उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

दे दी तुने आज़ादी या पायी है हमने बलिदानों से?


जो राष्ट्र अपने वीरों का सम्मान नहीं करता वह अपनी अस्मिता को खो देता है। ऐसे पाप तो रक्त से ही धोये जाते हैं। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ऐसे वीरों में से एक हे जिनके साथ देश के शासन ने न्याय नहीं किया। आज जब सारा देश इस वीर के जन्मदिन को मना रहा है तब इस अन्याय का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। सरकार भले ही स्वयं भूल जाये और प्रयत्नपूर्वक देश की नई पीढ़ियों को इतिहास के इस महत्वपूर्ण तथ्य से अनभिज्ञ रखें पर सत्य तो घनघोर बादलों को चीर कर आलोकित होनेवाले सूर्य के समान अपने आप को प्रगट कर ही देता है। पर जब प्रस्थापित व्यवस्था जानबूझकर बलिदानों को भूलाने के घोर पातक करती है तो कीमत पूरे राष्ट्र को चुकानी पड़ती है। क्यों आज भारत में समस्त क्षमताओं के होते हुए हम दुय्यम नेतृत्व की कायर नीतियों को सहनें के लिये विवश है? पूरे देश से ही वीरत्व ना केवल लुप्त हो रहा है इसे तिरस्करणीय बनाया जा रहा है। आतंक, साम्प्रदायिकता व भ्रष्टाचार से इस पावन मातृभूमि को बार बार क्षत विक्षत किया जा रहा है। सर्वस्व देश के लिये अर्पण करनेवाले वीर के बलिदान को भी जब विवादास्पद बना दिया जाता है; न्यूनगण्ड से ग्रसित नेतृत्व अपनी सत्ता को खोने के भय से जब अपने वीर राष्ट्रनायक को षड़यन्त्र पूर्वक जीवित ही समाधि में गाड़ देने के लिये संदेह से देखे जाते है तब पूरे राष्ट्र को अपने रक्त, स्वेद ओर मेद की आहुति से कीमत चुकानी पड़ती है।

कुछ वर्ष पूर्व जब अपने विराट योग शिविरों में स्वामी रामदेवजी ने यह प्रश्न पूछना शुरु किया कि हमको क्या अधिकार है कि हम, ‘‘दे दी तुने आज़ादी हमे बिना खड्ग बिना ढ़ाल’’ जैसे पूर्णतः असत्य गीतों को आलापकर हमारे वीरों के बलिदान का अपमान करें, तब इसे गांधी के विरुद्ध बात कहकर उनकी आलोचना की गई। पर क्या वर्तमान पीढ़ि को अधिकार नहीं हे कि वे इतिहास का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण समस्त उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर करें? क्या आज के दिन यह प्रश्न नहीं पुछा जाना चाहिये कि गीता का प्रतिदिन पाठ करने वाले हे महात्मा, अंधे धृतराष्ट्र के समान किस मोह में पड़कर तूने काँग्रेस अधिवेशन में लोकतान्त्रिक विधि से निर्वाचित सुभाषचन्द्र बोस को हटाकर अपने चमचे पट्टाभिसीतारामय्या को अध्यक्ष बनाया था? हम में से कम ही लोग इस ऐतिहासिक तथ्य से अवगत होंगे कि इसी विराट हृदय के योद्धा ने इस अन्याय के बाद भी मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी। नेताजी का प्रशंसा की अतिशयोक्ति में कहा गया विशेषण आज ऐसा चिपक गया है कि हम गांधी के निर्णयों का विश्लेषण ही नहीं करना चाहते। ऐसा करने का नाम लेना भी मानों घोर अपराध है।

पर 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के महत्वपूर्ण अध्याय का तो विश्लेषण करना ही होगा ना। महानायक सुभाष बाबू के जन्मदिन से अधिक उपयुक्त पर्व इस पावन कार्य के लिये और कौनसा होगा। आधुनिक भारत के निर्विवाद रुप से सबसे सशक्त इतिहासकार आर सी मजुमदार ने इस पूरी घटना के बारे में स्पष्टता से लिखा है। अहिंसा, ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के माध्यम से गांधी को भारत की स्वतंत्रता पूरा श्रेय देनेवाले इतिहास को रोज रोज पढ़नेवाले और ‘दे दी हमें . . .’ के तरानों को निर्लज्जता से दोहरानेवाले भारतवासी इस ऐतिहासिक सच्चाई को अवश्य पढ़े।

Majumdar, R.C., Three Phases of India’s Struggle for Freedom, Bombay, Bharatiya Vidya Bhavan, 1967, pp. 58-59. There is, however, no basis for the claim that the Civil Disobedience Movement directly led to independence. The campaigns of Gandhi … came to an ignoble end about fourteen years before India achieved independence…. During the First World War the Indian revolutionaries sought to take advantage of German help in the shape of war materials to free the country by armed revolt. But the attempt did not succeed. During the Second World War Subhas Bose followed the same method and created the INA. In spite of brilliant planning and initial success, the violent campaigns of Subhas Bose failed…. The Battles for India’s freedom were also being fought against Britain, though indirectly, by Hitler in Europe and Japan in Asia. None of these scored direct success, but few would deny that it was the cumulative effect of all the three that brought freedom to India. In particular, the revelations made by the INA trial, and the reaction it produced in India, made it quite plain to the British, already exhausted by the war, that they could no longer depend upon the loyalty of the sepoys for maintaining their authority in India. This had probably the greatest influence upon their final decision to quit India.

