उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

रीसेट मत कर देना!


गढ़े जीवन अपना अपना -17

जर्मन साधक बड़ी श्रद्धा से जप कर रहा था। गंगाजी का किनारा, सामने विशाल हिमालय के उत्तुंग शिखर! उत्तरकाशी में गंगाजी मुड़कर उत्तरवाहिनी हो जाती है। कहते है उसके किनारे जप करने से त्वरित सिद्धि हो जाती है। अपने जर्मन साधक का विश्वास तो और भी अधिक दृढ़ था। उसके गुरू ने उसको बताया था कि यदि वो मन्त्र का सवा लाख जप कर देगा तो रामजी उसे अवश्य दर्शन देंगे। उसके हाथमें अणु गणक (Electronic Counter) था। एक छोटासा यन्त्र जिसपर दो खटके (Buttons) थे। एक गणना के लिये। एक बार मन्त्र का पाठ करने पर इस बटन को दबाने से गणना आगे बढ़ती थी। दूसरा बटन था- पुनरारम्भ (Reset) का जिसको दबाने से गणक फिर शून्य पर आ जाता था। अर्थात सारी गणना फिर प्रारम्भ होगी। वो अपने देश जर्मनी से भारत कई बार आया था, शांति की खोज में। गत वर्ष गुरूजी मिले और फिर यही रह गया। एक दिन बड़ी हिम्मत करके उसने गुरूजी से पूछा, ‘‘क्या मै रामजी के दर्शन कर सकता हूँ?’’ गुरूजी ने तुरन्त उत्तर नहीं दिया। कहा रामजी से पूछकर बताता हूँ। फिर एक दिन बाद बताया कि सवा लाख जप करोगे तो रामजी दर्शन दे देंगे। तो श्रद्धा से साधक बैठ गया जप करने। सामने एक परदा लगा दिया ताकि रामजी उसपर प्रगट हो सके। जप बड़ी श्रद्धा से चल रहा था। बीच बीच में गणक देख लेता।

जप 1 लाख के पार हुआ। पर रामजी का कोई चिह्न नहीं- ना पैर ना मुगुट। थोड़ा सा विचलित हुआ। सोचा कही कुछ गड़बड़ तो नहीं हो गयी? फिर भी एकदम श्रद्धा तो नहीं टूटी इसलिये लगा रहा। पर जब केवल 1000 ही मन्त्र बाकि रहे तब तो लगा मामला निश्चित ही गड़बड़ है और उठ गया। गुरुजी के पास जाकर आवेश में कहने लगा, ‘‘आप गलत कहते है। आपने कहा था जप करने से रामजी दर्शन देंगे पर ऐसा नहीं हुआ। मैने श्रद्धा से जप किया पर दर्शन नहीं हुए।’’ गुरुजी ने आश्चर्य से कहा, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता। स्वयं रामजी ने कहा था यदि सवा लाख जप कर लिया तो वे दर्शन अवश्य देंगे। तुमको विश्वास है तुम्हारी मालाओं की गिनती ठीक थी कहीं जप अधुरा तो नहीं रह गया।’’ शिष्य ने कहा, ‘‘त्रुटी की कोई सम्भावना ही नहीं है, अणु गणक है, श्रेष्ठतम (Perfect) है।’’ गुरुजी ने कहा, ‘‘दिखाओ!’’ उसने देते हुए ही स्पष्ट किया, ‘‘अभी 1 लाख 24 हजार हुए है। 1 हजार बाकि ही है पर रामजी का तो एक भी अंग प्रगट नहीं हुआ। मेरा परदा कोरा (Blank) ही है।’’ गुरुजी जोर जोर से हँसने लगे, ‘‘वाकई तुम्हारा परदा तो कोरा ही है। अरे पगले! रामजी प्रत्यक्ष दर्शन देंगे जैसे हम तुम्हे दिख रहे है। इससे भी अधिक प्राणवान। कोई परदा नहीं चाहिये और सवा लाख पूरा होने पर ही दर्शन होंगे। 1 लाख 24 हजार 9 सौ 99 से भी नहीं होगा।’’ जर्मन साधक ने कहा, ‘‘ठीक है! 1000 ही बचे है अभी घण्टे भर में कर लूँगा।’’ गुरुजी ने मुस्कुराते हुए रीसेट का बटन दबा दिया और कहा, ‘‘ऐसे नहीं होता। एक भी व्यवधान का अर्थ है गणना का शून्य होना। अब फिर सवालाख पूरा करना होगा।’’

