उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

गण संस्कृति यज्ञ संस्कृति


‘‘हम भारतवासी, पूरी गंभीरता से भारत को एक सार्वभौम, लोकतान्त्रिक गणराज्य के रुप में संगठित करने का संकल्प करते है।’’ भारत के संविधान की मूल प्रस्तावना की यह प्रारम्भिक पंक्तियाँ  हैं। 1975 में पूरे देश में आपात्काल थोपकर संविधान की हत्या करनेवाले 42 वे संविधान संशोधन में इसमें सार्वभौम के बाद पंथनिरपेक्ष तथा समाजवादी ये दो विशेषण और जोड़े गये। संविधान की मूल प्रकृति तथा प्रावधान में किसी भी प्रकार के संशोधन के बिना ही उसके उद्देश्य में दो अनावश्यक संकल्पनाओं की पूछ जोड़ दी गई। चुनावी मजबुरियों के नाम पर इन को पुनः संशोधित करने का साहस कोई भी राजनैतिक दल आजतक नही दिखा पा रहा है। आपात्काल के बाद स्थापित जनता सरकार ने 44 वें संविधान संशोधन से 42 वें संशोधन द्वारा जनता मौलिक अधिकारों को स्थगित करनेवाले सभी प्रावधानों को तो निरस्त कर पूर्ववत् कर दिया किन्तु प्रस्तावना में की गई छेड़छाड़ को वैसे ही रखा। इन विशेषणों के जुड़ने के कारण ही आज हम राजनैतिक दलों को तुष्टिकरण की नित नई सीमाओं को लांघते हुए देखते है। सहिष्णुता का दायरा सीमटता जा रहा है और कट्टरता बढ़ती ही जा रही है।

इन विषयों पर चिंतन करना इसलिये आवश्यक है क्योंकि इन बातों से गणतन्त्र की नीव पर ही आघात हो रहे है। गणराज्य का आधार हे गण। गण अर्थात एकमन से कार्य करने वाला समूह। प्रबन्धन के क्षेत्र में आजकल अत्यधिक प्रचलित अंगरेजी शब्द है टीम। इसकी परिभाषा की जाती है, ‘‘एक कार्य के लिये गठित, एकलक्ष्यगामी दल’’। यह तात्कालिक होता है कार्य की अवधि तक के लिये कार्य की पूर्णता का लक्ष्य लेकर यह कार्य करता है। ‘गण’ की संकल्पना अधिक गहरी है। अंगरेजी में उपयुक्त Republic शब्द से भी बहुत गहरी। गण एक पारम्पारिक पारिभाषिक शब्द है। इसके राजनीति शास्त्र के उपयोग से भी पूर्व इसका आध्यात्मिक प्रयोग है। हमारी परम्परा में पूजा का पहला अधिकार गणेश जी का हैं जो गणों के ईश, गणनायक हैं। केवल शिवजी के गणों का नायक होने के कारण ही वे गण पति नहीं है। मानव का मानव से सम्बन्ध स्थापित करने की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया ‘गण’ के वे अधिपति है। मै से हम की ओर जाने की प्रक्रिया है गण।  और इस प्रक्रिया के लिए लिए आवश्यक साधना के अधिपति गणपति|
भारतीय आध्यात्म विद्या में आगम व निगम की दोनों विधियो की मान्यता है। निगम विधि में जहाँ  स्वयं को नकारकर शुन्य बना दिया जाता है|  नेति नेति की विधि से अहंकार को शुन्य कर शिवत्व से एकत्व की प्रक्रिया बतायी गई है। वही आगम विधि में अपने क्षुद्र अहं को विस्तारित कर सर्वव्यापि करने की प्रक्रिया द्वारा विराट से एकाकार होने की प्रक्रिया भी आध्यात्मिक साधना है। इस विधि में अपने व्यक्तिगत मै को सामूहिक मै के साथ क्रमशः एकाकार करते हुए स्वयं के स्वत्वबोध का विकास किया जाता है। यही अखण्डमण्डल की साधना है जो चराचर में व्याप्त ईश्वर का साक्षत्कार करवाती है। यह गण साधना है। मै को समूह में विसर्जित करने की साधना। गण के अंग का कोई व्यक्तिगत अस्तीत्व ही नहीं रह जाता है वह अपने गण परिचय से एकाकार हो बड़ी इकाई के रक्षार्थ अपने आप को समर्पित कर देता है।

‘गण’ गठन की प्रक्रिया व्यक्ति की साधना के साथ ही समूह की भी साधना है। भारत में सामूहिक साधना का ही विशेष महत्व रहा है। हमारे सारे वेद मन्त्र बहुवचन में प्रार्थना करते है। अहं का नहीं वयं का प्रयोग किया जाता है। मन, वचन, कर्म में सामूहिकता की प्रार्थना बार बार की गई है। हम एक मन से एक संकल्प के साथ एक दिशा में अग्रेसर होते हुये साथसाथ उत्कर्ष व कल्याण को प्राप्त करें। यह हिन्दूओं की सनातन वैश्विक प्रार्थना है। इस बात को हमने केवल दर्शन के सिद्धान्तों तक ही सीमित नहीं रखा अपितु कर्म, अथवा आचार की परम्परा में ढ़ालकर उसे जीवन का नियमित अंग बना दिया। यह भारतीय जीवन दर्शन की विशेषता है। प्रत्येक तत्व का कर्मकाण्ड के रुप में सघनीकृत संस्थापन (Concrete  Institutionalization ) किया गया। यही अनेक आक्रमणों के बाद भी हमारे जीवित रहने का महत्वपूर्ण रहस्य है। जीवन के प्रत्येक अंग में इस ‘गण’ संकल्पना को साकार किया गया। परिवार, वर्ण, ग्राम, नगर, जनपद तथा राष्ट्र इन सभी स्तरोंपर गणों के गठन की विधि को हमने सदियों से विकसित किया है। धार्मिक, औपासनिक परम्पराओं के साथ ही सामाजिक, आर्थिक व राजनयिक व्यवस्थाओं में गणों का विकास हिन्दूओं ने प्राचीनतम काल से किया है।

यह देश का दुभाग्य ही है कि स्वतन्त्रता के बाद हमारे इन प्रचण्ड ऐतिहासिक अनुभूतियों को पूर्णतः दुर्लक्षित कर हमने विदेशी विचारों पर आधरित व्यवस्था को अपनाया। इतना ही नहीं सेक्यूलर के नाम पर अपनी सभी प्राचीन परम्पराओं को प्रभावी रुप से नकारने का काम किया। परिणामतः परिभाषा में गणराज्य होते हुए भी सामूहिक चेतना के विकास के स्थान पर हमने विखण्डित गुटों की राजनैतिक चेतना का विकास किया। पंथ, प्रांत, भाषा तथा जाति जैसी सामूहिक चेतना व्यक्ति के विस्तार का माध्यम बनने के स्थान पर हमारी प्रचलित राजनैतिक व्यवस्था में यह सभी परिचय विघटन का कारण बनते जा रहे है। समाज में धार्मिक स्तर पर आज भी जीवित ‘गण’ संकल्पना को ठीक से समझकर उसे व्यवस्थागत रुप प्रदान करना वर्तमान भारत की सबसे बड़ी चुनोति है।

गण के गठन के शास्त्र को हम समझने का प्रयत्न करते है तो हम पाते है कि इसका भावात्मक आधार ‘त्याग’ में है। त्याग से ही व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज व समाज से राष्ट्र के स्तर पर स्वत्वबोध का विस्तार सम्भव है। त्याग का संस्थागत स्वरुप हे यज्ञ। यज्ञ के द्वारा हम सहजता से त्याग को परम्परा के रुप में ढ़ाल पाये है। आज भी हमारे घरों में गाय के लिये गोग्रास, तुलसी को पानी देने जैसी परम्पराओं का प्रयत्नपूर्वक पालन किया जाता है। अतिथि भोजन जैसे भूतयज्ञ द्वारा समाज को आपस में बांध रखा था। अतः यज्ञ को समझने से ही गण के गठन का कार्य किया जा सकता है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते है कि यज्ञ के द्वारा ही प्रजा का सृजन कर प्रजापति ने लोगों को कहा कि यह यज्ञ ही आपकी कामधेनु है जिसके द्वारा आप अपनी सभी ईच्छाओं की पूर्ति कर सकते हो। सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वम् एष्वोSस्विष्टकामधुक्।।गी 3.10।। अगले दो श्लोंकों में यज्ञ के द्वारा त्याग से कैसे परस्पर सामंजस्य बनाकर समुत्कर्ष की प्राप्ति हो सकती है इसका वर्णन है। देवान्भवयतानेन ते देवा भवयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्सथ।। गी 3.11।। यह भी कहा है कि बिना यज्ञ में हवि दिये अर्थात समाज, सृष्टि में अपने योगदान की श्रद्धापूर्वक आहुति दिये बिना जो भोग करता है वह तो चोर है। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभावितः। तैर्दत्तान प्रदायेभ्यो यो भुन्क्ते स्तेन एव सः।। गी 3.12।। आजके समस्त भ्रष्टाचारी इसी श्रेणी में आते है। यह श्लोक तो इन पापियों के लिये और भी कठोर शब्दावली का प्रयोग करता है। यज्ञ के प्रसाद के रुप में भोग करनेवाले लोग सर्व पापों से मुक्त हो जाते है वहीँ जो केवल अपने स्वार्थ के लिये ही भोग करते है वे तो पाप को ही खा रहे होते है।

यज्ञ अपने निर्माण में सबके योगदान को अधोरेखित कर अपने कर्म में उसके प्रति कृतज्ञता का व्यवहार लाने का संस्कार देता है। अतः यज्ञ के द्वारा ही गण का गठन सम्भव है। आज हमें पुनः यज्ञ संस्कारों के जागरण के द्वारा गण संस्कृति की पुनस्थार्पना करने की आवश्यकता है। इसीसे वास्तव में हमारे संविधान का ध्येय गणतन्त्र साकार हो सकेगा। संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्तव्यों की भी बात की है| भारतीय संस्कृति में सदा कर्त्तव्य को ही महत्त्व दिया गया है| अधिकार को उसके अप्रिनाम के रूप में ही देखा गया| यज्ञ का व्यवहारिक रूप कर्त्तव्य में ही प्रगट होता है| स्वाहः का मंत्र अपने कर्तव्यों की आहुति का परिचायक है| किन्तु भारतीय संस्कृति के स्थान पर विदेशी राज के प्रभाव में बने होने के कारण हमारे संविधान में मौलिक अधिकार तो न्यायलय में कार्यान्वित किये गए है किन्तु मौलिक कर्तव्यों का स्वरुप मात्र सुझावात्मक रखा गया है| इनकी अवहेलना को किसी न्यायलय में चुनौती नहीं दी जा सकती| यह हमारी विडम्बना है|

गण संकल्पना पर आधारित व्यवस्थाओ के निर्माण के लिये यज्ञ को और अधिक विस्तार से समझने की आवश्यकता है। इस गणतन्त्र दिवस के अवसर पर हम गणत्व को जीवन में उतारने के लिये यज्ञ को समझाने व जीवन में उतारने का संकल्प ग्रहण करें।

जनवरी 26, 2012 Posted by | योग, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

Constitutional Introspection on Republic Day


”We, the people of India that is Bharat, having solemnly resolved to constitute India into a sovereign, democratic republic. …” the preamble of Indian Constitution began like this on 26th of Nov 1949 when the draft was finalized and enacted and then adopted on the 26th January 1950 which we all celebrate every year as Republic Day. It has undergone 115 amendments in last 62 years. But otherwise it has stood the test of time by surviving in the unique challenges posed by the largest and certainly most complex democracies of the world today. The most controversial of these amendments was the 42nd amendment which ushered in the darkest periods of our recent history called, Emergency. The other sibling of the midnight delivery had seen much more turbulence and a large measure of Marshall Law. The notorious neighbour has spent more years in autocracy than in democracy in its fragile existence. 2 years of emergency is the Indian experience of the political autocracy. This very amendment which suspended all the fundamental rights guaranteed by the constitution also altered the basic nature of the constitution by strangely amending its preamble to add two more adjectives, namely socialist and secular.


India after 25 years of its constitution as a republic was now a sovereign, Socialist, Secular, Democratic Republic. Nothing was changed in the main body of the constitution to match these adjectives. The other portions of the 42nd amendments were to give the autocratic power to the executive by suspending the fundamental rights of the citizens. This act in itself was neither socialist nor secular. Thus logically the amendment accepted that the constitution in its originality was secular and socialist enough that it did not need any modification to suit the additions in preamble. The funniest part of this exercise is that after the end of Indira Rule and Janta Party coming in power the emergency provisions were removed from the constitution by the 44th amendment but the additions to the preamble were left untouched. Thus endorsing the enhanced emphasis on the socialist and secular nature of the constitution.

Though there are no changes in the original provisions, in practice secularism is being unnecessarily pronounced in all the governmental actions. The political parties for their petty electoral benefit tend to appeasement of so called minorities in the name of secularism. Secularism is used to denigrate everything traditional and Hindu in origin. The famous instance of the controversy over Saraswati Puja in the convention of education ministers during the NDA rule started by the objection raised by a few politicians. The issue was raised under the garb of secularism. Media gave great publicity to the issue. No one bothered to check the constitutionality of the claim. Recently the issue of Ayud Puja and Sarasavati Puja was raised before the Madras high court in a PIL. The high court has rejected the contention that performing Puja in the offices is against the secular nature of the government. “Showing respect to the place of work and the objects of work will in no way offend the feelings of others or affect secularism. Ayudha Puja is referable to prayer, reverence or respect given to objects through which an individual performs his profession or occupation. Ayudha Puja in its real terms transcends all religion,” a division bench of Justice R Sudhakar and Justice Aruna Jagadeesan has said. This should make the constitutional position clear on the issue. The practice of the media and intellectuals is very pathetic on this issue as it was well demonstrated by the Jaipur Lit fare issue. Even though on his very channel every representative of Islam from Lakhnau to Hyderabad was vociferously demanding that Sulman Rushdie should not be allowed to come to India, the star anchor Arnab Goswami kept on saying fringe elements of the Muslim society are opposed. This is the way the faulty concept of secularism corroborated by another unfounded concept of minority has developed into a divisive element in the constitutional discourse.

Socialism is very hard to define. But it can be said without slightest of doubt that the Indian state in last two decades has abandoned socialism as an economic policy. From 1991 we claim to have tried to follow the liberal free market economics. But according to the constitution India is still a Socialist Republic.

