उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

विवेकानन्द और ख्रिसमस


स्वामी विवेकानन्द के जीवन में 25 दिसम्बर का बड़ा ही ऐतिहासिक महत्व है। किन्तु जैसा कि कुछ लोगों द्वारा अतिउत्साह में प्रचारित किया जाता है उसका ख्रिसमस के साथ कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। सहिष्णुता व सर्वपंथसमभाव की स्वामीजी की संकल्पना को ठीक से ना समझने का यह परिणाम है। वर्तमान समय में प्रचलित ‘सेक्युलर’ शब्दावली के अर्थ के सन्दर्भ में स्वामीजी की सद्भावना को रखकर विकृत किया जाता है। स्वामीजी ने कभी भी इस प्रकार की संकल्पना नहीं रखी कि भारतीय संस्कृति के मूल तत्वों के साथ समझौता करने को पंथनिरपेक्षता माना जाय। स्वामीजी तो इसाइयों के बीच में जाकर उनको उनकी सैद्धांतिक व व्यावहारिक तृटियों को स्पष्टतः बताते थे। शिकागो की सर्वधर्मसभा में उन्होंने 20 सितम्बर को स्पष्टतः इसाइयों को चेतावनी दी थी कि भारत में उनके धर्मप्रसार व मतांतरण की कोई आवश्यकता नहीं है। लंदन में बालते हुए उन्होंने यहा तक कहा था कि जितना कीचड़ इसाई मिशनरियों ने हिन्दूओं के विरुद्ध उछाला है उसकी तुलना में तो बंगाल की खाडी के तल से सारा गर्त उठाकर उन पर ड़ाला जाय तो भी कम होगा। इसाई पाद्रियों को दिये गये इस व्याख्यान का विषय था ‘‘ईसा मसीह की ओर लौटों।’’ स्वामीजी के मन में ईसा मसीह की करुणा के प्रति बड़ी श्रद्धा थी।  किन्तु वे स्पष्टतः जानते थे की चर्च ने ईसा के मार्ग को कब का छोड़ दिया है।
प्रत्येक हिन्दू के समान ही उनका विश्वास था कि ईश्वर तक कई मार्गों से जाया जा सकता है। अतः किसी का यह सोचना कि केवल उसका ही सम्प्रदाय मुक्ति का एकमात्र मार्ग है यह अपने आप में स्वीकार्य नहीं था। स्वामीजी ने शिकागो की सभा में दिये समापन भाषण में 27 सितम्बर को स्पष्ट कहा था कि कोई यदि ऐसा विचार करता है तो मै उस पर दया करता हूँ। यह बात सीधे सीधे ग्रंथाधारित, एकांगी, अब्राहमिक पंथों के लिये कही गई थी। इसाई तथा इस्लाम ने इसी गैरविश्वास के कारण अपने संगठित अस्तीत्व के प्रारम्भ से ही सदा धर्मयुद्ध किये है। जिहाद व क्रुसेड़ के कारण ही पुरी पृथ्वी को कई बार लहूलूहान किया गया था। स्वामीजी ने इस बात पर सीधे आलोचना शिकागों में की थी। यह भी स्पष्ट किया था कि पूर्व के पंथ, अर्थात भारतीय मूल के सम्प्रदाय, जिनकी जननी हिन्दूत्व है उनका इतिहास ऐसे किसी रक्तरंजित प्रसार का साक्षी नहीं है। लंदन में ये पूछे जाने पर कि आप भारत को महान कैसे कह सकते हैं जब विश्व इतिहास में आपने कभी किसी पर आक्रमण कर विजय ही नहीं प्राप्त की? क्योंकि पश्चिमी दृष्टि में आक्रमण व विश्वविजय ही महानता का लक्षण है। स्वामीजी ने तपाक से उत्तर दिया यही हमारी महानता है कि हमने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया। भारत से निकला हर संदेश प्रेम व शांति से ही प्रसारित हुआ है। अतः वर्तमान में जब स्वामीजी के बाहर देशों में दिये गये उद्धरणों को संदर्भ से हटाकर हिन्दूओं के लिये कहा जाता है तो वह अर्थहीन हो जाता है।