अभ्यास में सातत्य का यही महत्व है। निरन्तर अभ्यास ही प्रभावी होता है। हम सब अपने जीवन में कुछ पाने की आकांक्षा से संकल्प लेकर बड़ी श्रद्धा से प्रयास करते है पर गड़बड़ यही हो जाती है सातत्य नहीं बना पाते। कुछ ना कुछ बहाना बन जाता है और हम नियम तोड़ देते है। गणना शून्य हो जाती है साधना रीसेट हो जाती है। अतः सातत्य का बड़ा महत्व है। लगातार करने से ही अभ्यास सिद्ध होता है। हम अपने घर में ही देख सकते है, हमारी माँ प्रतिदिन नियम से कुछ काम करती ही है। साधारण से कार्य है जैसे तुलसी को पानी ड़ालना, श्याम को दियाबाती करना, ज्यादा समय या श्रम नहीं लगता। पर हाँ! ध्यान रखना तो पड़ता ही है। और इसी से एकाग्रता और अनुशासन आता है। सातत्य से करने से अभ्यास सिद्ध हो जाता है। इसिलिये हम पाते है साधारण गृहिणी में भी अद्भूत ईच्छाशक्ति होती है। पन्नाधाय और इमरता देवी जैसे असाधारण त्याग को भी वो सहजता से कर लेती है।

राजस्थान में जोधपुर के पास स्थान है खेजड़ी। वहाँ की एक साधारण ग्रामीण महिला ने पर्यावरण की रक्षा के लिये बलिदान कर दिया। जब राजा के सैनिक पेड़ काटने आये तो इमरता देवी एक पेड़ से चिपक गई। ‘सिर कटे तो कटै पर रूख ना कटै।’’ वृक्ष की कीमत हमारी जान से भी बढ़कर है। 300 महिलाये इमरता देवी के बलिदान से प्ररित होकर खेजड़ी के वृक्षों से चिपक गई। राजा को हारना पड़ा वृक्ष बच गयें। आज वहाँ इमरता देवी के सम्मान में उद्यान बना है। विष्नोइयों के 29 नियमों का सातत्य से पालन करने से एक सामान्य अनपढ़ महिला में पर्यावरण की रक्षा के लिये आत्मबलिदान करने का साहस पैदा हो गया।

हम अपने जीवन में प्रतिदिन करने के लिये छोटे छोटे कुछ नियम बना लें। और फिर पूर्ण श्रद्धासे उनका पालन करें। हमारा साहस ही हमारा सम्बल बनेगा। जब आलस से नियम टूटने लगे तो अपने आप को याद दिलाये कि कितने दिनों, महिनों या वर्षोंसे बिना एक दिन का भी विराम लिये हम इस कार्य को कर रहे है। तो फिर मन कहेगा आज एक दिन ना करने से इतनी बड़ी गणना शून्य हो जायेगी। और यह बात हमे नियम तोड़ने से परावृत्त करेगी। जब कांचिकामकोटी पीठ के शंकराचार्य को झूठे आरोपों में बंदी बना लिया तो वहाँ के चन्द्रमौलीश्वर की संध्यापूजा में खण्ड पडा। 1200 वर्षोंसे निरन्तर चल रही पूजा में विराम आ गया। अब आज फिर से प्रारम्भ परम्परा तो मात्र 6 साल पूरानी है।

कहते है कि 12 साल लगातार बिना एक भी खण्ड के अभ्यास करने पर एक तप सिद्ध होता है। एक मनुष्य को अपने जीवन में कम से कम 12 तप करने अपेक्षित है। अब प्रश्न आयेगा 144 वर्ष तो आयु ही नहीं है फिर ये कैसे सम्भव है? सरल सी बात है एक बार में एक तप ही करना थोड़े ही आवश्यक है। एकसाथ छोटे- छाटे 6-7 नियम बना सकते है। आचार्य तुलसी इसे अणुव्रत साधना कहते थे। पर याद रहे अभ्यास रीसेट ना हो जाय!

अप्रैल 11, 2012 - Posted by | आलेख | , , , ,

11 टिप्पणियाँ »

