उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मात्रा भेद


कल तक 
अनन्त के दर्शन से
थे जो विस्मित !
अब आत्मबल विहीन
क्यों हो गये
शंकित?

विस्मयादि बोध ‘!’
के स्थान पर
प्रश्नचिह्न ‘?’
लग गये।

जड़ का चेतन से
देखो कैसा
कार्य-कारण सम्बन्ध . . .
मात्र एक मात्रा के
बदलने से
सारे ‘गुण’
बदल गये !!!

जनवरी 6, 2012 - Posted by | कविता

1 टिप्पणी »

  1. ji bilkul /devnagari ki yahi to visheshata hai.bahut sundar vishleshan hai apaka.Dhanyosmi .

    टिप्पणी द्वारा Bhanwar Singh Rajput | जनवरी 8, 2012 | प्रतिक्रिया


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