उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

कैसे दूर हो संसद के प्रति समाज की अनास्था ?


संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन कर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

हमारे लोकतन्त्र की सबसे बडी पंचायत संसद के सत्रों को १३ मई २०१२ को ६० वर्ष पूरे हुए । संसद का महत्व इस कारण है क्योंकि स्वतन्त्र भारत के संविधान के अनुसार यह हमारी सर्वोच्च विधायिका है । देश में सुशासन के लिये समुचित कानून बनाने का कार्य संसद को करना है । जिस संविधान के द्वारा इसकी स्थापना हुई उसमें परिवर्तन का अधिकार भी संसद को ही है । सामूहिक निर्णय लोकतन्त्र में सुराज की आत्मा है । संसद चर्चा के द्वारा सामूहिक निर्णय का स्थान है । देश की नीतियों के निर्धारण का कार्य यद्यपि कार्यपालिका का है, किन्तु उनकी समीक्षा तथा दिशा निर्देशन का कार्य संसद में विभिन्न चर्चाओं के माध्यम से किया जाता है । भारतीय लोकतन्त्र में हमने जो व्यवस्था स्वीकार की है उसमें कार्यपालिका भी संसद का ही अंग होती है । मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री का संसद सदस्य होना अनिवार्य है । यदि नियुक्ति के समय वह सांसद नहीं है तो ६ माह के भीतर सांसद बनना अनिवार्य है । इस प्रकार संसद भारतीय राजव्यवस्था में सर्वोच्च है । न्यायपालिका को संसद के निर्णय बदलने का अधिकार नहीं है । संसद द्वारा बनाये कानून यदि संविधान के विपरीत हो तब ही न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है । अन्यथा इन कानूनों के अनुसार ही निर्णय देने के लिये सर्वोच्च न्यायालय बाध्य है ।

संसद के वर्चस्व का आधार उसका निर्वाचित स्वरूप है । सैद्धांतिक रूप से लोकतन्त्र में जनता ही राजा है । जनता के प्रतिनिधि राज चलाते हैं । अत: जनता के प्रतिनिधियों को सर्वाधिक अधिकार प्राप्त हैं । जिसको संसद में बहुमत प्राप्त है वह भारतीय राजव्यवस्था में सर्वाधिकारी है । जनता के निर्वाचन द्वारा सांसदों को यह नैतिक अधिकार मिल जाता है कि वे देश के बारे में निर्णय करें । यह नैतिक अधिकार ही वास्तव में संसद को राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण संस्था का दर्जा देता है । संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विशेष सत्र का आयोजन हुआ । स्मृतियों को संजोया गया । पूर्व सांसदों का स्मरण किया गया । प्रथम लोकसभा के दो जीवित सदस्यों श्री रिशांग किशिंग तथा श्री रेशमलाल जांगिड का सम्मान भी किया गया । कुल मिलाकर उत्सव मनाया गया । पर क्या केवल उत्सव मनाना पर्याप्त है ? सैद्धांतिक रूप से जो सम्मान व महत्व संसद का है क्या वह गरिमा आज जनमानस में स्थापित है ? क्या देश की जनता संसद के हीरक महोत्सव के समारोह में मन से जुडी ? क्या उसे इसका कोई हर्ष हुआ ?