  1. Bahut acha article hai Bhaiya.
    Dhanyawaad

    टिप्पणी द्वारा Deepesh | अप्रैल 11, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. मैं भारतीय संतों ,गुरुओं की महानता का कायल हूँ। हमारे यहाँ अधिकारी को ज्ञान देने की परंपरा है। निश्चित ही जर्मन मुमुक्ष ईश्वर दर्शन के लिए भारत आए होंगे और उन्होने ,उन्हें जो बताया गया उसी के अनुसार ,ईश्वर की कल्पना की होगी, अर्थात अतीव सुंदर , महान वैभवयुक्त यानी मुकुटधारी,सर्व शक्तिमान,निर्दोष,गुणआगार आदि आदि। भारतीय ऋषि ने मुमुक्ष का स्तर देखकर सवा लाख जाप करने की सलाह दी होगी । साधक जर्मनी का था,दूर से आया था, भारत के ज्ञान पर उसे महान श्रद्धा रही होगी। पर वह गुरु के जाप के निहितार्थ को तो समझ नहीं सका और गिनती को महत्व देने लगा। परिणाम वही हुआ जो होना था, पूरी मेहनत ‘रीसेट’ हो गई। वास्तव में तो मुकुटधारी भगवान की कल्पना मनुष्य की है। उस कल्पना में यदि मुमुक्ष का विश्वास प्रगाढ़ है तो निश्चित ही उसे मुकुटधारी भगवान मिलेंगे । सवा लाख जाप हो या केवल एक बार प्रेम से पुकारने पर वे दौड़ते चले आएँगे पर सच बात तो यह है कि भगवान और भक्त जब एकाकार हो जाता है, जहाँ एकत्व है वहीं वही पूर्णत्व है।व्यक्ति का आध्यात्मिक दृष्टि से विकास ही उसे पहले महात्मा और अंत में महानता की पराकाष्ठा होने पर परमात्मा बनाता है।भारत में दीन दुखियों की सच्ची निस्वार्थ सेवा ही परमात्म मिलन है। जर्मनी में शायद दीन- दुखी, आर्त न हों पर भारतीय महात्मा को तो धर्म का सार तत्व समझना चाहिए था।

    टिप्पणी द्वारा रामभुवन सिंह कुशवाह | अप्रैल 11, 2012 | प्रतिक्रिया

    • आप की बात सही है पर आप उदहारण में अटक गए अतः मई उसपर टिपण्णी नहीं करूँगा| फिर कभी इस विषय पर चर्चा करेंगे| इस लेख में जर्मन साधक का उदहारण तो इस हेतु दिय था की सातत्य में एक भी विराम आपको पुनः शुन्य पर ले जाता है| गणना फिर १ से प्रारंभ करनी पड़ती है| अतः अभ्यास में एक भी खंड न पड़े यह प्रयास हो|

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | अप्रैल 11, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. bhaiya sadar pranam
    suppose 108 surya namskar karte he lekin kbhi kbhi koi karansar ham pura nahi kar pate to kya thoda bahot kam karte he to kaya hamari tapsya reset ho jayegi?

    टिप्पणी द्वारा Mitesh Dholiya | अप्रैल 12, 2012 | प्रतिक्रिया

  4. Ha bat to thik hai,man me aalsay aane par use kahna hi hoga-aaj nahi karne se etne dinon ki niymitata tut jayegi ! ganna fir se shuru ho jayegi !!

    टिप्पणी द्वारा amit | अप्रैल 12, 2012 | प्रतिक्रिया

  5. आदरणीय भाई सा. ,मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ।मैं मानता हूँ कि साधक के लिए मन का एकाग्र करना जरूरी है। पर सब साधक तो नहीं होते,न सबके लिए जप करना जरूरी है। आज का युवा अपने कर्तव्य पथ पर आंगे बढ़ना चाहता है ।मेरे ख्याल से वही उसके लिए धर्म और अध्यात्म है । उसके लिए वही ज्ञान मुनासिब है जो उसके लिए सरल और सहज हो।जर्मनी का साधक निश्चित ही होगा मैं उसके न होने पर कोई प्रश्न ही खड़ा नहीं करता । मेरा तो कहना है कि आज के समय में वह ज्ञान ही सार्थक और उपयोगी होगा जो जीवन और जगत के लिए कल्याणकारी हो । योग निश्चित ही परम कल्याणकारी है । योग के दो स्वरूप आपने ही तो हमें बताए हैं : समाहित और व्युत्थान । आज व्युत्थान योग की बहुत अधिक आवश्यकता है।हमारे युवक जीवन को एकाग्र करने के लिए प्रातः स्मरण,योग के कुछ आसान आसन,सूर्य नमस्कार इतने से ही मन एकाग्र कर कर्तव्य पालन की ओर अग्रसर हों । वे जीवन में ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति ,सदाचार और अपना तथा अपने परिवार का संयमित जीवन जीकर अपना और अपने देश को समर्थ बनाएँ -ऐसा व्यावहारिक उपदेश ही ज्यादा उपयोगी होगा।
    बाकी जो आंगे बढ़ना चाहे, बढ़े , योगी और साधकों को कोई रोकता थोड़े हीं है।
    मैं अभी भी यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि एक दिन सूर्य नमस्कार करने से चूक जाने पर वह शून्य कैसे हो जाएगा ? उससे तो बेहतर होगा ही जिसने एक दिन भी सूर्य नमस्कार नहीं किया।
    मैं अब 69 का होगया । जैसी कि 69 की संख्या का स्वभाव है ,ठीक उल्टा ही सोचता हूँ यह आपको लगता होगा पर मेरा दावे के साथ कहना है कि मन की निर्मलता, कार्य में एकाग्रता और जीवन की सार्थकता ,लक्ष्य ऐसी औषधियां है जिसके लेने के बाद कोई रोग पैदा ही नहीं होता। और जिस दिन मरना होगा मर जायेंगे । स्वामी विवेकानन्द , आदि शंकर बहुत जल्दी चले गए । पर वे अपने अत्यंत अल्प जीवन में जो कुछ कर गए वही बहुत है।
    मेरे गले में कोई व्याधि नहीं है और मेरा हाज़मा भी भगवान की कृपा से बहुत अच्छा है। मेरी तो चिंता उन युवाओं के बारे में है जो अपनी उम्र से ज्यादा उसका सोच, ज्ञान और समझ बढ़ी है।वे इतनी जल्दी हमारे गूढ़ ज्ञान को हृदयांगम नहीं कर पा रहे हैं।
    निश्चित ही स्वामी विवेकानन्द उन्हें प्रेरित करते हैं क्योंकि वे युवा को एक श्रेष्ठ योगी बनाने की अपेक्षा श्रेष्ठ नागरिक बनाना चाहते हैं। दुर्भाग्य से आज के धर्मोपदेशक वह ज्ञान उन्हें नहीं दे पा रहे हैं जिनकी उन्हें आज जरूरत है। सादर, गुस्ताखी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं। रामभुवन सिंह