On the occasion of the 63rd Republic day we must introspect on the functioning of our constitution in the present scenario. We need not go far for the parameters on which to do the self evaluation. The preamble of the constitution puts forth the goals to be achieved by the independent Indian Republic. It proclaims ”…. and to secure to all its citizens: JUSTICE, social, economic and political; LIBERTY of thought, expression, belief, faith and worship; EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;”

After 6 decades it definitely is a time to evaluate the performance of constitutional framework in light of the goals it had set before itself. Justice, Liberty, Equality and Fraternity are the lofty ideas we had kept before us to put them in practice by implementing the provisions of the Constitution. It demands a detailed study of all the parameters and an objective comparison with the bottom-line from where we started. We would definitely try to do some such attempts in the coming months with the available data from the open sources. But even without the benefit of such detailed statistical study one can say without any fear of serious opposition from any quarter of the civil society or even the government, that we have not been successful to ensure any of these lofty ideals to all our citizens. In fact we will hardly find any section of the society satisfied enough to concede that all these constitutional promises have been fulfilled.

This total despondency should not be taken lightly. A large number of citizens are totally dissatisfied. Many of them have given up hope of any change. Some have taken extreme measures falling pray to the devious design of the antinational forces in their desperation. The spreading Red terror and other separatist movements in many parts of the country are the result of this desperation and hopelessness. The more civil of the disappointed citizenry have also taken up to the democratic form of protests. The number of protests and the response they yielded last year is an eye-opener for the patriots in the country. It is not a good sign that the educated, well off middle class urban population has lost faith in the political and constitutional mechanism for change in the system and in this cynical desperation are ready to come to the streets and demonstrate their anger and cry for reform. This depicts the total failure of governance. The loss of faith of the population in the government’s conflict redressal mechanism is the most dangerous bane of Democracy.

In this background it is urgent that we take stock of things as they stand. We must be ready to face that we need basic change of approach. The system based on the colonial experience has worked fine for these 6 decades. But the whole paradigm within the country and at the Global level has changed. In 1950 we were a nation trying to rebuild on the ruins of the colonial Raj. The economic situation was pathetic. The confidence level of the masses individually and collectively was not very high. It was time for survival and reconstruction. But today the Global leaders are falling on the economic front. India is being seen as an upcoming power at economic and geopolitical level by the whole world. The most discouraging analysts put us as a regional power and more optimistic claim that India has a Global role to play. More importantly the youth has a confidence that they can achieve anything in India. Whatever is possible in any other part of the world is achievable by us. We have shown it practically in the fields of science and technology, communications, finances, space technology and many more. The national belief in its capacity is not reflected in the state machinery. The government does not exude this confidence shown by the society. The policies framed by the government still smack of the stink of olden days of begging and struggle for survival. This psychological dichotomy between the state and the nation is the cause of all the cynical despondency. The state has to come up to the level and expectations of the awakened India.

This strange mixture of strength and vulnerability is the reality of Indian Republic on the eve of its 63rd Republic day celebration. We need to have a fresh constitutional structure to meet this unique situation in the Indian History. This is a very important window of opportunity for the great and the most ancient nation of the whole world. This is the moment when the destiny of not only 1/6th of the world’s population but the whole world will be decided. We need gear ourselves up for the occasion. The first important step can be constitutional review. In fact it should be afresh constitutional drafting exercise. This time we must take the vast and deep Historical and philosophical experience of Bharat in to account. The constitution must be indigenous. Based in the cultural ethos of the people of Bharat.

We, the people of Bharat must come together to give unto ourselves a real Bharatiya Constitution. Let this be our resolve this Republic Day.

जनवरी 25, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

115 Years of Swamiji’s address at Ramnad


REPLY TO THE ADDRESS OF WELCOME AT RAMNAD

RAMNAD, 25th January, 1897.

The longest night seems to be passing away, the sorest trouble seems to be coming to an end at last, the seeming corpse appears to be awaking and a voice is coming to us — away back where history and even tradition fails to peep into the gloom of the past, coming down from there, reflected as it were from peak to peak of the infinite Himalaya of knowledge, and of love, and of work, India, this motherland of ours — a voice is coming unto us, gentle, firm, and yet unmistakable in its utterances, and is gaining volume as days pass by, and behold, the sleeper is awakening! Like a breeze from the Himalayas, it is bringing life into the almost dead bones and muscles, the lethargy is passing away, and only the blind cannot see, or the perverted will not see, that she is awakening, this motherland of ours, from her deep long sleep. None can desist her any more; never is she going to sleep any more; no outward powers can hold her back any more; for the infinite giant is rising to her feet.


Your Highness and gentlemen of Ramnad, accept my heartfelt thanks for the cordiality and kindness with which you have received me. I feel that you are cordial and kind, for heart speaks unto heart better than any language of the mouth; spirit speaks unto spirit in silence, and yet in most unmistakable language, and I feel it in my heart of hearts. Your Highness of Ramnad, if there has been any work done by my humble self in the cause of our religion and our motherland in the Western countries, if any little work has been done in rousing the sympathies of our own people by drawing their attention to the inestimable jewels that, they know not, are lying deep buried about their own home — if, instead of dying of thirst and drinking dirty ditch water elsewhere out of the blindness of ignorance, they are being called to go and drink from the eternal fountain which is flowing perennially by their own home — if anything has been done to rouse our people towards action, to make them understand that in everything, religion and religion alone is the life of India, and when that goes India will die, in spite of politics, in spite of social reforms, in spite of Kubera’s wealth poured upon the head of every one of her children — if anything has been done towards this end, India and every country where any work has been done owe much of it to you, Raja of Ramnad. For it was you who gave me the idea first, and it was you who persistently urged me on towards the work. You, as it were, intuitively understood what was going to be, and took me by the hand, helped me all along, and have never ceased to encourage me. Well is it, therefore, that you should be the first to rejoice at my success, and meet it is that I should first land in your territory on my return to India.

Great works are to be done, wonderful powers have to be worked out, we have to teach other nations many things, as has been said already by your Highness. This is the motherland of philosophy, of spirituality, and of ethics, of sweetness, gentleness, and love. These still exist, and my experience of the world leads me to stand on firm ground and make the bold statement that India is still the first and foremost of all the nations of the world in these respects. Look at this little phenomenon. There have been immense political changes within the last four or five years. Gigantic organizations undertaking to subvert the whole of existing institutions in different countries and meeting with a certain amount of success have been working all over the Western world. Ask our people if they have heard anything about them. They have heard not a word about them. But that there was a Parliament of Religions in Chicago, and that there was a Sannyasin sent over from India to that Parliament, and that he was very well received and since that time has been working in the West, the poorest beggar has known. I have heard it said that our masses are dense, that they do not want any education, and that they do not care for any information. I had at one time a foolish leaning towards that opinion myself, but I find experience is a far more glorious teacher than any amount of speculation, or any amount of books written by globe-trotters and hasty observers. This experience teaches me that they are not dense, that they are not slow, that they are as eager and thirsty for information as any race under the sun; but then each nation has its own part to play, and naturally, each nation has its own peculiarity and individuality with which it is born. Each represents, as it were, one peculiar note in this harmony of nations, and this is its very life, its vitality. In it is the backbone, the foundation, and the bed-rock of the national life, and here in this blessed land, the foundation, the backbone, the life-centre is religion and religion alone. Let others talk of politics, of the glory of acquisition of immense wealth poured in by trade, of the power and spread of commercialism, of the glorious fountain of physical liberty; but these the Hindu mind does not understand and does not want to understand. Touch him on spirituality, on religion, on God, on the soul, on the Infinite, on spiritual freedom, and I assure you, the lowest peasant in India is better informed on these subjects than many a so-called philosopher in other lands. I have said, gentlemen, that we have yet something to teach to the world. This is the very reason, the raison d’être, that this nation has lived on, in spite of hundreds of years of persecution, in spite of nearly a thousand year of foreign rule and foreign oppression. This nation still lives; the raison d’être is it still holds to God, to the treasure-house of religion and spirituality.

In this land are, still, religion and spirituality, the fountains which will have to overflow and flood the world to bring in new life and new vitality to the Western and other nations, which are now almost borne down, half-killed, and degraded by political ambitions and social scheming. From out of many voices, consonant and dissentient, from out of the medley of sounds filling the Indian atmosphere, rises up supreme, striking, and full, one note, and that is renunciation. Give up! That is the watchword of the Indian religions. This world is a delusion of two days. The present life is of five minutes. Beyond is the Infinite, beyond this world of delusion; let us seek that. This continent is illumined with brave and gigantic minds and intelligences which even think of this so called infinite universe as only a mud-puddle; beyond and still beyond they go. Time, even infinite time, is to them but non-existence. Beyond and beyond time they go. Space is nothing to them; beyond that they want to go, and this going beyond the phenomenal is the very soul of religion. The characteristic of my nation is this transcendentalism, this struggle to go beyond, this daring to tear the veil off the face of nature and have at any risk, at any price, a glimpse of the beyond. That is our ideal, but of course all the people in a country cannot give up entirely. Do you want to enthuse them, then here is the way to do so. Your talks of politics, of social regeneration, your talks of money-making and commercialism — all these will roll off like water from a duck’s back. This spirituality, then, is what you have to teach the world. Have we to learn anything else, have we to learn anything from the world? We have, perhaps, to gain a little in material knowledge, in the power of organisation, in the ability to handle powers, organising powers, in bringing the best results out of the smallest of causes. This perhaps to a certain extent we may learn from the West. But if any one preaches in India the ideal of eating and drinking and making merry, if any one wants to apotheosise the material world into a God, that man is a liar; he has no place in this holy land, the Indian mind does not want to listen to him. Ay, in spite of the sparkle and glitter of Western civilisation, in spite of all its polish and its marvellous manifestation of power, standing upon this platform, I tell them to their face that it is all vain. It is vanity of vanities. God alone lives. The soul alone lives. Spirituality alone lives. Hold on to that.

Yet, perhaps, some sort of materialism, toned down to our own requirements, would be a blessing to many of our brothers who are not yet ripe for the highest truths. This is the mistake made in every country and in every society, and it is a greatly regrettable thing that in India, where it was always understood, the same mistake of forcing the highest truths on people who are not ready for them has been made of late. My method need not be yours. The Sannyasin, as you all know, is the ideal of the Hindu’s life, and every one by our Shâstras is compelled to give up. Every Hindu who has tasted the fruits of this world must give up in the latter part of his life, and he who does not is not a Hindu and has no more right to call himself a Hindu. We know that this is the ideal — to give up after seeing and experiencing the vanity of things. Having found out that the heart of the material world is a mere hollow, containing only ashes, give it up and go back. The mind is circling forward, as it were, towards the senses, and that mind has to circle backwards; the Pravritti has to stop and the Nivritti has to begin. That is the ideal. But that ideal can only be realised after a certain amount of experience. We cannot teach the child the truth of renunciation; the child is a born optimist; his whole life is in his senses; his whole life is one mass of sense-enjoyment. So there are childlike men in every society who require a certain amount of experience, of enjoyment, to see through the vanity of it, and then renunciation will come to them. There has been ample provision made for them in our Books; but unfortunately, in later times, there has been a tendency to bind every one down by the same laws as those by which the Sannyasin is bound, and that is a great mistake. But for that a good deal of the poverty and the misery that you see in India need not have been. A poor man’s life is hemmed in and bound down by tremendous spiritual and ethical laws for which he has no use. Hands off! Let the poor fellow enjoy himself a little, and then he will raise himself up, and renunciation will come to him of itself. Perhaps in this line, we can be taught something by the Western people; but we must be very cautious in learning these things. I am sorry to say that most of the examples one meets nowadays of men who have imbibed the Western ideas are more or less failures.

There are two great obstacles on our path in India, the Scylla of old orthodoxy and the Charybdis of modern European civilisation. Of these two, I vote for the old orthodoxy, and not for the Europeanised system; for the old orthodox man may be ignorant, he may be crude, but he is a man, he has a faith, he has strength, he stands on his own feet; while the Europeanised man has no backbone, he is a mass of heterogeneous ideas picked up at random from every source — and these ideas are unassimilated, undigested, unharmonised. He does not stand on his own feet, and his head is turning round and round. Where is the motive power of his work? — in a few patronizing pats from the English people. His schemes of reforms, his vehement vituperations against the evils of certain social customs, have, as the mainspring, some European patronage. Why are some of our customs called evils? Because the Europeans say so. That is about the reason he gives. I would not submit to that. Stand and die in your own strength, if there is any sin in the world, it is weakness; avoid all weakness, for weakness is sin, weakness is death. These unbalanced creatures are not yet formed into distinct personalities; what are we to call them – men, women, or animals? While those old orthodox people were staunch and were men. There are still some excellent examples, and the one I want to present before you now is your Raja of Ramnad. Here you have a man than whom there is no more zealous a Hindu throughout the length and breadth of this land; here you have a prince than whom there is no prince in this land better informed in all affairs, both oriental and occidental, who takes from every nation whatever he can that is good. “Learn good knowledge with all devotion from the lowest caste. Learn the way to freedom, even if it comes from a Pariah, by serving him. If a woman is a jewel, take her in marriage even if she comes from a low family of the lowest caste.” Such is the law laid down by our great and peerless legislator, the divine Manu. This is true. Stand on your own feet, and assimilate what you can; learn from every nation, take what is of use to you. But remember that as Hindus everything else must be subordinated to our own national ideals. Each man has a mission in life, which is the result of all his infinite past Karma. Each of you was born with a splendid heritage, which is the whole of the infinite past life of your glorious nation. Millions of your ancestors are watching, as it were, every action of yours, so be alert. And what is the mission with which every Hindu child is born? Have you not read the proud declaration of Manu regarding the Brahmin where he says that the birth of the Brahmin is “for the protection of the treasury of religion”? I should say that that is the mission not only of the Brahmin, but of every child, whether boy or girl, who is born in this blessed land “for the protection of the treasury of religion”. And every other problem in life must be subordinated to that one principal theme. That is also the law of harmony in music. There may be a nation whose theme of life is political supremacy; religion and everything else must become subordinate to that one great theme of its life. But here is another nation whose great theme of life is spirituality and renunciation, whose one watchword is that this world is all vanity and a delusion of three days, and everything else, whether science or knowledge, enjoyment or powers, wealth, name, or fame, must be subordinated to that one theme. The secret of a true Hindu’s character lies in the subordination of his knowledge of European sciences and learning, of his wealth, position, and name, to that one principal theme which is inborn in every Hindu child — the spirituality and purity of the race. Therefore between these two, the case of the orthodox man who has the whole of that life-spring of the race, spirituality, and the other man whose hands are full of Western imitation jewels but has no hold on the life-giving principle, spirituality — of these, I do not doubt that every one here will agree that we should choose the first, the orthodox, because there is some hope in him — he has the national theme, something to hold to; so he will live, but the other will die. Just as in the case of individuals, if the principle of life is undisturbed, if the principal function of that individual life is present, any injuries received as regards other functions are not serious, do not kill the individual, so, as long as this principal function of our life is not disturbed, nothing can destroy our nation. But mark you, if you give up that spirituality, leaving it aside to go after the materialising civilisation of the West, the result will be that in three generations you will be an extinct race; because the backbone of the nation will be broken, the foundation upon which the national edifice has been built will be undermined, and the result will be annihilation all round.

