उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

जाग उठी है तरुणाई !


विवेकानन्द जयंती १२ जनवरी “राष्ट्रीय युवा दिवस” पर विशेष:


‘‘मेरी आशा युवाओं में है। इनमें से मेरे कार्यकर्ता आयेंगे।’’ स्वामी विवेकानन्द ने कहा था। युवा शक्ति ने प्रतिसाद भी दिया और देश के लिये अपने आप को समर्पित कर दिया। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में सम्मिलित क्रांतिकारी हो या असहयोग के शांतिपूर्ण मार्ग से विरोध प्रदर्शन करने वाले देशभक्त हो दोनों ही ने स्वामी विवेकानन्द से प्रेरणा प्राप्त की। वर्तमान में भी भारत को पुनः उस जागरण की आवश्यकता है।
शिकागों से लौटते ही रामेश्वरम के किनारे पर अपने सम्बोधन में स्वामी विवेकानन्द ने कहा था, ‘‘सूदीर्घ रजनी अब समाप्तप्राय सी दिखाई देती है। लम्बी काली रात टल गई अब उषा होने को है। यह सोया भारत जाग उठा है। केवल अन्धे देख नही सकते, विक्षिप्तबुद्धि समझ नहीं सकते कि यह सुप्त विराट जाग गया है। हिमालय से चल रही मंद शीतल लहर ने इस महाकाय को जगा दिया है। अपनी नियती को यह प्राप्त करके रहेगा। विश्व की कोई शक्ति इसे नहीं रोक सकती।’’
वर्तमान में एक ओर स्वामीजी की भविष्यवाणी सत्य होने के लक्षण दिखाई दे रहे है। देश की युवाशक्ति अनेक क्षेत्रों में नये नये कीर्तिमान गढ़ रही है। ज्ञान-विज्ञान, आर्थिक विकास, अंतरिक्ष तकनिक, संगणक, व्यापार आदि सब में भारतीय युवा पुनः अपने खोये गौरव को प्राप्त कर विश्व नेतृत्व की ओर अग्रेसर है। भारत विश्व का सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाला देश बन गया है। इतना ही नहीं विश्व के सर्वाधिक अभियंता व चिकित्सक निर्माण करने का श्रेय भी हमें ही है। इसके साथ ही इतनी बड़ी कुशल व अकुशल श्रामिक संख्या भी और किसी देश के पास नहीं है। जनसंख्या में चीन भले ही हमसे आगे हो किंतु उसकी औसत आयु प्रौढ़ता की ओर है और 3 वर्षों में वहाँ कार्यबल इतना कम हो जायेगा कि वर्तमान उत्पादकता बनाये रखने के लिये भी उसे अन्य आशियाई देशों की सहायता लेनी होगी। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो भारत का वर्चस्व सदा से ही रहा है।
किन्तु दूसरी ओर एक राष्ट्र के रुप में भारत की स्थिति बड़ी विकट है। देश चारों ओर से चुनौतियों से घिरा हुआ है। चीन व पाकिस्तान का आपसी गठजोड़ सामरिक रूप से भारत को चारों ओर से घेर रहा है। इसी समय हमारी प्रशासकीय व्यवस्था पूर्णतः चरमराई हुई दिखाई पड़ रही है। समाज में मूल्यों के ह्रास का संकट है। शासन द्वारा अल्पसंख्यकों के नाम पर चल रहा तुष्टीकरण का खेल फिर से विभाजन जैसे हालात पैदा कर रहा है। अर्थात चारों ओर चुनौती ही चुनौती है।


