’ महावीर हुनमान के अलावा कठोपनिषद् का वीर हिरो नचिकेता स्वामीजी का प्रिय आदर्श था। वे कहा करते थे, ‘मुझे 100 नचिकेता दे दो और मै विश्व का कायापालट कर दूंगा।’
इस 10 वर्षीय बालक नचिकेता के जीवन को समझने से हम श्रद्धा के जागरण का तन्त्र समझ सकते है। बालक के पिता वाजश्रवा माने हुवे ऋषि है और समय समय पर बड़े बड़े सर्वस्व त्यागी महायज्ञ करते रहते है। और इसी के लिये ख्यातिप्राप्त है। एक समय के यज्ञ में बालक नचिकेता पिता का भ्रष्टाचार देख कर विचलित होता है। वो देखता है कि अपने पूज्य पिता ब्राह्मणों को मृतप्राय गायें दान में दे रहे है। पीतोदका, जितना पानी पीना था पी लिया, दग्धतृणा, अब घास भी खाने की शक्ति जिनमें नहीं बची और वन्ध्या, जो बांझ है; ऐसी पूर्णतः निरुपयागी गायों का दान तो याचक का बोझ बढ़ाना है। ममता के कारण तटस्थ रहने के स्थान पर बालक नचिकेता श्रद्धा से भर गया। श्रद्धा से प्रेरणा पा कर वह पिता से प्रश्न पूछने का साहस कर पाता है। पर अपना ध्यैर्य और विवेक नहीं खोता। पिता पर आरोप नहीं लगाता केवल उनसे विनम्रता से प्रश्न पूछता है।
महायोगी अरविन्द कहते है, ‘श्रद्धा प्रश्नहीन विश्वास नहीं है। अन्ध अनुकरण नहीं है। श्रद्धा तो प्रश्न पूछने का साहस प्रदान करती है। अपने आप से और अपनों से ‘समाधान अवश्य मिलेगा’ इस विश्वास के साथ प्रश्न पूछना श्रद्धा है।’ तो श्रद्धा का पहला अंग है ‘आत्मावलोकन’। श्रद्धावान् स्वयं का यथातथ्य आकलन करता है। श्रद्धा से आविष्ट नचिकेता भी पिता से संवाद यहाँ से ही प्रारम्भ करता है- मै बहुतों से बढ़कर हूँ और बहुतों से कम भी हूँ। मै ना तो सर्वप्रथम हूँ पर नाही अंतिम। अर्थात मै कुछ तो योग्य हूँ। आप मूझे किसे दान देंगे? यह आत्मावलोकन है। वृथा अभिमान नहीं कि मै धर्म जानता हूँ, आप गलत है। कोई अभिमान नहीं। पर झूठी विनम्रता के नाम पर स्वयं का अवमूल्यन भी नहीं। नियमित आत्मावलोकन से आत्मविश्वास जगता है जो श्रद्धा के जागरण का माध्यम बनता है।
नचिकेता ने पिता को पूछा तो ऐसे अपने प्रिय सुयोग्य पुत्र को आप किसे दान दोगे। पिता ने सम्भवतः झल्लाकर या टालने के लिये कह दिया, ‘मृत्यवे ते ददामि।’ जैसे गुस्से से कभी माँ कह देती है ना ‘जा मर!’ नचिकेता के पिता ने कह दिया मै तुझे मृत्यु को दान देता हूँ। सुननेवाले सब अवाक् रह जाते है पर श्रद्धावान् नचिकेता अविचल मुस्कुराता सम्मूख आयी चुनौती को स्वीकार करता है और यमनगरी को जाने को तत्पर होता है। श्रद्धा के विकास की वैज्ञानिक तकनिक को समझने के लिये हमें भी नचिकेता के साथ यमराज जिनका दूसरा नाम धर्मराज भी है उनके पास जाना होगा। पर पहले अपनी क्षमता का अवलोकन तो कर लें। निमर्मता से अपना नित्य आत्मावलोकन करना प्रारम्भ कर दे। रोज सोन से पहले अपनी क्षमता का आकलन करें। अपनी दिनचर्या का अवलोकन कर पूछे स्वयं से श्रद्धा के जागरण के लिये ‘क्या हम तत्पर है?’

दिसम्बर 20, 2011 Posted by | आलेख | , , | 8 टिप्पणियाँ

   

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