वास्तव में स्वतन्त्र भारत के पडौस में जो देश हैं उसकी राजनीतिक दृष्टि से समीक्षा करें तो यह अपने आप में हमारे लिए बहुत बडी उपलब्धि है । भारत के साथ उसी से कटकर बने सभी पडौसी देशों में लोकतन्त्र का अस्तित्व ही खतरे में रहा है । पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यान्मार, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव तथा अफगानिस्तान सभी देशों में राजनैतिक उथल-पुथल ही चल रही है । ऐसे में १९७५ से ७७ के आपात्काल के कुछ माह छोड दिये जाये तो भारत ने स्थिर लोकतन्त्र का परिचय दिया है । इतने विशाल, विविधता सम्पन्न राष्ट्र के लिये यह अपने आप में ही बहुत बडी उपलब्धि है । किन्तु आज कितने भारतीय इस विचार से ऐसी सकारात्मकता से जुड सकते हैं ? दोष उनका भी नहीं है । हमारी लगभग सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में से समाज की आस्था उठ चुकी है । इसके चारित्रिक कारण है । संसद की गरिमा की रक्षा सांसद ही कर सकते हैं और पिछले कई वर्षों में राजनीतिक दलों के साथ ही सांसदों के चरित्र में भी गिरावट आई है । जो हमारी विशेषतायें थी वे ही बाधा बन गई । कार्यपालिका पर निर्वाचित संसद का अंकुश रहने के स्थान पर भ्रष्टाचार में भागीदारी के लिए कार्यपालिका का अंग बनने हेतु सांसद चुने जाने की परम्परा प्रारम्भ हो गई । सेवा के स्थान पर राजनीति व्यवसाय बन गई । इसी कारण संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने पर सांसदों के अलावा किसी ने उत्सव नहीं मनाया । यह तो ऐसा हुआ कि स्वयं का जन्मदिन केवल स्वयं ही मनाये । केवल व्यक्तिगत चारित्र्य ही संसद की गिरती गरिमा के लिए कारणीभूत नहीं है, वरन् वास्तव में ऐसे व्यवस्थागत कारण भी है जिसके चलते चरित्रहीन व्यक्ति लोकतन्त्र के मंदिर का पुजारी बन सकता है । भारत में पंचों को परमेश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है । यदि संसद को देश की सर्वोच्च पंचायत का यह दैवी सम्मान पुन: दिलाना है तो राजनैतिक दलों से सुयोग्य व्यक्ति को विधायिका में भेजने के साथ ही दो महत्वपूर्ण व्यवस्थागत सुधार भी अनिवार्य है ।

१.   निर्वाचन में सही अर्थों में बहुमत के प्रतिनिधि का चयन हो । वर्तमान चुनाव प्रणाली में मतदान के सर्वाधिक हिस्से का प्रतिनिधि निर्वाचित हो जाता है । विविधता के कारण दलों व प्रत्याशियों की संख्या बडी होती है । अत: ऐसा यदा कदा ही होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधि को बहुमत ने चुना हो । अधिकतर सांसद १५ से २५ प्रतिशत मत पाकर सांसद बन जाते हैं । यह प्रतिशत भी उन मतों का है जो मतदान में सम्मिलित हुए । परंतु जो २५ से ४० प्रतिशत मतदाता अपने मताधिकार का आलस, व्यस्तता अथवा घोर अनास्था के कारण प्रयोग ही नहीं कर रहे, उनकी तो गणना ही नहीं है । इस प्रकार समाज के ८० प्रतिशत से अधिक लोगों द्वारा नकारे हुए प्रतिनिधि संसद में जनता का प्रतिनिधित्व करने का दंभ भरते हैं । इस नकारा पद्धति के कारण राजनीति का स्वरूप विभाजनकारी हो गया है । जाति, पंथ, भाषा अथवा जो भी मिल जाये उस आधार पर जनता को बाँटकर अपने लिये प्रभावी अल्पमत का समर्थन प्राप्त करना प्रत्येक दल व नेता का लक्ष्य बन गया है । इसी के चलते सांसदों की भी मंडी लगती है । अत: संसद के ६० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर चुनाव में विजय के लिये ५० प्रतिशत से कम से कम एक मत अधिक का प्रावधान किया जाना चाहिये ।

२.   सांसदों में भ्रष्टाचार का दूसरा व्यवस्थागत कारण कार्यपालिका व विधायिका का घोलमेल है । मंत्री बनने के लिये सांसद होना अनिवार्य है । मंत्री के कार्यों पर नियन्त्रण व अंकुश रखने का काम भी संसद को करना है । इस दोहरे दायित्व के आपसी हितसम्बन्ध होने के कारण ही कार्यपालिका के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के स्थान पर विधायिका उसकी भागीदार बनती दिखाई दे रही है । अत: कार्यपालिका के स्वतन्त्र स्वरूप को विकसित कर संसद केवल विधायिका के रूप में तथा कार्यपालिका की नीति के लिये मार्गदर्शक तथा समीक्षक की भूमिका में हो, यह आवश्यक है । वर्तमान स्थिति में इसका एक समाधान मुख्य कार्यपालक प्रधानमंत्री के प्रत्यक्ष चुनाव से हो सकेगा । यदि देश की पूरी जनता प्रधानमंत्री के चुनाव में मतदान करे तथा उसमें भी बहुमत से चयन का ही नियम हो तो, एक स्थिर कार्यपालिका के साथ ही तटस्थ विधायिका का निर्माण हो सकेगा ।

संसद के हीरक महोत्सव के अवसर पर हम वैचारिक मंथन के द्वारा देश में एक लोकतांत्रिक क्रांति का सुत्रपात करें जिससे कि विश्व का सबसे बडा लोकतन्त्र भारत और भी अधिक आदर्श एवं प्रभावशाली बनें ।

मई 16, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

स्मृति स्वाधीनता संग्राम की . . .


