उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

परिवर्तन का मत


बहुप्रतिक्षित चुनाव परिणाम आ गये। कहीं भी कोई आश्चर्य नहीं रहा। 24 घण्टें कुछ ना कुछ परोसने की मजबुरी में समाचार माध्यम कुछ ना कुछ विश्लेषण करेंगे ही। संविधान की भावना व भाषा के विपरित पंथ व जाति की चर्चा तथाकथित विशेषज्ञ बड़ी निर्लज्जता से करते है। राजनेताओं को जनता में गुट बनाबनाकर उनके मत पाने है अतः वे पंथ, जाति आदि आधार पर घोषणायें कर प्रचार करते है यह तो समझा जा सकता है किन्तु समाचार वाहिनियों के सुत्रधारों, अंग्रेजी में तो इन्हें लंगर कहते है, तथा उनके साथ चर्चा करने के लिये एकत्रित ‘विशेषज्ञों’ की क्या अनिवार्यता हे जो वे इन विभाजनकारी तत्वों के आधार पर चुनाव का विश्लेषण करते है? उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत पानेवाली स पा के युवा नेता अखिलेश यादव ने बड़ी प्रगल्भता के साथ पहली पत्रकार परिषद में जनता का आभार मानते हुए स्पष्ट किया कि ‘‘हमें जनता ने जाति, पंथ (भैयाजी ने तो धर्म ही कहा था) से उपर उठकर समर्थन दिया है।’’ पर तथाकथित विशेषज्ञ कहाँ मानने वाले? वे तो अभी तक रट लगा रहे है कि साम्प्रदायित मतों के ध्रुवीकरण के कारण ही उ प्र में स पा को विजय प्राप्त हुई। आशा है कि अखिलेश यादव अपने पिता के विपरित, साम्प्रदायिकता व आपराधिक बाहुबल के स्थान पर विकासोन्मुखी राजनीति करेंगे।

समाचार माध्यमों की रट ने काँग्रेस को भी अपनी हार के लिये कारण मिल गया। जिन वाहिनियों ने प्रतिदिन काँग्रेस के बाबा को अवास्तव महत्व दिया था वे काँग्रेस की करारी हार को नहीं पचा पा रहे थे। वे और काँग्रेस के अंतहीन नेता हार के लिये अपने युवराज के बचपने को छोड़ कर और सभी कारण ढ़ुंढ़ने में लगे है। इसमे फिर साम्प्रदायिक विलेषण से उनके लिये अच्छा अवसर मिल गया। सलमान खुर्शीद जिनकी पत्नि ना केवल चुनाव हारी अपितु तीसरे क्रमांक पर रही, बिना किसी लाग लपेट के कॅमेरा के सामने कह रहे थे कि ‘‘मुस्लिम आरक्षण की हमारी रणनीति बिल्कुल ठीक थी। स पा को भी विजय इन्हीं के भरोसे मिली है।’’ चुनावों को साम्प्रदायिक बनाने के बावजूद पूर्णतः सपाट हो जाने के बाद भी इस प्रकार की विघटनकारी वृत्ति राष्ट्रद्रोह ही कही जा सकती है।

यदि सभी राज्यों के परिणामों को एकसाथ देखा जाये तो देश के मूड़ का भान हो सकता है। देश परिवर्तन चाहता है। अधुरे परिवर्तन से समाज को संतुष्टि नहीं है। आज जनता परिणामकारी परिवर्तन चाहती है। अतः जहाँ विकल्प स्पष्ट था वहाँ जनता ने पूर्ण परिवर्तन कर दिखाया। भ्रष्ट सरकारों को जनता सबक सीखाना चाहती है। सब जगह इसी इच्छा से सभी राज्यों में मतदान का प्रतिशत भी अधिक रहा है। भले ही चुनाव विधानसभा के हो, लोगों का केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश मतदान में व्यक्त हुआ है। पंजाब व उत्तराखण्ड में राज्य सरकारों के विरूद्ध परिवर्तन की हवा को केन्द्र सरकार के प्रति आक्रोश ने काटा। जिसके कारण आसन्न दलों को पूर्णतः हटाया नहीं जा सका। उत्तर प्रदेश के समान गैर काँग्रेसी विकल्प होता तो पंजाब व उत्तराखण्ड में भी उ प्र व गोवा के समान ही परिवर्तन दिख सकता था।