स्वामीजी के जीवन में 25 दिसम्बर से जुड़ी दो महत्वपूर्ण घटनायें हैं। एक तो 1886 की है जब ठाकूर की समाधि के बाद महत्प्रयास से स्वामीजी ने उनके युवा वैरागी शिष्यों को वराहनगर के एक भूतहा बंगले में एकत्रित किया था। 1886 का वर्ष स्वामीजी के लिये बड़ा ही विपदाओं भरा था। ठाकूर के जाने के बाद उनके युवा शिष्यों को जोड़े रखना एक चुनौति थी। स्वयं की घर की समस्या भी विकराल थी। रामकृष्ण भावधारा के गृहस्थ शिष्य किसी मठ या सन्यासी परम्परा के पक्ष में नहीं थे। अतः उनमें से कुछ का ही सहयोग मिल पाता था। कुछ युवा साथी भी परिवार के दबाव में घर लौट गये थे। उनसे सम्पर्क बनाये रखना कठीन किन्तु आवश्यक था। ठाकुर इन शिष्यों का भार स्वामीजी पर सौंप गये थे। इस काल में नरेन्द्रनाथ ने किस प्रकार संगठन को आकार दिया यह अध्ययन हम सभी कार्यकर्ताओं के लिये अत्यन्त प्रेरक है। कम ही लोग जानते है कि किस प्रकार स्वामीजी एक एक युवा साथी के घर जाकर उसे ठाकुर की याद दिलाया करते थे। कई बार उन मित्रों के घर के लोगों ने और कई बार तो स्वयं उन साथियों ने भी स्वामीजी का अपमान किया था। पर स्वामीजी ड़टें रहे। कहते है किसी साथी के द्वार को वे 3 घण्टे तक खटखटाते रहे बिना किसी संकोच के और इतने अपमानजनक व्यवहार के बाद भी जब द्वार खुला तो ऐसे प्रेम से मिले जैसे विरह के बाद अपने भाई से मिल रहे हो। फिर घण्टों सत्संग चला। ठाकुर की छोटी छोटी बाते, स्नेह और भक्ति के प्रसंगों पर चर्चा हुई। इस सम्पर्क ने उस साथी को गृहस्थी के फेर में जाने से बचा लिया।
ऐसे एक एक हीरे को जोड़कर वराहनगर मठ की स्थापना हुई। ठाकुर के पुष्प वहाँ पूजे गये। और मठ इन युवाओं की साधना स्थली बन गई। 24 दिसंबर 1886 की रात सब युवा आग के चारों ओर बैठर ध्यान कर रहे थे। उस दिन ध्यान कुछ ज्यादा ही गहरा लगा। ध्यान से जागृत होते ही अचानक नरेन्द्र आविष्ट सा वक्तृत्व देने लगा। सब ध्यान पूर्वक सुन रहे थे। ठाकुर के सेवा संन्देश के बारे में बालते बोलते अचानक ईसा का विषया चल पड़ा दीन दुखियों के प्रति करुणा के उनके संदेश का भावपूर्ण वर्णन नरेन्द्र के मुख से निसृत हो रहा था। उन्होंने अपने साथियों का आहवान किया कि जिस तरहा इसा के संदेशवाहको (Aposltles)  ने उनके संदेश को पूनर्जीवित कर विश्व में प्रसारित किया हम भी ठाकूर के जीवन संदेश के वैरागी प्रसारक बन जाये। स्वामीजी के भावपूर्ण वक्तव्य के प्रभाव में सभी साथी उठ खड़े हुए और अग्नि को साक्षी मानकर सन्यास व रामकृष्ण भावधारा के प्रसार की शपथ ग्रहण की बाद में किसी को ध्यान आया कि मध्यरात्री उलट चुकी थी व ख्रिसमस का शुभारम्भ हो चुका था। स्वामीजी व उनके गुरूभाइयों ने सन्यास की विधिवत् दीक्षा बाद मे सम्भवतः जनवरी 1887 के तीसरे सप्ताह में विरजा होम के द्वारा स्वयं का तर्पण कर ली थी। पूरी घटना को अनुसंधानपूर्ण वर्णन विवेकानन्द केन्द्र द्वारा प्रकाशित Comprehensive Biography of Swami Vivekananda में लेखक शैलेन्द्रनाथ धर ने किया है। जो इस आलेख के अन्त में ज्यों का त्यों दिया है।