10 मई 1857, अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शुभारम्भ। 1908 में स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने लंदन में 10 मई को क्रांति दिवस के रूप में मनाया था। उन्होंने हुतात्माओं की शपथ ली थी कि जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता क्रांति की अग्निशिखा को प्रज्वलित रखेंगे। सावरकर ने ही ‘प्रथम स्वातन्त्र्य समर‘ नाम से पुस्तक लिख कर इसके वास्तविक राष्ट्रीय स्वरूप का परिचय भारतीयों को करवाया था। यह विश्व की एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसे छपने पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया तथा मूल पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही इसका फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित हुआ।

सावरकर ने उस समय की परिस्थिति के अनुसार इसे केवल प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा है किन्तु आज हमें यह स्पष्ट करना चाहिये कि यह अंग्रेजों के विरूद्ध प्रथम आंदोलन था। केवल प्रथम कहना तो पूर्ण सत्य नहीं होगा। शिवाजी, राणाप्रताप के संग्राम भी स्वाधीनता के ही संग्राम थे। शिवाजी से प्रेरणा प्राप्त कर छत्रसाल जैसे अनेक वीरों ने मुगलों के परकीय शासन को उखाड़ स्वकीयों के शासन को प्रस्थापित किया था। उससे भी अनेक शताब्दियों पहले सिकन्दर की सेना को भगाने का कार्य चाणक्य के शिष्यों ने किया था। अतः स्वाधीनता का संग्राम तो भारत में सतत चलता रहा है। गत 2000 वर्षों में कोई भी 25-50 वर्ष का भी कालखण्ड ऐसा ना बीता हो जब देश के किसी ना किसी कोने में स्वतन्त्रता का आंदोलन ना हुआ हो। हमने कभी भी विदेशी, विधर्मी सत्ता को पूर्णतः स्वीकार नही किया। इतना ही नहीं इस कालखण्ड के बहुत बड़े हिस्सें में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हमारा अपना स्वदेशी शासन चलता रहा है। विदेशी इतिहासकारों के प्रभाव में आज भी हम इसे मराठा, राजपूत, सिख शासन इस प्रकार बाँटकर देखते है। जब कि ये सब स्वकीय शासन थे। इतिहास को पश्चिमी दृष्टि के स्थान पर भारतीय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने पर हमको इस कालखण्ड को दासता अथवा गुलामी का काल कहने के स्थान पर संग्राम युग कहना होगा।

प्लासी में द्रोहियों के कारण हुए पराभव के बाद पराधीन हुए भारत का अंग्रजों की सत्ता के विरूद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 का है। इस संग्राम की अनेक विशेषतायें हैं। सामान्यतः जिसे केवल सिपाही विद्रोह कहा जाता रहा है तथा दुर्भाग्य से आज भी अनेक भारतीय विश्वविद्यायलों के पाठ्यक्रम में इसी रूप में पढ़ाया भी जाता है वह जन सामान्य का संग्राम था। अंग्रेजी फौज में सम्मिलित भारतीय सैनिक भी जनविद्रोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। दूसरा भ्रम यह फैलाया जाता है कि यह केवल राजे रजवाड़ों तथा नबाबों का अपने अपने संस्थानों के लिये किया युद्ध था। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का भाव इसमेे निहित नहीं था। यह भी जानबुझकर फैलाया भ्रम है। उस समय के अंग्रजों के दस्तावेज प्रमाण है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके सेनापति तात्या टोपे के अद्भूत नियोजन से पूरे देश में ही इस संग्राम का जाल बिछाया गया था। ब्रिटिश सेना की छावनियों में फैला असंतोष भी कोई संयोग मात्र नहीं था। रानी के प्रभावी गुप्तचर विभाग का वह सफलतम छù युद्ध था। रानी ने सामान्य वेश्याओं को अपनी कला के माध्यम से राष्ट्र कार्य के लिये प्ररित किया। स्वर्गीय पति की नाट्यशाला की नटियाँ गुप्तचर बनीं और सैनिक शिविरों में नांच गाने के माध्यम से प्रथम असंतोष फैलाने का व बाद में संदेश पहुँचाने का कार्य इन वीरांगनाओं ने किया था।