Therefore, my friends, the way out is that first and foremost we must keep a firm hold on spirituality — that inestimable gift handed down to us by our ancient forefathers. Did you ever hear of a country where the greatest kings tried to trace their descent not to kings, not to robber-barons living in old castles who plundered poor travellers, but to semi-naked sages who lived in the forest? Did you ever hear of such a land? This is the land. In other countries great priests try to trace their descent to some king, but here the greatest kings would trace their descent to some ancient priest. Therefore, whether you believe in spirituality or not, for the sake of the national life, you have to get a hold on spirituality and keep to it. Then stretch the other hand out and gain all you can from other races, but everything must be subordinated to that one ideal of life; and out of that a wonderful, glorious, future India will come — I am sure it is coming — a greater India than ever was. Sages will spring up greater than all the ancient sages; and your ancestors will not only be satisfied, but I am sure, they will be proud from their positions in other worlds to look down upon their descendants, so glorious, and so great.

Let us all work hard, my brethren; this is no time for sleep. On our work depends the coming of the India of the future. She is there ready waiting. She is only sleeping. Arise and awake and see her seated here on her eternal throne, rejuvenated, more glorious than she ever was — this motherland of ours. The idea of God was nowhere else ever so fully developed as in this motherland of ours, for the same idea of God never existed anywhere else. Perhaps you are astonished at my assertion; but show me any idea of God from any other scripture equal to ours; they have only clan-Gods, the God of the Jews, the God of the Arabs, and of such and such a race, and their God is fighting the Gods of the other races. But the idea of that beneficent, most merciful God, our father, our mother, our friend, the friend of our friends, the soul of our souls, is here and here alone. And may He who is the Shiva of the Shaivites, the Vishnu of the Vaishnavites, the Karma of the Karmis, the Buddha of the Buddhists, the Jina of the Jains, the Jehovah of the Christians and the Jews, the Allah of the Mohammedans, the Lord of every sect, the Brahman of the Vedantists, He the all-pervading, whose glory has been known only in this land — may He bless us, may He help us, may He give strength unto us, energy unto us, to carry this idea into practice. May that which we have listened to and studied become food to us, may it become strength in us, may it become energy in us to help each other; may we, the teacher and the taught, not be jealous of each other! Peace, peace, peace, in the name of Hari!

जनवरी 25, 2012 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

दे दी तुने आज़ादी या पायी है हमने बलिदानों से?


जो राष्ट्र अपने वीरों का सम्मान नहीं करता वह अपनी अस्मिता को खो देता है। ऐसे पाप तो रक्त से ही धोये जाते हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ऐसे वीरों में से एक हे जिनके साथ देश के शासन ने न्याय नहीं किया। आज जब सारा देश इस वीर के जन्मदिन को मना रहा है तब इस अन्याय का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। सरकार भले ही स्वयं भूल जाये और प्रयत्नपूर्वक देश की नई पीढ़ियों को इतिहास के इस महत्वपूर्ण तथ्य से अनभिज्ञ रखें पर सत्य तो घनघोर बादलों को चीर कर आलोकित होनेवाले सूर्य के समान अपने आप को प्रगट कर ही देता है। पर जब प्रस्थापित व्यवस्था जानबूझकर बलिदानों को भूलाने के घोर पातक करती है तो कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ती है। क्यों आज भारत में समस्त क्षमताओं के होते हुए हम दुय्यम नेतृत्व की कायर नीतियों को सहनें के लिये विवश है? पूरे देश से ही वीरत्व ना केवल लुप्त हो रहा है इसे तिरस्करणीय बनाया जा रहा है। आतंक, साम्प्रदायिकता व भ्रष्टाचार से इस पावन मातृभूमि को बार बार क्षत विक्षत किया जा रहा है। सर्वस्व देश के लिये अर्पण करनेवाले वीर के बलिदान को भी जब विवादास्पद बना दिया जाता है; न्यूनगण्ड से ग्रसित नेतृत्व अपनी सत्ता को खोने के भय से जब अपने वीर राष्ट्रनायक को षड़यन्त्र पूर्वक जीवित ही समाधि में गाड़ देने के लिये संदेह से देखे जाते है तब पूरे राष्ट्र को अपने रक्त, स्वेद ओर मेद की आहुति से कीमत चुकानी पड़ती है।

कुछ वर्ष पूर्व जब अपने विराट योग शिविरों में स्वामी रामदेवजी ने यह प्रश्न पूछना शुरु किया कि हमको क्या अधिकार है कि हम, ‘‘दे दी तुने आज़ादी हमे बिना खड्ग बिना ढ़ाल’’ जैसे पूर्णतः असत्य गीतों को आलापकर हमारे वीरों के बलिदान का अपमान करें, तब इसे गांधी के विरुद्ध बात कहकर उनकी आलोचना की गई। पर क्या वर्तमान पीढ़ि को अधिकार नहीं हे कि वे इतिहास का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण समस्त उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर करें? क्या आज के दिन यह प्रश्न नहीं पुछा जाना चाहिये कि गीता का प्रतिदिन पाठ करने वाले हे महात्मा, अंधे धृतराष्ट्र के समान किस मोह में पड़कर तूने काँग्रेस अधिवेशन में लोकतान्त्रिक विधि से निर्वाचित सुभाषचन्द्र बोस को हटाकर अपने चमचे पट्टाभिसीतारामय्या को अध्यक्ष बनाया था? हम में से कम ही लोग इस ऐतिहासिक तथ्य से अवगत होंगे कि इसी विराट हृदय के योद्धा ने इस अन्याय के बाद भी मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी। नेताजी का प्रशंसा की अतिशयोक्ति में कहा गया विशेषण आज ऐसा चिपक गया है कि हम गांधी के निर्णयों का विश्लेषण ही नहीं करना चाहते। ऐसा करने का नाम लेना भी मानों घोर अपराध है।

पर 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के महत्वपूर्ण अध्याय का तो विश्लेषण करना ही होगा ना। महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन से अधिक उपयुक्त पर्व इस पावन कार्य के लिये और कौनसा होगा। आधुनिक भारत के निर्विवाद रुप से सबसे सशक्त इतिहासकार आर सी मजुमदार ने इस पूरी घटना के बारे में स्पष्टता से लिखा है। अहिंसा, ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के माध्यम से गांधी को भारत की स्वतंत्रता पूरा श्रेय देनेवाले इतिहास को रोज रोज पढ़नेवाले और ‘दे दी हमें . . .’ के तरानों को निर्लज्जता से दोहरानेवाले भारतवासी इस ऐतिहासिक सच्चाई को अवश्य पढ़े।

Majumdar, R.C., Three Phases of India’s Struggle for Freedom, Bombay, Bharatiya Vidya Bhavan, 1967, pp. 58-59. There is, however, no basis for the claim that the Civil Disobedience Movement directly led to independence. The campaigns of Gandhi … came to an ignoble end about fourteen years before India achieved independence…. During the First World War the Indian revolutionaries sought to take advantage of German help in the shape of war materials to free the country by armed revolt. But the attempt did not succeed. During the Second World War Subhas Bose followed the same method and created the INA. In spite of brilliant planning and initial success, the violent campaigns of Subhas Bose failed…. The Battles for India’s freedom were also being fought against Britain, though indirectly, by Hitler in Europe and Japan in Asia. None of these scored direct success, but few would deny that it was the cumulative effect of all the three that brought freedom to India. In particular, the revelations made by the INA trial, and the reaction it produced in India, made it quite plain to the British, already exhausted by the war, that they could no longer depend upon the loyalty of the sepoys for maintaining their authority in India. This had probably the greatest influence upon their final decision to quit India.

अंतिम पंक्ति में वे स्पष्ट लिखते है कि आज़ाद हिन्द सेना के वीरों के उपर चलाये गये देशद्रोह के मुकदमें में उजागर तथ्यों व उनपर पूरे देश में उठी प्रतिक्रियाओं के कारण द्वितीय महायुद्ध में क्षीण हुए ब्रिटिश साम्राज्य का भारत में टिका रहना असम्भव था। वे भारत में उनकी सेना के सिपाहियों पर विश्वास नहीं कर सकते थे। इस बात का भारत छोड़ने के उनके अंतिम निर्णय पर सर्वाधिक प्रभाव था।

नेताजी भारत छोड़कर विदेश जाने से पूर्व रत्नागिरी में स्थानबद्ध सावरकर से मिलने गये थे। सावरकर ने उन्हें द्वितीय महायुद्ध के समय विदेश में जाकर सेना गठित करने का सुझाव दिया। योरोप के क्रांतिकारियों से अपने सम्पर्क भी उन्होंने नेताजी को दिये। इन्हीं में से एक की सहायता से नेताजी अफगानिस्तान मार्ग से योरोप पहुँचे। सावरकर की योजना का दूसरा अंग था- ब्रिटिश सेना का हिन्दवीकरण अर्थात हिन्दूओं क सैनिकीकरण। कुछ वर्ष पूर्व अंडमान से सावरकर के नाम पट्ट को हटाने वाले देशद्रोही नेता सावरकर के जिस पत्र का हवाला देकर उन्हें अंग्रजों का एजण्ट कहते थे वही पत्र सावरकर की चाणक्य नीति का परिचायक है। सावरकर ने अंग्रेजों को इस बात के लिये अनुमति मांगी कि वे देशभर घूमघूम कर युवाओं को सेना में भरती होने का आवाहन करना चाहते है। महायुद्ध के लिये सेना की मांग के चलते सावरकर को स्थानबद्धता से मुक्त किया गया। सावरकर ने देशभर में सभायें कर हिन्दू युवाओं से सेना में भरती होने को कहा। एक अनुमान के अनुसार उनके आह्वान के प्रत्यूत्तर के रूप में 6 लाख से अधिक हिन्दू सेना में भरती हूए। एक साथी के शंका करने पर सावरकर ने उत्तर दिया कि 20 साल पूर्व जिस ब्रिटिश शासन ने हमारे शस्त्र छीने थे वह आज स्वयं हमें शस्त्र देने को तत्पर है। एक बार हमारे युवाओं को शस्त्रबद्ध हो जाने दों। समय आने पर वे तय करेंगे कि इसे किस दिशा में चलाना है।

योजना यह थी कि बाहर से सुभाष की आज़ाद हिन्द सेना चलो दिल्ली के अभियान को छेड़ेगी और जब उनसे लड़ने के लिये अंग्रेज भारतीय सेना के भेजेंगे तो यह सावरकरी युवक विद्रोह कर देंगे। हिरोशिमा व नागासाकी पर हुए अमानवीय आण्विक हमले के कारण जापान के असमय युद्धविराम कर देने से यह योजना इस रूप में पूण नही हो सकीं। किन्तु भारत के स्वतन्त्रता अधिनियम को ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में प्रस्तुत करते समय प्रधानमन्त्री क्लेमण्ट एटली द्वारा दिये कारण इस योजना की सफलता को स्पष्ट करते है। उन्होंने अपनी असमर्थता में सेना के विद्रोह की बात को पूर्ण स्पष्टता से कहा है। गांधी के ‘भारत छोड़ो’ अथवा सविनय आज्ञाभंग का उसमें कतई उल्लेख नहीं मिलता। आज़ाद हिन्द सेना का भय व भारतीय सेना पर अविश्वास के अलावा बाकि कारण केवल दिखावटी सिद्धान्त मात्र है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के पुर्व मुख्य न्यायाधीश पी वी चक्रवर्ति के 30 मार्च 1976 को लिखे पत्र से स्पष्ट है कि एटली ने उन्हें साफ शब्दों में भारत की स्वतन्त्रता के समय ब्रिटिश सोच के बारे में बताया था।

Dhanjaya Bhat, Writing in The Tribune,Sunday, February 12, 2006. Spectrum Suppl.

Which phase of our freedom struggle won for us Independence? Mahatma Gandhi’s 1942 Quit India movement or The INA army launched by Netaji Bose to free India or the Royal Indian Navy Mutiny of 1946? According to the British Prime Minister Clement Attlee, during whose regime India became free, it was the INA and the RIN Mutiny of February 18–23, 1946 that made the British realize that their time was up in India. It has been argued that when the leaders of the Congress were finally released, they came out as tired and broken men. This allowed the British and the sectarian parties to press home the advantage and negotiate better terms for themselves. An extract from a letter written by P.V. Chuckraborty, former Chief Justice of Calcutta High Court, on March 30, 1976, reads thus: “When I was acting as Governor of West Bengal in 1956, Lord Clement Attlee, who as the British Prime Minister in post war years was responsible for India’s freedom, visited India and stayed in Raj Bhavan Calcutta for two days`85 I put it straight to him like this: ‘The Quit India Movement of Gandhi practically died out long before 1947 and there was nothing in the Indian situation at that time, which made it necessary for the British to leave India in a hurry. Why then did they do so?’ In reply Attlee cited several reasons, the most important of which were the INA activities of Netaji Subhas Chandra Bose, which weakened the very foundation of the British Empire in India, and the RIN Mutiny which made the British realise that the Indian armed forces could no longer be trusted to prop up the British. When asked about the extent to which the British decision to quit India was influenced by Mahatma Gandhi’s 1942 movement, Attlee’s lips widened in smile of disdain and he uttered, slowly, ‘Minimal’.”

माननीय न्यायमुर्ति के अनुसार पूर्व प्रधानमन्त्री एटलीने दो बाते बिलकुल स्पष्टता से कही है – 1. गांधी का असहयोग व सविनय आज्ञाभंग का आंदोलन तो कबका समाप्त हो गया था। स्पष्ट प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि उसका प्रभाव ‘नहीं के बराबर’ था। 2. भारत छोड़ने की जल्दबाजी के मुख्य कारणों में सुभाष जी की आज़ाद हिन्द सेना और भारतीय शाही नौसेना में विद्रोह से उपजे अविश्वास को गिनाया।

अब इन तथ्यों पर चर्चा करने का समय आ गया है। केवल स्वतन्त्रता के श्रेय की बात नहीं, भारत के खोये आत्मविश्वास को पुनः पाने की बात है। कब तक भीरु बनकर मार खाने के तराने गर्व से गाते रहेंगे? दे दी तुने आज़ादी कहते लज्जा नहीं आती? अरे क्या किसी ने भीक्षा में दी है ये स्वतन्त्रता? वीरों ने अपने बासंती बलिदान से छीनी है अत्याचारी के क्रूर कराल जबड़े से माता की धानी चुनरियाँ।

‘दे दी . . ’ के कायर तराने छोड़ो! वीर सुभाष के जन्मदिन पर गर्व से सिंहगर्जन करों – दे दी तुने आज़ादी नहीं पायी है हमने बलिदानों से स्वतन्त्रता ! वीरों की शहादत ने छिनी है जालीम से आज़ादी। किसी का उपकार नही अपने लहू के पराक्रम की है ये गाथा।

हे वीर सुभाष! अच्छा ही है कि इस कायर सरकार के विज्ञापनों से अपवित्र नहीं है आपकी जयंति। हमारे हृदय की हर धड़कन में तेरा हर संघर्ष आज भी है जीवित। कसम है हमें किसी अज्ञात कोने में तुम्हारे अंतेष्टि को तरसते अस्थियों की – तुम्हारी गाथा को हम दुखान्तिका मे न बदलने देंगे। अपने पौरुष से तेरा खोया सम्मान पुनः दिलायेंगे।
जय हिन्द  . . .