इस प्रसंग को लेकर कई बार यह कहा जाता है कि स्वामीजी ने ख्रिसमस के दिन सन्यास ग्रहण किया। इस बात को लेकर कई भक्त आज भी इस उत्सव को मनाते है। इस सन्दर्भ में स्वामीजी की भूमिका को स्पष्टतः समझने की आवश्यकता है। अन्यथा हम उनकी ईच्छा के विपरित कार्य करने के दोषी होंगे। आज पूरे देश के विशेषकर जनजातीय पीछड़े क्षेत्र में इसाई मिशनरी ख्रिसमस का उपयोग बड़े प्रमाण में मतांतरण के लिये कर रहे है। यह मतांतरण राष्ट्रविरोधी शक्तियों का पोषण करता है। पूर्वोत्तर के कई अलगाववादी आतंकी संगठनों के साथ ही माओवादी आतंकी भी चर्च का प्रश्रय व सहयोग प्राप्त करते है यह स्पष्ट हो चुका है। ऐसे में स्वामीजी के नाम पर हम भी इस त्योहार को विकृत रुप में सम्बल ना प्रदान करें। 24 दिसंबर 1886 की घटना में स्पष्ट है कि स्वामीजी ख्रिस्त के संदेशवाहकों के उदाहरण से ठाकुर के संदेशवाहक बनने का अपने गुरुभाइयों से आहवान कर रहे थे। संयोग की बात है कि संख्या 12 ही थी। पर संदेश तो ठाकूर का ही देना था। मतांतरण के राष्ट्रविरोधी होने के मामले में स्वामीजी के मन में कोई शंका नहीं थी। शिकागों से लौटने के बाद रामकृष्ण मठ की विधिवत् स्थापना के समय उन्होंने अपने हाथ से जो विनियम लिखे उसमें यह स्पष्टतः अंकित है कि एक हिन्दू का मतांतरित होना केवल एक संख्या का कम होना नहीं है अपितु एक शत्रु का बढ़ना है। हिन्दूओं द्वारा अपने वंचित लोगों की सेवा के लिये मिशन के रुप में काम करने की आवश्यकता को देखते हुए ही उन्होंने मठ के साथ ही रामकृष्ण मिशन नाम से सेवाकार्यों का भी सुत्रपात किया। इसका स्पष्ट उद्देश्य सेवा के नाम पर मतांतरण करनेवाले इसाइयों को व्यावहारिक उत्तर देना ही था।
अतः आज के दिन स्वामी जी के सर्वपंथसमभाव को ठीक ढ़ंग से समझने की आवश्यकता है अन्यथा सेक्यूल्यारिज्म के नाम पर हम सच्चाई से मुख मोड़ने का राष्ट्रद्रोह करते रहेंगे और उसमें स्वामीजी व ठाकूर जैसे महापूरुषों का गलत उदाहरण भी देते रहेंगे।
25 दिसम्बर के साथ जुड़ा दूसरा प्रसंग स्वामीजी के जीवन को दिशा देनेवाला है। कन्याकुमारी की शिलापर उनका राष्ट्रचिंतन इसी दिन प्रारम्भ हुआ था। पूरे देश का परिव्राजक के रुप में भ्रमण करने के बाद तीन दिन व तीन रात्री कन्याकुमारी की श्रीपाद शिलापर उन्होंने ध्यान किया था। उन्होंने बाद में स्वयं अपने गुरुभाईको लिखे पत्र में लिखा है है कि मा भारती के अंतिम छोर पर मुझे मेरे जीवन की कार्ययोजना प्राप्त हुई। उसी स्थान पर आज भव्य विवेकानन्द शिला स्मारक की स्थापना हुई है। स्मारक के प्रणेता माननीय एकनाथजी रानडे कहा करते थे कि स्वामीजी के जीवन में इस शिला का वही महत्व है जो गौतम बुद्ध के जीवन में गया के बोधिवृक्ष का।
इस राष्ट्र चिंतन में स्वामीजी ने भारत के गौरवशाली अतीत, चिंताजनक वर्तमान व स्वर्णीम भविष्य का साक्षत्कार किया था। हम भी इस पर्व के स्मरण में इसी क्रम में भारत को समझने का प्रयत्न करें उस पर चिन्तन करें।