पूरे देश में ही रोटी व कमल के निशान के द्वारा क्रांति का संदेश प्रवाहित हुआ था। जो इतिहासकार अज्ञान अथवा कपट के कारण इसे केवल उत्तरी भारत में सीमित बताते है वे भी सत्य से परें है। मैसूर तथा त्रावणकोर तक इस क्रांति की ज्वाला लगी थी। पूर्वनिर्धारित तिथि 31 मई को दोनों ही राज्यों ने अंग्रेजों के शासन को नकारा तथा युद्ध की घोषणा की। कंपनी के प्रतिनिधियों को निष्कासित कर दिया। मैसूर जैसे राज्यों में जहाँ कंपनी की टुकड़ियों ने विरोध किया वहाँ सभी अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया। एक ही दिन में भारत के एक बड़े हिस्से ने स्वयं को कंपनी की सत्ता से मुक्त घोषित कर दिया। इतिहास की कठोर वास्तविकताओं में ‘‘यदि’’ की कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं होता। फिर भी यह तो कहना ही होगा कि यदि 10 मई को मंगल पाण्डें संयम नहीं खोता और पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार 31 मई को क्रांति की चिंगारी एकसाथ पूरे देश में प्रगट होती तो अंग्रेजों के लिये इसे नियंत्रित करना निश्चित ही असम्भव हो जाता। अतः 10 मई के क्रांति दिवस का एक संदेश यह भी है कि जोश, उत्साह, उमंग, उत्सर्ग व समर्पण के साथ ही देशसेवा में धैर्य तथा संयम का भी बड़ा स्थान है। कई बार परिवर्तन के आंदोलन की अनिवार्यता व आग्रह के चलते हम प्रतिक्षा को असहनीय मान बैठते है किन्तु बृहत् योजना में इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है।

अंग्रेजों को समूल भारत से बाहर करने के जिस उद्देश्य से इस महाक्रांति का आज ही के दिन सूत्रपात हुआ था क्या वह लक्ष्य पूर्ण हुआ है? आज के दिन हमें यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या देश मानसिक दासता से स्वाधीन हुआ है? का हम वास्तव में स्वतन्त्र हुए है? क्या यह जो तन्त्र, व्यवस्था हमने अपनायी है वह स्व की है? स्वदेशी है? इस देश के ऐतिहासिक अनुभव व संस्कारों में से पनपी है? यदि इन सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं में दिये जा रहे है तो फिर आज पुनः क्राति की ज्वाला प्रज्वलित करनी होगी। सच्ची स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त करने तक यह क्रांति जीवित रहेगी। यही संकल्प 1857 के वीरों की स्मृति में हर देशभक्त को लेना होगा।

सावरकर का उद्बोधन १० मई १९०८ अवश्य देखें

http://www.youtube.com/watch?v=nCMk3HcXr-8&feature=youtu.be

मई 10, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

समर्पण का सम्मान


अनेक वर्ष पहले विवेकानंद केंद्र की हिंदी मासिक पत्रिका “केंद्र भारती” में ये लेख लिखा था| पिछले दिनों नागपुर के साप्ताहिक “भारतवाणी” ने इसे पुनः प्रकाशित किया| मित्रों के आग्रह पर यहाँ प्रकाशित कर रहे है| – उत्तरापथ

“ये अपने केन्द्र में भी पक्षपात होता है ! कुछ लोगों को अधिक महत्व मिलता है, भले ही उनमें योग्यता कम हो ।” अनीश खीजता हुआ-सा बोला ।

रजत बात से सहमत था, “चापलूसी करते हैं न उनको महत्व मिलता है ।”

“नहीं । मैं यह नहीं कह रहा था । मुझे लगता है, महत्व उन्हें मिलता है जो जीवनव्रती बन सकता है । अन्य कोई कितना भी योग्य क्यों न हो, यदि वह जीवनव्रती नहीं बननेवाला है तो उसे महत्व नहीं मिलेगा ।” अनीश ने बात स्पष्ट की ।

दोनों को ध्यान ही नहीं था कि भाईजी कब कक्ष में आ गये ! भाईजी ने खाँसकर उनका ध्यान आकर्षित किया ।