जनवरी 23, 2012 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

लूला लोकतंत्र : जरुरी है सर्जरी


वर्ष २०११ में हुए आंदोलनों में जनता की प्रचंड ताकत देखने में आई |
किसी भी नीति के निर्धारण में जनता की सोच लोकतान्त्रिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण कारक होती है| इसलिए नीतियाँ बनाने वालो की तरफ से हमेशा से ही जनमत या जनता की “सोच”  को ढालने का संगठित प्रयास होता रहता है | मिडिया के बड़े प्रभाव क्षेत्र से लोगो की सोच को प्रभावित करना अब एक विशेष कार्य बन चुका है | प्रिंट मिडिया का अपना एक वर्ग है, और वह उन्हें प्रभावित भी करती है | इलेक्ट्रोनिक मिडिया और सोशल मिडिया में हुयी बढोत्तरी से लोगो को अपनी राय व्यक्त करने के और भी मार्ग मिल गए हैं | पहले दो पर तो सरकार  का प्रभाव   हो सकता है, चूँकि उसके पास इन्हें देने के लिए  भारी भरकम मात्र में धन होता है जो वह अपने विज्ञापनों पर खर्च करती है विज्ञापनों के लिए| लेकिन पूरी दुनिया में सोशल मिडिया पर किसी भी सरकार का प्रभाव जमाना मुश्किल है|
लेकिन अब इस अभूतपूर्व चुनौती  से निपटने के लिए भी कुछ  व्यावसायिक रूप से लोगो की सोच प्रभावित करने वाले  “प्रोफेशनल” लोग काम पर लगाये जा चुके है | विकसित देशो में तो पिछले एक दशक से और अपने यहाँ कोई दो सालो से ही इस तरह के कला और विज्ञान ने प्रगति की है | वर्तमान सरकार तो इसमें बहुत ही निपुण है और इस काम में उसने इस क्षेत्र के सबसे अनुभवी लोगो को लगा रखा है | कुछ अखबारों की रिपोर्टिंग के अनुसार तो सत्ताधारी पार्टी के युवराज को “कौन से कपडे पहनने है” , “किस तरह बोला जाय ” यहाँ तक की कैमरे के सामने भीड़ में “किसी छोटे बच्चे को कैसे अपनी गोद में उठाना है ” यह तक सलाह देने के लिए प्रोफेशनल रखे गए है | कुछ अखबारों की माने तो पिछले दिनों चेहरे पर जो चमक दिखी वह भी प्रधानमंत्री के खास प्रोफेशनल सलाहकारों की सलाह का परिणाम थी | व्यावसायिक रूप से ऐसा करने वालो की करतूत का एक चिंताजनक उदहारण है अन्ना का मुम्बई अनशन |
इसके पूर्व आई. ए. सी. (बिना किसी प्रोफेशनल के ) लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही थी की “जनलोकपाल” ही सरकार से सम्बंधित सारी समस्याओं की चाबी है | और केंद्र की सरकार ने बड़ी चालाकी से इसे संभाला …. उसने ऐसा माहोल बनाया  की भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कानून “लोकपाल “बनाकर लाये है भले ही जनलोकपाल की कॉपी ही न हो , पर एक कदम तो बढाया! इस से लोगो के मन में एक भ्रम उत्पन्न हो गया की सरकार कुछ कर रही है और अन्ना सिर्फ अपने अहंकार की तुष्टि के लिए ही अनशन कर रहे है | टीम अन्ना ने अपनी राजनैतिक असमर्थता सिद्ध की| भारतीय जनता की मूल प्रवृत्ति है की वो कानूनी कार्यवाही  में अधिक विश्वास  करती है | अगर उन्हें थोड़ी बहुत आशा भी दिखती हो तो लोग सरकार में विश्वास बनाये रखते है | पूर्व में अप्रैल और जून में युपिए की सरकार लोगो को यह मौका देने में चूक गयी | ४ जून  को लोगो के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर हुए वीभत्स सरकारी हमले (जिसमे महिलाये औ बच्चे भी शामिल थे ) से लोग भड़क गए और लोगो ने स्वयं को अकेला महसूस किया और इसीलिए फिर आन्दोलन को इतना भारी जनसमर्थन मिला |लेकिन सरकार इस बार लोगो में यह सोच बनाने में सफल रही की वे कुछ कर रहे है विपक्ष और टीएमसी जैसी पार्टिया केंद्र सरकार पर कड़े कानून के लिए दवाब बनाये हुए है ऐसे में अलग से कुछ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है ….भारत में सब कैसे होता है यह उस का सटीक उदहारण है |
इसी प्रकरण में एक जो अजीब चीज और देखने में आई वो है उनका कहना है की सारी गड़बड़ी की वजह शासन तंत्र ही है न की कोई शासन करने वाले लोग| जिस प्रकार लोकतान्त्रिक व्यबस्था भारत ने अपनाई हुयी है वास्तव में वाही सारी समस्याओ का मूल है यहाँ तक की टीम अन्ना ने तो सांसदों द्वारा उनकी पार्टी अनुशासन में बंधे रहने तक की आलोचना की | उन्होंने संसद से (व्हिप) “सचेतक”   के प्रावधान को हटाने की मांग की ताकि एक संसद अपनी मर्जी से अपनी सोच से वोट दे सके | दोगलेपन की हद हो गयी | एक तरफ तो आप लोगो के “राईट टू रिकाल ”  की बात कर रहे है , दूसरी तरफ सांसद अपनी ही पार्टी अनुशासन को न माने यह चाहते है | सचेतक का जो वैधानिक प्रावधान है वह  १९८० के समय हुयी सांसदों की खरीद फरोख्त के बाद बने “दल बदल विरोधी कानून” के बाद से और मजबूत हुआ है| एक सांसद अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह के आधार पर चुनाव जीतता है न की उसकी व्यक्तिगत जीत होती है | चुनावों में जनता के मध्य पार्टी की कार्य योजना रखी जाती है जिस पर लोग उन्हें वोट देंगे ऐसी उम्मीद की जाती है | अब कहना की पार्टी के घोषणा पत्र में बंधने की अपेक्षा एक सांसद किसी नैतिक स्थान के लिए व्यक्तिगत रूप से अधिक उपयुर्क्त होगा यह तो संसद में भ्रष्टाचार की बाढ़ ला देगी |
वास्तव में गठबंधन की  वर्तमान विडंबना ही हमारे इस त्रुटी पूर्ण  लोकतंत्र में एक भरी नौटंकी जैसे है| चुनावों में जो पार्टिया एक दुसरे के खिलाफ लडती है , वही जीतने के बाद मिलकर सरकार बनाती है, एक तरफ जहा केंद्र के स्तर पर सी.बी.आई. का डर दिखाकर या राहत का लालच देकर जिन पार्टियों से गठबंधन बनाया जाता है , राज्यों में वही एक दुसरे के कटुता पूर्ण अभियानों का निशाना बनती है |
लेकिन क्या हम इस सब के लिए लोकतंत्र को जिम्म्मेदार ठहरा सकते है ? लोकतंत्र ही मूल समस्या है ऐसा अभिमत बनाना एक वस्तुनिष्ठ समीक्षा के लिए ठीक नहीं बैठता | कोई और विकल्प ही स्वाभाविक रूप से शोषण और भ्रष्टाचार से निजत का उपाय हो सकता है |
१९७७ में जय प्रकाश नारायण की समग्र क्रांति और उसके बाद १९८६ के अयोध्या आन्दोलन में जो देखा, लोकतंत्र में राष्ट्रीय स्तर पर लोगो में हिम्मत जगाने की क्षमता है, और वही गैर राजनितिक रूप से पिछले वर्ष हुआ| निश्चित ही हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है की लोकतंत्र के वर्तमान स्वरुप ने कुछ यथाक्रम में गलतियां की है जो हमारी आज की शासन व्यवस्था के ढहने के लिए जिम्मेदार है | पर सिर्फ लोकतंत्र को ही अपने आप ने जिम्मेदार मानकार नकारना समय के साथ उचित नहीं होगा | हमें खेल को खेल के नियमो का पालन करते हुए जीतना  होगा | इसमें कोई संदेह नहीं की बदलाव होना चाहिए | पर हमें सुधार इसी तंत्र में से इसी की अनुरूप उभार कर लाने होंगे न की एकदम अलग से कोई कदम उठाया जाय |
सैधांतिक रूप से देखा जाय तो लोकतंत्र के दो रूपों का चलन है .. पहला है  १- प्रत्यक्ष लोकतंत्र :  ऐसा माना जाता है की यूनान में एथेंस जैसे कुछ नगरो में और उत्तर भारत के कुछ गणों में सिकंदर के आक्रमण के समय यह लागू था, इसमें जनता प्रत्यक्ष रूप से शासन विधि में भाग लेती है और विधान परिषद् की कार्यकारिणी का और कही कही तो न्यायपालिका का भी चुनाव  करती है |
दूसरी है २. प्रतिनिधि आधारित लोकतंत्र :– यह वेस्टमिन्स्टर  नमूना है जो हमने अंगेजी हुकूमत की वसीयत रूप में अपनाया है| इसमें जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि निर्वाचित किये  जाते है जो आगे कार्यपालिका का चुनाव करते है तथा अधिकांशतः न्यायपालिका को नियुक्त किया जाता है नाकि निर्वाचित किया जाता है | दोनों ही प्रकारों के तंत्र के अपने अपने गुण-दोष है | अमेरिका ने दोनों के संकर रूप को अपनाया हुआ है , इसमें राज्यों में तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी कार्यपालिका का प्रत्यक्ष निर्वाचन होता है |जहाँ एक और विधान परिषद् के लिए प्रतिनिधि सभा होती है वही दूसरी ओर वह कार्यपालिका के नियामक प्राधिकरण के तौर पर भी  कार्य करती है | ऐसा प्रतीत होता है की अमेरिका के अधिकांश राज्यों में न्यायपालिका भी निर्वाचित होती है |
पर लगता है हमने अपने यहाँ भारत में लोकतान्त्रिक नियमो की बुरी गति कर रखी है , जिसमे बहुमत का नियम सबसे पहले है |दोनों ही प्रकार के तंत्र में  बहुमत द्वारा ही नीतिया तय होती है | निर्वाचन में यह निश्चित होना चाहिए की विजयी प्रत्याशी  को  में डाले गए मतों में से कम से कम ५०% से १ अधिक मत प्राप्त हो |जबकि यहाँ भारत में  लोकतंत्र के दिखावटी मुखिया, राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से होता है| और सबसे खतरनाक प्रावधान यह है की कार्यकारिणी का मुखिया, प्रधानमंत्री का निर्वाचन भी प्रत्यक्ष रूप से करना अनिवार्य नहीं होता है | वर्तमान प्रधानमंत्री भी राज्यसभा सदस्य है जहाँ जनता के मत का प्रत्यक्ष उपयोग नहीं होता है|  लेकिन एक प्रधानमंत्री के रूप में बने रहने के लिए  लोकसभा के सदस्यों का बहुमत उसके पास होना चाहिए , जिसमे १ +५०% का नियम अनिवार्य है | लेकिन हमारे सांसद  जिस प्रक्रिया से निर्वाचित होते है उसमे यह आवश्यक नहीं होता है की उन्हें बहुमत में वोट प्राप्त हुए हो और इसीलिए हमारे सांसद डाले गए वोटो में से ७% भी अपने पक्ष में पाकर चयनित  हो जाते है | मुश्किल से ही कोई सांसद हो जो यह दावा कर सके की उसे अपने निर्वाचन क्षेत्र से ५०% से भी अधिक वोट प्राप्त हुए हो |और इस प्रकार यह हमारेलोकतंत्र का क्रमश ढहना है | हमारे पास यहाँ तक की संवैधानिक प्रावधानों में भी वास्तविक लोकतंत्र है ही नहीं  | यह तो केवल एक झलक मात्र है | इसी से समाज में अभिजात शासन वर्ग और जाती, क्षेत्र, भाषा  और धर्मं की गन्दी ,भेद और फूट की राजनीती पनपती है | किसी भी  राजनेता के पास जीतने का यही मंत्र है की औरो को इतने टुकडो में बाँट दो की अपना हिस्सा सबसे बड़ा हो जाये | यह अनुवांशिक तौर पर व्याप्त हो चुका है|
जब तक हमारी लोकतान्त्रिक ढांचे की आधारभूत कमी दूर नहीं होती तब तक हम किसी सुधार की आशा नहीं कर सकते |
दो जरुरी आधारभूत सुधार मांगो को रखने की आवश्यकता है |
१. वर्त्तमान पटकथा के हिसाब से पहले  तो कार्यकारिणी के मुखिया, प्रधानमन्त्री का प्रत्यक्ष/सीधा  निर्वाचन हो | इसके लिए संवैधानिक संशोधन लाने होगा की गठबंधन  दौर की इस राजनीती में होना मुश्किल है, जहाँ एक छोटी क्षेत्रीय पार्टी को भी असंगत महत्व और मूल्य प्राप्त है | लेकिन हम शुरुआत  के तौर पर इस मांग का मुद्दा तो उठा ही सकते है | या दूसरा विकल्प यह हो की पहले कदम के रूप में  राष्ट्रपति शासन वाली सरकार जिसमे राष्ट्रपति का सीधा निर्वाचन हो , हो सकता है |
२. दूसरा यह की पंचायत से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव में जीतने की शर्त , डाले गए कुल मतों में १+५० % मत प्राप्त करना अनिवार्य हो | यह अपेक्षाकृत आसान भी है | केवल “जनप्रतिनिधि अधिनियम” से संशोधन करने से यह हो जायेगा और साधारण बहुमत से इसे पारित भी किया जा सकता है | इससे दो सबसे बड़ी पार्टियों को सीधा लाभ मिलने की सम्भावना है, इसलिए यह सर्वसम्मति से हो भी सकेगा| यह नैतिक और तार्किक दोनों रूप से ही वजनदार तर्क है और कोई इसे नकार भी नहीं सकता | जिसे उसके निर्वाचन क्षेत्र की बहुमत जनता ने नकार दिया हो उसे जनता का प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है |
लेकिन यह कोई जादू की छड़ी भी नहीं है की सारी गड़बड़ियां  ही दूर हो जाएँगी | अंततोगत्वा हमें दो शताब्दी पूर्व के एतिहासिक अनुभवों के परे जनि की आवश्यकता है | वर्त्तमान व्यवस्था  ब्रिटिश शासन के परिणाम स्वरुप सामने आई है, इसकी जड़े वही उपनिवेशिक काल में जमी हुयी हैं| इसलिए अंतिम उपचार के लिए हमें मूल कारण तक जाना होगा और जिसके लिए हमें अपने राष्ट्र के इतिहास की और भी गहराइयो में जाना होगा |
हमारा ५००० वर्षो से भी अधिक का ज्ञात इतिहास है जिसमे प्रत्येक दूसरी शताब्दी में हमारा स्वर्णिम काल रहा है | और हमने आर्थिक सम्पन्नता, शिक्षा, विज्ञान और तकनीक, और सबसे महत्वपूर्ण शांतिपूर्ण सामाजिक-राजनैतिक तंत्र स्थापना में विश्व की अगुवाई की है | शासन तंत्र के विभिन्न प्रकारों  का हमने प्रयोग किया है|  हम भारत के विभिन्न भागो के उस विविध राजनीती तंत्र को पुनः नहीं ला सकते जो पहले हुआ करता था | हिन्दुओ का सदैव ही सामान सिद्धांत के विविध प्रगटीकरण में विश्वास रहा है और हमने राजनीती में भी इसे लागू किया था |चक्रवर्ती अपने जीते हुए राज्यों में उनके स्वयं के  लागू किये हुए शासन -व्यवस्था का सम्मान किया करते थे | इसी श्रंखला में हमारे यहाँ एक और जहाँ विविधताओं से पूर्ण राजनैतिक तंत्र वाले गणराज्य थे वाही दूसरी और मगध साम्राज्य जैसे जटिल ढांचे के  विविध रूप थे |  कुछ  व्यवस्थाये तो ऐसी थी जहाँ केवल एक महिला का ही शासन रहा | लेकिन इन सभी  का आधारभूत  सिद्धांत “धर्मं” था, उन सभी को एक सूत्र में बांधने वाला | आज वास्तव में जिस चीज की कमी है वाह है धार्मिक तंत्र |
आजके इस सामने आये तंत्र को स्वीकार्य कर हमें इसमें धार्मिक सिद्धांतो को लागू करना होगा | किसी ‘विदेशी’ को पचाने का यह हिन्दू तरीका है |  आज हमें वर्तमान समाज के अनुरूप  सनातन धर्म की व्याख्या और युगधर्म की आचार-संहिता तैयार करने के लिए एक नयी स्वच्छ स्मृति की आवश्यकता है | संविधान का यह हमारा स्वदेशी विचार है |
हमारी संसद-भवन  के  नक़्शे के पीछे की प्रेरणा मध्यप्रदेश के मितावली स्थित  चौसठ  योगिनी मंदिर का नक्शा है | वैसे ही हमारे लोकतंत्र को भी हमें अपने राष्ट्रधर्म के सिद्धांतो ठोस आधार पर आधारित करना होगा | वर्तमान लूली व्यवस्था की सम्पूर्ण शल्य-चिकित्सा बहुत जरुरी है न की केवल उपरी दिखावटी लीपापोती मात्र|