जनता की इस परिवर्तन की मनिषा को समझे बिना किसी भी दल के लिये आगामी राज्य चुनावों अथवा कभी भी सम्भव लोकसभा चुनावों के लिये प्रभावी रणनीति बनाना सम्भव नहीं है। जनता भ्रष्ट, निकृष्ट शासन से उब चुकी है। व्यवस्था की शिथिलता, अप्रामाणिकता तथा प्रभावहीनता ने देश की समस्त क्षमताओं को ग्रहण लगा रखा है। इन बातों से देश का युवा त्रस्त है। अतः वह उस दल को चुनना चाहता है जिसमें उसे परिवर्तन की सम्भावना दिखाई देती है। गत वर्ष तामिलनाडु व पश्चिम बंगाल में भी यही भाव जनता ने व्यक्त किया। अतः जो व्यवस्था परिवर्तन के पक्ष में समाज का अभिमत बना है उसे चुनावी मतदान में रूपांतरित करना हो तो केवल जाति पाति के गणित बिठाकर काम नहीं चलेगा। अपनी भावी नीति को ठीक से रेखांकित करना होगा। केवल सत्तासीन पक्ष की आलोचना से काम नहीं चलेगा अपितु व्यवस्था के परिक्षालन की, पूर्ण परिवर्तन की अपनी योजना भी समाज के सम्मूख रखनी होगी। वर्तमान केन्द्र सरकार ने अक्षमता, भ्रष्टाचार व अनिर्णय के समस्त कीर्तिमान तोड़ दिये है। किन्तु केवल उसकी नीतियों की आलोचना भर करने से काम नहीं चलेगा।

काँग्रेस नीत सं प्र ग के विरूद्ध जनता की हवा तो इस बात से ही स्पष्ट है कि शासनविरोधी लहर तथा एकमात्र विकल्प होने के बावजूद पंजाब व उत्तराखण्ड में वह पूर्ण बहूमत नहीं पा सकी है। आगामी विधानसभा चुनावों में अधिकतर राज्य भाजपा शासित हैं। शासन के विरूद्ध जो अभिमत होगा उसका लाभ उठाने में काँग्रेस तभी सफल हो पायेगी जब वो केन्द्र में भ्रष्टाचार व महंगाई जैसे जनता से जुड़े मुद्दों पर कुछ कारवाई करती हुई दिखाई दें। अन्यथा धीरे धीरे इन राज्यों में भी क्षेत्रीय दलों की शक्ति उभर सकती है। वैश्विक स्तर पर भारत की सम्भावनाओं को देखते हुए राष्ट्रहित में केन्द्र में सशक्त सरकार की अनिवार्यता है। यदि अनेक क्षेत्रीय दलों पर निर्भर गठबन्धन पुनः केन्द्र में शासन में आता है तो ऐसी स्थिति में आगामी 5 वर्ष बड़े ही कठीन होंगे। भारत के सम्मूख विश्वमंच पर प्रभावी भूमिका के लिये खुल रहे अवसर के द्वार अधिक समय तक खुले रहेंगे ऐसा नहीं है। यदि समर्थ सरकार की अनुपस्थिति के कारण भारत यह अवसर खो देता है तो ऐसे में फिर ऐसी अनुकूल स्थितियाँ बनने में दशकों का समय लग जायेगा। अतः 2013 या 2014 जब भी अगले साधारण चुनाव हो भारत को एक दल के सशक्त शासन के लिये प्रयासरत होना चाहिये।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भा ज  पा व काँग्रेस ही ऐसे विकल्प है जो एकदलीय स्थिर सरकार दे सकने की स्थिति में है। काँग्रेस की नीतियों की विफलता के कारण उसके विरूद्ध जनमत को देखते हुए यह दायित्व भा ज पा पर अधिक है। गठबन्धन की राजनीति के साथ ही स्वयं के बूते पर 250 सांसद चुनने का लक्ष्य लेकर काम करने की आवश्यकता है। अभी तो इस दल के संसद के दोनों सदनों के नेता भी मिड़िया में खुली चर्चा में 160-170 के आंकड़े गिनाते दिखाई देते है। जबकि अब तक 302 ऐसे निर्वाचन क्षेत्र है जहाँ कभी ना कभी भा ज पा के सांसद चुनाव जीत चूके हैं। ऐसे में परिवर्तन की हवा में सही प्रकार से प्रयास करने पर 250 स्थानों पर विजय प्राप्त करना बहुत असम्भव स्वप्न नहीं है। किन्तु वर्तमान चुनाव परिणामों से सही सबक सीख कर इस ओर तेयारी करने के लिये बहुत अधिक समय नहीं बचा है। साम्प्रदायिकता के आधार पर चुनाव जीतने की तकनिक गत 3-4 चुनावों से स्वयं को सेक्यूलर कहलाने वाले दलों ने विकसित की है। यह देशविघातक तकनिक तभी कारगर होती है जब बाकि मतों का जाति आधारित विभाजन होता है। यदि भा ज पा अपनी मूल राष्ट्रवादी विचारधारा पर बनीं रहती है तब ही जाति से उपर उठकर मतों को पाने की सम्भावना हो सकती है। प्रचार माध्यमों द्वारा हिन्दुत्व, भगवा आदि संकीर्ण नामों से सम्बोधित कर कुख्यात किये जाने के भय से अपनी मूल विचारधारा को छोड़ने का ही परिणाम है कि उ प्र में परिवर्तन के मत को भा ज पा अपने पक्ष में नहीं कर सकी। मिड़िया के कहने से अपने प्रचारक तय करने की भूल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की साम्प्रदायिकता को अवसर प्रदान करती है। यदि जाति, पंथ के उपर उठकर देशहित का आहवान करना है तो राष्ट्रहित की बात करने में आक्रमक आग्रह आवश्यक होगा।