अंतिम पंक्ति में वे स्पष्ट लिखते है कि आज़ाद हिन्द सेना के वीरों के उपर चलाये गये देशद्रोह के मुकदमें में उजागर तथ्यों व उनपर पूरे देश में उठी प्रतिक्रियाओं के कारण द्वितीय महायुद्ध में क्षीण हुए ब्रिटिश साम्राज्य का भारत में टिका रहना असम्भव था। वे भारत में उनकी सेना के सिपाहियों पर विश्वास नहीं कर सकते थे। इस बात का भारत छोड़ने के उनके अंतिम निर्णय पर सर्वाधिक प्रभाव था।

नेताजी भारत छोड़कर विदेश जाने से पूर्व रत्नागिरी में स्थानबद्ध सावरकर से मिलने गये थे। सावरकर ने उन्हें द्वितीय महायुद्ध के समय विदेश में जाकर सेना गठित करने का सुझाव दिया। योरोप के क्रांतिकारियों से अपने सम्पर्क भी उन्होंने नेताजी को दिये। इन्हीं में से एक की सहायता से नेताजी अफगानिस्तान मार्ग से योरोप पहुँचे। सावरकर की योजना का दूसरा अंग था- ब्रिटिश सेना का हिन्दवीकरण अर्थात हिन्दूओं क सैनिकीकरण। कुछ वर्ष पूर्व अंडमान से सावरकर के नाम पट्ट को हटाने वाले देशद्रोही नेता सावरकर के जिस पत्र का हवाला देकर उन्हें अंग्रजों का एजण्ट कहते थे वही पत्र सावरकर की चाणक्य नीति का परिचायक है। सावरकर ने अंग्रेजों को इस बात के लिये अनुमति मांगी कि वे देशभर घूमघूम कर युवाओं को सेना में भरती होने का आवाहन करना चाहते है। महायुद्ध के लिये सेना की मांग के चलते सावरकर को स्थानबद्धता से मुक्त किया गया। सावरकर ने देशभर में सभायें कर हिन्दू युवाओं से सेना में भरती होने को कहा। एक अनुमान के अनुसार उनके आह्वान के प्रत्यूत्तर के रूप में 6 लाख से अधिक हिन्दू सेना में भरती हूए। एक साथी के शंका करने पर सावरकर ने उत्तर दिया कि 20 साल पूर्व जिस ब्रिटिश शासन ने हमारे शस्त्र छीने थे वह आज स्वयं हमें शस्त्र देने को तत्पर है। एक बार हमारे युवाओं को शस्त्रबद्ध हो जाने दों। समय आने पर वे तय करेंगे कि इसे किस दिशा में चलाना है।

योजना यह थी कि बाहर से सुभाष की आज़ाद हिन्द सेना चलो दिल्ली के अभियान को छेड़ेगी और जब उनसे लड़ने के लिये अंग्रेज भारतीय सेना के भेजेंगे तो यह सावरकरी युवक विद्रोह कर देंगे। हिरोशिमा व नागासाकी पर हुए अमानवीय आण्विक हमले के कारण जापान के असमय युद्धविराम कर देने से यह योजना इस रूप में पूण नही हो सकीं। किन्तु भारत के स्वतन्त्रता अधिनियम को ब्रिटिश पार्लियामेण्ट में प्रस्तुत करते समय प्रधानमन्त्री क्लेमण्ट एटली द्वारा दिये कारण इस योजना की सफलता को स्पष्ट करते है। उन्होंने अपनी असमर्थता में सेना के विद्रोह की बात को पूर्ण स्पष्टता से कहा है। गांधी के ‘भारत छोड़ो’ अथवा सविनय आज्ञाभंग का उसमें कतई उल्लेख नहीं मिलता। आज़ाद हिन्द सेना का भय व भारतीय सेना पर अविश्वास के अलावा बाकि कारण केवल दिखावटी सिद्धान्त मात्र है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय के पुर्व मुख्य न्यायाधीश पी वी चक्रवर्ति के 30 मार्च 1976 को लिखे पत्र से स्पष्ट है कि एटली ने उन्हें साफ शब्दों में भारत की स्वतन्त्रता के समय ब्रिटिश सोच के बारे में बताया था।

Dhanjaya Bhat, Writing in The Tribune,Sunday, February 12, 2006. Spectrum Suppl.