“अनीश ! तुमने सही कहा ! ऐसा तो है ही, पर क्या तुमने इसके कारण पर चिन्तन किया है ? ऊपर से यह पक्षपात लगता है । ऐसे ही पक्षपात का आरोप श्रीकृष्ण पर भी लगा था ।”

अनीश व रजत झेप गये व दत्तचित्त हो सुनने लगे । ” एक बार गोपियों के मन में आया- ये बांसुरी देखो, कैसे सदा कृष्ण के साथ रहती है और वह भी देखो, कैसे उसका लाड करता है ! ऐसा क्या है इस बंसी में जो मोहन के मन को मोह लिया, उसके अधरों पर स्थान बना लिया ?”

सारी गोपियाँ बंसी के पास गईं और उसे लगीं अपमानित करने, “अरी मुरलिया, तू क्यों ऐसे इठलाये ? दो कौडी की तू बाँसुरी, कृष्ण-संग से इतना इतराये ! ऐसा तुझमें है ही क्या जो कृष्ण की स्नेह-भाजन बने ? वह तो उस साँवरे की कृपा है जो तुझ जैसों को भी अपनाता है ।”

बंसी कृष्ण-स्वर का साधन है । उसके लीला का उपकरण है । बंसी जानती है उसका अपना कोई स्वर नहीं, संगीत नहीं, मोल नहीं । सब कुछ कान्हा का है । पर यह कान्हा का स्नेह अकारण नहीं है, वह उसने अर्जित किया है ।

हम सभी ईश्वरीय उद्देश्य के उपकरण बन सकें, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि, हम बंसी बनने की प्रक्रिया को समझें, उस पर आचरण करें’, भाईजी ने कथा को वर्तमान सन्दर्भ से जोडा । सभी लोग सावधान हो सुनने लगे । अब तो उनकी अपनी बात हो रही थी ।

बंसी ने अपने इस पडाव तक पहुँचने की यात्रा का वर्णन आरम्भ किया, वह बडी विनम्रता से बोली, ”  ऐसे ही नहीं कान्हा ने मुझे अपनाया ! मैंने भी खूब सहा है । बिना तप के कृष्ण-स्वर नहीं बजते जो आप सुनते ही आकर्षित हो भाग आती हो ।”

मेरे निर्माण का, साधना का पहला चरण प्रारम्भ हुआ- मोहमर्दन से ! मेरे हरे-हरे होते हुए यौवन में ही मुझे अपने कुटुम्ब-बाँस के पेड से अलग किया गया । क्षुद्र मोह से नाता तोडा गया । मेरे अनावश्यक भाग को काट कर अलग कर दिया, फिर खण्ड-खण्ड कर दिया ।

” ईश्वरीय उपकरण बनने के लिये समस्त मोह जनक, अधोगामी क्षुद्रता का त्याग करना पडता है । सदा स्नेहमय कृष्ण मुरारी हमें अपनाये, इसलिए हमें अपने शरीर मय नातों को तोडना होगा । अनन्त से नाता जोडने के लिए जडता को छोडना होगा ।” भाईजी ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट किया।

बंसी कह रही थी, ” यह तो केवल प्रारम्भ है । फिर मुझे रेत में तपाया गया । हरा होते हुए तोडा गया, क्योंकि किशोर तरुण ही राष्ट्रकार्य के लिए ज्यादा उपयोगी होते हैं पर उनके बचपने को तो पकना पडेगा । मजबूती तो तब ही आयेगी । तपकर पक्व बाँस ही बांसुरी बन सकता है । परिपक्व चित्त में ही ईश्वरीय संगीत झंकृत हो सकता है । जैसे पके फल से ही रस झरता है । कृष्ण भक्ति तो रसमय है, मधुर है ।

तीसरे चरण में बाँस की गाँठें घिसी गईं । गाँठें न घिसे तो स्वर कैसे बजेगा ? ईश्वर-प्रदत्त कार्य का कार्यकर्ता बनना है तो अपनी गाँठें घिसनी पडेंगी। अपने अहंकार से उत्पन्न राग-द्वेष की गाँठें प्रिय-अप्रिय गाँठें, क्षुद्र मान-अपमान की गाँठें जो उनका होना चाहे, उसे तो विस्तारित होना चाहिए, उदार होना चाहिए ।”

