उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

धर्म का मर्म


कर्मयोग 11:
धर्म के आचरण को मानव का सबसे बड़ा रक्षक और साथी माना जाता रहा है। रामायण में जब राम वनवास में जाने से पूर्व माता कौसल्या का आशिर्वाद ग्रहण करने जाते है तो माता यही आशिर्वाद देती है। यदि आज तक तूमने जीवन में धर्म का पालन किया है, तो वह निर्वाह किया हुआ धर्म सभी संकटों में तुम्हारी रक्षा करेगा। धर्मो रक्षति रक्षितः। जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। महाभारत युद्ध से पूर्व जब दूर्योधन अपनी माता गांधारी का आशिर्वाद लेने जाता है तब वह भी यही तत्व बताती है। माँ द्वारा युद्धोत्सुक पूत्र को दीर्घ जीवन का आशिर्वाद दिये जाने पर दूर्योधन आश्चर्य से पूछता है। आपने मुझे विजय का आशिर्वाद नहीं दिया? तब माता उत्तर में धर्म का मर्म बताती है – श्रृणु मुढ़ः। यतो धर्मः ततो जयः। यतो कृष्णः ततो धर्मः। हे मूर्ख सुन, जिस पक्ष में धर्म होगा उसी की विजय होगी। और जहाँ स्वयं कृष्ण है वही धर्म होगा। जब मानव धर्म के मर्म को स्वयं के जीवन में उतार लेता है तब उसका कर्म ही धर्म का मापदण्ड़ बन जाता है। वह स्वयं धर्म का मूर्तिमंत रुप बन जाता है। वाल्मिकी रामायण में कहा है – रामो विग्रहवान धर्मः। राम मूर्तिमन्त धर्म है।

गीता का प्रारम्भ ही धर्म शब्द से होता है। धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।गी 1.1। धर्म का क्षेत्र, और उसका नाम है कुरूक्षेत्र। कुरू का अर्थ है ‘करो’। अर्थात जो कर्म का क्षेत्र है वही धर्म का क्षेत्र है। संस्कृत में शब्दों का क्रम बदल कर भी अर्थ समान रहता है। अतः इसी पंक्ति को एसे भी समझ सकते हैं। क्षेत्रे क्षेत्रे धर्मं कुरू। अर्थात जीवन के हर क्षेत्र में धर्म का आचरण करों। यह तो पूरी गीता का ही सार हुआ। गीता में क्षेत्र का भी अर्थ विस्तार से समझाया है। पूरा 13 वा अध्याय ही क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ के बीच में भेद व सम्बन्ध के बारे में है। क्षेत्र का एक अर्थ है खेत। खेत शब्द की उत्पत्ती ही क्षेत्र से हुई है। उच्चारभेद में क्ष का ख होना सामान्यसा भाषाशास्त्रीय नियम है। गीता पूरे जगत को ही खेत कहती है और ईश्वरीय आत्मतत्व है जो इस खेत में खेती करने वाला किसान है। गीता में इसे क्षेत्रज्ञ कहा है- खेत को जानने वाला। कर्म की खेती में धर्म के नियम लागू करने से ही जीवन में आनन्द व मुक्ति की फसल पा सकेंगे।