जनवरी 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

सफलता की चाह नहीं! चिरविजय का पराक्रम !!


कर्मयोग 10:
‘‘हर कोई सफल होना चाहता है। पर क्या यह सम्भव है? आपकी गीता क्या कहती है?’’ युवाओं की जिज्ञासायें विद्रोह के आवरण में ही व्यक्त होती है। पर भाईजी को तो इस प्रकार की आपत्तियों को झेलने का पुराना अभ्यास है। उन्हें पता था युवक की बात अभी पूरी नहीं हुई है अतः वे केवल हँस दिये। प्रश्नकर्ता ने कहा, ‘‘मुझे पता है आप कहेंगे सच्ची सफलता अलग होती है। सफलता का अर्थ क्या है? आदि आदि। पर जब आप कहते है कि गीता जीवन का मार्गदर्शन करती है तो फिर इस बारे में भी तो कुछ होगा ना उसमें?’’

भाईजी ने कहा गीता में सफलता के बारे में कुछ कैसे हो सकता है? गीता तो कहती है आपका कर्म पर तो पूरा अधिकार है किंतु फल पर कोई अधिकार ही नहीं है। जब फल पर अधिकार ही नहीं है तो फिर स-फल अर्थात फल पाने वाले होने का क्या अर्थ हुआ? गीता तो कहती है – न मे कर्मफले स्पृहा।। कर्मफल के प्रति कोई लिप्सा नहीं है। हमारी पारम्पारिक व्रत कथाओं में इससे अधिक गहरे पद का प्रयोग होता है। सुफल – अच्छा फल। हमारे व्रत का परिणाम अच्छे फल को देनेवाला हो ऐसी प्रार्थना है। सु-फल कौनसा होगा यह प्रत्येक की स्थिति पर निर्भर करेगा। देवताओं की स्तुति में किये जानेवाले स्तोत्रों के अंत में फलश्रृति आती है जिसमे अक्सर यह प्रार्थना होती है – विद्यार्थि लभते विद्या, धनार्थि लभते धनम्। पुत्रार्थि लभते पुत्रान् मोक्षार्थि लभते गतिम्।। जिसको जो चाह हो उसको वो मिले। संत ज्ञानेश्वर ने तो इन्हीं शब्दों में पसायदान, प्रसाद मांगा है। जो जे वांछिल तो ते लाहो। प्राणिजात। ये तो बड़ी ही बढ़िया बात हुई। जो चाहो वो मिल जाये। गीता से तो ये ही अच्छा है। पर ज्ञानेश्वरी तो गीता की ही मराठी में व्याख्या है फिर इसके अंत में मांगे पसायदान में गीता के विपरित बात कैसे हो सकती है?  यह गीता के अनुसार ही है। गीता में भगवान कह रहे है – ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तांस तथैव भजाम्यहम्। मम वत्र्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वशः।। गी 4.11।। जो जैसे भाव से पूजा करेगा वैसा ही ईश्वर को प्राप्त करेगा।

यह भाव कैसे आता है? हमारी मर्जी अथवा चाह भी हमारे भाव पर ही निर्भर करेगी। हम इसी के अनुरूप कार्य करेंगे। और उसी के अनुसार फल को प्राप्त करेंगे। हमारा कर्म ही हमारी पूजा है अतः उसका फल उस पूजा का प्रसाद। मन अपनी क्षमता, स्तर व योग्यता के अनुसार ही कामना करेगा। इन तीनों के सम्मिलित प्रभाव को हम हमारी स्थिति कह सकते है। गीता में इसके लिये बड़ा ही मार्मिक शब्द प्रयोग हुआ है -उपपत्ति। क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ न एतद् त्वयि उपपद्यते। गी 2.3।। कापुरूषता को मत प्राप्त हो अर्जुन। यह तेरी उपपत्ति नहीं है। सरल भाषा में तुम्हारे स्तर के व्यक्ति को यह शोभा नहीं देता। हमारी उपपत्ति के अनुसार किया कार्य ही हमें शोभा देता है। उपपत्ति का अर्थ है अंतिम लक्ष्य के सन्दर्भ में हमारी स्थिति। कहाँ तक हम पहुँचे हैं? किस स्थान पर बैठने की हमारी योग्यता है? इसी के अनुसार हमारा मन कामना करेगा। कर्म भी इस प्रकृति के अनुसार होंगे और फलकामना भी इसी की सीमा में होगी। कई बार कर्म करते समय हम अपनी उपपत्ति को भूल जाते है फिर भी उसी के अनुरूप फल की कामना करने लगते है। तब कर्म और परिणाम की अपेक्षा में विभेद हो जाता है। कर्म पर ध्यान दिये बिना केवल परिणाम की ईच्छा करना सामान्यतः इसे ही सफलता की चाह माना जाता है। ये चाह हमेशा मर्यादित, सीमित ही होगी। अतः इसके पूर्ण हो जाने से क्षणिक आवेशयुक्त सुख का अनुभव भले ही हो, संतोष नहीं मिलेगा। क्योंकि हमे अपनी प्रकृति की सीमा से परे जोने में ही संतोष मिलता है। कर्म प्रकृति के वशी भूत होकर चलता है तो कामनापूर्ति भी सुख नहीं देती। अंग्रजी शब्द Success का भी शाब्दिक अर्थ है -‘के पार जाना’। अपने लक्ष्य को पार करना अथवा अपनी क्षमता की सीमा को पार पाना या फिर बाधाओं पर पार पाना इसे ही वास्तव में Success माना गया है। तो हिन्दी में इसका सही अनुवाद होगा विजय। प्रकृति पर विजय। अपनी स्वाभविक सीमा पर विजय। प्रकृति पर विजय उसके विपरित जाकर नहीं हो सकती। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते हुए ही उसके पार जाया जा सकता है।

प्रकृति के दो मोटे मोटे वर्ग किये गये है- प्रवृत्तिं च निवृत्तिंच। प्रवृत्ति अर्थात कामनाओं की ओर मन की गति। निवृत्ति अर्थात कामनाओं से वैराग्य की ओर मन की स्वभावतः गति। हमे अपनी स्थिति इन दो में से किस ओर अधिक है यह देखना चाहिये ताकि इसके अनुरूप हम अपने लिये सही कर्म मार्ग चुन सकें। यदि हमारा मन अधिक बहिर्मुख है। बाहरी बातों में अधिक रमता है। ईच्छाओं में इन्द्रियों के सुख के लिये अधिक लालायित होता है तो मानना होगा कि हमारे लिये प्रवृत्ति मार्ग ठीक है। यदि किसी उदात्त ध्येय के लिये काम करते हुए इन सुखों का त्याग करने में आनन्द का अनुभव होता है। स्वयं को भूला देने वाले कार्य में मन अधिक रमता है। स्वयं से अधिक औरों के हित में विचार करने का मन है तो फिर हम कह सकते है कि हमारी गति वैराग्य की ओर है और हमारे लिये निवृत्ति मार्ग श्रेयस्कर है। ‘श्रेय’ इस शब्द का गीता में बार बार प्रयोग हुआ है। कामना, वासना या इच्छा से कर्म का निर्धारण नहीं होगा। हमारी प्रकृति के अनुरूप जो हमारे लिये श्रेय की ओर ले जानेवाला है वही हमारा कर्तव्य है।
गीता के प्रथम अध्याय में अपने मन के सम्भ्रम का वर्णन करते समय भी अर्जुन प्रारम्भ इसी से करता है।

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।। गी 1.31।।  हे केशव सारे लक्षण मुझे अपने विपरित दिखाई पड़ते है। इस युद्ध में अपने स्वजनों को मारने में मै कोई श्रेय नहीं देखता हूँ। आगे पूरा वर्णन इसी क्रम में है कि किस प्रकार यह युद्ध धर्म का नाश करेगा अतः श्रेयस्कर – श्रेय की ओर ले जाने वाला नहीं है। इसलिये मै युद्ध नहीं करूंगा। श्रेय ही अर्जुन का तर्क है। फिर भगवान द्वारा उपपत्ति का भान करा दिये जाने पर अपने भय व भ्रम का साक्षात्कार हो जाने पर जब अर्जुन शरणागति से शिष्यत्व ग्रहण करता हे तब फिर श्रेय का उल्लेख है। कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यत् श्रेयः स्यात् निश्चितं ब्रुहि तन्मे शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।।  भय के कारण मेरा स्वभाव कृपणता अर्थात संकुचितता से ढ़क गया है और इसके कारण मै अपने धर्म अर्थात कर्तव्य के प्रति भ्रमित हो गया हूँ। इसलिये मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वह निश्चित कर आप मुझे बताओ। मै आपका शिष्य हूँ और आपकी शरण आया हूँ। मेरी रक्षा करें। भगवान भी जीवन के यथार्थ का ज्ञान बताते है और फिर कहते है – धर्म्याद्धि युद्धाद् श्रेयो अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते।। गी 2.31।।  धर्म की स्थापना के उद्देश्य से किये गये युद्ध से क्षत्रिय के लिये और अधिक श्रेयस्कर कुछ भी नहीं है। आगे के 6 श्लोंकों में स्वधर्म से पलायन के दुष्परिणामों का वर्णन करने के बाद अपने श्रेय के लिये युद्ध का आदेश देते है। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय।। गी 2.37।। आगे भी जहाँ जहाँ शंका आई वहाँ वहाँ अर्जुन ने अपने लिये श्रेयस्कर क्या है यही पूछा है। तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम्।। गी 3.2।।  अतः एक तय करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर होगा – कर्म का मार्ग या ज्ञान का मार्ग?