Which phase of our freedom struggle won for us Independence? Mahatma Gandhi’s 1942 Quit India movement or The INA army launched by Netaji Bose to free India or the Royal Indian Navy Mutiny of 1946? According to the British Prime Minister Clement Attlee, during whose regime India became free, it was the INA and the RIN Mutiny of February 18–23, 1946 that made the British realize that their time was up in India. It has been argued that when the leaders of the Congress were finally released, they came out as tired and broken men. This allowed the British and the sectarian parties to press home the advantage and negotiate better terms for themselves. An extract from a letter written by P.V. Chuckraborty, former Chief Justice of Calcutta High Court, on March 30, 1976, reads thus: “When I was acting as Governor of West Bengal in 1956, Lord Clement Attlee, who as the British Prime Minister in post war years was responsible for India’s freedom, visited India and stayed in Raj Bhavan Calcutta for two days`85 I put it straight to him like this: ‘The Quit India Movement of Gandhi practically died out long before 1947 and there was nothing in the Indian situation at that time, which made it necessary for the British to leave India in a hurry. Why then did they do so?’ In reply Attlee cited several reasons, the most important of which were the INA activities of Netaji Subhas Chandra Bose, which weakened the very foundation of the British Empire in India, and the RIN Mutiny which made the British realise that the Indian armed forces could no longer be trusted to prop up the British. When asked about the extent to which the British decision to quit India was influenced by Mahatma Gandhi’s 1942 movement, Attlee’s lips widened in smile of disdain and he uttered, slowly, ‘Minimal’.”

माननीय न्यायमुर्ति के अनुसार पूर्व प्रधानमन्त्री एटलीने दो बाते बिलकुल स्पष्टता से कही है – 1. गांधी का असहयोग व सविनय आज्ञाभंग का आंदोलन तो कबका समाप्त हो गया था। स्पष्ट प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि उसका प्रभाव ‘नहीं के बराबर’ था। 2. भारत छोड़ने की जल्दबाजी के मुख्य कारणों में सुभाष जी की आज़ाद हिन्द सेना और भारतीय शाही नौसेना में विद्रोह से उपजे अविश्वास को गिनाया।

अब इन तथ्यों पर चर्चा करने का समय आ गया है। केवल स्वतन्त्रता के श्रेय की बात नहीं, भारत के खोये आत्मविश्वास को पुनः पाने की बात है। कब तक भीरु बनकर मार खाने के तराने गर्व से गाते रहेंगे? दे दी तुने आज़ादी कहते लज्जा नहीं आती? अरे क्या किसी ने भीक्षा में दी है ये स्वतन्त्रता? वीरों ने अपने बासंती बलिदान से छीनी है अत्याचारी के क्रूर कराल जबड़े से माता की धानी चुनरियाँ।

‘दे दी . . ’ के कायर तराने छोड़ो! वीर सुभाष के जन्मदिन पर गर्व से सिंहगर्जन करों – दे दी तुने आज़ादी नहीं पायी है हमने बलिदानों से स्वतन्त्रता ! वीरों की शहादत ने छिनी है जालीम से आज़ादी। किसी का उपकार नही अपने लहू के पराक्रम की है ये गाथा।

हे वीर सुभाष! अच्छा ही है कि इस कायर सरकार के विज्ञापनों से अपवित्र नहीं है आपकी जयंति। हमारे हृदय की हर धड़कन में तेरा हर संघर्ष आज भी है जीवित। कसम है हमें किसी अज्ञात कोने में तुम्हारे अंतेष्टि को तरसते अस्थियों की – तुम्हारी गाथा को हम दुखान्तिका मे न बदलने देंगे। अपने पौरुष से तेरा खोया सम्मान पुनः दिलायेंगे।
जय हिन्द  . . .

जनवरी 23, 2012 - Posted by | चरित्र, सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , ,

4 टिप्पणियाँ »

  1. baba ramdev jese manch se hi yah satya janta tak pahunch sakata he. ham apne vyaktigat prayas to karenge hi.aap ko bahut bahut dhanyabad.

    टिप्पणी द्वारा manoj pathak | जनवरी 24, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. भैय्या लेख बहुत प्रभावी और प्रेरणादायी है. बहोत धन्यवाद.

    टिप्पणी द्वारा siddharam | जनवरी 24, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. Dhanyawad Bahut hi Achchha lekh hai or jaankari se Barpoor

    टिप्पणी द्वारा Mahender Vikram Singh | फ़रवरी 2, 2012 | प्रतिक्रिया

  4. aazadi gandhi ki wajah se nahin mili par dusre vishwayudhdh me briten tabaah ho chuka tha aur uske paas bhaarat ke i vyavastha chalane ko bhi paise nahin the aur dusre sab khazane to wo loot hi chuka tha so unho ne aazadi dene ka nirnay kiya aur hum gandhi ko mahaan samajte rahe jabke usne angrezo ke prastav par bantwara svikar kar liya kyuki use mahaan banane ki bahut jaldi thi.. jay hind jay bhaarat..

    टिप्पणी द्वारा mayur | जून 24, 2012 | प्रतिक्रिया


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