उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मै हूँ सबसे सुन्दर !


गढ़े जीवन अपना अपना -13

“बताओ! गुलाब क्यों सुन्दर होता है?” कुलकर्णी सर थे तो अंग्रजी के शिक्षक पर उनकी आदत थी कि कक्षा का प्रारम्भ किसी ना किसी प्रश्न से किया जाये। और लगभग हर बार प्रश्न ऐसा ही कुछ उटपटांग हुआ करता था। अब इसी को ले लो। गुलाब क्यों सुन्दर होता है? 7 वी कक्षा की बुद्धि के अनुसार छात्र उत्तर देते रहे, ‘गुलाब का रंग सुन्दर होता है इसलिये!’ किसी ने कहा उसकी पंखुड़ियों की रचना के कारण। कोई भी जबाब कुलकर्णी सर को संतुष्ट नहीं कर सका। वैसे भी उनके प्रश्नों का उत्तर उनके स्वयं के पास जो होता था वही उनको मान्य होता था। दो दिन का समय दिया गया छात्रों को ताकि घर में भी सब को पूछ सकें और फिर ये सिद्ध हो जाय कि कोई भी सही जबाब नहीं जानता। वैसे भी इस प्रश्न का माता -पिता भी क्या जबाब दें। ‘‘ये भी कोई बात हुई भला! गुलाब सुन्दर होता ही है अब इसमें क्यों क्या बताये। भगवान ने ही उसे सुन्दर बनाया है।’’

पढ़ते समय आप भी सोचने लगे ना कि गुलाब क्यों सुन्दर होता है? अब आपको कुलकर्णी सर का उत्तर बता ही देते है। सारे उत्तरों को खारीज कर देने के बाद ही शिक्षक वो उत्तर बताता है जो उसके अनुसार सही होता है और अक्सर छात्र इस बात से सहमत नहीं होते कि वो सही उत्तर है। पर कुलकर्णी सर का प्रश्न पूछने के पीछे हेतु ही अलग होता था। उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘गुलाब इसलिये सुन्दर होता है क्योंकि सब कहते है कि वो सुन्दर होता है। हर कवि कहता है, हर फिल्म में कहा जाता है कि तुम गुलाब सी सुन्दर हो। इसलिये हम भी मान लेते है।’’ देखा सर ने भी नहीं बताया कि क्यों गुलाब सुन्दर होता है? जब छात्रों ने ये बोला तो सर ने कहा, ‘‘मै तो बता दूँगा। पर मेरा पूछने का आशय ये था कि अधिकतर बाते हम जीवन में ऐसे ही मान लेते है क्योंकि सब कहते है। सोचते कहाँ है कि इसका वास्तविक अर्थ क्या है?’’

हम सब सुन्दर बनना चाहते है या सुन्दर दिखना चाहते है? शायद केवल दिखना चाहते है क्योंकि हम सोचते है सौन्दर्य तो ईश्वरीय देन है। अब हम जैसे पैदा हुए है वैसे ही तो नाक नक्श रहेंगे ना? हाँ! आजकल लोग प्रसाधन शल्य चिकित्सा (Cosmetic Surgery ) से अपने अंगो की रचना भी बदलने लगे है। सब के बस का ये भले ही ना हो पर कम से कम कुछ क्रीम पाउडर लगाकर सुन्दर दिखने का प्रयास तो सब करते ही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार अब इस मामले में पुरुषों ने महिलाओं को पीछे छोड़ दिया है। पुरुषों के लिये विशेष प्रसाधनों की बिक्री अब अधिक होने लगी है। हर कोई क्रीम लगाकर गोरा होना चाहता है। बाल बढ़ाकर या भिन्न भिन्न तरह से कटवाकर अपने आप को सुन्दर दिखाने की होड़ लगी है। वैसे इस प्रयास में गलत कुछ नहीं है। केवल ये सारे प्रसाधनों के विज्ञापन मात्र उल्लु बनाओ प्रोग्राम है। इससे सुन्दर व्यक्तित्व का कोई लेना देना नहीं।