आधुनिक समय में धर्म का अर्थ सीमित कर दिया है इसी कारण जब गीता में धर्म की बात होती है तो उसे समझने में कई बार भूल हो जाती है। यह नहीं कहा जा सकता कि इतिहास में कब से धर्म को मत, सम्प्रदाय अथवा पंथ के पर्यायी के रुप में देख जाने लगा, किन्तु गीता में इस पद का प्रयोग इस अर्थ में एक बार भी नहीं हुआ है। भारतीय संकृति में जीवन के शाश्वत अर्थात समयातीत, सभी युगों तथा देशों में लागू होने वाले नियमों को सनातन धर्म कहा गया। इसमें व्यक्ति का व्यक्ति से, व्यक्ति का समष्टि अर्थात सब प्रकार की सामूहिक रचना यथा जनजाति, समाज या राष्ट्र से, व्यक्ति व समष्टि का सृष्टि अर्थात सम्पूर्ण प्राणी व वनस्पति जगत के साथ ही समस्त पर्यावरण के साथ सम्बंधों के बारे में शाश्वत नियमों को जानकर उनपर आधारित जीवनरचना को साकार किया गया। यह पूरी समझ वैज्ञानिक होने के कारण ही सबके लिये समान थी केवल इसकी बाह्य अभिव्यक्ति देश काल के अनुसार विविध हो सकती है। इस सत्य को समझने के कारण ही भारत में विविधता के कारण संघर्ष के स्थान पर समारोह होता है। विविधता का केवल सम्मान ही नही पूजन किया जाता है। इन्ही नियमों में व्यक्ति तथा समष्टि के परमेष्टि अर्थात सर्वव्यापी परमसत्ता से सम्बन्ध को भी परिभाषित किया गया। सम्भवतः इसी अंग के कारण जब संकुचित उपासना पद्धति आधारित सम्प्रदायों से सामना हुआ तब उनकी पंथानुभूति को भी इसी विविधता में से एक समझा गया। पर यह तो भारतीय मूल के सम्प्रदायों की समझ थी जिसे अन्य कट्टर तत्वधारी संकीर्ण मत नहीं मानते थे। हमारे इतिहास में इन मतों के आक्रमणों को ना समझ पाने के कारण बड़ा नुकसान हुआ है। अतः धर्म का अर्थ ठीक से समझना आवश्यक है। सबसे पहले तो यह स्पष्ट कर लेना आवश्यक है कि अंगरेजी के शब्द Religion का अनुवाद धर्म नहीं हो सकता। उन्हें पंथ अथवा मत कह सकते है। भगिनी निवेदिता ने इस भेद को स्ष्ट करने के लिये अंगरेजी में पुस्तक लिखी – Religion and Dharma जिसका हिन्दी अनुवाद कार्यकर्ताओं के लिये ध्येयमार्ग में अत्यंत उपयागी है इसीलिये हिन्दी में इस पुस्तक का शीर्षक है -‘पथ और पाथेय’

जीवन के सनातन नियमों को धर्म कहते हैं। इस विशाल समझ को हम कुछ वैज्ञानिक भागों में विश्लेषित कर ठीक से जान सकते है। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि किस प्रकार भिन्न भिन्न सन्दर्भ में धर्म का लाक्षणिक अर्थ अलग अलग छटा के साथ प्रयोग में आता है। जीवन को समझने में जगत की अभिव्यक्ति के सभी अंगों को उनके वास्तविक स्वरूप में जानना होता है। जब वस्तु के वास्तविक रुप अर्थात स्वभाव की समझ को बताना होता है तो उसे उस वस्तु का धर्म कहते है। जैसे अग्नि का धर्म है दाहकता। अब यहाँ आग की जलाने की क्षमता व स्वभाव को दर्शाने के लिये धर्म पद प्रयुक्त हुआ। इसी अर्थ में हम रसायनशास्त्र में जब भिन्न भिन्न रसायनों का वर्णन करते है तो कहते है ये प्राणवायु के गुणधर्म है। यहाँ धर्म गुण अथवा स्वभाव के रुप में प्रयोग हुआ है। जीवनमें उस वस्तु, व्यक्ति अथवा समूह के सम्बन्ध को परिभाषित करने के लिये उसके सनातन गुण या स्वभाव को समझना आवश्यक है इसिलिये यहा धर्म पद का प्रयोग उचित ही है।

