उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

मुस्लिम आरक्षण: व्हाय धिस कोलावरी दी ? अभी ही क्यों ?


उत्तर प्रदेश के चुनाव हमेशा ही बड़े आकर्षक होते है। सबसे बड़ी जनसंख्या का प्रांत होने के साथ ही राजकीय दृष्टि से पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करने का सामथ्र्य रखता है। सम्भवतः इसी कारण प्रसार माध्यम भी उत्तर प्रदेश के चुनावों को अत्यधिक महत्व देते है। वहाँ की छोटी से छोटी खबर भी तुरन्त सूर्खी का रूप लेती है। इस बार के चुनाव भी कोई अपवाद नहीं है। किन्तु इस बार जिन विषयों को उठाया जा रहा है वे निश्चित ही महाभयानक हैं। इन समाचारों, चर्चाओं तथा प्रतिक्रियाओं को देखकर डोमिनिक लापेर की किताब “Freedom at Midnight” की याद आने लगती है। बात जयपुर साहित्य मेले की नौटंकी से प्रारम्भ होती है। सलमान रूश्दी को नहीं आने देने की राजनीति से मुस्लिम तुष्टिकरण का जो घिनौना खेल प्रारम्भ होता है वो बाटला हाउस के शहीदों के अपमान से होता हुआ गैर कानुनी कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के पंथाधारित आरक्षण की असंवैधानिक घोषणा में परिणित होता है। नवीन चावला के समय से ही अपनी धार खो चुके चुनाव आयोग की क्या मजबुरी है पता नहीं, स्वयं कोई कारवाई करने के स्थान पर राष्ट्रपति को पत्र लिखने का मजाक उसे सूझता है। राष्ट्रपति सदासर्वदा मौन मोहन के पालें में उस कागज को उछालकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। चुनाव आयोग की बृहन्नला स्थिति का केन्द्र के दूसरे काबिना मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा मखौल उड़ाते है। पूरा तन्त्र ही मानों इस विषय पर हतप्रभ सा दिखता है।

इस सब नौटंकी के पीछे के मूल कारण व उसमें छिपे भयावह खतरे की कोई चर्चा ही नहीं करना चाहता। वर्तमान में सुविख्यात तमिल गीत मन में उभर आता है .वही थिस Kolavari Kolavari दी? यह सब क्या हो रहा है? देश के विभाजन के समय नकली आंसु बहाने वाले देश के सबसे पूराने राजनयिक दल की इस साम्प्रदायिक रणनीति की ओर कोई माध्यम किसी प्रकार से संकेत करने को तैयार नहीं है।

राजनीति में चुनावी जीत को ही महत्व देने को यह परिणाम है कि देश विघातक नीतियों को अपनाया जा रहा है। आसाम, बंगाल व केरल के विधानसभा चुनावों में यह प्रयोग सफलतापूर्वक अपनाया जा चुका है। वर्तमान आसाम में 52 विधायक मुस्लिम समुदाय से है। मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेशी मुस्लिमों को समर्थन के लिये कुख्यात दल ।प्क्न्थ् के 30 सदस्य है। यदि दूसरे स्थान पर रहे मुस्लिम प्रतिद्वंद्वियों की संख्या को देखे तो ये 89 तक जा पहुँचती है जो कुल 126 विधायकों  में दो तिहाई बहुमत के निकट पहुँचता है। केरल में तो वर्तमान विधायिका में हिन्दु अल्पसंख्य हो चुका है। शासनकर्ता गठबन्धन के 71 में से 35 विधायक मुस्लिम व ईसाई समुदाय से है। विपक्ष की स्थिति भी यही है 69 में से 28 अहिन्दू विधायक है। बंगाल में भी सत्ताधारी तृणमूल के तुष्टिकरण चलते पूर्वी भाग के कुछ जिलों में हिन्दुओ का जीवन पूर्णतः असुरक्षित हो गया है। नित होनवाले आक्रमणों व अत्याचारों से मेदिनीपुर जैसे जिलों में सामूहिक पलायन की स्थिति बन रही है। हिन्दूओं को अपने हितों के लिये एकत्रित होने का भी अधिकार नहीं दिया जा रहा है। बुधवार 16 फरवरी को कोलकाता में 1 लाख हिन्दूओं का विरोध प्रदर्शन आयोज्य था। राज्य सरकार ने पाबंदी लगाकर सभी नेताओं को कैद कर लिया। सभा तो हुई पर केवल नाममात्र की पुलिस ने किसी प्रकार की चर्चा से पूर्व ही एकत्रित हजारों लागों को बलपूर्वक खदेड़ दिया। किसी प्रचार माध्यम ने समाचार तक नहीं दिया।