” इसलिये कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण से पूर्व, उनकी आदतों को मुलायम करना पडता है । गाँठें घिसेंगी तो स्वर बजेगा । गाँठें होंगी तो लट्ठ बजेंगे ।” सभी हँस पडे ।

” आजकल नाक इतनी बढ गई है कि घर-घर में लट्ठ बज रहे हैं ।” सोनू ने टिप्पणी की ।

“हाँ, गाँठें घिसने से बाह्य आचरण विनम्र हो जाएगा । पर यह तो अहंकार का केवल बाह्य रूप है । यह घिस जाए व बाँस अन्दर से भरा रहे भूसे से, तब भी बाँसुरी नहीं बजेगी ।”

भाईजी सबको गहराई में ले जाना चाहते थे । कथा आगे बढी । बंसी बोली, ” बंसी बनने के चौथे चरण में तो मुझे अन्दर से खोखला किया गया । कुचर-कुचर कर मेरे अन्दर के भूसे को निकाल दिया गया । जब आर-पार खोखली हो गई, जब अहंकार लेशमात्र भी नहीं रहा, तब मैं बंसी के स्वर हेतु वायु का प्रवाह बनने को तत्पर हुई ।”

अभी तपस्या समाप्त नहीं हुई है । ईश्वरानुरागी बनना है, उनका परम प्रेमस्पद बनना है तो आपको इन्द्रधनुषी योग्यताएँ अर्जित करनी होंगी, गरम सरिये से खोखले बाँस में छः स्वर-छिद्र किये गये । यह ईश्वरीय उपकरण की दिव्य विशेषताएँ हैं ।

भगवान श्रेष्ठता में प्रकट होते हैं । यदि हम अपने जीवन द्वारा ईश्वर को प्रकट करना चाहते हैं तो हमें योग्यताएँ अर्जित करनी होंगी, विविध योग्यताएँ । कार्यकर्ता हर कार्य में दक्ष होना चाहिए, कुशल एवं निपुण होना चाहिए उसे सदा अपने आप को श्रेष्ठ बनाने हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए।

अब भी बंसी नहीं बजेगी । योग्यता के अर्जन मात्र से ईश्वरीय कार्य का हेतु बनना सम्भव नहीं है । मानवी मन की दुर्बलता है कि योग्यता के साथ ही अहंकार भी बढता है । इस अहंकार से स्वर नहीं बज सकते । अतः समस्त खूबियाँ, जीवन में उपार्जित क्षमताएँ समर्पित होनी चाहिए । बंसी के सन्दर्भ में यह समर्पण है- ” फूँक मारने का छिद्र । इसके बिना तो बाँसुरी बज ही नहीं सकती । यह पूर्ण ईश्वर चरण में निवेदन ही बंसी को कृष्ण-स्वर प्रकटन का अधिकार देता है; सदा कान्हा के संग का अवसर प्रदान करता है ।”

” यह समर्पण ही कार्यकर्ता की योग्यता का मापदण्ड है । उसमें कितनी भी शारीरिक बौद्धिक या मानसिक क्षमताएँ हों, यदि समर्पण का भाव न हो तो उसका मूल्य नगण्य है । समर्पण ही ईश्वरप्रकटन का आधार है । अतः केन्द्र-कार्य जैसे सत्कर्म में लगे व्यक्ति को मिलनेवाला महत्व उसके समर्पण के अनुपात में होगा । इसे ही तुम जीवनव्रती बनने की सम्भावना कहकर अभिव्यक्त कर रहे हो ।” भाईजी आविष्ट से बोल रहे थे ।

” और यदि कोई अपने जीवन भर के लिए व्रतस्थ होकर रहने को तत्पर है तो वह सम्मान योग्य है । समाज में भी इस बात की प्रतिष्ठा होना आवश्यक है । समाज आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है । क्षुद्र जीविकोपार्जन ही जीवनलक्ष्य होता चला जा रहा है । माता-पिता भी अपने पुत्रों से पशुवत पेटपालन की ही अपेक्षा करने लगे हैं – समाज का यह परिदृश्य बदलना होगा ।”

समर्पण का ही सम्मान होना चाहिए । आइये ! इस योग भूमि में हम त्याग व समर्पण को परम्परा के रूप में कायम करें ।

मई 5, 2012 Posted by | Uncategorized | , | 6 टिप्पणियाँ

   

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