उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

केवल पर्दा उठने की ही देरी है


गत सप्ताह भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दो ऐतिहासिक निर्णय दिये। किसी भी लोकसेवक के विरूद्ध अभियोजन के लिये सरकार की अनुमति का प्रावधान ब्रिटिश राज की व्यवस्था की अनेक देनों में से एक है। जिस अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप है उसके विरुद्ध कारवाई करने हेतु अनुमति उसी के वरिष्ठ अधिकारी अथवा मन्त्री से प्राप्त करनी पड़ती है। इसके पीछे का तर्क यह था कि अनावश्यक रुप से शासकीय अधिकारियों को कानूनी झंझटों में घसीटे जाने से बचाया जाय ताकि वे अपने कर्तव्य को निर्भय होकर निभा सके। वर्तमान सड़ी व्यवस्था में भ्रष्ट अधिकारियों को दण्डात्मक कारवाई से बचाने के लिये इस प्रावधान का दुरुपयोग हो रहा है। अनेक बार जिस मंत्री के आदेश पर भ्रष्ट अधिकारी कार्य कर रहा होता है वही अनुमति देनेवाला होता है। ऐसे में निर्णय को लटकाये रखने का चलन सामने आया है। सर्वोच्च न्यायालय ने अब इसपर 4 माह की समयसीमा लगा दी है। आदेश का सर्वोत्तम पहलू यह है कि इसने सरकार को निर्णय लेने पर बाध्य किया है। अपराधियों को बचाने के लिये निर्णयों को लम्बित रखने की बाबूगिरी अब नहीं चलेगी। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि चार माह में निर्णय ना किये जाने पर अनुमति मान ली जायेगी।

इस प्रावधान का सबसे बड़ा व तात्कालिक असर सुब्रह्मणियम स्वामी द्वारा प्रधानमंत्री से सोनिया गांधी के विरूद्ध अभियोजन के लिये मांगी अनुमति पर होगा। यदि शासन समय सीमा में निर्णय नहीं लेता है तो वह परोक्ष अनुमति ही हो जायेगी। यदि समय सीमा में प्रधानमंत्री तथ्यों को जानकर भी अनुमति नकारते है तब वे भी भ्रष्टाचार के सहयोगी हो जायेंगे। वर्तमान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अंग्रेजी शासन की कुख्यात देन प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे हैं अतः निर्णयों को लम्बित रखने को उन्होंने एक कला का रुप दे दिया है। प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव अत्यन्त संवेदनशील मुद्दोंपर चुप्पी साधने के विशेषज्ञ थे। उन्होंने कहा था कि ‘‘कारवाई ना करना भी अपने काप में एक कारवाई है।’’ मनमोहनसिंहजी ने उनके पदचिह्नों पर चलने के नये आयाम स्थापित किये है। अब सर्वोच्च न्यायालय के क्रांतिकारी निर्णय से उनको इस उंघाउ नींद से जागना होगा। वैसे भी युवराज का अभिषेक करने को लालायित काँग्रेस कभी भी इस सर्कस के सिंह को सेवानिवृत्ति का आदेश दे सकती है। हे वीर खालसा सरदारों को दशमेश की दी पगड़ी जीवनभर धारनेवाले सिंह अपने सिंहत्व को एक बार तो दिखा दो और जाने से पूर्व सोनिया के विरूद्ध अभियोजन की अनुमति दे ही दो। सारा देश आपके सब अपराधों को भूल आपको सर आँखों पर रख लेगा।

दूसरा निर्णय भ्रष्ट वाणिज्यिक संस्थानों पर कड़ा प्रहार था। जितना राजनैतिक तन्त्र भ्रष्ट है उससे कई गुना अधिक कलुषित कार्पोरेट जगत है। दोनों के गठजोड़ ने पूरे देश को गिरवी रख दिया है। प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंद लूट मची है। 2जी मामले में 122 लाइसेन्स रद्द करने का निर्णय इस दिशा में अत्यन्त सार्थक कदम है। न्यायालय ने दिखा दिया है कि जो भी अपराध में लिप्त है उसे उसकी कीमत चुकानी ही होगी। राजनेताओं को भ्रष्ट कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले व्यावसायिकों के लिये यह चेतावनी की घण्टी है। केवल स्वार्थ व लालच के लिये ही धंधा करनेवाले लोगों से हम जगने की अपेक्षा तो नहीं कर सकते किन्तु पीढ़ियों से नैतिक व्यवसाय के लिये जाने जा रहे टाटा व बिड़ला जैसे समूह तो आगे से भ्रष्ट नीतियों द्वारा अनुचित लाभ के प्रयत्नों को विराम देंगे ऐसी अपेक्षा की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण चुनावों से पूर्व इन न्यायालयीन निर्णयों तथा सरकार को दी गई स्पष्ट फटकारों से यु पी ए शासन की पूर्व से ही कलंकित साख और अधिक गर्त में गिर गई है। अपने गृहमंत्री के कुछ समय के लिये बच जाने से सरकार राहत की सांस भले ही ले ले किन्तु विशेष सी बी आय सत्र न्यायाधीश के निर्णय की भाषा उच्च न्यायालय में कुछ विपरित निर्णय आने की आस लगाती है। ऐसा यदा कदा ही होता है कि न्यायाधीश तथ्यों की तो पुष्टि कर दे किन्तु उनके अपर्याप्त होने का कारण देकर याचिका को बरखास्त कर दे। न्यायालय ने माना है कि संचार मंत्री के निर्णयों को बदलने का अधिकार होते हुए भी तत्कालीन वित्त मंत्री ने उन निर्णयों से सहमति दिखाई। इस तथ्य को मानने के बाद न्यायाधीश महोदय इसे आपराधिक षड़यन्त्र मानने के लिये अपर्याप्त मानते है। इस भाषा में इस बात के लिये जगह बन जाती है कि अधिक पूछताछ व छानबीन से कुछ और तथ्य सामने आ सकते है जो अपराधिक नियत को स्पष्ट करें। ऐसे में आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि सर्वोच्च न्यायालय सी बी आय को जाँच के आदेश दे।

इसी सप्ताह कनाड़ा के एक अदालती मामाले में तत्कालीन उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को रिश्वत दिये जाने का मामला सामने आया है। अब प्रश्न केवल यही बचा है कि इस सरकार में कोई एक भी इमानदार मंत्री बचा है क्या? या केवल पर्दा उठने की ही देरी है। यह तो निश्चित है कि कलंक से घिरी यह सरकार देश पर शासन करने का नैतिक अधिकार खो चुकी है। विपक्ष, सामान्य जनता व सबसे महत्वपूर्ण देश के प्रबुद्ध नागरिक इस सरकार को बिना विलम्ब पदच्युत करने के लिये आंदोलन प्रारम्भ करें।

सिंहासन खाली करों कि जनता आती है।

फ़रवरी 8, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

   

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