अवसर व चुनौती के एकसाथ सामने है ऐसे समय देश के युवाशक्ति को सन्नध होना होगा। अपनी तरुणाई को ललकार कर शक्ति को जागृत करना होगा। युवा की परिभाषा ही बल से है। स्वामी विवेकानन्द युवाओं से आवाहन किया करते थे, ‘‘मुझे चाहिये लोहे की मांसपेशियाँ, फौलाद का स्नायुतन्त्र व वज्र का सा हृदय।’’ शारीरिक बल, मानसिक बल व आत्मबल तीनों से युक्त युवा ही स्वामीजी का कार्य कर सकता है। स्थान स्थान पर फिर आखाड़े लगें। बलोपासना को पुनः जगाने का प्रसंग है। जागों युवा साथियों अपनी कमर कस कर खड़े हो जाओ। माँ की सेवा के लिये सामर्थ्य जुटाओं!
तरुणाई का आह्वान है तो साहस तो चाहिये ही। स्वामीजी के शब्दों में, ‘‘समुद्र को पी जाने का साहस, सागर तल की गहराई से माती चुन लाने का साहस, मृत्यु का सामना कर सके ऐसा साहस।’’ साहस की जागृति होती हे वीरव्रत के धारण करने से। युवा के जीवन में व्रत हो। व्रत के बिना जीवन व्यर्थ है। व्रत अर्थात संकल्प के साथ चुनौती धारण कर किया पूर्ण नियोजित कार्य। जागो भारती के पुत्रों वीरेश्वर विवेकानन्द के समान वीरव्रती बनों।
राष्ट्रीय चुनौतियों का प्रतिसाद भी राष्ट्रीय होना होगा। अतः सामर्थ्य व साहस से सम्पन्न युवाओं को संगठित होना होगा। स्वामी जी ने भारत को संगठन का मन्त्र देकर सामूहिक साधना की वैदिक परम्परा का पुनर्जागरण किया। उनकी प्रेरणा व विचार से ही देश में सकारात्मक कार्य करनेवाले सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक तथा वैचारिक संवा संगठनों का महाप्रवाह प्रारम्भ हुआ। वीर पूत्रों अपनी स्वार्थी तमनिद्रा को त्याग संगठित हो जाओ। सदियों की मानसिक दासता से उत्पन्न इर्ष्या का त्याग कर साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करनें को तत्पर हो जाओ। जहाँ जहाँ हो वही संगठित होकर देशसेवा में लग जाओ। स्वामीजी का आश्वासन हमारे साथ है, ‘‘मेरे बच्चों यदि तुम मेरी योजना पर कार्य करना प्रारम्भ कर दो तो मै सदा तुम्हारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर कार्य करुंगा। इसके लिये मुझे बार बार ही क्यों ना जन्म लेना पड़े?’’
जागृत, सामर्थ्यशाली, वीर व संगठित तरुणाई को समर्पित भी होना होगा। समर्पण के बिना, आहुती के बिना तो सारा प्रयास ही अधुरा रह जाता है। स्वामीजी कहते है, ‘‘उठो! काम में लग जाओं! अपने आप को झोंक दो। कोई व्यक्तिगगत चिंता ना करों भगवति सब चिंता करेगी। मेरे बच्चों मै तुमसे अपार प्रेम करता हूँ। इसीलिये चाहता हूँ कि देश का काम करते करते तुम हँस कर मृत्यु का वरण करों!’’ कितना अद्भूत प्रेम! क्या हम इस अनल प्रेम का प्राशन करने के अधिकारी है? क्या इतना समर्पण है कि अपने आप को मिटाकर माँ भारती की सेवा में लग जाये?
स्वामी विवेकानन्द के 149 वी जयन्ति 12 जनवरी के अवसर पर हम संकल्पबद्ध होकर स्वामीजी को जन्मदिन पर अपने युवा जीवन का उपहार प्रदान करें। ताकि फिर गान गूँज उठे
जाग उठी है तरुणाई!!

जनवरी 11, 2012 - Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , ,

4 टिप्पणियाँ »

  1. Really unbelievable thoughts ……………………………..

    टिप्पणी द्वारा Dnyanda Babar | जनवरी 12, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. भैया जी को नमस्कार…..
    जैसा की आपने कहा आज अपने देश में युवाओं की संख्या बहोत ज्यादा है,
    लेकिन मै देखा रहा हू ज्यादातर युवा दिशाहीन है, गुमराह है, जीवन का ज्यादातर समय, करना क्या है? की स्थति में गुजर रहे है|
    गंभीरता का आभाव है, गंभीर मुद्दों को हस कर टाल देते है| ऐसी स्थति में युवा, कैसे इन चुनोतियों का सामना कर पायेगा….?
    २५-३० साल से पहले कोई अपने कर्म छेत्र में नहीं आ पता, क्या तब तक बेरोजगार युवा देश पर बोझ नहीं है..?
    आज की ये शिक्षा वयवस्था क्यूँ इतना समय लेती है….जिस छेत्र में कर्म करना है वो पहले क्यूँ तय नहीं कर पाते..?

    टिप्पणी द्वारा Devendra Singh Poonia | जनवरी 12, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. http://suvarnlife.wordpress.com

    nice thoughts and quotes….

    टिप्पणी द्वारा Prakash Depala | जनवरी 13, 2012 | प्रतिक्रिया

  4. Like this

    टिप्पणी द्वारा Patil prakash | जनवरी 13, 2012 | प्रतिक्रिया

  5. स्वामी विवेकानंद ने आधुनिक भारत में नए विचारों की जिस तरह सृष्टि की है उससे काफी कुछ सीखने की जरूरत है,हमारा समाज उनको महान बनाने में लगा है लेकिन उनके विचारों के प्रचार प्रसार और उस पर अमल के मामले में काफी पीछे है। स्वामी विवेकानंद की गरीबों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, वे हमेशा उनकी मुक्ति के बारे सोचते थे।
    इस प्रसंग में उन्होंने एक पत्र में लिखा है- “गरीबों के लिए काम की व्यवस्था करने के लिए भौतिक सभ्यता की,यहाँ तक विलास-बाहुल्य की आवश्यकता है।रोटी, रोटी ! मैं यह नहीं स्वीकार कि जो ईश्वर मुझे यहां रोटी नहीं दे सकता,वह स्वर्ग में मुझे अत्यन्त सुख देगा। उफ ! भारत को ऊपर उठाया जाना है ! गरीबों की भूख मिटायी जानी है ! शिक्षा का प्रसार किया जाना है !पंड़ो-पुरोहितों को हटाया जाना है ! हमें पंड़े-पुरोहित नहीं चाहिए ! हमें सामाजिक आतंक नहीं चाहिए ! हरेक को रोटी,हरेक के लिए काम की अधिक सुविधाएं चाहिए।”
    ( सेलेक्शन्स फ्रॉम स्वामी विवेकानन्द, पृ.862)

    टिप्पणी द्वारा रवि कुमार | जनवरी 15, 2012 | प्रतिक्रिया

  6. yeh mahan

    टिप्पणी द्वारा neeraj billaeya | जनवरी 24, 2012 | प्रतिक्रिया


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