उत्तर प्रदेश में भी काँग्रेस, समाजवादी पार्टी तथा ब स पा इस होड़ में है कि इस समुदाय कौन कितना रिझा सकता है। संविधान में स्पष्ट लिखा है कि पंथ, मजहब के आधार पर किसी प्रकार का आरक्षण नहीं दिया जा सकता। फिर भी मण्डल कमिशन के प्रावधानों का दूरूपयोग कर पीछड़े वर्ग के 27 प्रतिशत कोटे में से 4.5 प्रतिशत कोटा अल्पसंख्यकों में से पीछड़ों के लिये निर्धारित करने का निर्णय केन्द्रीय मंत्री परिषद ने उ प्र चुनावों की घोषणा से एक दिन पूर्व ही लिया। यह पंथ पर आधारित है किन्तु केवल उस समुदाय में से पीछड़ों के लिये है। प्रचार ऐसे किया जा रहा है कि सभी मुस्लिमों को आरक्षण दिया गया है। काँग्रेस नेता निर्लज्ज होकर इस कोटे को जनसंख्या के अनुपात में बढ़ाने की असंवैधानिक घोषणा किये जा रहे है। इसका राजनैतिक कारण यह है कि उ प्र में मुस्लिम मतों का गणित अत्यन्त भयावह होता जा रहा है। 2001 की जनगणना के अनुसार 11 जिलों में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक थी। बच्चों के आधिक्य को ध्यान में ले तो मतदाताओं में 25 प्रतिशत से अधिक बनता है। रामपुर जैसे जिले में मुस्लिम आबादी 49 प्रतिशत थी जो अब मुस्लिम बहुसंख्य जिला बन गया होगा। परिसीमन के बाद इन 11 जिलों में 68 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र आते है। इन क्षेत्रों में मुस्लिम तुष्टिकरण के सीधे प्रभाव की अपेक्षा इन घोर साम्प्रदायिक दलों को है। सारा घमासान इसे प्राप्त करने के लिये है। किसी को चिंता नहीं है कि इसका देश की एकता व अखण्डता पर क्या प्रभाव होगा।

सामान्यतः यह माना जाता है कि जहाँ भी मुस्लिम मतों का प्रतिशत 20 से अधिक होता हे वहाँ सामूहिक मतदान के कारण वे निर्णायक बन जाते है। हालाँकि आज उ प्र  की स्थिति में यह कहना सम्भव नहीं है कि चुनाव में यह मत किसी एक दल के खाते में जायेगा। भयावह स्थिति तो इसको पाने के लिये किये जा रहे प्रयासों में है। यह सब स्वतन्त्रता पूर्व के दशक की घटनाओं के समान ही हो रहा है। इसको रोकने के लिये सभी देशभक्तों को एकजूट होकर प्रयास करने की आवश्यकता है। पंथाधारित धृवीकरण तो ठीक नहीं है किन्तु वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिन्दुआंे का सुदृढ़ संगठन देश की एकता के लिये अनिवार्य है। एक ओर जाति वर्ग के भेदों से उपर उठकर सभी हिन्दूओं के संगठित होने व अपनी शक्ति को राजनैतिक अभिव्यक्ति देने के लिये तत्पर होने की आवश्यकता है और दूसरी ओर भारतीय मुसलमानों में इस जागरण की आवश्यकता है कि इस विभाजनकारी राजनीति से सर्वाधिक नुकसान उसी समूदाय का हुआ है। चाहे वर्तमान में पाकिस्तान की स्थिति देखे अथवा देश में काँग्रेस शासित प्रदेशों की। 60 वर्ष तक मुस्लिमों के रहनुमा बनें रहने का दावा करने के बाद उनके पीछड़ेपन के अध्ययन के लिये सच्चर समिति का गठन करनेवाली काँग्रेस का षडयन्त्र भारतीय मुसलमानों को समझना चाहिये। उसी समिति की रिपोर्ट में मुस्लिम समाज की सबसे अच्छी स्थिति गुजरात में है ऐसा लिखा है। यह भी मुस्लिम समुदाय के लिये समझना आवश्यक है।

भारती के पुत्रों के लिये समय जागने का है अन्यथा तुष्टिकरण का यह खेल पता नहीं देश को कहाँ ले जायेगा?

फ़रवरी 23, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 7 टिप्पणियाँ

   

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