केवल वस्तु के स्वभाव को ही नहीं मानव के विशिष्ट स्वभाव को भी धर्म ही कहा गया है। गीता इसी को स्वधर्म कहती है। स्वधर्म ही मानव कोअपने पशुवत् वृत्तियों को नियन्त्रित करने की क्षमता प्रदान करता है और अपने जीवन का समग्र विकास करने का मार्ग प्रदान करता है। इस अर्थ में धर्म आत्मविकास का मार्ग है। पशुमानव से मानव, मानव से महामानव व महामानव से दिव्य मानव और अन्ततः साक्षात दिव्यता को ही प्राप्त करने का मार्ग धर्म है। इसी सन्दर्भ में स्वामी विवेकानन्द कहते है, ‘‘आत्मसाक्षत्कार ही धर्म है।’’ और विस्तार से इसका विवरण भी वे देते है, ‘‘प्रत्येक जीव में अन्तर्निहित दिव्यत्व है। इस दिव्यता को जीवन मे प्रगट करना ही जीवन का लक्ष्य है। प्रकृति के अन्तर्बाह्य नियमन से ही यह सम्भव है। ज्ञानयोग वा भक्तियोग, राजयोग वा कर्मयोग इन चारों में से एक अथवा अनेक या कि सभी के आचरण द्वारा मुक्त हेाना ही धर्म का मर्म है। बाकि सारी बाते जैसे पुस्तकें, परम्परा, उपासना के नियम, मंदिर, मठ यह सब तो गौण उपचार मात्र है।’’ धर्म के इसी अर्थ का विपर्याय होकर इसे केवल उपासना पद्धति के रूप में उसे संकुचित कर देख गया। एक ईश्वर, एक दूत व एक ग्रंथ पर आधारित मत अपने को ही समग्र मान कर अंतिम सत्य के रूप में प्रचारित करने लगते है। इसी एक मार्ग से मुक्ति सम्भव है इस विश्वास को लेकर पूरे विश्व को ज्ञान अथवा शस्त्र बल के आधार पर अपने मत में मतांतरित करने का प्रयास करते है। इससे ही पूरे विश्व में संर्घष व आतंक का प्रादुर्भाव हुआ है। ऐसे मतों के समकक्ष वैज्ञानिक विचार पर आधारित सदा गतिमान सनातन धर्म अथवा वर्तमान में प्रचलित इसके नामाभिधान हिन्दूत्व को नहीं रखा जा सकता। जो थोथी पंथनिरपेक्षता के चक्कर में इस्लाम, इसाई, यहुदी, पारसी आदि पंथों के साथ ही हिन्दू धर्म की तुलना करते हुए सबको समान बताते है वह सत्य से कोसों दूर है। दिखवटी समानता के प्रचार के स्थान पर इनके तुलनात्मक अध्ययन से इनके भेद को समझकर स्वीकार करना ही शांति का स्थायी मार्ग है। हमारे ऋषियों ने इसीका प्रतिपादन किया था – ‘एकं सत् विप्राः बहुदा वदन्ति।’ सत्य एक है, ज्ञानीजन उसका अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। इसे स्वीकार करने पर ही पंथ धर्म का रुप ले सकते है। अन्यथा उनको समान कहना उचित नहीं है।

व्यक्ति व समूह के द्वारा कर्म के माध्यम से ही सम्बन्धों का निर्वाह किया जाता है। इस निबाहने वाले व्यवहार से कुछ अपेक्षायें होती है। उस आधार पर नियमावली विकसित होती है। उसे भी धर्म कहते है। हमारा किसी के साथ कैसा व्यवहार हो इसे अभिव्यक्त करते समय भी धर्म शब्द का प्रयोग होता है। अतः हर सम्बन्ध का अपना धर्म है। पति धर्म, पुत्र धर्म, पड़ौसी का धर्म, राजधर्म यह सब सम्बन्धों को निभाने की विधियाँ हे जिसे धर्म कहा गया है। यह धर्म का एक और अर्थ हुआ। इसमें यह कर्तव्य का रुप धारण करता है। जब हम पतिधर्म या पत्निधर्म की बात करते हे तो पति के पत्नि के प्रति या पत्नि के पति के प्रति कर्तव्य की बात कर रहे होते है। कर्तव्य का ही कर्म में निर्वाह हो सकता है। वर्तमान समय में कर्तव्य को महत्व देने के स्थान पर उसके परिणाम स्वरुप सम्बन्धी को प्राप्त होनवाले लाभ को महत्व दिया गया है। इसे ‘अधिकार’ कहा जाने लगा। अब सारी बात ही उलटी हो गई। अधिकार परिणाम होने के स्थान पर अपेक्षित कर्म बन गये। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य के स्थान पर दूसरे के कर्तव्य के फलस्वरूप हमें प्राप्य परिणाम की अपेक्षा को ही जीवन का आधार बना लेता है तो स्वाभाविक ही जीवन परावलम्बी हो जाता है। हम इन अपेक्षाओं को लेकर संघर्ष में पड़ जाते हैं। इसके विपरित यदि प्रत्येक अपने धर्म अर्थात कर्तव्य का पालन करने लगे तो परिणाम स्वरुप सहज ही दूसरों के अधिकारों की पूर्तता हो जायेगी। यह अधिक वैज्ञानिक भी है। कर्तव्य कर्मप्रधान होने के कारण हमारे अधिकार में, नियन्त्रण में है। अधिकार का वास्तविक अर्थ यही है- जिस पर हमारा स्वामीत्व है। दूसरी ओर जिसे आजकल अंगरेजी के Right शब्द के पर्याय अधिकार के रुप में समझा जाता है वह अपेक्षा पर आधारित होने के कारण केवल सम्भावना के अधीन है अतः हमारे नियन्त्रण में नहीं है। कितनी मजेदार बात हुई जिसे हम अधिकार मान रहे है वो वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार हमारे अधिकार में ही नहीं है। धर्म का कर्तव्य यह अर्थ भी उसके बृहत् प्रत्यय सृष्टि के सनातन नियम का ही एक अंग है।