किसी कवि ने कहा ही है ना कि सौन्दर्य तो देखनेवाले की दृष्टि में होता है। इसका अर्थ हुआ सुन्दरता का अर्थ है आकर्षित करने की क्षमता। तो गुलाब भी इसीलिये सुन्दर है क्योंकि वह सबको आकर्षित करता है। मन मोह लेता है। यह आकर्षण विशेषता से आता है। दिखने की विशेषता या सुगन्ध की या फिर रचना की। कुछ अलग हटके होगा तो आकर्षण होगा। शायद इसीलिये शोभाचार (Fashion) के नाम पर कुछ ना कुछ विचित्र ही किया जाता है। चित्र विचित्र केशभूषा व वेषभूषा के द्वारा अलग दिखने से लोग आकर्षित होंगे ऐसा विचार होता होगा। पर विड़म्बना देखो। कोई शोभाचार चल जाये, लोकप्रिय हो जाये तो सब वैसे ही बाल कटवाने लगते है और फिर आप अलग दिखने की जगह सभी बन्दरों की तरहा ही लालमुहें दिखने लगते है। सब एक जैसे हो जाये तो फिर आकर्षण कहाँ रहा?

व्यक्तित्व के बाहरी पहलुओं में बल के बाद रूप दूसरा महत्वपूर्ण पहलु है। आकर्षक रूप का विकास भी व्यक्तित्व के विकास का अंग है। कृष्ण के नाम का ही अर्थ है आकर्षित करने वाला। कर्षयति इति कृष्णः। उसकी बांसुरी के पीछे मनुष्य ही क्या पशु पक्षी सब खींचें चले आते थें। रंग काला है गोरा नहीं। कपड़े भी सामान्य पीले रंग के वस्त्र, आभूषण के नाम पर पत्तों की माला और मोर मुकुट। फिर भी विश्व इतिहास का सबसे आकर्षक व्यक्तित्व। तो मानना ही पड़ेगा ये कुछ और बात है। इस सौंदर्य के तत्व को समझना होगा। बाहरी नकल से काम नहीं चलेगा, हमारे अन्दर के कृष्ण को जगाना होगा तभी वास्तविक सुन्दरता का जागरण होगा। सुन्दर दिखने की कोशिश के स्थान पर सुन्दर बनने की कोशिश करनी होगी तो आकर्षण अपने आप आ ही जायेगा।

सुन्दरता का प्रगटीकरण भले ही बाहरी हो पर उसका उद्गम तो भीतर से होता है। सुन्दरता की पहली आवश्यकता है पवित्रता। शरीर, मन और वाणी की पवित्रता। शौच अर्थात शुद्धि को योग में बड़ा महत्व दिया गया है। शरीर शुद्ध ही नहीं होगा तो उपर से कितना भी सजा लो आकर्षण कैसे आयेगा? हमको स्नान के तुरन्त बाद अनुभव होनेवाली ताजगी में कितना सौन्दर्य छिपा है। स्नान के बाद हमारा रूप सर्वोत्तम होता है। फिर हम उपर से प्रसाधन चुपड़कर उसे अपवित्र बना लेते है। नियमित पूर्ण स्नान भी सुन्दर बनने का सहज साधन है। शरीर को शुद्ध रखने की और भी कई विधियाँ योग में बताई गई है। ज्ञाता प्रशिक्षक से सीखकर करने से लाभ होगा। इसीलिये यहाँ उनका वर्णन नहीं कर रहे। बिना प्रशिक्षक के मार्गदर्शन के केवल पढ़कर करने से दुष्परिणाम हो सकते है। वैसे संकल्प के साथ रोज स्नान भी पर्याप्त है। मन की शुद्धि भी अत्यावश्यक है। विचार में शुद्धता का अर्थ है उपर उठाने वाले विचार, विस्तार देनेवाले विचार, बिना छल कपट के विचार। नाक नक्श अच्छे होने के बाद भी विचार दुष्ट या कपटी होने से आकर्षण चला जाता है। वाणी की शुद्धता भी सौन्दर्य को निखरने में अनिवार्य है। सदाचार पर विचार करते समय इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे।

