उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मृत्युंजय महाशिवरात्रि


महाशिवरात्री का उत्सव भगवान शंकर के विवाह का उत्सव माना जाता है। एक ध्येयपूर्ण विवाह। सति के दहन के बाद से ही ध्यानमग्न शिवजी का हिमालय पुत्री पार्वती से विवाह, देवों के सेनापति कुमार कार्तिकेय के जन्म के लिये हुआ है। भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्ति अथवा दो परिवारों का मिलन मात्र नहीं है अपितु पूरी सृष्टि में असुर विनाश कर शुभ संस्कारों के पोषण के लिये विवाह का संस्कार है। पराक्रमी धर्मरक्षक संतति के प्रजनन के लिये सारा ही गृहस्थाश्रम केन्द्रित है। इसिलिये शिव-पार्वति विवाह के कथानक को नाट्य रूप देने पर महाकवि कालिदास उसको नाम देते है- कुमारसंम्भव। तारकासुर के वध के लिये शिवजी के पुत्र का सेनापतित्व अनिवार्य है तब तपस्यारत शिवजी के मन में पार्वति की श्रद्धा के प्रति अनुराग उत्पन्न करना आवश्यक हो जाता है। वैसे तो शिवजी को आशुतोष, पल भर में संतुष्ट होनेवाले कहा जाता है किन्तु जब अपने आत्मानन्द में मस्त हो तो इन्हें आकर्षित करने की क्षमता किसमें होगी? माता पार्वति की तपस्या तो अनवरत है। शिवजी की सेवा के लिये ही उनका जन्म हुआ है। अपने पूर्वजन्म का उन्हें स्मरण भी है और अपने जीवन उद्देश्य का ज्ञान भी। उनकी घोर तपस्या से विव्हल माता ने उन्हें आर्त स्वर में पुकारा ‘‘ऐसा मत कर’’- ‘‘उ मा!’’ और देवी का नाम ही पड़ गया उमा। पर जिसे अपने जीवन का अंतिम आनन्द ही शिवसेवा में मिल रहा है वह कैसे रुकेगी? ध्यानमग्न शिवजी उनकी ओर तनिक भी लक्ष्य नहीं कर रहे फिर भी वे पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ सेवा कर रही हैं।

कुमार के जन्म को सम्भव करने देवताओं ने कामदेव मन्मथ को शिवजी के मन को हरने के लिये भेजा। दूर से खड़े होकर उसने कामबाण चलाया। शिवजी का ध्यान तो भंग हुआ और देवी पार्वति की सेवा का भी उनको भान हुआ। उनके प्रति कृपा, स्नेह व अनुराग भी उपजा किन्तु कामदेव की उदण्ड़ता पर प्रचण्ड क्रोध आया। तीसरे नेत्र की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया। काम के शरीर के भस्म होने का दिन आज भी याद किया जाता है। काम के अनंग होने का उत्सव है वसंतपंचमी। भारत में प्रेम की पराकाष्ठा शारीरिक आसक्ति में नहीं काम के अनंग, अशरीरी अर्थात इन्द्रियों के परे हो जाने में है। उसी का उत्सव है। बादमें मन्मथपत्नि रति व अन्य देवताओं की प्रार्थना पर शिवजी ने काम को पुनः जीवित तो कर दिया किन्तु उनके मन में जो पार्वति के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ है वह अशरीरी ही रहा। यही हमारा जीवनादर्श है। इसी के स्मरण के लिये महाशिवरात्री का आयोजन है।

कार्यकर्ता के लिये यह जीवन के ध्येय का स्मरण करने का अवसर है। जैसे पार्वति के विवाह का उद्देश्य असुर नाश व धर्म रक्षा है वैसे ही उनके कन्याकुमारी अवतार में इसी उद्देश्य से उनका अविवाहित रहना है। दोनों स्थितियों में उद्देश्य महत्वपूर्ण है। निरुद्देश्य केवल परिवार व समाज के दबाव में विवाह करने के स्थान पर अपने जीवन ध्येय का स्मरण कर उसके अनुरूप इस सम्बन्ध में निर्णय लेना आवश्यक है। महाशिवरात्री का अवसर इस चिंतन के लिये सर्वाधिक उपयोगी है। स्वामी विवेकानन्द आलासिंघा पेरुमल को लिखे एक पत्र में स्पष्ट लिखते है, ‘‘चरित्र की शुचिता, साहस, समर्पण ये देशसेवा के लिये आवश्यक गुण हैं। हमारे होनहार युवाओं में ये सब गुण है यदि वे उस बलिवेदि पर बलि ना चढ़े जिसे विवाह कहते है।’’

महाभारत के शांतिपर्व में महाशिवरात्रि से जुड़ी एक कथा आती है। शरशैया पर पड़े भीष्म राजा चित्रभानु की कथा बताते है। राजा महाशिवरात्रि का व्रत रखता है उसी दिन महामुनि अष्टावक्र उसके पास आते है और व्रत के बारे में पूछते है। राजा अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाता है। पूर्वजन्म में वह एक व्याध, शिकारी होता है। एक शाम जंगल में शेर पीछे पड़ने के कारण भय से जान बचाने के लिये एक पेड़ पर चढ़ता है। रात भर पेड़ पर ही कटती है। उसे नहीं पता कि वह महाश्विरात्रि की रात है और ना ही यह कि जिस पेड़ पर वह चढ़ा है वह बेल का पेड़ है। रात भर ड़र के मारे वो बेचैनी में बिल्वपत्र तोड़ तोड़ कर नीचे ड़ालता है। नीचे एक शिवलिंग है जिसपर अपने आप अर्चना हो रही है। सुबह शिवजी प्रसन्न होकर उसे दर्शन व वरदान देते है।