गीता श्रेय का मार्ग बताती है। श्रेय अर्थात जो श्री की ओर ले जाये। श्री को प्राप्त करने का मार्ग। श्री के कई अर्थ लगाये जाते है। सबसे प्रचलित अर्थ है – लक्ष्मी। इसी से श्रीमन्त अर्थात अमीर जैसे शब्द भी प्रचलित हुए। श्री का अर्थ केवल धन से लेना अधुरा ही होगा। श्री अर्थात परिपूर्णता के साथ समृद्धि। समृद्ध का अर्थ है जिसके पास सबकुछ है। भौतिक साधनसम्पन्नता के साथ ही आत्मिक सामथ्र्य भी। जो स्वावलम्बी होने के साथ ही औरों को भी आवश्यकतानुसार सम्बल देने की क्षमता व नियत दोनों का होना वास्तविक श्रीमन्ती है।

‘श्री’ का एक और अर्थ है – विद्या। किसी विषय का पूर्ण ज्ञान, स्वामीत्व होना विद्या है। केवल सैद्धान्तिक जानकारी ही नही अपितु पूर्ण व्यावहारिक ज्ञान भी। विद्वान अर्थात जिसके पास विद्या है। तो विद्वान होने का अर्थ केवल किसी विषय की व्याख्या करने की क्षमता से नहीं है अपितु आवश्यकतानुसार उसके प्रयोग का भी पूर्ण ज्ञान आवश्यक है। वाहनशास्त्र (Automobile) का विद्वान अभियन्ता (Engineer) यदि अपना स्वयं का वाहन ठीक नहीं कर सकता हो तो वह कैसा विद्वान? उससे तो वह अनपढ़ यन्त्री (Mechanic) अच्छा जो रासायनिक व भौतिक विज्ञान के सुत्र तो नहीं जानता जिससे वाहन चलता है किन्तु बन्द पड़े वाहन की तृटी को पहचान कर उसको ठीक करने का कौशल तो उसके पास है। विद्या का अर्थ ज्ञान व कौशल दोनों का समन्वय है। अतः श्री से युक्त -श्रीयुत का अर्थ होगा जो ज्ञानी होने के साथ ही व्यावहारिक भी है। विद्या का एक और शास्त्रीय वर्गीकरण भी है। परा विद्या व अपरा विद्या। पराविद्या वह आध्यात्मिक ज्ञान व विज्ञान है जो ईश्वर से सम्बंधित है। अर्थात ईश्वरसाक्षात्कार का ज्ञान व कौशल। अपरा विद्या में अन्य सभी भौतिक जगत के विषयों का ज्ञान आता है। ‘श्री’ पद में परा व अपरा दोनों विद्याओं का समावेश होता है।

श्रेय अर्थात श्री की ओर ले जानेवाला यह कहते समय श्री का अर्थ और अधिक गहन व परिपूर्ण लिया गया है। इसमें उपरोक्त दोनों अर्थों के साथ ही और भी अधिक समृद्धि की बात अभिप्रेत है। प्रत्येक की उपपत्ति के अनुसार उसका स्वभाव होता है। इस स्वभाव के अनुरूप उसके जीवन का विशिष्ठ लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य को पाने हेतु उसे सामर्थ्य, क्षमता व विद्या के साथ ही सम्यक व्यवहार भी करना होता है। यह श्री है जिसे पाने की ओर अग्रेसर होना श्रेय कहलायेगा। तो हमारे लिये वह श्रेयस्कर होगा जो हमें अपने स्वधर्म की ओर ले जाये। ऐसा कर्म जो हमारे स्वधर्म को साकार करने में सहायक हो वही हमारा कर्तव्य कहलायेगा। ऐसे कर्तव्य पथ पर सब अग्रेसर हो ऐसी अपेक्षा है इसिलिये नाम के साथ श्री लगाने की परम्परा है। श्रीराम अर्थात श्री से युक्त राम। हम एक दुसरे के नाम में आदरपूर्वक श्री का प्रयोग करते है तब वह योग्यता वाचक भले ही ना हो किन्तु लक्ष्य का स्मरण करानेवाला तो होता ही है कि हमे श्री की ओर ही जाना है। इस ध्येयमार्ग को ही कठोपनिषद् में ‘श्रेयो मार्ग’ कहा है। आवश्यक नहीं की श्रेयो मार्ग प्रेयो मार्ग भी हो। यमराज तो नचिकेता को दिये उपदेश में दोनों को एक दूसरे के विपरीत बताते है। उनके अनुसार प्रवृत्ति की ओर जानेवाला इन्द्रिय सुख का मार्ग प्रेयो मार्ग है और निवृत्ति की ओर ले जानेवाला श्रेयो मार्ग जिसके बारे में अन्त में वे कहते है कि यह तलवार की धार पर चलने के समान कठीन मार्ग है। शुरस्य धारा निषिदा दुरत्यया। यमराज के उपदेश का विषय आत्मज्ञान होने के कारण ऐसा कहा होगा। किन्तु कर्मयोग में श्रेयगामी मार्ग सहज, स्वभावगत होने के कारण आनन्ददायी भी होता है। सुखकर होगा ही ऐसा नहीं किन्तु कल्याणकारी कष्ट भी तो आनन्द देता है। अपनी पूरी शक्ति के साथ दौड़ लगाकर स्वर्णपदक जीतनेवाला धावक पूरी थकान के बाद भी कितने आनन्द का अनुभव करता है। विजय प्राप्ति के लिये किया गया कष्ट भी आनन्ददायी होता है। यदि लक्ष्य का भान भूल जाये तब सुख-सुविधा से सम्पन्न जीवन भी उपर से चाहे जितना प्रिय लगे अर्थहीन होने के कारण उबाउ और थका देनेवाला ही होता है। जीवन में स्वभावानुसार सही कर्म चुना हो तब श्रेय मार्ग प्रियकर भी होता है। किन्तु यदि किसी समय संयम की शिथिलता के कारण श्रेय मार्ग पे्रय ना हो तब चुनाव अप्रिय होते हुए भी श्रेयका ही करना है। सामान्य सा उदाहरण मधुमेह के रोगी को मिठाई खाने की इच्छा का है। इसमें जो प्रिय है वो श्रेय नहीं है। अतः क्षणिक सुखकर होते हुये भी दीर्घतः दुखदायी है। सर्वदा सुख व आनन्ददायी तो श्रेयो मार्ग ही है।

श्री प्राप्त करने के लिये प्रयास ही विजय का प्रयास है। अपने जीवनध्येय को पहचान उसकी पूर्णता में स्वयं को पूरा झोंक देना चिरविजय का मार्ग है। जीवन संग्राम के छोटे छोटे संघर्षों पर विजय प्राप्त करने की आपाधापी में यदि हम जीवन के परमध्येय को भूल गये तो फिर सफल भले ही हो संतुष्ट नहीं होंगे। संतुष्टि तो चिरविजय में ही है। यह चिरविजय की कामना ही हमारे जीवन को गतिमान व ध्येयगामी बनाये रखती है। भारतीय संस्कृति प्रत्येक को उदात्त ध्येय की ओर ही प्रेरित करती है। जन्म जन्मांतर की अखण्डयात्रा में इस बार का जो पाड़ाव हमने पाया है वह हमारी उपपत्ति है। यहाँ तक पहुँचे है यह तो तय है। इसे ही प्रारब्ध भी कहते है। इसे नहीं बदल सकते पर चिंता की कोई बात नहीं यह हमारी सीमा थोड़े ही है। यदि अपनी उपपत्ति के अनुरूप श्रेयो मार्ग चुन लिया तो आगे बढ़ने की कोई सीमा नहीं है। शायर कहता है – सरे अक्स सितारों से आगे जहां और भी है। बुलन्दी परों की उड़ानों से आगे आसमां और भी है।
सफलता की चाह तो केवल सीमित परिणाम की नपुंसक अपेक्षा मात्र है। अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करते समय अधिक और अधिक बड़े ध्येय को प्राप्त करने का पराक्रम करते रहना ही चिरविजय की कामना है।

जनवरी 19, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

विड़ियो गेम्स छोड़ों ओर मैदान में चलों !


गढ़े जीवन अपना अपना -12

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं।
देवकी परमानन्दम् कृष्णं वन्दे जगदगुरुम्।।

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कृष्ण की सारी कथायें ही रसमय है और वीरता से परिपूर्ण भी। शिशु अवस्था से ही पुतना मौसी और शकटासुर के षड़यन्त्रों को समझकर यशोदा के लाला ने उनका मर्दन कर दिया। वहीं से उनकी बाललीलाओं में अनेक राक्षसों के निःपात के अध्याय जुड़े है। आगे सारे जीवन भर ही वे दुष्टों का संहार करते रहे। पर जब जगद्गुरु के रुप में उनका बखान करना है तब उनके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अध्याय का ही उल्लेख होता है। कंस चाणूर मर्दनं।

कृष्ण स्वयं मात्र 12 वर्ष के हैं और बलराम दाऊ 14 के। नन्दग्राम की लीलाओं का समापन और मथुरा प्रयाण का ये समय है। कंस ने जानबूझकर महोत्सव निमन्त्रण दिया है। अपने काल को मारने के अनेक प्रयास असफल होने के बाद अब वो अपने समक्ष मथुरा में ही कृष्ण को समाप्त कर दैवी आकाशवाणी से उपजे भय को समाप्त करना चाहता है। अतः नन्दग्राम के गोप समूह के स्वागत की विशेष व्यवस्था है। जैसे ही यह दल मथुरा के महाद्वार पहुँचा एक मदमस्त हाथी महावत के नियन्त्रण से बाहर हो गया और सीधा कृष्ण के दल पर चढ़ आया। आसपास के राहियों में हाहाकार मच गया। कुवलीयापीड़ नाम का यह विशाल हाथी मथुरा में कुख्यात था। अपराधियों को पैरों तले कुचलकर मृत्युदण्ड देने का इसे प्रशिक्षण प्राप्त था। आज कंस ने उसका नियोजन अपने भानजों को मारने के लिये किया था। योजना के अनुसार ही उसे खुब दारू पिलाकर ठीक कृष्ण के आगमन के समय वहाँ अंधादुंध तबाही मचाने के लिये छोड़ दिया गया था।

वीर के बल की परिक्षा थी यह। केवल साहस या युक्ति से काम नहीं चलने वाला। यहाँ तो शारीरिक बल की परिक्षा थी। कुवलीयापीड़ ने कृष्ण भगवान् को अपनी सूँड़ में में पकड़ने का प्रयास किया। ताकि दूर उछालकर फेंक दे। पर कान्हा तो चपलता से उसकी सूँड पर ही चढ़ गये। अब कृष्ण उपर थे। हाथी जोर जोर से हिलाकर उन्हे गिराने का प्रयास कर रहा था। पर अब आक्रमण नन्दलाला के पास था। शक्ति देखों कितनी प्रचण्ड, उन्होंने एक ही झटके में कुवलीयापीड़ के दांत को उखाड़ फेंका और अपने शक्तिशाली मुष्टिकाप्रहारों से उसके मस्तक पर आघात किया। मर्म पर किये घातक प्रहारों से वह बलवान हाथी भी मुर्छित हो गया। कहते है कि कृष्ण ने सूँड पकडकर उस हाथी को उठाया और गोल गोल घुमाकर दूर फेंक दिया। कुवलीयापीड़ की मुक्ति हो गई। गोपकुमारों ने नन्दलाल के जयघोषों से मथुरा को गुंजा दिया। कंस के आतंक से भयभीत मथुरावासियों के मन में अपने उद्धार की आशा जगी।

उत्सव में अनेक आयोजन थे। पर मुख्य आयोजन जहाँ स्वयं मथुराधीश कंस विराजमान थे वो था मल्लयुद्ध का आखाड़ा। कुश्ति भी मरणांतक। एक मल्ल के मरने पर ही दूसरा विजयी होगा। कंस के सबसे भयानक मल्ल थे चाणूर और मुष्टिक। दोनों राक्षसों समान की महाकाय तो थे ही अति क्रूर भी जाने जाते थें। अत्यन्त विभत्स तरिके से विरोधी पहलवानों को मारते थें। वे कंस की आतंकी योजना का दूसरा चरण थे। कंस ने उन दोनों से कहा था, ‘‘वो मायावी वसुदेव पुत्र यदि किसी प्रकार कुवलीयापीड़ के पैरों से बच भी निकला तो आप दोनों उन दोनों भाइयों को मल्लयुद्ध के लिये ललकारना। आखाड़े की लाल माटी में ही उनके सुकोमल शरीर कुचल देना।’’

योजना के अनुसार चाणूर और मुष्टिक ने कान्हा और दाऊ को ललकारा। साथी गोप भी उन अतिकाय दैत्यों को देखकर चुनौति स्वीकार करने को मना कर रहे थे। मथुरावासी भी इन बालकों के सुकोमल शरीरयष्टि को देखकर चिंतित थे। पर दोनों भाई तत्पर थे। एकदूसरे की ओर देखकर मुस्कुराये और आखाड़ें में उतर गये। सबको लग रहा था कि ये तो एक तरफा युद्ध होगा। पर इन बालकों को अपनी क्षमता की सीमा का भान था। अतः उन्होंने क्रमशः चाणूर व मुष्टिक की ही शक्ति का प्रयोग करना प्रारम्भ किया। दोनों में चपलता अद्भूत थी। अपनी चपलता से कम से कम शक्ति का प्रयोग करते हुए बलवान विराधी के वारों से वे बचते रहे। अपने सारे दाँव निष्फल होते देख चाणूर-मुष्टिक खीजते गये। और जोर से वार करते गये। कान्हा-दाऊ बचते जाते और खिखिलाकर हँसते जाते। उनके हँसने से कंस के दैत्य और गुस्सा कर और जोर से आक्रमण करते। कान्हा की योजना थी अपने सामर्थ्य का समुचित प्रयोग। कृष्ण और बलराम के पास पाश्विक बल भले ही चाणूर मुष्टिक जैसा ना हो पर युवा होने के कारण चपलता और तितिक्षा (Stamina) निश्चित ही अधिक थे। उन्होंने उसी का प्रयोग किया। चपलता से बचाव करते हुए चाणूर मुष्टिक को थका दिया। और जब तितिक्षा के अंतिम पड़ाव पर दोनों थककर हाँफने लगे तब अपने दाँव लगाये। ओर कुछ ही क्षणों मे दोनों को अपनी दुर्गति से मुक्त कर दिया।

सारी मथुरा कृष्ण के जयघोष से गूँज उठी। कंस ने कान्हा को कैद करने का आदेश दिया। पर उससे पूर्व ही कृष्ण ने दौड़कर सिंहासन से कंस को नीचे खींच लिया। अवाक् कंस सम्हले उससे पूर्व ही अपनी शक्तिशाली मुष्टिका से मर्माघात कर मथुरा को और अपने माता -पिता वसुदेव देवकी को आतंक की कैद से मुक्त कर दिया।

हमारे व्यक्तित्व विकास के आंतरिक आयामों प्रेरणा, वीरता, धैर्य और विवेक का आत्मावलोकन, उत्साह और वैराग्य से कैसे विकास किया जाता है यह हमने महावीर हनुमान तथा नचिकेता के उदाहरणों से देखा था। अब हम अपने व्यक्तित्व के बाहरी आयामों के विकास की ओर मुड़ रहे है। हमारा व्यक्तित्व प्रगट तो शरीर के माध्यम से ही होता है। इसीलिये कहा है शरीरमाद्यम् खलुधर्म साधनं। शरीर धर्म पालन का प्रथम साधन है। सबसे पहला आयाम है-यह शारीरिक बल। बलवान् शरीर का अर्थ केवल पशुवत् शक्ति से नहीं है। वजन उठाने की क्षमता होना तो ठीक ही है। उसे शक्ति (Power) कहते है। पर केवल इससे ही काम नहीं चलता। इसके साथ ही चपलता (Dexterity) और तितिक्षा (Stamina) भी चाहिए। चपलता के लिये अंगो में लचीलापन भी चाहिये और सहजता से उनके संचालन का कौशल भी। तितिक्षा वास्तव में फेफड़ों की क्षमता है। श्वास को अधिक समय तक धारण करने की क्षमता है तितिक्षा।

तीनों के विकास के लिये नियमित व्यायाम आवश्यक है। तितिक्षा के लिये दौड़ लगाना सर्वौत्तम है। सभी अंगों के लचीले और संतुलित विकास के लिये सूर्यनमस्कार सबसे उत्तम है। पर केवल 12 से काम नहीं चलेगा, कम से कम 50 तो करने ही चाहिये। 108 करना सर्वोत्तम। समर्थ रामदास प्रतिदिन 1200 सूर्यनमस्कार लगाते थे। आजकल आधुनिक युवा यन्त्रों की सहायता से व्यायाम करने Gym जाते है। सही निर्देशन में उससे तात्कालिक लाभ तो होता ही है पर देखा गया है कि कालांतर में मांसपेशियों के शिथिल होने की समस्या आती है। वैसे भी अधिकतर जिम जाने वालों का उद्देश्य वास्तविक बल प्राप्त करने के स्थान पर केवल दिखाउ सौष्ठव प्राप्त करना होता है। उसी हेतु अनेक यूवा घातक दवाइयाँ भी लेने लगे है। इन सबके दुष्परिणाम बड़े ही दुखद होते है। अतः इनसे बचना ही ठीक है। यदि सही तरिके से शारीरिक बल अर्थात शक्ति, चपलता, तितिक्षा (PDS- Power, Dextirity, Stamina) तीनों प्राप्त करने है तो नियमित मैदानी खेल खेलना आवश्यक है। यही कान्हा की विधि है। गाय चराते चराते खेल खेल में वीरो की टोली बना ड़ाली। हमारे देसी खेलों में शरीर की पूर्ण क्षमता के विकास की विधि है। क्रिकेट, फुटबोल जैसे आधुनिक खेलों में मनोरंजन तो होगा पर बलवर्द्धन निश्चित नहीं है। इसीलिये इसके खिलाड़ियों को तैयारी के लिये अलग से व्यायाम करना पड़ता है। गांव के खलिहानों में या संघ की शाखा में या विवेकानन्द केन्द्र के संस्कार वर्गों में खेले जाने वाले शेर-बकरी, किसान-लोमड़ी, कुक्कुट युद्ध, कबड्डी, दूग्र विजय जैसे मैदानी खेलों में ये सब विकास सहजता से हो जाता है।

तो आधुनिक नन्दलालों विड़ियो गेम्स छोड़ों ओर मैदान में चलों।

जनवरी 16, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

जाग उठी है तरुणाई !