Comprehensive Biography of Swami Vivekananda By S N Dhar

Volume I- Page 285-288

In suitable atmosphere and association, the light of the youngmen’s combined spiritual fire “blazed into a tremendous conflagration”. During their stay here, Narendranath constantly told them, “Godrealization is the one and only aim of life. That is what the Master had told us”. Sri Ramakrishna’s name was always on their lips. The whole place thus became surcharged with the spirit of renunciation. All this found expression one night, 24th December, 1886, as they sat under the canopy of a starlit wintry sky in the compound of the house before the fire of huge logs. The meditation lasted long. Then Narendranath suddenly broke the silence with a narration of the wonderful story of the life of Jesus. Through his eloquence his listeners were next admitted into that apostolic world in which Paul had preached the gospel of the Arisen Christ and spread Christianity far and wide. In an inspired voice he exhorted them to be apostles themselves to carry abroad the new message for the uplift and salvation of mankind, till they all rose up in a body, with the blazing fire in front and shining stars above as their witnesses, to pledge themselves to a life of renunciation. At the end of it all, they recollected that it was Christmas Eve. The very air seemed to vibrate with their ecstatic fervour. Antpur proved to be the spark that detonated the spirit of renunciation. There was no longer to be want of young men who would follow their example.

After they had thus solemnly resolved to live a life of renunciation, it was only natural that they should think of initiating themselves as monks by the performance of sastric rites. Narendranath consulted his gurubhais on the subject and was overjoyed when he learned from Kali that he knew all about Viraja Homa, which was the particular rite that had to be performed for initiation. Kali explained that once during their stay at Cossipore he had set out for Barabar Hill near Gaya with a view to meeting a Hathayogi about whom he had learned from Vijayakrishna Goswami. While staying at a dharmasala in a village situated at the foot of the hill, said he, he had chanced to meet a Dasanama sannyasi who was a Puri and who had with him a book containing the mantras, etc., of Viraja Homa, He had carefully copied them out in a notebook which was still with him. All of them gladly agreeing to the idea, a day was fixed for the ceremony, which was performed duly. Kali, acting as tantradharaka at the bidding of Narendranath, read out the mantras, which the others recited while they offered the oblations to the sacred fire. (At the Viraja Homa, the wouldbe sannyasis offer pindas or oblations to themselves as persons performing the sraddha rite do to the manes of dead relations. They discard caste insignia, such as the sacrificial thread for the Brahmins, and for all practical purposes thereafter are dead to the world). The first to perform the Homa was Narendranath and he was followed in order by Rakhal, Niranjan, Sarat, Sasi, Sarada, Latu and others. Tarak refused to perform the Homa, though pressed very much to do so. He did it later. After all had finished performing the Homa Kali recited the mantras and offered oblations to the sacred fire and was thus initiated. The ceremony was performed, according to Swami Abhedananda, in the early days of the month of Magha, 1293 B.S., which correspond with the third week of January, 1887.