सुन्दर रूप का दूसरा घटक है प्रसन्नता। कितने भी संतुलित अंग हो, रुप सुहाना हो पर क्या रोते हुए कोई आकर्षक लग सकता है? अतः सतत प्रसन्न रहने का स्वयं को प्रशिक्षण देना होगा। जरा सोचिये बिना किसी बाहरी प्रेरणा के हमारा भाव क्या होता है? प्रसन्नता का या चिंता का या कष्ट का? जब कोई नहीं है, कोई देख नहीं रहा क्या तब हम प्रसन्न होते है? जो अपने आप से प्रसन्न रहता है वो मदमस्त ही सबसे आकर्षक होता है। मुस्कुराने के लिये कोई कारण नहीं चाहिये। वो हमारा सहज स्वभाव बन जाये। कारण तो दुखी होने के लिये आवश्यक हो।

आकर्षण का तीसरा अनिवार्य अंग है प्रमाणबद्धता या सुव्यवस्था। आकर्षण का सबसे बड़ा उदाहरण है चुम्बक। लोहे और चुम्बक की रासायनिक रचना एक ही है फिर भी चुम्बक में आकर्षण है और लोहे में नहीं है। पर उसी सादे लोहे के टुकड़े को चुम्बक पर लगातार घिसने से वो भी चुम्बक बन जाता है। दोनों के आयनों की संरचना में भेद है। लोहे के आयन अस्त व्यस्त है तो चुम्बक के आयन दक्षिण और उत्तर धृवों के बीच पंक्तिबद्ध हो गये है। लगातार घिसने से लोहे के आयन भी प्रमाणबद्ध हो जाते है और वो भी चुम्बक बन जाता है। अच्छी संगत का यह सुपरिणाम है। अपनी वस्तुओं को व्यवस्थित करना व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रारम्भ है। तो अपना कमरा सुव्यवस्थित कर लो, कपड़ें, किताबें ठीक से रखने लगो। इससे हमारे व्यक्तित्व के आयन भी सुव्यवस्थित होने लगेंगे और हम आकर्षक बन जायेंगे।

प्रत्येक व्यक्ति ही स्वभावतः सुन्दर होता है। केवल लम्बे होने में ही सौन्दर्य नहीं है या किसी का शरीर स्थूल है तो उसका अर्थ ये नहीं कि वो आकर्षक नहीं हो सकता। हम अपने शरीर रचना के अनुसार अपने परिधान आदि का चयन करना सीखेंगे तो रुप निखरेगा। मुख्य बात तो ये है कि पवित्रता, प्रसन्नता और प्रमाणबद्धता ये हमें सुन्दर बनाते है, प्रसाधन नहीं। इसका अभ्यास करें और फिर आपका रोम रोम कह उठेगा,
मै हूँ सबसे सुन्दर!

फ़रवरी 3, 2012 - Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , , ,

5 टिप्पणियाँ »

  1. Bilkul Sahi. Aaj ka yug Prasadhan ke liye aapna swast Khan – Paan sab Bhul Gaya Hai. Unhe Filmy Abhinayako Bhooto ne aakarsht kar rka hai

    टिप्पणी द्वारा Rishav | फ़रवरी 3, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. Not denying need of internal beauty but I think external ( not without internal ) is a added advantage.
    And your article will help in it. Thank you.

    टिप्पणी द्वारा jainvarunv | फ़रवरी 4, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. पवित्रता ,प्रसन्नता,प्रमाणबद्धता या सुव्यवस्था
    “अपनी वस्तुओं को व्यवस्थित करना व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रारम्भ है। तो अपना कमरा सुव्यवस्थित कर लो, कपड़ें, किताबें ठीक से रखने लगो। इससे हमारे व्यक्तित्व के आयन भी सुव्यवस्थित होने लगेंगे और हम आकर्षक बन जायेंगे।”…………….Dhanyabad sutra dene ke liye …….प्रत्येक व्यक्ति ही स्वभावतः सुन्दर होता है……..

    टिप्पणी द्वारा indrajeet sharma | फ़रवरी 4, 2012 | प्रतिक्रिया

  4. Reblogged this on kishor's space.

    टिप्पणी द्वारा kckotecha | फ़रवरी 4, 2012 | प्रतिक्रिया

  5. really true…………………………!

    टिप्पणी द्वारा Dnyanda Babar | फ़रवरी 8, 2012 | प्रतिक्रिया


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