यह कर्तव्य धर्म सम्बन्धों के संजाल के द्वारा समाज को धारण करता है। यह धारण करने का कर्म ही उसे धर्म यह नाम प्रदान करता है। अतः समाज को धारण करने की प्रक्रिया को धर्म कहा गया। इसके लिये आध्यात्मिक, औपासनिक व न्यायिक इन तीनों व्यवस्थाओं का निर्माण होता है। अतः धर्म ही विधि अर्थात कानून का रुप लेता है। यदि समाज की प्रगल्भता पर्याप्त रुप से विकसित ना हो ता इसे राजकीय मान्यता की आवश्यकता पड़ती है अतः विधि की रचना करनी पड़ती है। बिना राजनैतिक हस्तक्षेप के सनातन नियमों की युगानुकुल व्याख्या के समाज में रुढ़ होकर उसके द्वारा समाज की सहज धारणा ही आदर्श समाज रचना है। इसीको धर्मराज्य कहा गया। भारत में धर्मराज्य का अर्थ अंगरेजी के Theocracy से नहीं होकर, समाज में धर्म के प्रस्थापित होने से राज्य के विसर्जित हो जाने व मानवीय मूल्यों द्वारा ही प्रत्येक व्यक्ति द्वारा स्वतः एकल व सामूहिक कर्तव्य का पालन किया जाना है। महाभारत के शांतिपर्व में शरशैयापर लेटे भीष्म द्वारा युधिष्ठिर को इसी धर्मराज्य की स्थापना के सुत्रों का मार्गदर्शन किया गया है। उस समय वे पूर्व में साकार धर्मराज्यों का विवरण करते है। न राज्यो न च राजा आसीत, न दण्डों न दण्डितः। न तो कोई राजा आवश्यक था ना ही कोई शासन व्यवस्था। न किसी को सजा देने की आवश्यकता पड़ती थी। धर्मेनैव प्रजा सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परं। वर्तन्ति स्म परस्परं।। धर्म के द्वारा ही सारी प्रजा एकदुसरे का परस्पर रक्षण करती थी। एक दूसरे से निर्वाह करती थी।

यह धर्म स्थापित करना ही मानवमात्र का व्यक्तिगत व सामूहिक जीवनध्येय है। इसिलिये इसे चतुविर्ध पुरुषार्थ का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। यह चार पूरूषार्थों में से केवल एक नही हैं। अर्थ व काम को भी धर्म के ही आधार पर करना है। मोक्ष अपने आप में इससे उपर सर्वोच्च लक्ष्य है। जब तक जगत के नियमों से मुक्त नहीं हो जाते तब तक बाकि तीनों पुरूषार्थ ही जीवन का लक्ष्य है और वे तीनों ही धर्म के ही अंग है। मोक्ष की आकांक्षा भी धर्म का ही परिणाम है। जीवन में सब स्तरों पर धर्म का निर्वाह करने से चित्त की शुद्धि के कारण ही मुमुक्षा- मोक्ष की ईच्छा जागृत होती हैं। यह मुमुक्षा ही मोक्ष की ओर अग्रेसर करती है। अतः इसका भी मूल भी धर्म में ही है। यह धर्म का व्यवस्थागत रुप है। इसीकी संस्थापना के लिये बार बार अवतार होते है। इस धर्माधारित विश्वव्यवस्था को अगली बार विस्तार से देखेंगे। तब तक धर्म पद के इन पाँच प्रत्ययों, अर्थछटाओं को हृदयंगम करना आवश्यक है। 1. स्वभाव या गुणधर्म, 2. आत्म विकास का मार्ग, 3. व्यक्ति, समाज, सृष्टि तथा परमेष्टि के आपसी सम्बन्धों के निर्वहन में प्रयुक्त कर्तव्य, 4. विधि अथवा कानून तथा 5. समस्त जगत को धारण करने वाला आधार तत्व यह धर्म के पाँच आयाम हमने देखें। यह समझने के लिये भले ही अलग अलग विश्लेषित किये गये हो इनका अन्तर्निहित मर्म एक ही है। उसका साक्षात्कार ही अपने जीवन में धर्मस्थापना है। धर्म के मर्म को समझे और अपने जीवन में उतारे यही सच्चा योग है।

फ़रवरी 15, 2012 - Posted by | योग | , , , , , , , , ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. Bahut Sunder Bhaiya

    टिप्पणी द्वारा Deepesh | फ़रवरी 15, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. Dharm ki vistrat vyakhya ke liye dhanywad.