    टिप्पणी द्वारा ram Bhuwan Singh Kushwah, | अप्रैल 12, 2012 | प्रतिक्रिया

    • १. मन एकाग्र करना केवल साधक के लिए नहीं सबके लिए जरुरी है|
      २. यदि पोस्ट का पहला वाक्य देखा जाये तो आप को पता चलेगा कि ये पूरी श्रंखला का १७ वा लेख है| आप द्वारा कहे अनेक मुद्दे पहले १६ में आ चुके है|
      ३. सूर्यनमस्कार करने में एक दिन का गप होने से पहले किये सूर्यनमस्कार का परिणाम शुन्य होगा ऐसा तो नहीं कहा| गणना शुन्य होगी| निरंतरता से मिलाने वाला चरित्र निर्माणकारी लाभ नहीं मिलेगा| मन को ये बात बताने से सातत्य बढेगा, यह अनुभव है तर्क नहीं|
      ४. स्वास्थ्य, या आयु के लिए योग करने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए| चाहे जितने वर्ष जिए अपने जीवन को उत्पादक, उपयोगी व योगदान करने वाला बनाने के लिए ये लेखमाला है| हम सब किसी भी आयु में अपने चरित्र को ऐसा बना सकते है|
      ५. यह सब स्वयं के मूल्याङ्कन के लिए है| दूसरों के बारे में मत बनाने के लिए नहीं है|
      ६. मुझे नहीं लगता कि आयु के कारण उल्टा या सीधा सोचने कि बात है| आप ने शायद एकांगी देखा इसलिए ऐसी बाते मन में आई| ये अच्छा ही है कि आपने खुलकर टिपण्णी दी| इस चर्चा से भी कई पाठकों को भी लाभ मिलेगा|

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | अप्रैल 12, 2012 | प्रतिक्रिया

  6. Maza aa gaya bhaiya…….

    टिप्पणी द्वारा Prashant | अप्रैल 13, 2012 | प्रतिक्रिया

  7. Bahut sunder Bhaiya

    टिप्पणी द्वारा Deepesh | अप्रैल 15, 2012 | प्रतिक्रिया

  8. प्रणाम दादा !
    जो देनिक क्रियाए हे उनमे केसे पालन करे …
    रोज उसी समय पर उठा पाना ;रोज पढना .और भी सरे कम !
    किसी दिन तो छुट ही जाएगा न तब ??????

    टिप्पणी द्वारा neha singh | अप्रैल 17, 2012 | प्रतिक्रिया

    • रोज जो भी करते है सब में इस सातत्य का पालन करना तो बड़ा ही कठिन होगा| अतः हमको इनमे से कुछ बातें तय करनी होगी जो हमारा नित्य संकल्प हो| कुछ साप्ताहिक, मासिक और वार्षिक संकल्प भी हो सकते है, उनकी निरंतरता उस गति में होगी|

      टिप्पणी द्वारा uttarapath | अप्रैल 18, 2012 | प्रतिक्रिया


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