विवेकानन्द जयंती १२ जनवरी “राष्ट्रीय युवा दिवस” पर विशेष:


‘‘मेरी आशा युवाओं में है। इनमें से मेरे कार्यकर्ता आयेंगे।’’ स्वामी विवेकानन्द ने कहा था। युवा शक्ति ने प्रतिसाद भी दिया और देश के लिये अपने आप को समर्पित कर दिया। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सम्मिलित क्रांतिकारी हो या असहयोग के शांतिपूर्ण मार्ग से विरोध प्रदर्शन करने वाले देशभक्त हो दोनों ही ने स्वामी विवेकानन्द से प्रेरणा प्राप्त की। वर्तमान में भी भारत को पुनः उस जागरण की आवश्यकता है।
शिकागों से लौटते ही रामेश्वरम के किनारे पर अपने सम्बोधन में स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘सूदीर्घ रजनी अब समाप्तप्राय सी दिखाई देती है। लम्बी काली रात टल गई अब उषा होने को है। यह सोया भारत जाग उठा है। केवल अन्धे देख नही सकते, विक्षिप्तबुद्धि समझ नहीं सकते कि यह सुप्त विराट जाग गया है। हिमालय से चल रही मंद शीतल लहर ने इस महाकाय को जगा दिया है। अपनी नियती को यह प्राप्त करके रहेगा। विश्व की कोई शक्ति इसे नहीं रोक सकती।’’
वर्तमान में एक ओर स्वामीजी की भविष्यवाणी सत्य होने के लक्षण दिखाई दे रहे है। देश की युवाशक्ति अनेक क्षेत्रों में नये नये कीर्तिमान गढ़ रही है। ज्ञान-विज्ञान, आर्थिक विकास, अंतरिक्ष तकनिक, संगणक, व्यापार आदि सब में भारतीय युवा पुनः अपने खोये गौरव को प्राप्त कर विश्व नेतृत्व की ओर अग्रेसर है। भारत विश्व का सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इतना ही नहीं विश्व के सर्वाधिक अभियंता व चिकित्सक निर्माण करने का श्रेय भी हमें ही है। इसके साथ ही इतनी बड़ी कुशल व अकुशल श्रामिक संख्या भी और किसी देश के पास नहीं है। जनसंख्या में चीन भले ही हमसे आगे हो किंतु उसकी औसत आयु प्रौढ़ता की ओर है और 3 वर्षों में वहाँ कार्यबल इतना कम हो जायेगा कि वर्तमान उत्पादकता बनाये रखने के लिये भी उसे अन्य आशियाई देशों की सहायता लेनी होगी। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो भारत का वर्चस्व सदा से ही रहा है।
किन्तु दूसरी ओर एक राष्ट्र के रुप में भारत की स्थिति बड़ी विकट है। देश चारों ओर से चुनौतियों से घिरा हुआ है। चीन व पाकिस्तान का आपसी गठजोड़ सामरिक रूप से भारत को चारों ओर से घेर रहा है। इसी समय हमारी प्रशासकीय व्यवस्था पूर्णतः चरमराई हुई दिखाई पड़ रही है। समाज में मूल्यों के ह्रास का संकट है। शासन द्वारा अल्पसंख्यकों के नाम पर चल रहा तुष्टीकरण का खेल फिर से विभाजन जैसे हालात पैदा कर रहा है। अर्थात चारों ओर चुनौती ही चुनौती है।


अवसर व चुनौती के एकसाथ सामने है ऐसे समय देश के युवाशक्ति को सन्नध होना होगा। अपनी तरुणाई को ललकार कर शक्ति को जागृत करना होगा। युवा की परिभाषा ही बल से है। स्वामी विवेकानन्द युवाओं से आवाहन किया करते थे, ‘‘मुझे चाहिये लोहे की मांसपेशियाँ, फौलाद का स्नायुतन्त्र व वज्र का सा हृदय।’’ शारीरिक बल, मानसिक बल व आत्मबल तीनों से युक्त युवा ही स्वामीजी का कार्य कर सकता है। स्थान स्थान पर फिर आखाड़े लगें। बलोपासना को पुनः जगाने का प्रसंग है। जागों युवा साथियों अपनी कमर कस कर खड़े हो जाओ। माँ की सेवा के लिये सामर्थ्य जुटाओं!
तरुणाई का आह्वान है तो साहस तो चाहिये ही। स्वामीजी के शब्दों में, ‘‘समुद्र को पी जाने का साहस, सागर तल की गहराई से माती चुन लाने का साहस, मृत्यु का सामना कर सके ऐसा साहस।’’ साहस की जागृति होती हे वीरव्रत के धारण करने से। युवा के जीवन में व्रत हो। व्रत के बिना जीवन व्यर्थ है। व्रत अर्थात संकल्प के साथ चुनौती धारण कर किया पूर्ण नियोजित कार्य। जागो भारती के पुत्रों वीरेश्वर विवेकानन्द के समान वीरव्रती बनों।
राष्ट्रीय चुनौतियों का प्रतिसाद भी राष्ट्रीय होना होगा। अतः सामर्थ्य व साहस से सम्पन्न युवाओं को संगठित होना होगा। स्वामी जी ने भारत को संगठन का मन्त्र देकर सामूहिक साधना की वैदिक परम्परा का पुनर्जागरण किया। उनकी प्रेरणा व विचार से ही देश में सकारात्मक कार्य करनेवाले सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक तथा वैचारिक संवा संगठनों का महाप्रवाह प्रारम्भ हुआ। वीर पूत्रों अपनी स्वार्थी तमनिद्रा को त्याग संगठित हो जाओ। सदियों की मानसिक दासता से उत्पन्न इर्ष्या का त्याग कर साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करनें को तत्पर हो जाओ। जहाँ जहाँ हो वही संगठित होकर देशसेवा में लग जाओ। स्वामीजी का आश्वासन हमारे साथ है, ‘‘मेरे बच्चों यदि तुम मेरी योजना पर कार्य करना प्रारम्भ कर दो तो मै सदा तुम्हारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करुंगा। इसके लिये मुझे बार बार ही क्यों ना जन्म लेना पड़े?’’
जागृत, सामर्थ्यशाली, वीर व संगठित तरुणाई को समर्पित भी होना होगा। समर्पण के बिना, आहुती के बिना तो सारा प्रयास ही अधुरा रह जाता है। स्वामीजी कहते है, ‘‘उठो! काम में लग जाओं! अपने आप को झोंक दो। कोई व्यक्तिगगत चिंता ना करों भगवति सब चिंता करेगी। मेरे बच्चों मै तुमसे अपार प्रेम करता हूँ। इसीलिये चाहता हूँ कि देश का काम करते करते तुम हँस कर मृत्यु का वरण करों!’’ कितना अद्भूत प्रेम! क्या हम इस अनल प्रेम का प्राशन करने के अधिकारी है? क्या इतना समर्पण है कि अपने आप को मिटाकर माँ भारती की सेवा में लग जाये?
स्वामी विवेकानन्द के 149 वी जयन्ति 12 जनवरी के अवसर पर हम संकल्पबद्ध होकर स्वामीजी को जन्मदिन पर अपने युवा जीवन का उपहार प्रदान करें। ताकि फिर गान गूँज उठे
जाग उठी है तरुणाई!!

जनवरी 11, 2012 Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

कोई शक या सवाल?