The sannyasis assumed new names, Narendranath taking the name Vividishananda and giving his gurubhais the names which were suggested by their respective natures, such as Brahmananda, Premananda, Ramakrishananda, Saradananda, etc., He gave Kali the name Abhedananda, because he was a staunch Vedantin, Sasi the name Ramakrishnananda, because he spent nearly all his time in the worship of the Master, and Latu the name Adbhutananda because his spirit of renunciation and tapasyas were really adbhuta (unique). The monks henceforth used their new names, except Narendranath, who perhaps did not use a monastic name because the lawsuit was going on, and a change of name, or even his acceptance of sannyasa might create legal difficulties, that might help his adversaries. Even after the lawsuit had ended in 1889, however, he rarely used a monastic name, or stuck to one, (sometimes calling himself  Sachchidananda), and it was not till the very eve of his departure for the West in 1893 that he publicly called himself by his worldfamous name, Vivekananda. We shall discuss the subject later on. A list of the new names is found in a letter from Swami Sivananda (signed Sivananda) to Gangadhar on 4 January 1890.

The names are as follows:

Niranjan — Swami Niranjanananda

Jogin — Swami Yogananda

Baburam — Swami Premananda

Latu — Swami Adbhutananda

Sasi — Swami Ramakrishnananda

Hari — Swami Turiyananda

Tulasi — Swami Nirmalananda

Daksha — Swami Jnanananda

Kali — Swami Abhedananda

Gopal Senior — Swami Advaitananda

The names of the sannyasis not mentioned in Swami Sivananda’s list are as follows:

Rakhal — Swami Brahmananda

Sarat — Swami Saradananda

Sarada — Swami Trigunatitananda

(later shortened, at Swami Vivekananda’s request, to Swami Trigunatita)

Subodh — Swami Subodhananda

Gangadhar, who was on his trip to Tibet and was not present at the Viraja Homa spoken of above, was initiated into sannyasa by Narendranath and given the name of Swami Akhandananda after his return to the monastery in the first week of July 1890. The list of Sri Ramakrishna’s direct disciples taking the monastic vow is completed with Hariprasanna, who joined much later, after Swami Vivekananda’s return from America, assuming the name Swami Vijnanananda. It may be noted that Swami Sivananda’s list contains a new name, Daksha, who joined the Baranagore Math in 1887, and being very devoted to Narendranath, came to be recognized as one of the circle of devotees. Curiously enough, it does not mention Narendranath.

You can buy the book here http://eshop.vivekanandakendra.org/books/Comparehensive-Biography-of-Swami-Vivekananda

दिसम्बर 25, 2011 - Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी, English Posts | ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. bahut prernadayi….. Dhanyavad

    टिप्पणी द्वारा Deepesh | दिसम्बर 25, 2011 | प्रतिक्रिया

  2. subah se hi aise lekh ki talash thi, ab jakar shanti mili .. dhanyavaad bhaiya !

    टिप्पणी द्वारा abhishek | दिसम्बर 25, 2011 | प्रतिक्रिया

  3. bahut hi achchha likha h

    टिप्पणी द्वारा nitin | दिसम्बर 26, 2011 | प्रतिक्रिया

  4. Thank you for writing this article. Swami’s realization on Dec 25 is good example of काकतालिय न्याय.

    टिप्पणी द्वारा Nisarg | दिसम्बर 26, 2011 | प्रतिक्रिया

  5. Atyant hi shikshaprad evam eye opener

    टिप्पणी द्वारा Dhirendra Chaturvedi | दिसम्बर 27, 2011 | प्रतिक्रिया

  6. 25 december swamiji k jivan me aur
    hamaren jivan me bhi kis karan mahatva ka h,samajh me aaya…………

    aur esi din se swamiji ne samarth bharat k nirman hetu vision dekhna shuru kia
    dhanyosmi……..!

    टिप्पणी द्वारा amit kumar | दिसम्बर 28, 2011 | प्रतिक्रिया


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