इस कथा में अनेक बाते छिपी है। अनजाने में हुई साधना से भी परिणाम देने का सुअवसर इस मुहुर्त में है। कुछ आधुनिक विद्वान प्राणविद्या के प्र्रति अनभिज्ञता के चलते इसे अंधविश्वास कहेंगे। किन्तु पूरे वर्ष में दो रात्रियों की ग्रहस्थिति अत्यन्त महत्वपूर्ण है। एक है दिवाली को अमावस्या की कालरात्रि व दूसरी है उत्तर भारत में फाल्गुन तथा बाकि पंचांगो अनुासर माघ की कृष्ण चतुर्दशी महारात्रि। एक शक्ति की साधना का पर्व है तो दूसरा शिव-शक्ति के मिलन की साधना का। आज की रात सोन के लिये नहीं जागरण के लिये है। महामृत्युंजय मन्त्र का जप करने के लिये यह सर्वोत्तम अवसर है। स्वार्थ के लिये नहीं राष्ट्र रक्षा के लिये संकल्प कर जप करे।

ॐ ह्युं ज्युं सः ॐ भूर्भुवः स्वः
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय माSमृतात||
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः ज्युं ह्युं ॐ

समुद्रमंथन के बाद हलाहल के पान को भी आज के दिन से जोड़कर देखा जाता है। समाज में विचारों का मंथन होगा तो अमृत व अन्य रत्नों से पहले पूरे संसार को भस्म करने की क्षमता रखने वाला विष कालकूट निकलेगा। शिव में ही वह क्षमता है कि इस हलाहल को अपने कण्ठ में धारण कर सके। कितना अद्भूत संतुलन है। निगलने से स्वयं का ही नाश होगा और उगलने से पूरे संसार का। ऐसे में कण्ठ में धारण करने की क्षमता शिव जी के पास ही है। सामाजिक कार्य में जुड़े कार्यकर्ताओं के लिये नीलकण्ठ महादेव का यह आदर्श अनिवार्य है। आइये आज के दिन शिवजी से प्रार्थना करें कि हमें भी ऐसे ही विषपायी संतुलन का वरदान प्रदान करें। धैर्य व धारणा शक्ति का तो शिवजी आदर्श है। विष को धारण करना हो अथवा सगरपुत्रों के बहाने सारी मानवता को संजिवनी प्रदान करने स्वर्ग से अवतरित गंगा की अजस्र धारा को अपनी जट़ा मे धारण कर सौम्यरूप में पूरे समाज को देने का दायित्व हो। सामाजिक कार्यकर्ता को भी इन दोनों प्रकार के धैर्य का अपने व्यक्तित्व में समावेश करना होता है। समाज घातक विष को कण्ठ में समा जाने का धैर्य व समाज की सृजनशील धारा को जटा में धारण कर प्रवाहित करने का धैर्य।

महाशिवरात्रि से जुड़ी एक कथा एकता की परिचायक है। अपने दैवी विश्वासों को कट्टरता की परिसीमा तक ले जानेवाले तत्वों के लिये इसमें संदेश है। महाभारत युद्ध के बाद अश्वमेघ यज्ञ किया गया। श्रीकृष्ण चाहते थे कि मुनि व्याघ्रपाद इसक पौरोहित्य करें। व्याघ्रपाद घोर शिवभक्त है और विष्णू का नाम भी सुनना नहीं चाहते। कृष्ण ने भीम को मुनि को लाने का दायित्व दिया और विस्तार से पूरी प्रक्रिया समझायी। भीम ने उसी अनुसार शिवध्यान में रत मुनि व्याघ्रपाद को ‘‘गोविन्दा गोपाला’’ कहकर जगाया। क्रोधित ऋषि भीम के पीछे दौड़े। भीम ने कुछ दूरी पर कृष्ण के बताये अनुसार एक रुद्राक्ष ड़ाला। कहते है जहाँ रुद्राक्ष गिरा वहीं शिवलिंग उत्पन्न हुआ। व्याघ्रपाद उसकी पूजा में लग गये। भीम ने पुनः ‘गोविन्दा गोपाला’ गाना प्रारम्भ किया। ऐसा 12 बार हुआ। कन्याकुमारी जिले में ये बारह शिवलिंग व मन्दिर आज भी विद्यमान हैं। 12 वे स्थान पर श्रीकृष्ण ने व्याघ्रपाद को शिव व विष्णु के दर्शन एक ही विग्रह में दिये तथा उनके मन का भेद दूर कर दिया। आज भी परम्परा है कि महाशिवरात्रि के दिन भक्तगण इन बारह मंदिरों के मध्य ‘‘गोविन्दा, गोपाला’’ गाते हुये दौड़ लगाते है। उत्सव का नाम है- शिवालयोत्तम।

सभी देवताओं के एकत्व के संदेश के साथ ही भारतीय संस्कृति की एक और महानता की ओर इस कथा में निर्देश मिलता है। हमने अपने उदात्त तत्वों को केवल सिद्धान्तों के रूप में ग्रंथों में ही नहीं रखा अपितु उनका स्थायित्व परम्परा के रूप में स्थापित किया। महाशिवालय की विष्णु के नाम को जप करते हुए शिव मंदिरों की प्रदक्षिण समाज में एकत्व को सदा बनाये रखने का वैज्ञानिक उपाय है। आईये! महाशिवरात्रि के शुभ मुहुर्त पर जागरण करें – भयहारी महामुत्यंजय का जप करें, जीवन के ध्येय पर चिंतन करें, धर्म के मर्म को सहज आचरण योग्य परम्परा में विकसित करने पर कार्य करने का संकल्प लें।
उँ नमः शिवाय!

फ़रवरी 20, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

   

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