कर्मयोग 9:
प्रश्नों का गीता में बड़ा महत्व है। अर्जुन के प्रश्नों से ही गीता का प्रवाह आगे बढ़ता है। अन्यथा तो दूसरे अध्याय में भगवान ने अपनी बात पूरी ही कर ली है। जीवन में प्रश्नों का बड़ा महत्व है। ज्ञानप्राप्ति में उचित प्रश्नों का सही आदरयुक्त सेवाभाव से पूछा जाना आवश्यक होता है। कर्मयोग के रहस्यों को समझते समय हम यह भी कला विकसित करें ये आवश्यक है। मन में उठनेवाले हर प्रश्नवाचक विचार को ज्ञानकुंजी प्रश्न नहीं कहा जा सकता। अर्जुन जैसे सटीक प्रश्न मन में पकने देने होते है। सामान्यतः विचारश्रृंखला का प्रारम्भ जिज्ञासा से होता है। जिज्ञासा में हम ज्ञानप्राप्ति का प्रयत्न प्रारम्भ करते है। द्वितीय अध्याय में अर्जुन द्वारा स्थितःप्रज्ञ के लक्षणों के बारे में पूछना जिज्ञासा कि श्रेणी में आता है। कृष्ण द्वारा दूसरे अध्याय में प्रदत्त ज्ञानयोग व कर्मयोग के सिद्धांतों के आकलन से अर्जुन विषाद की स्थिति से बाहर आ गया है व जिज्ञासा को प्रगट कर रहा है। जिज्ञासा ज्ञान को ग्रहण करने की तत्परता को दर्शाती है। बिना जिज्ञासा के कितना भी श्रेष्ठ व्याख्याकार क्यों ना हो वह अपने उपदेश से तात्कालिक बौद्धिक क्षुधा शांति तो कर सकता है किन्तु ज्ञानदान नहीं। ज्ञानदान गुरु की योग्यता से भी अधिक शिष्य की तत्परता पर निर्भर करता है। इस जिज्ञासा को जागृत करना सच्चे गुरु का प्रथम कर्तव्य है।
किन्तु प्रथम प्रयास में सुने हुए उच्च सिद्धान्त कई बार हजम नहीं होते है। पूरा समाधान नहीं होता ऐसे में मन का भ्रम से सामना होता है। दो प्रगटतः परस्पर विरोधी सिद्धांतों में अपक्व बुद्धि भी सामंजस्य बैठाने का प्रयास करती है। पर हो नहीं पाता तब भ्रम होता है। भ्रमित मन से सटीक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते किन्तु जब भ्रम की स्थिति में हम किसी से मार्गदर्शन पाने का प्रयत्न करते है तब गुरु कितना भी ज्ञानी व सुयोग्य क्यों ना हो मन में शंका ही प्रगट होती है। तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में अर्जुन पूछता है
जायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन
तत् किं कर्मणी घोरे माम् नियोजयसि केशव।।गी 3.1।।
जब आप स्वयं ही कह रहे हो कि ज्ञान कर्म से अधिक श्रेष्ठ है तो फिर मूझे क्यों ऐसे भयंकर कर्म में धकेल रहे हो? यह सर्वाधिक सुयोग्य गुरु द्वारा प्रदत्त सर्वोच्च ज्ञान पर की गई शंका है। अगले श्लोक में तो अर्जुन स्पष्टता से अपने सम्भ्रम को मानता है और कृष्ण पर आरोप लगाता है कि आपकी मिश्रित बातों से ये हो रहा है।
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसिव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोSहमाप्नुयाम।।गी 3.2।।
ऐसी दोगली बातों से आप मेरी बुद्धि को भ्रमित कर रहे हो। कर्म करना श्रेष्ठ है अथवा ज्ञान के लिये कर्म का त्याग? इस संभ्रम और शंका में भी उसकी श्रद्धा अड़ीग है। अतः वह इस शंका की स्थिति में भी अपने शिष्यत्व को नहीं भूला है और कृष्ण से ही कह रहा है कि आप ही ऐसे में निश्चित करके बता दो कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है?
महर्षि अरविन्द कहते है श्रद्धा कभी भी अन्ध नहीं होती ना ही बिना प्रश्न के विश्वास करने को कहती है। श्रद्धा में तो प्रश्न पूछने की स्वतन्त्रता है। शिष्य के मन में कोई भय नहीं है कि मूझे गलत समझा जायेगा। या मेरे द्वारा शंका प्रगट करने पर गुरु मेरे प्रति दूर्भाव धारण करेगा। यदि ऐसी आशंका में प्रश्न पूछने का संकोच हे तो यह श्रद्धा की कमी है। श्रद्धावान के मन में ना तो कोई भय है ना ही आशंका अथवा संकोच। बालक जिस प्रकार माता से निःसंकाच अपने मन की बात कह सकता है वैसे ही शिष्य अपने गुरु के सामने अपने अंतर की जिज्ञासा, भ्रम अथवा शंका को खुलकर प्रग्ट करता है। इस विश्वास के साथ कि यहाँ से उत्तर अवश्य मिलेगा। शंका का समाधान होगा। भ्रम का निरास होगा।
अर्जुन का कृष्ण से नितान्त स्नेह का सम्बन्ध है। इतना घनीष्ठ कि कोई दुराव या संकोच नहीं है। 11 वे अध्याय में विश्वरूप दर्शन के बाद अचंभित अर्जुन अपने सखासे क्षमा मांगता है
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।गी 11.41।।
तुम्हारी महिमा को ना जानते हुये मैने प्रेम में आपको कई मित्रवत् संबोधनों से पुकारा है। कृपया मेरी इस धृष्टता को क्षमा कर दें। इस सख्य के होते हुए भी अर्जुन का शिष्यत्व उच्च कोटी का है। और यदि हम गीता के मर्म को जानने का यत्न कर रहे है तो हमें अर्जुन सा शिष्यत्व प्राप्त करने के लिये प्रार्थना करनी चाहिये। दूसरे अध्याय के 7 वे श्लोक में शिष्यस्तेSहम शाधि माम् त्वां प्रपन्नं।।गी 2.7।। कहकर शरणागति प्राप्त करने के बाद से ही हम अर्जुन के संवादों में विषाद के स्थान पर शिष्यत्व की प्रगल्भता का विकास देखते है। जिज्ञासा, भ्रम और शंका की सिढ़ियों का पार करते हुये अर्जुन प्रश्न और उससे भी विकसित परिप्रश्न तक पहुँचता है और भगवान से अंतिम ज्ञान प्राप्त करता है।
चौथे अध्याय में ज्ञान की महिमा बताते हुये उसके प्राप्ति का माध्यम भी बताया है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः।।गी 4.34।।
प्रणिपात अर्थात विनम्र शरणागति, परिप्रश्न अर्थात अपने तप से तपा हुआ सटीक प्रश्न और सेवा से संतुष्ट हुए तत्वदर्शी ज्ञानीगण ज्ञान का उपदेश देते है। तीनों आवश्यक है। वर्तमान युग में शिक्षा में तर्क का आधार अधिक होने के कारण प्रश्नों का पकना सबसे कठीन है। विनम्रता व सेवा तो श्रद्धा से आ ही जायेगी किन्तु सही प्रश्न को अपने अन्दर पकाने का ध्यैर्य व सही गुरु से पूछने का विनम्र साहस आज के युग मे प्रयत्नपूर्वक विकसित करने पड़ेंगे।
गीता में अर्जुन की अनेक जिज्ञासायें हैं जैसे स्थितःप्रज्ञ के लक्षण पूछना,
स्थितःप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।। गी 2.54।।
या फिर पापाचरण का कारण पूछना
अथ केन प्रयुक्तोSयं पापं चरति पुरूषः।
अनिच्छन्नपि वाष्र्णेय बलादिव नियोजितः।। गी 3.36।।
बिना स्वयं की इच्छा के भी बलपूर्वक किस प्रेरणा से मनुष्य पाप का आचरण करता है? ये जिज्ञासायें है – अतन्त्य निष्पाप मन से पूछी गयी जानकारीयाँ। यह ज्ञान सर्वजनहिताय है।
किन्तु तिसरे अध्याय के प्रारम्भ कर्म व ज्ञान के चयन के बारे में पूछे उपरोक्त भ्रमजनित प्रश्न अथवा चौथे अध्याय में जन्मक्रम के भ्रम के बारे में पूछना
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानियां त्वमादौ प्रोक्तवान् इति।। गी 4.4।।
आपका जन्म तो विवस्वान के बाद हुआ है फिर हम ये कैसे मान ले कि आपने पूर्व में ही विवस्वान को यह कर्मयोग का ज्ञान बताया था? वैसे ही फिर पाँचवे अध्याय के प्रारम्भ में
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेयं एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं।।गी 5.1।।
कभी कर्म के सिद्धांत की बात करते हो पुनः फिर से कर्म योग की बात करते हो। हे कृष्ण इनमें से जो एक मेरे लिये श्रेयस्कर हो वो तय कर के मुझे बता दो। ये सारी शंकायें है। कृष्ण द्वारा बतायें गये उपदेश में जो ऊपरी विरोधाभास है उससे भ्रमित होकर पूछी गई शंकायें। पर एक बात स्पष्ट है शंका प्रगट करते समय भी अर्जुन स्पष्ट हे कि उसे क्या चाहिये। उसने ये नहीं कहा कि मुझे क्या भयेगा अथवा सहज होगा? ये पूछा है कि मेरे लिये क्या श्रेयस्कर है वा बताओ। हर बार श्रेय की चिंता है।
इन सब स्तरों में से पकते पकते अर्जुन की मेधा प्रश्न पूछने के लिये तैयार हुई और फिर अनेक जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं के बाद उसका प्रश्न प्रगट हुआ,
एवमेतद्यथत्थ त्वमात्मानं परमेश्वर।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।।गी 11.3।।
हे परमेश्वर आपका वह सर्वव्यापी रूप मै देखना चाहता हूँ। यदि सम्भव हो तो मुझे वह परम दर्शन करायें। इससे पूर्व पहले श्लोक में वह मान चुका हे कि उसका भ्रम दूर हुआ। अब मोह नहीं रहा।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेनं मोहोSयं विगतो मम।। गी 11.1।। आपके द्वारा कहे गये इन गुढ़ अध्यात्मज्ञान युक्त वचनों से मेरा मोह जाता रहा है। मोह के जाने के बाद प्रश्न प्रगट हुआ है। परमज्ञान की अनुभूति करने वाला प्रश्न। साक्षात्कार की भूमिका बना वह प्रश्न। जिस प्रश्न के उत्तर में अर्जुन को योगी, ज्ञानियों को भी दूर्लभ ऐसा विश्वरूप दर्शन हुआ वह प्रश्न। इसे ही परिप्रश्न कहते है। पूर्ण परिपक्व मेधा से उत्पन्न सटीक प्रश्न।
हम भी अपने अन्दर अर्जुन की श्रद्धा का जागरण करें। अपने मन की जिज्ञासाओं, भ्रम और शंकाओं को प्रगट करें। उसी में से प्रश्न को पूछने की परिपक्वता आयेगी। यदि मन में उठनेवाली शंकाओं को ही संकोच, भय अथवा उपहास की आशंका से दबा देंगे तो प्रश्न का पकना ही असम्भव हो जायेगा। और फिर ज्ञान की सम्भावना भी दूरस्थ होगी। सबसे बड़ी समस्या होती है कि किसे पूछे? सच्चा गुरु आज कहाँ मिलेगा?  यदि हमारा शिष्यत्व पक जाये तो गुरु को आना ही होगा। अभी तो किसी ऐसे सुहृद  से पूछना प्रारम्भ करे जिसके बारे में तीन बाते हमें निश्चित हो – 1. वह हमसे अधिक ज्ञानी वा अनुभवी है। 2. वह हमसे प्रेम करता है और हमारे ध्येय के बारे में सम्भवतः हमसे अधिक जानता है। 3. उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है।
ऐसा मार्गदर्शक मिलना कम से कम भारत में तो आज भी कठीन नहीं है। तो आज ही शुरू हो जाये पूछना चाहे जिज्ञासा हो, भ्रम हो या शंका? जैसे सेना में अधिकारी हर बात को समझाने के बाद अवसर देते हुए पूछता है – कोई शक या सवाल?

जनवरी 10, 2012 Posted by | योग | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

Fractured Democracy : Demands Surgery


People’s power was amply exhibited in different protests in the year 2011. In a democratic setup public opinion is very important factor in policy making. Hence there is always a concerted effort on the part of the establishment to mange the public perception. With the explosion of media of mass communication this task has become more and more specialized. Print media has its own influence in the class of people in the polpulation but the spread of electronic channels and then the sudden explosion of social media has given the masses multiple avenues to express there opinion. The first two are influenced by the government by spending enormous amounts on advertisements. But the internet being an open forum without much financial involvement it is very difficult for the governments all over the world to effectively control this.

Professional perception managers are employed to meet this unprecedented challenge. The art and science has been developing gin the developed countries for more than decade now but we are experimenting with this in last couple of years. This government is learnt to have used most expensive professionals available in the field. It was reported in some news papers that these agencies have been advising the prince of the ruling party on matters like how to dress? How to speak? How to pick up a child at appropriate moment to be photographed etc. Same report claimed that the couple of day’s growth seen on the face is also a planned move suggested by PMs –Perception managers. On a more serious stage an example of effective perception management was the Mumbai fast of Anna. It was reversal of perceptions that worked against India Against Corruption. Earlier IAC had successfully created a perception (without any professional help) that Janalokpal is the key to all the problems related to Governance. The central government very cleverly managed to put forth that they have come up with Lokpal. May not be copycat of JLP but nevertheless a Lokpal is here. This created an overwhelming impression in the public mind that Mumbai fast is just an ego boosting exercise. Hence we did not see the response as before. It was naive on the part of team Anna to think that they are in an honest fight. They proved to be politically immature to match the choreography of the political managers of the government. Basically Bharatiya Public wants to believe in the Rule of law. They tend to follow the government even if little less than perfect. Agitation is only an extreme measure. The UPA had failed to give this room for an alternative earlier in April and August. After the 4th June crack down on the peaceful gathering of fasting protestors including women and children in the Ramlila grounds created an out rage. Public felt cornered hence the agitations got mass support. This time around the government was successful in creating a perception that the effort is on and there are parties like TMC apart from the opposition who are grinding the Govt for strong Lokpal, hence no need for extracurricular measures. This is most typical how Bharat works.

There is another extreme in the discourse. They claim that the system and not the governing group are responsible for the mess. The Democratic set-up adopted by Bharat is the root cause of all the problems. Even the team Anna members criticized the practice MPs following the party line. They demanded removing the provision of whip so that individuals can vote in the parliament according to their own thinking. This is height of duplicity. On one hand we are talking about people’s right to recall and on the other we want the MPs not to follow party discipline. The legal provisions of whip were strengthened by anti defection law after the repeated horse-trading episodes in the 1980s. An MP is elected on the party symbol. It is not his individual win. The party policy is projected to the public in the election; they are supposed to have voted accordingly. To claim that the individual will be in a better position to take moral position than within the party mandate may open flood gates for more dangerous corruption in the houses of Parliament. In fact the present irony of coalitions is also a great drama of our flawed democracy. The parties which fought against each other in the election come together and form the government. On one hand at the central level support of parties is bought by CBI threats or relaxations, on the other hand the same parties are target of vicious campaign at the State level.

But can we blame Democracy for all this? Contention that Democracy is the root cause of all the evil does not hold good in an objective analysis. Any other alternative will be inherently more prone to dishonesty and exploitation. Democracy as such at least notionally has the potential of generating people’s power as witnessed in the “Samagra Kranti” led by Jaiprakash Narain in 1977 and again during the Ayodhya agitation in 1992. The same was done apolitically last year. We can definitely infer that present form of democracy has created systemic faults that are responsible for the failure of governance mechanism in the country today. But to say that per say Democracy need to be negated does not go with the times. We will have to win the game by following the rules of the game. Reforms are no doubt needed in our democratic system. But we will have to demand reforms in accordance with the evolved system and not totally out of box.

Theoretically speaking, there are two forms of practicing Democracy. A > Direct Democracy – This is said to be practiced in the city states of Athens or some of the Ganas in the northern Bharat at the time of Alexander’s attack. The citizens directly participate in the governance process in legislature and they elect the executive, even the Judiciary in some cases.

B> Representative Democracy- The Westminster model that we have adopted as a legacy of British Raj. In this the representatives are elected by the citizens and they in turn ‘choose’ the Executive. Mostly the Judiciary is not elected but selected.

Both the models have their pros and cons. US has hybridized the two systems. It has direct elections for the executive heads in the states as well as at the Federal level. At the same time there is a representative houses for legislation primarily but it also serves as a regulatory authority on the Executive.  It seems the Judiciary is also elected in most of the States in US.

We, in Bharat seem to have made a total mess of the democratic principles. The most important of which is the Rule of the majority. Whether in the direct or representative democracy it is the majority that should decide the policy. The elections should ensure that the winning representative of the citizens should have the backing of at least one more than 50% of the polled votes. Here, in Bharat the Decorative head, President, is elected by indirect elections. The more damaging constitutional provision is that the executive Head, Prime-minister, as well need not even be elected directly. Present PM is Rajyasabha member, where the election does not involve citizen’s vote directly. But to continue as the Prime-minister he must always have backing of Majority Members of Loksabha. There 1+50% is mandatory. But the MPs are elected by a process where they do not need to have majority vote in their respective constituency. So, we have MPs who won the elections by securing only 7% of the polled votes. There are hardly a few members who can claim to have got more than 50% of the polled votes in their own Loksabha seat.

This is systemic failure of the democracy. We do not have democracy in practice here even in the constitutional provisions, it is only notional. Hence the rise of elite ruling class and also the evolution of increasingly divisive politics based on all the possible fault lines of caste, region, language or religion. The only thing the politician has to make sure to win an election is to divide others into enough groups to make his group largest. This is inherent in the system.

We can not hope to have any reforms unless we change this basic flaw in the democratic set-up. Two basic demands need to be put forward.

1)      Direct election of the head of the executive, Prime minister in present scenario. This will need constitutional amendment hence very difficult in the era of coalition politics in which even small regional parties have disproportionate importance and value. But we must start a discourse to create a demand for this. The other alternative is Presidential form of government with direct election of the President being the first step.

2)      Demand for making 1+50% as the winning criterion in all the elections from Panchayat to Rashtrapati. This is relatively easier. It can be done by amending the Peoples Representative act. This can be done by simple majority. The major two political parties are expected to benefit most by this reform so it can be done with consensus. It is morally and logically very sound argument and no one ca deny that those who are denied support by the majority of the voters in their constituency have no right to represent people.

These are not the magic wand reforms which will cure all the evils of our system. Ultimately we need to go beyond the historical experience of just a couple of centuries. The present day system has evolved out of the British raj and has its Historic roots in the colonial period. But for the final cure we will have to go to root cause and for that we will have to still deeper in the Historical experience of the nation. We have known history of more than 5000 years with a golden era every second century. We led the world in economic prosperity, Education, Science and Technology and most importantly a peaceful socio-political system. We had variety of political experiments. We can not bring back the diverse political systems which existed in different parts of Bharat. Hindus have always believed in diversity of expression of the same principle. We followed it in political systems also. The Chakravartis respected the existing system of the conquered state and allowed it to continue. We had so many variations of political systems Gana-rajya with total direct democracy on one end of the spectrum to different forms of complex structures like the Magadha Empire. There were systems where only women ruled. But the basic principle of rule was Dharma. That was the common thread.

What we lack today is the Dharmik System. Today we have to accept the system that has evolved and apply the Dharmik principles to it. That is the Hindu way of digesting the alien. We need a fresh Smriti to interpret Sanatana Dharma according to present day society and to codify Yugadharma. This is our indigenous idea of constitution. We need a Smriti instead of this cut & paste document, that we call Constitution of India.

The parliament house has drawn inspiration for its architecture from the Chausath Yogini Temple in Mitawali, Madhya Pradesh in the same way our democratic structure needs to be based on the sound foundations of the principles of the Dharma of the land. The fractured Democracy demands a complete surgery not just cosmetic make-over.

जनवरी 7, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी, English Posts | , , , , , , , , , , , , , , , | 4 टिप्पणियाँ

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