उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

गढ़े जीवन अब तक . . .


पिछले 17 लेखों में हम जीवन गठन की प्रक्रिया को देख रहे है। आगे बढ़ने से पहले एक बार अब तक की बातों की एक झलक देख ले।
प्रत्येक का जीवन उसका अपना है, अद्वितीय है फिर भी सब आपस में जुड़े है, एक ही जीवनरस से पोषित है। अतः सबका आपसी सम्बन्ध, अवलम्बन व निर्भरता को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक को अपना कार्य, भुमिका व ध्येय चुनना होता है। प्रकृति के इन नियमों के अनुसार ही जीवन जीना वैज्ञानिक विधि है। जीवनध्येय अपने जीवन के उद्देश्य के अनुरूप तो होना ही चाहिये साथ ही समष्टि में अपनी भुमिका के लिये भी उपयुक्त हो। यह जीवन ध्येय ही अपनी आजीविका ;ब्ंतममतद्ध अर्थात भौतिक जीवन लक्ष्य को तय करने में मुख्य कारक होता है। जब जीवन ध्येय तय होता है वही जीवन की दिशा भी तय करता है।
इस ध्येय को पाने के लिये अपने चरित्र का गठन करना अगला कार्य है। चरित्र गठन के आंतरिक व बाह्य आयाम होते है। आंतरिक आयाम अंतःकरण से जुड़े होते है तो बाह्य आयाम शारीरिक क्षमता से। चरित्र गठन के आंतरिक साधन हैं – प्रेरणा, वीरता, धैर्य व विवेक। प्रेरणा में असम्भव को सम्भव बनाने की क्षमता होती है। चुनौति को स्वीकार करने की ताकद ही वीरता है। प्रतिकूल परिस्थिति में भी मन को स्थिर रखने की अत्यन्त कठीन साधना धैर्य से ही सम्भव है। निर्णय लेते समय उपलब्ध विकल्पों में से सही चुनाव करना विवेक का काम है। इन चारों आंतरिक आयामों का संतुलित विकास चरित्र गठन का महत्वपूर्ण अंग है। प्रेरणा, वीरता, धैर्य व विवेक को एकत्रित रूप से श्रद्धा कहा जा सकता है। स्वामी विवेकानन्द युवाओं में नचिकेता सी श्रद्धा का आहवान करते है। हमने नचिकेता के जीवन के उदाहरणों से ही समझा कि श्रद्धा का विकास कैसे कर सकते है? नियमित आत्मावलोकन, सभी प्रकार की परिस्थिति में उत्साह तथा मन को विस्तारित करनेवाला वैराग्य श्रद्धा को दृढ़ करने के साधन हैं।
चरित्र गठन के बाह्य आयाम शारीरिक लगते हे किन्तु वास्तव में ये पूर्ण व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति करते हैं। बल में केवल शक्ति ही नहीं तो साथ में तितिक्षा व चापल्य भी आवश्यक है। बल के साथ ही बाह्य आयामों में रूप भी महत्वपूर्ण है। शुद्धि के साथ अनुशासन से ही व्यक्तित्व में आकर्षण उत्पन्न होता है। यह आकर्षण ही रूप का निखार है। स्वास्थ्य को केवल बिमारी से बचाव नहीं माना जाना चाहिये। स्वस्थ होने के लिये सकारात्मक चिंतन भी आवश्यक है। चरित्र का चैथा बाह्य आयाम है कौशल। स्वावलम्बन, यन्त्र तथा कला का कौशल विकसित करना एक सुगठित चरित्र के लिये अनवार्य है। बल, रूप, स्वास्थ्य व कौशल इन चारों के विकास के लिये अभ्यास ही एकमात्र साधन है। योगाचार्य पतंजली दीर्घकाल तक निरन्तरता से सेवाभाव से किये कार्य को अभ्यास कहते है। हमने अपनी लेखमाला में देखा कि अभ्यास एकाग्रता का करना है और पूर्ण अनुशासन व अखण्ड सातत्य के साथ करना है।
जीवन गठन की साधना में ओर भी पाड़ाव बाकि है किन्तु चरित्र गठन के इन आंतरिक व बाह्य आयामों को एक प्रवाह चित्र के रूप में एकत्र देख लेते है।

अप्रैल 18, 2012 - Posted by | आलेख | , , ,

3 टिप्पणियाँ »

  1. एक बात और जो कुछ करना है बस प्‍यार से करना है.. एकदम सहज होकर..

    टिप्पणी द्वारा Kautsa Shri | अप्रैल 19, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. Bahut Sunder Bhaiya. Aapke Mardarshan ke liye dhanyavad. Bhaiya kya aap 1 se 17 bhag ke link kram-bad roop se mujhe mail kar sakte h, m apne sabhi mitro ko bhejna chahta hu jises sabko jivan me prerna mil sake dhanyavad – mera email id – deep.sh83@gmail.com – Dhanyavad…….. – Deepesh

    टिप्पणी द्वारा Deepesh | अप्रैल 27, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. Nirmaan mein Satsang kaa sthan pratyek step par rahega. Isn;t it Bhaiya

    टिप्पणी द्वारा akhilesh gumashta | मई 14, 2012 | प्रतिक्रिया


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