इसके साथ ही केवल आलोचना के स्थान पर पर्यायी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत करने की क्षमता भी इस राष्ट्रवादी विचारधारा में है। स्वतन्त्रता से लेकर अब तक हमने विदेशी विचार पर आधारित व्यवस्था को ही अपनाया है। नीतिनिर्धारण में 1991 से पूर्व रूस प्रेरित समाजवाद तथा 1991 के भूमण्डलीकरण के दौर से पश्चिम का अन्धानुकरण हमारी सरकारों ने किया है। भारत की विशिष्ठ आवश्यकताओं के अनुरूप भारत की अपनी व्यवस्था निर्माण का प्रयास किया ही नहीं गया। वैचारिक स्तर पर भी इस प्रकार के मौलिक चिंतन का अभाव रहा है। गांधी व पं दीनदयाल उपाध्याय ने क्रमशः सर्वोदय व अन्त्योदय के लक्ष्य को सामने रखते हुए लोकहितकारी शासन तथा राजव्यवस्था की शुद्ध भारतीय वैचारिक पृष्ठभूमि दी थी। आज इन दोनों की ही थाती भा ज पा की पैतृक विचारधारा ने ही जीवित रखी है। राज्यों में इस विचारधारा पर आधरित विकास व सुशासन के प्रादर्श माॅड़ेल खड़े करने का दावा करने के साथ ही पूरे देश के लिये एक देशज, प्रभावी व्यवस्था का खाका प्रस्तुत कर चुनाव लड़ने से ही आगामी समय में समाज का समर्थन मिल सकेगा।

भारत में चुनाव जीतने के लिये भाव जागरण तो आवश्यक ही है साथ ही प्रत्यक्ष धरातल पर परिणामकारी व्यवस्था की खातरी ;ळनंतंदजममद्ध भी। देश को सांस्कृतिक आधार पर एकत्र करनेवाले आह्वान का भावजागरण व भावी सुशासन की योजना इन दो ध्रुवों पर ही परिवर्तन का मत अपने पक्ष में किया जा सकेगा। जो भी दल इस प्रकार का विश्वास देनें में सक्षम होगा वहीं देश को अत्यावश्यक समर्थ, सक्षम व स्थिर शासन प्रदान कर सकेगा। अन्यथा जनता में परिवर्तन प्रज्वलित आकांक्षा क्षेत्रशः भिन्न भिन्न आधार पाकर प्रगट होगी व विपरित विचार व विरोधी हितों से परिचालित दलों के गुटबंदी में देश का भावी पुनः भटक जायेगा।

मार्च 9, 2012 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. आगामी चुनाव में भी यदि त्रिशंकु लोकसभा निकलती है तो दोष जनता का नहीं है। राजनेताओं और राजनैतिक दल ही जिम्मेदार हैं। राजनैतिक दल अपनी विचारधारा का आग्रह लगभग छोड़ चुके हैं और राजनेता किसी भी तरह चुनाव जीतना चाहते हैं। दोनों मीडिया और जनता पर दोषारोपण कर रहे हैं।

    टिप्पणी द्वारा Ram Bhuwan Singh Kushwah | मार्च 10, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. BJP ko iss disha me sochna chahiye…

    टिप्पणी द्वारा Murari Gupta | मार्च 11, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. मिड़िया के कहने से अपने प्रचारक तय करने की भूल अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की साम्प्रदायिकता को अवसर प्रदान करती है। यदि जाति, पंथ के उपर उठकर देशहित का आहवान करना है तो राष्ट्रहित की बात करने में आक्रमक आग्रह आवश्यक होगा।

    टिप्पणी द्वारा jgdish gupt | मार्च 12, 2012 | प्रतिक्रिया


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