    टिप्पणी द्वारा Bhanwar Singh Rajput | फ़रवरी 16, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. यह बहुत ही विचित्र स्थिति है कि व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में तो धर्म का आचरण करता है लेकिन वह जब किसी प्रतिद्वंदी के समक्ष होता है तो धर्म के ठीक विपरीत आचरण करने लगता है जबकि वह यह भलीभांति यह जानता है कि उसके द्वारा किया जा रहा आचरण यदि कोई उसके साथ करेगा तो उसे स्वयं को ही स्वीकार्य नहीं होगा फिर भी वह ऐसा करने से नही चुकता | भगवतगीता में ऐसे व्यक्ति के लिए श्रीकृष्ण ने कुछ उपदेश दिए हो तो कृपया उन्हें उदधृत करेंगे |

    टिप्पणी द्वारा Bhanwar Singh Rajput | फ़रवरी 16, 2012 | प्रतिक्रिया

  4. shri Bhanwar Sinh jee धर्मं एक ही है . अपने लिए भिन्न औरोंके लिए भिन्न ऐसा नहीं . यदि ऐसा कोई करता है तो समझिये उसे धर्म सही समझ में नहीं आया . व्यवहार में परिस्थिति के अनुसार आचरण भिन्न भिन्न होता है होना भी चाहिए . किन्तु उसका अर्थ जो आपने किया वैसा नहीं है . धर्म का निकष है क्या कोई आचरण सबके शांतिपूर्ण उन्नतिकारक सह अस्तित्व के अनुकूल है या नहीं ? गीता में इस विषय कुछ है क्या यह आपने पूछा है . तो एक बात तो अवश्य ही कही है “स्वधर्मे निधनं श्रेयः ” प्रत्येक व्यक्ति का अपना धर्म होता है भिन्न भिन्न भूमिकाओं में भिन्न भिन्न स्थितियों में भिन्न भिन्न धर्मं और साथ में एक शाश्वत धर्म भी है . आचरण के विषय में कहा है ” सर्वभूतहिते रताः” ” आत्मवत सर्व भूतेषु ” यह भी (गीता में नहीं ) अपने आचरण के लिए सिद्धांत है . जैसा अपने लिए वैसा ही दूसरोंके लिए . यह सिध्दांत समझेंगे तो आपका प्रश्न स्वयं ही निराकृत होता है .

    टिप्पणी द्वारा Prof. Mukund Hambarde | फ़रवरी 17, 2012 | प्रतिक्रिया

  5. मान्यवर ,आपने अनेकानेक उद्धरणों द्वारा धर्म की बारीकियों को परिभाषित करने का सराहनीय प्रयास किया है | धन्यवाद| वस्तुत:’धर्म’शब्द इतना अधिक सारगर्भित है कि न तो इसे पूर्णरूपेण समझा जा सकता है और न ही [अपने शब्दों में ]किसी अन्य को समझाया ही जा सकता है|हाँ ,प्रयास किया जा सकता है |हम मानव यदि अपने जीवन-जंजाल के बीच मात्र इतना ही समझ सकें कि ‘परोपकार’से बड़ा कोई पुण्य नहीं है और ‘परपीड़न’से बड़ा कोई पाप, तो शायद कुछ हद तक धर्म को समझ कर अपने चिंतन में सकारात्मकता ला सकते हैं अर्थात् अहंकार ,काम ,क्रोध,लोभ ,मोह,ईर्ष्या आदि से यथासंभव मुक्त होकर सद्-
    कर्मों द्वारा, अपने ‘मानव’होने का ॠण अदा कर सकते हैं |
    आभार
    रजनी सडाना

    टिप्पणी द्वारा rajni sadana | फ़रवरी 19, 2012 | प्रतिक्रिया


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: