उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

अस्मिता भारतीय की, परिचय भारत का . . .


कल वर्षप्रतिपदा है। पूरे देश में उल्हास व धार्मिक पवित्रता के साथ नववर्ष के उत्सव मनाये जायेंगे। विदेशी पंचांग के आदी तथाकथित आधुनिक लोग शायद इसको जानते भी नहीं होंगे। निश्चित ही माध्यमों द्वारा 1 जनवरी के समान हंगामा तो होगा ही नहीं। यदि कोई केवल प्रसार माध्यमों पर ही निर्भर करता हो तो सम्भवतः इस नववर्ष से अनभिज्ञ ही रहेगा। इन परिस्थितियों को देखकर मन में प्रश्न आता है- क्या यही भारत है?

पुदुचेरी के एक युवा लेखक ने अमेरिकी समाचारपत्र न्यूयार्क टाइम्स में लेख लिखा है कि ‘‘भारत अब अमेरिका बन गया है’’।

http://www.nytimes.com/2012/03/11/opinion/sunday/how-india-became-america.html?_r=4&hp

बड़े बड़े माल के चित्र दिखाकर भारत में फैल रहे पाश्चात्य प्रभाव का उदात्तीकरण ही इस लेख में किया है। इसी को विकास के पर्याय के रूप में चित्रित किया गया है। पूरे लेख में ऐसा चित्रण दिया गया है मानो भारत में पूरे संस्कार ही अमेरिका जैसे हो गये है। इस सब में लेखक का भाव उत्सव का है। मानों अमेरिका बन जाना भारत की कोई बहुत बड़ी उपलब्धी है। दो प्रश्न इस युवा पत्रकार को अपने आप से पूछने चाहिये। एक क्या वाकई बहुतांश भारत में यह पाश्चात्यीकरण हुआ है? और दूसरा कि क्या बाहरी परिवर्तन से भारत का मूल स्वभाव, भारत की आत्मा ही बदल जायेगी? हमारी शिक्षा ने हमें अपने आप से ही अनभिज्ञ कर दिया है। आज हमारे शिक्षित युवा नहीं जानते कि भारत क्या है। केवल किसी एक युवा पत्रकार की बात नहीं है अपने इतिहास, संस्कार व संस्कृति से परिचय ना होने के कारण अनेक तथाकथित उच्च शिक्षित युवा विकसित सम्पन्न भारत को अमेरिका की प्रतिकृति के रूप में ही देखना चाहते है।

इसमें वाकई इन युवाओं का दोष नहीं है। हमारे प्रबुद्ध वर्ग का यह दायित्व है। पर प्रबुद्ध वर्ग स्वयं ही भ्रमित दिखाई देता है। सर्वोच्च न्यायालय के एक भूतपूर्व न्यायाधीश जो वर्तमान में प्रसार माध्यमों की संस्था के अध्यक्ष है, ने अमेरिका में दिये अपने व्याख्यान में भारत को एक सराय के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने भारत को दूसरे देश से आये प्रवासियों का देश बताया। उनके अनुसार सहस्रों वर्षों से अनेक अलग अलग मूल के लोग यहाँ आते गये और बसते गये। अर्थात वर्तमान में जो हम सब यहाँ के निवासी है उनका इस भूमि से कोई नाता ही नहीं है। हमने भी अपने विद्यालय में इतिहास की पुस्तकों में ऐसी ही बातें पढ़ी है। किन्तु गत 2 से भी अधिक दशकों से मिली पुरातात्विक जानकारी ने इस कहानी को झूठा साबित कर दिया है। आर्यों के भारत बाहर से आने के सिद्धांत का विश्वभर के विद्वान पुरातत्व वेत्ताओं तथा इतिहासकारों ने खण्डन किया है। 1300 से भी अधिक स्थानों पर हुई खुदाई ने हड़प्पा व माहन जो दारों से भी 2000 वर्ष पूर्व से आज तक एक सलग, अखण्ड सरस्वति-सिंधु सभ्यता के होने के प्रमाण प्रचूर मात्रा मे प्रस्तुत किये है। भले ही विद्यालय व महाविद्यालयों की पुस्तकों में इन तथ्यों को आने में और देरी हो सकती है किन्तु विद्वान पूर्वन्यायाधीश को तो यह ज्ञात ही होगा। अतः उनके द्वारा विदेश में भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के बारे में इस प्रकार का विपर्याय देख मन में प्रश्न उठता है कि यह भ्रमप्रणीत प्रामाणिक अभिमत है अथवा वाममार्गी विचारकों द्वारा हेतु पुरस्सर किये जा रहे बुद्धिभेद का अंग है?

स्वतन्त्र भारत में हम अपनी अस्मिता को भूलते जा रहे है। अस्मिता अर्थात पहचान। अपने होने का मूल्य, सार्थकता। बिना अस्मिता के भान के देश का स्वाभिमान जागना सम्भव ही नहीं है। विड़म्बना यह है कि भारत में विदेशी शासन के विकट काल में हमने अपनी अस्मिता को अक्षुण्ण रखा और आज जब राजनैतिक स्वतन्त्रता है तब हम इसे भूलते जा रहे है। भारत की आत्मा धर्म है। किसी विदेशी विश्वविद्यालय में इस बात पर अनुसंधान हो रहा है कि इस्लाम के कठोर आक्रमण के सामने विश्व की बड़ी बड़ी सामथ्र्यवान व समृद्ध सभ्यतायें, जैसे मिस्र, मेसोपोटेमिया, पारस आदि कुछ दशकों में ही ध्वस्त हो गई। वहाँ की पूरी जनसंख्या ईस्लाम में मतांतरित हो गई। आज वहाँ पूरानी सभ्यता के केवल अवशेष ही बचे है। कोई जीवित वंशधर नहीं बचा। 700 वर्षों से अधिक के इस्लामी आक्रमण व 170 साल के मुगल राज्य के बाद भी आज भारत में हिन्दू न केवल जीवित है अपितु फल फूल रहा है और अपने पूर्व वैभव को प्राप्त करने की ओर अग्रेसर है। इसके मूल में क्या कारण है? क्या इस संस्कृति की विशेषता है जो इसे शाश्वत सनातन अमृतत्व प्रदान कर रहा है? यह विदेशों में शोध का विषय है किन्तु भारत में आज इस बात का भान ही नहीं है।

वास्तव में हम भ्रमित हैं अतः विरोधाभास से भी ग्रसित हैं। गीता को सायबेरिया के कोर्ट में चुनौति दी जाती है तो सारा देश एकस्वर में विरोध करता है। देश के विदेशमन्त्री रशिया के राजदूत को बुलाकर अपनी नाराजगी व्यक्त करते है। किन्तु इसी के 6 माह पूर्व जब मध्य प्रदेश सरकार विद्यालयों में गीता का पाठ पढ़ाने का निर्णय करती है तो इन्हीं के दल के लोग जबलपुर उच्च न्यायालय में इसका विरोध करते है। नार्वे में हाथ से भोजन करने जैसी भारतीय परम्पराओं को स्वास्थ्य के विपरित बताकर बच्चों को मातापिता से दूर करने का घोर विरोध करते समय मिड़िया कहता रहा कि आप हमारी परम्पराओं को अपनी दृष्टि से कैसे देख सकते है? वही मिड़िया पाद्यपूजा की अतिप्राचीन परम्परा की आलोचना करते समय भूल जाता है कि ये सारी आलोचना पश्चिमी दृष्टि के कारण है। शिक्षित भारत की यह विडम्बना आज के सभी समस्याओं की जड़ है।

वर्तमान में भ्रमित भारत पुनः अपनी अस्मिता को खोज रहा है तब वर्षप्रतिपदा का अवसर भारतीय अस्मिता के जागरण का अवसर है। पूरे देश के अधिकांश भागों में यह नववर्ष का दिन है। हमारी मान्यता के अनुसार आजही के दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना की। यह एक संकल्प लेने का अवसर है। नवीकरण, सृजन के संकल्प का अवसर। इसी दिन भारत की अस्मिता को मूल वेदों की रक्षा द्वारा पुनर्जागृत करने के लिये महर्षि दयानन्द सरस्वति ने आर्य समाज की स्थापना की। हिन्दू समाज को संगठित कर भारत की राष्ट्रीयता का अलख जगाने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना करनेवाले युगपुरूष डॉ केशव बळीरामपंत हेडगेवार का भी यह जन्मदिन है। कुल मिलाकर भारत की भारतीयता को जगाने का दिन है। इस वर्ष का संयोग ऐसा है कि इसी दिन हुतात्मा दिवस है। भारत की स्वतन्त्रता के लिये अपने यौवन को आहुत करनेवाले हुतात्मा भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरू का बलिदान दिवस 23 मार्च सभी युवाओं के लिये अपने देश के लिये संकल्प लेने का दिन है। किस स्वप्न को संजोंये हँसते हँसते बलिदान हुए थे ये वीर? यह प्रश्न हर मन में गुंजाने का यह दिन है। भारत से भारत का परिचय करा हर भारतीय की अस्मिता को जगाने का संकल्प ही विश्व मानवता का त्राण कर सकता है।

मार्च 22, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

अभ्यास भैया अभ्यास!


गढ़े जीवन अपना अपना -16
आधी रात का समय था। हस्तिनापुर के प्रासाद में सब ओर शांति थी। अर्जुन को लघुशंका के लिये जाना पड़ा। हाथ में मशाल लिये अर्जुन जब मैदान से लौट रहा था तो उसे भोजनालय में से कुछ खटपट की आवाज आई। जब जाकर के देखा तो भीम महाराज थाली में चावल का पहाड़ रचकर खा रहे थे। अर्जुन को देखकर सहम गये और अपनी सफाई देने लगे, ‘‘क्या है ना आप सब भाई थोड़ा थोड़ा खाकर अपना भोजन समाप्त कर देते हो। तो आपके साथ मुझे भी रुकना पड़ता है। पर पेट तो खाली ही रहता है। लज्जा के मारे मै भी उठ जाता हूँ। पर रात को इतनी भूख लगती है कि यहाँ आकर जो मिलता है वो खा लेता हूँ। अब माता कुंति को पता है तो वो मेरे लिये कुछ ज्यादा ही बचाकर रखती है। देखो बाकी लोगों को मत बताना। सब हसेंगे।’’ अर्जुन ने कहा, ‘‘मै आपकी समस्या समझ सकता हूँ। मै किसी को नहीं बताउंगा। पर मुझे एक प्रश्न है अंधेरे में आप खा कैसे लेते हो? हाथ सीधा मूह तक कैसे पहूँच जाता है? इधर उधर क्यों नहीं जाता?’’ भीम खिलखिलाकर हँस पड़े, ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास! आचार्य बताते है ना सब कुशलता अभ्यास से ही आयेगी। तुम धनुर्विद्या का अभ्यास करते हो मै खादविद्या का।’’ अर्जुन को मन्त्र मिल गया – ‘अभ्यास भैया अभ्यास!’ और उसने रात को धनुर्विद्या का अभ्यास करना प्रारम्भ किया और अन्धेरे में भी निशाना लगाने में निष्णात हो गया।

केवल कुशलता ही नहीं व्यक्तित्व के सारे बाह्य आयाम बल, रुप, स्वास्थ व कौशल सभी अभ्यास के द्वारा ही विकसित किये जा सकते है। अभ्यास को योग में भी वैराग्य के साथ सबसे अधिक महत्व का साधन माना गया है। महर्षि पतंजलि अभ्यास की व्याख्या करते है ‘‘स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारसेवितो दृढ़भुमि।’’ हम बहुत अधिक तकनिकी चर्चा नहीं करेंगे। हमारे व्यावहारिक प्रयोग के लिये अभ्यास के तीन अंगों का समझना पर्याप्त है। अभ्यास किसका करना है – एकाग्रता का। कैसे करना है अनुशासन से करना है। और कब करना है सातत्य से करना है दीर्घकाल तक। स्वामी विवेकानन्द के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के पास असीम शक्ति है। किन्तु कौन व्यक्ति कितनी शक्ति का अपने जीवन में लक्ष्य प्राप्ति की ओर प्रयोग कर पाता है ये इस बात पर निर्भर करता है कि किसके पास कितनी एकाग्र होने की क्षमता है। एकाग्रता की क्षमता प्रत्येक में होती है। अभ्यास से उसको बढ़ाया भी जा सकता है और अधिक प्रभावी भी बनाया सकता है। मन में प्रचण्ड ताकद है पर वह बिखरी हुई होने के कारण चरित्र के विकास में साधक नहीं हो सकती। यदि हम इस मन को एकाग्र होने का प्रशिक्षण प्रदान करते है तो यह मन की शक्ति दृढ़भूमि बनकर ईच्छाशक्ति बन जाती है।

आसन, प्राणायाम या सूर्यनमस्कार योग के इन सभी अभ्यासों में मूलतः मन को एकाग्र करने का ही अभ्यास होता है। त्राटक जैसे विशेष शुद्धिक्रिया भी सीख सकते है जो सीधे मन की एकाग्रता को बढ़ाती है। इन सब को सूयोग्य प्रशिक्षित शिक्षकों के मार्गदर्शन में सीखकर बाद में ही किया जा सकता है। धारणा-ध्यान आदि आंतरिक योग के साधन एकाग्रता में प्रशिक्षित होने के बाद ही सम्भव हो पाते है। पर एकाग्रता को अपने व्यक्तित्व का अंग बनाने का सबसे सरल मार्ग है खेल। मैदानी खेलों में मन की एकाग्रता का सहज और आनन्द के साथ विकास होता है। इसलिये पढ़ाई में भी यदि सबसे आगे बढ़ना हे तो खेल का अभ्यास प्रारम्भ कर दो। हाँ नियमितता से अभ्यास।

ये नियमितता भी तो अभ्यास से ही आती है। अनुशासन के अभ्यास से। अनुशासन अर्थात स्वयं का स्वयं पर शासन। जो व्यक्ति किसी और के अधीन नहीं रहना चाहता है उसे अनुशासित होना होगा। अनुशासन स्वयं के प्रति सम्मान का प्रगटीकरण है। जो खुद से प्यार करता है वह अपने जीवन को सहज ही अनुशासित कर लेता है। अनुशासित व्यक्ति अपने आप में बड़ा ही स्वतन्त्र हो जाता है। युवाओं के मन में ये बहुत बड़ी गलतफहमी होती है कि अनुशासनहीन होने में आनन्द है। वास्तव में यदि आप समय और शरीर को अनुशासित कर सकें तो आप पायेंगे की आपके पास जो चाहे वो करने के लिये पर्याप्त समय भी होता है, सामथ्र्य भी और विकल्प चूनने की स्वतन्त्रता भी। अनुशासित छात्र पढ़ाई नियमित करता है तो बकाया (Pending) काम कुछ भी ना रहने से कम समय में ही मुक्त हो जाता है और फिर परीक्षा के मध्य भी अपनी रूचि के अनुसार खेल अथवा मनोरंजन के लिये समय निकाल लेता है।

समयपालन, आज्ञापालन और सुव्यवस्था ये अनुशासन के अभ्यास के तीन मार्ग हैं। हम स्वयं तय करके समयपालन करें यह अपने जीवन का सम्मान है। यदि हम किसी से समय तय करें तो उसका कड़ाई से पालन करें स्वयं के गठन के लिये। कहते है नेपोलियन ने महत्वपूर्ण मन्त्रणा के लिये रखे भोज में सेनापति को देरी होने पर अकेले ही भोजन कर लिया और बादमें भूखे पेट ही मन्त्रणा प्रारम्भ कर दी। किसी के यह कहने पर कि 20 सेकण्ड ही तो देरी हुई थी उत्तर दिया कि ‘‘रणभूमि में 20 सेकण्ड का अन्तर जीवन और मृत्यु के मध्य का अन्तर होगा। और इससे भी अधिक महत्व की बात है कि यह विजय और पराजय के बीच का भी अन्तर होगा।मै विजय की आदत डालना चाहता हूँ। उसका प्रारम्भ समयपालन की आदत से होता है।’’

आज्ञापालन मन को अनुशासित करता है और बल, रूप स्वास्थ्य और कुशलता में यह अनिवार्य है। आज्ञा के रुप में मन के विरूद्ध बात को भी किया जाता है तब उसे आज्ञापालन कहते है। यदि पहलवान मन की माने और शरीर को कष्ट देनेवाले व्यायाम से कतराये ते कैसे बलवान् होगा। पर यदि वह प्रशिक्षक की आज्ञा का पालन कर मन की कमजोरी को जीत ले तो अवश्य अपराजेय हो जायेगा। इसलिये जीवन में विजयी व्यक्तित्व को गढ़ना है तो मनमानी नहीं चलेगी, आज्ञामानी ही दौड़ेगी। तो हर बार कार्य करते समय स्वयं को पूछे मनमानी या आज्ञामानी?

सुन्दरता के लिये शारीरिक अनुशासन अर्थात सुव्यवस्था अत्यावश्यक है। आकर्षक चुम्बकत्व आयनों के अनुशासित होने से आता है यह हमने देखा था। इसका अभ्यास हमें अपने स्वामीत्व की हर वस्तु को सुव्यवस्थित करने से करना होगा। जिस चीज को हम अपना कह देते है उसके साथ अपने अहं के माध्यम से हम अपने चरित्र को जोड़ देते है। अर्थात हमारे कपड़े, पुस्तके, जूते-चप्पल, गाडी, खेल के उपकरण, गुड्डा-गुड्डी जिसे भी हम हमारा कहते है सब हमारे व्यक्तित्व को ना केवल दर्शाते है अपितु गढ़ते भी है। अतः शारीरिक अनुशासन का प्रारम्भ इन चीजों को व्यवस्थित करने से होता है। पुस्तके, कपड़े साफ-स्वच्छ, सुन्दर रखने में जो प्रयास लगेगा वो हमारे मन को भी सुन्दर कर देगा। अव्यवस्था से व्यवस्था और व्यवस्था से सुव्यवस्था का प्रवास जीवन को सुन्दरता और सहज निर्मलता की ओर ले जाता है।

एकाग्रता और अनुशासन के साथ ही अभ्यास का सबसे श्रेष्ठ अंग है -सातत्य। महर्षि पतंजलि ने जिसे नैरन्तर्य कहा है- निरन्तरता। इसकी चर्चा को अभी निरन्तर रखते है अगले सप्ताह के लिये। तब तक पहले दो अंगों का तो अभ्यास प्रारम्भ कर ले। भीम सा बल, अर्जुन सा रूप और दोनों का स्वास्थ्य और कौशल पाने का एक ही तो मन्त्र है ‘‘अभ्यास भैया अभ्यास!’’

मार्च 19, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

कुशल मंगल है।


गढ़े जीवन अपना अपना -15

चरित्र निर्माण के बाहरी आयामों में चौथा व अंतिम है – कौशल। शारीरिक बल, रूप ओर स्वास्थ्य के साथ ही विभिन्न प्रकार के कौशल भी जीवन में वांछित सफलता पाने के लिये आवश्यक है। जीवन के लक्ष्य की ओर बढ़ने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है अन्यथा भी अनेक प्रकार की परिस्थितियों में जीवन को अपने निश्चित लक्ष्य की ओर अग्रेसर करने की चुनौति आ सकती है। आचार्य चाणक्य अपने शिष्यों को शिक्षा देते है कि यदि मार्ग में बाधा नहीं है तो समझना चाहिये कि मार्ग सही दिशा में नहीं है। इसलिये जब हम अपने जीवन में लक्ष्यप्राप्ती का मार्ग चुनते है तो हमें सभी प्रकार की स्थितियों के लिये स्वयं को तैयार करना चाहिये। अतः व्यक्तित्व विकास में कौशल प्राप्ति का असाधारण महत्व है। पांडवों के जीवन में आई प्रत्येक बाधा को उन्होंने कौशल प्राप्ति का साधन बनाया। अर्जुन ने सारे जीवन भर नये नये अस्त्रों को प्राप्त करने के लिये अलग अलग खतरों का सामना किया। किरात रूप में स्वयं शंकर भगवान का सामना कर पाशुपतास्त्र प्राप्त करना हो या नारायणास्त्र की उग्र तपस्या हो, इन सब ने ही अन्ततः धर्मयुद्ध में पाण्डवों को विजयश्री प्रदान की।

वर्तमान युग में तीन प्रकार के कौशल में प्रशिक्षित होना विकसित व्यक्तित्व के लिये आवश्यक है। पहली श्रेणी में जीवनोपयोगी कौशल आते है जो व्यक्ति को स्वावलम्बी बनाते है। स्वयं के लिये हम नियम सा बना ले जो मुझे चाहिये वो मै बना सकूं। खाना खाते है ना तो भोजन पकाना आना चाहिये। आधुनिक घरों के बच्चों को तो भोजन परोसना और थाली धोना भी नहीं आता। कपड़े पहनते है तो कपड़े धोना, प्रेस करना या कुछ थोड़ी बहुत सिलाई करना सीख लेना चाहिये। कुछ सम्पन्न घरों के बालकों को तो कपड़ों की घड़ी करना भी नहीं आता। विकसित व्यक्तित्व का ध्येय हो कि किसी भी परिस्थिति में दूसरे पर निर्भर ना रहना पड़ें। ये उपर से सरल लगने वाली बाते कभी कभी बड़ी बाधा बन जाती है। कपड़े धोने का अभ्यास ना हो तो अचानक साफ कपड़े नहीं धो सकेंगे। स्वावलम्बन की आदत बाल्यकाल में ही पड़ जानी चाहिये। समझदार अभिभावक सामथ्र्य के बावजूद 10 से 16 वर्ष के आयु में बालकों को नौकरों पर निर्भर नहीं होने देते।

दूसरी श्रेणी में अभिव्यक्ति का कौशल आता है। अपने व्यक्तित्व को प्रगट करने के लिये अभिव्यक्ति-कौशल अत्यावश्यक है। जीवनलक्ष्य की प्राप्ति में यह महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में व्यावसायिक सफलता में भी यह अनिवार्य हो गया है। इस श्रेणी के कौशल में भाषा का ज्ञान आता है। व्यक्ति को अधिक से अधिक भाषाओं को सीखना चाहिये। वर्तमान में केवल अंग्रेजी पर बल दिया जाता है पर भाषा कौशल का सर्वोत्तम विकास मातृभाषा में ही होता है। यदि एक बार मातृभाषा में प्रवीणता हासिल कर ले तो फिर अन्य किसी भी भाषा को सीखना सरल हो जाता है। हमारे मस्तिष्क में जो भाषा सम्बंधी केन्द्र है उनका विकास होना आवश्यक है यदि ये केन्द्र ठीक से विकसित हो जाये तो कोई भी नई भाषा सीखना सहज सुलभ हाता है। यन्त्र मानव (रोबोट) के विकास के लिये अनिवार्य कृत्रिम बुद्धि (Artificial Intelligence) के बारे में जो अत्याधुनिक अनुसंधान हुए है वे हमें बताते हैं कि संस्कृत एक ऐसी परिष्कृत भाषा है कि जिसके अध्ययन से मस्तिष्क का पूर्ण विकास होता है। यह भाषा गणितीय होने के कारण बिना किसी विसंगति के भाषीय तर्क का विकास होता है जो मस्तिष्क के भाषा केन्द्रों के स्नायविक उतकों (Neurons) के विकास में गति प्रदान करता है। इसी शास्त्रीयता के चलते इंग्लैण्ड के कुछ विद्यालयों में वैदिक मंत्रो तथा संस्कृत के अध्यापन को प्रारम्भ किया गया है। यदि संस्कृत व अपनी मातृभाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया जाये तो फिर अंग्रेजी में भी सहज प्राविण्य मिल जायेगा। हाँ प्रयास तो करना ही पड़ेगा। मातृभाषा फिर संस्कृत और उसके बाद अंग्रेजी यदि यह क्रम रखा जाये तो भाषा सीखने में आनन्द आयेगा और प्रयास कठीन होने से भी खेल के समान आनन्ददायी होंगे।

अभिव्यक्ति कौशल का दूसरा अंग है कला। प्रत्येक व्यक्ति में अपनी भावनाओं के प्रेषित करने की आकांक्षा भी होती है और उसकी अपनी एक विधा भी। यही विधा कला के रूप में प्रगट होती है। सारी कलायें भावों की अभिव्यक्ति के लिये ही होती है। प्रत्येक के स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति अपने भाव शब्द या रूप के द्वारा अभिव्यक्त करता है। शब्द या ध्वनि के द्वारा सम्प्रेषण काव्य, लेखन, संगीत आदि कलाओं में विकसित होता है। रूप अथवा आकार के द्वारा सम्प्रेषण शिल्प, चित्रकला, नृत्य नाट्य आदि कलाओं में विकसित होता है। संसार में प्रत्येक व्यक्ति कलोपासक होता है अर्थात कलाभिव्यक्ति को करनेवाला अथवा उसका आस्वादन करनेवाला होता है। अपने अन्दर की कला का विकास भी व्यक्तित्व के विकास के लिये अत्यावश्यक है। व्यावसायिक लक्ष्य को महत्व देते समय कला को अतिरिक्त एवं अनावश्यक मानते हुए दुर्लक्षित किया जाता है पर यह आत्मघाती है। कलाविहीन व्यक्ति में जो अधुरापन रहता है वह उसे किसी भी क्षेत्र में अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं करने देता। अतः अपनी अपनी रूचि के अनुसार कलाविधा का चयन कर उसके प्रशिक्षण, अभ्यास व आस्वादन के लिये नियमितता से समय देना चाहिये। जीवन के लक्ष्यप्राप्ति में सहायक होने के साथ ही कलोपासना जीवन को रसमय बनाकर परिपूर्ण कर देती है।

तीसरी श्रेणी के कौशल में यन्त्रविद्या (Technology) का अन्तर्भाव होता है। मानव की शारीरिक क्षमताओं को विस्तारित करने का काम यन्त्र करते है। यन्त्रों के सुविधाजनक प्रयोग से कार्य को सुचारू, सक्षम एवं कम समय में किया जा सकता है। आधुनिक जीवन में संचार के साधन बढ़ जाने के साथ ही जीवन में उपकरणों की संख्या एवं भुमिका दोनों में प्रचण्ड वृद्धि हुई है। संगणक (Computer) और चल-दूरभाष (Mobile) तो प्रत्येक के अनिवार्य उपांग हो गये है। इनके प्रयोग एवं उपयोग में असीम सम्भावनायें है और शायद ही कोई ऐसा दम्भ भर सकें कि इनको पूरी तरहा से जान लिया। इन उपकरणों का प्रयोग तो सभी करते है पर अनेक सुक्ष्म पहलुओं की ओर ध्यान नहीं देते। हममें से कितने लोग जानते है कि केवल कुछ नम्बर डायल करके ही अपने मोबाईल की पूर्णतः समाप्त (Discharged) बैटरी को कुछ और देर तक चलाया जा सकता है। ऐसी अनेक बातें है जिनकी बारीकियों के बारे में हम लोग नहीं जानते। दिल्ली के छतरपूर मंदिर की घटना है। एक अमेरिकी पर्यटक ने अपना अत्याधुनिक कॅमेरा देकर एक भारतीय छात्र को फोटो लेने को कहा। दो-तीन फोटो लेने के बाद कॅमेरा लौटाते हुए छात्र ने पर्यटक को कॅमेरे के बारे में कुछ तकनिकी प्रश्न पूछे। अमेरिकी ने जबाब दिया मै इसकी तकनिक के बारे में कुछ नहीं जानता केवल उपयोग जानता हूँ। जापानी चीजे बनाते हैं हम प्रयोग करके खराब होने पर फैंक देते है। हम भारतीय ही है जो खराब चीजों को भी सुधारकर प्रयोग में लेते है। ये जुगाड़ हमारी कंजुसी या कमी नहीं यन्त्र ज्ञान के प्रति हमारी स्वाभाविक जिज्ञासा है। आधुनिक पीढ़ि में भी ये जिज्ञासा है पर प्रतिस्पद्र्धा की आपाधापी में हम इस कौशल को भूल ना जाये, प्रयत्नपूर्वक विकसित करें।

स्वावलम्बन, कला और यन्त्रविद्या तीनों श्रेणियों के कौशल विकसित करने के लिये नित्य अभ्यास ही एकमात्र उपाय है। कौशल के नैपुण्य में ही हमारा कुशल है और सार्वजनिक उद्देश्य के प्रति समर्पित कुशल ही मानवता के लिये मंगल होता है।

मार्च 14, 2012 Posted by | आलेख | , , , , , , , , , , , | 8 टिप्पणियाँ

परिवर्तन का मत


बहुप्रतिक्षित चुनाव परिणाम आ गये। कहीं भी कोई आश्चर्य नहीं रहा। 24 घण्टें कुछ ना कुछ परोसने की मजबुरी में समाचार माध्यम कुछ ना कुछ विश्लेषण करेंगे ही। संविधान की भावना व भाषा के विपरित पंथ व जाति की चर्चा तथाकथित विशेषज्ञ बड़ी निर्लज्जता से करते है। राजनेताओं को जनता में गुट बनाबनाकर उनके मत पाने है अतः वे पंथ, जाति आदि आधार पर घोषणायें कर प्रचार करते है यह तो समझा जा सकता है किन्तु समाचार वाहिनियों के सुत्रधारों, अंग्रेजी में तो इन्हें लंगर कहते है, तथा उनके साथ चर्चा करने के लिये एकत्रित ‘विशेषज्ञों’ की क्या अनिवार्यता हे जो वे इन विभाजनकारी तत्वों के आधार पर चुनाव का विश्लेषण करते है? उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत पानेवाली स पा के युवा नेता अखिलेश यादव ने बड़ी प्रगल्भता के साथ पहली पत्रकार परिषद में जनता का आभार मानते हुए स्पष्ट किया कि ‘‘हमें जनता ने जाति, पंथ (भैयाजी ने तो धर्म ही कहा था) से उपर उठकर समर्थन दिया है।’’ पर तथाकथित विशेषज्ञ कहाँ मानने वाले? वे तो अभी तक रट लगा रहे है कि साम्प्रदायित मतों के ध्रुवीकरण के कारण ही उ प्र में स पा को विजय प्राप्त हुई। आशा है कि अखिलेश यादव अपने पिता के विपरित, साम्प्रदायिकता व आपराधिक बाहुबल के स्थान पर विकासोन्मुखी राजनीति करेंगे।

समाचार माध्यमों की रट ने काँग्रेस को भी अपनी हार के लिये कारण मिल गया। जिन वाहिनियों ने प्रतिदिन काँग्रेस के बाबा को अवास्तव महत्व दिया था वे काँग्रेस की करारी हार को नहीं पचा पा रहे थे। वे और काँग्रेस के अंतहीन नेता हार के लिये अपने युवराज के बचपने को छोड़ कर और सभी कारण ढ़ुंढ़ने में लगे है। इसमे फिर साम्प्रदायिक विलेषण से उनके लिये अच्छा अवसर मिल गया। सलमान खुर्शीद जिनकी पत्नि ना केवल चुनाव हारी अपितु तीसरे क्रमांक पर रही, बिना किसी लाग लपेट के कॅमेरा के सामने कह रहे थे कि ‘‘मुस्लिम आरक्षण की हमारी रणनीति बिल्कुल ठीक थी। स पा को भी विजय इन्हीं के भरोसे मिली है।’’ चुनावों को साम्प्रदायिक बनाने के बावजूद पूर्णतः सपाट हो जाने के बाद भी इस प्रकार की विघटनकारी वृत्ति राष्ट्रद्रोह ही कही जा सकती है।

यदि सभी राज्यों के परिणामों को एकसाथ देखा जाये तो देश के मूड़ का भान हो सकता है। देश परिवर्तन चाहता है। अधुरे परिवर्तन से समाज को संतुष्टि नहीं है। आज जनता परिणामकारी परिवर्तन चाहती है। अतः जहाँ विकल्प स्पष्ट था वहाँ जनता ने पूर्ण परिवर्तन कर दिखाया। भ्रष्ट सरकारों को जनता सबक सीखाना चाहती है। सब जगह इसी इच्छा से सभी राज्यों में मतदान का प्रतिशत भी अधिक रहा है। भले ही चुनाव विधानसभा के हो, लोगों का केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश मतदान में व्यक्त हुआ है। पंजाब व उत्तराखण्ड में राज्य सरकारों के विरूद्ध परिवर्तन की हवा को केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश ने काटा। जिसके कारण आसन्न दलों को पूर्णतः हटाया नहीं जा सका। उत्तर प्रदेश के समान गैर काँग्रेसी विकल्प होता तो पंजाब व उत्तराखण्ड में भी उ प्र व गोवा के समान ही परिवर्तन दिख सकता था।

जनता की इस परिवर्तन की मनिषा को समझे बिना किसी भी दल के लिये आगामी राज्य चुनावों अथवा कभी भी सम्भव लोकसभा चुनावों के लिये प्रभावी रणनीति बनाना सम्भव नहीं है। जनता भ्रष्ट, निकृष्ट शासन से उब चुकी है। व्यवस्था की शिथिलता, अप्रामाणिकता तथा प्रभावहीनता ने देश की समस्त क्षमताओं को ग्रहण लगा रखा है। इन बातों से देश का युवा त्रस्त है। अतः वह उस दल को चुनना चाहता है जिसमें उसे परिवर्तन की सम्भावना दिखाई देती है। गत वर्ष तामिलनाडु व पश्चिम बंगाल में भी यही भाव जनता ने व्यक्त किया। अतः जो व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में समाज का अभिमत बना है उसे चुनावी मतदान में रूपांतरित करना हो तो केवल जाति पाति के गणित बिठाकर काम नहीं चलेगा। अपनी भावी नीति को ठीक से रेखांकित करना होगा। केवल सत्तासीन पक्ष की आलोचना से काम नहीं चलेगा अपितु व्यवस्था के परिक्षालन की, पूर्ण परिवर्तन की अपनी योजना भी समाज के सम्मूख रखनी होगी। वर्तमान केन्द्र सरकार ने अक्षमता, भ्रष्टाचार व अनिर्णय के समस्त कीर्तिमान तोड़ दिये है। किन्तु केवल उसकी नीतियों की आलोचना भर करने से काम नहीं चलेगा।

काँग्रेस नीत सं प्र ग के विरूद्ध जनता की हवा तो इस बात से ही स्पष्ट है कि शासनविरोधी लहर तथा एकमात्र विकल्प होने के बावजूद पंजाब व उत्तराखण्ड में वह पूर्ण बहूमत नहीं पा सकी है। आगामी विधानसभा चुनावों में अधिकतर राज्य भाजपा शासित हैं। शासन के विरूद्ध जो अभिमत होगा उसका लाभ उठाने में काँग्रेस तभी सफल हो पायेगी जब वो केन्द्र में भ्रष्टाचार व महंगाई जैसे जनता से जुड़े मुद्दों पर कुछ कारवाई करती हुई दिखाई दें। अन्यथा धीरे धीरे इन राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों की शक्ति उभर सकती है। वैश्विक स्तर पर भारत की सम्भावनाओं को देखते हुए राष्ट्रहित में केन्द्र में सशक्त सरकार की अनिवार्यता है। यदि अनेक क्षेत्रीय दलों पर निर्भर गठबन्धन पुनः केन्द्र में शासन में आता है तो ऐसी स्थिति में आगामी 5 वर्ष बड़े ही कठीन होंगे। भारत के सम्मूख विश्वमंच पर प्रभावी भूमिका के लिये खुल रहे अवसर के द्वार अधिक समय तक खुले रहेंगे ऐसा नहीं है। यदि समर्थ सरकार की अनुपस्थिति के कारण भारत यह अवसर खो देता है तो ऐसे में फिर ऐसी अनुकूल स्थितियाँ बनने में दशकों का समय लग जायेगा। अतः 2013 या 2014 जब भी अगले साधारण चुनाव हो भारत को एक दल के सशक्त शासन के लिये प्रयासरत होना चाहिये।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भा ज  पा व काँग्रेस ही ऐसे विकल्प है जो एकदलीय स्थिर सरकार दे सकने की स्थिति में है। काँग्रेस की नीतियों की विफलता के कारण उसके विरूद्ध जनमत को देखते हुए यह दायित्व भा ज पा पर अधिक है। गठबन्धन की राजनीति के साथ ही स्वयं के बूते पर 250 सांसद चुनने का लक्ष्य लेकर काम करने की आवश्यकता है। अभी तो इस दल के संसद के दोनों सदनों के नेता भी मिड़िया में खुली चर्चा में 160-170 के आंकड़े गिनाते दिखाई देते है। जबकि अब तक 302 ऐसे निर्वाचन क्षेत्र है जहाँ कभी ना कभी भा ज पा के सांसद चुनाव जीत चूके हैं। ऐसे में परिवर्तन की हवा में सही प्रकार से प्रयास करने पर 250 स्थानों पर विजय प्राप्त करना बहुत असम्भव स्वप्न नहीं है। किन्तु वर्तमान चुनाव परिणामों से सही सबक सीख कर इस ओर तेयारी करने के लिये बहुत अधिक समय नहीं बचा है। साम्प्रदायिकता के आधार पर चुनाव जीतने की तकनिक गत 3-4 चुनावों से स्वयं को सेक्यूलर कहलाने वाले दलों ने विकसित की है। यह देशविघातक तकनिक तभी कारगर होती है जब बाकि मतों का जाति आधारित विभाजन होता है। यदि भा ज पा अपनी मूल राष्ट्रवादी विचारधारा पर बनीं रहती है तब ही जाति से उपर उठकर मतों को पाने की सम्भावना हो सकती है। प्रचार माध्यमों द्वारा हिन्दुत्व, भगवा आदि संकीर्ण नामों से सम्बोधित कर कुख्यात किये जाने के भय से अपनी मूल विचारधारा को छोड़ने का ही परिणाम है कि उ प्र में परिवर्तन के मत को भा ज पा अपने पक्ष में नहीं कर सकी। मिड़िया के कहने से अपने प्रचारक तय करने की भूल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की साम्प्रदायिकता को अवसर प्रदान करती है। यदि जाति, पंथ के उपर उठकर देशहित का आहवान करना है तो राष्ट्रहित की बात करने में आक्रमक आग्रह आवश्यक होगा।

इसके साथ ही केवल आलोचना के स्थान पर पर्यायी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत करने की क्षमता भी इस राष्ट्रवादी विचारधारा में है। स्वतन्त्रता से लेकर अब तक हमने विदेशी विचार पर आधारित व्यवस्था को ही अपनाया है। नीतिनिर्धारण में 1991 से पूर्व रूस प्रेरित समाजवाद तथा 1991 के भूमण्डलीकरण के दौर से पश्चिम का अन्धानुकरण हमारी सरकारों ने किया है। भारत की विशिष्ठ आवश्यकताओं के अनुरूप भारत की अपनी व्यवस्था निर्माण का प्रयास किया ही नहीं गया। वैचारिक स्तर पर भी इस प्रकार के मौलिक चिंतन का अभाव रहा है। गांधी व पं दीनदयाल उपाध्याय ने क्रमशः सर्वोदय व अन्त्योदय के लक्ष्य को सामने रखते हुए लोकहितकारी शासन तथा राजव्यवस्था की शुद्ध भारतीय वैचारिक पृष्ठभूमि दी थी। आज इन दोनों की ही थाती भा ज पा की पैतृक विचारधारा ने ही जीवित रखी है। राज्यों में इस विचारधारा पर आधरित विकास व सुशासन के प्रादर्श माॅड़ेल खड़े करने का दावा करने के साथ ही पूरे देश के लिये एक देशज, प्रभावी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत कर चुनाव लड़ने से ही आगामी समय में समाज का समर्थन मिल सकेगा।

भारत में चुनाव जीतने के लिये भाव जागरण तो आवश्यक ही है साथ ही प्रत्यक्ष धरातल पर परिणामकारी व्यवस्था की खातरी ;ळनंतंदजममद्ध भी। देश को सांस्कृतिक आधार पर एकत्र करनेवाले आह्वान का भावजागरण व भावी सुशासन की योजना इन दो ध्रुवों पर ही परिवर्तन का मत अपने पक्ष में किया जा सकेगा। जो भी दल इस प्रकार का विश्वास देनें में सक्षम होगा वहीं देश को अत्यावश्यक समर्थ, सक्षम व स्थिर शासन प्रदान कर सकेगा। अन्यथा जनता में परिवर्तन प्रज्वलित आकांक्षा क्षेत्रशः भिन्न भिन्न आधार पाकर प्रगट होगी व विपरित विचार व विरोधी हितों से परिचालित दलों के गुटबंदी में देश का भावी पुनः भटक जायेगा।

मार्च 9, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

   

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