उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

समर्पण का सम्मान


अनेक वर्ष पहले विवेकानंद केंद्र की हिंदी मासिक पत्रिका “केंद्र भारती” में ये लेख लिखा था| पिछले दिनों नागपुर के साप्ताहिक “भारतवाणी” ने इसे पुनः प्रकाशित किया| मित्रों के आग्रह पर यहाँ प्रकाशित कर रहे है| – उत्तरापथ

“ये अपने केन्द्र में भी पक्षपात होता है ! कुछ लोगों को अधिक महत्व मिलता है, भले ही उनमें योग्यता कम हो ।” अनीश खीजता हुआ-सा बोला ।

रजत बात से सहमत था, “चापलूसी करते हैं न उनको महत्व मिलता है ।”

“नहीं । मैं यह नहीं कह रहा था । मुझे लगता है, महत्व उन्हें मिलता है जो जीवनव्रती बन सकता है । अन्य कोई कितना भी योग्य क्यों न हो, यदि वह जीवनव्रती नहीं बननेवाला है तो उसे महत्व नहीं मिलेगा ।” अनीश ने बात स्पष्ट की ।

दोनों को ध्यान ही नहीं था कि भाईजी कब कक्ष में आ गये ! भाईजी ने खाँसकर उनका ध्यान आकर्षित किया ।

“अनीश ! तुमने सही कहा ! ऐसा तो है ही, पर क्या तुमने इसके कारण पर चिन्तन किया है ? ऊपर से यह पक्षपात लगता है । ऐसे ही पक्षपात का आरोप श्रीकृष्ण पर भी लगा था ।”

अनीश व रजत झेप गये व दत्तचित्त हो सुनने लगे । ” एक बार गोपियों के मन में आया- ये बांसुरी देखो, कैसे सदा कृष्ण के साथ रहती है और वह भी देखो, कैसे उसका लाड करता है ! ऐसा क्या है इस बंसी में जो मोहन के मन को मोह लिया, उसके अधरों पर स्थान बना लिया ?”

सारी गोपियाँ बंसी के पास गईं और उसे लगीं अपमानित करने, “अरी मुरलिया, तू क्यों ऐसे इठलाये ? दो कौडी की तू बाँसुरी, कृष्ण-संग से इतना इतराये ! ऐसा तुझमें है ही क्या जो कृष्ण की स्नेह-भाजन बने ? वह तो उस साँवरे की कृपा है जो तुझ जैसों को भी अपनाता है ।”

बंसी कृष्ण-स्वर का साधन है । उसके लीला का उपकरण है । बंसी जानती है उसका अपना कोई स्वर नहीं, संगीत नहीं, मोल नहीं । सब कुछ कान्हा का है । पर यह कान्हा का स्नेह अकारण नहीं है, वह उसने अर्जित किया है ।

हम सभी ईश्वरीय उद्देश्य के उपकरण बन सकें, इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि, हम बंसी बनने की प्रक्रिया को समझें, उस पर आचरण करें’, भाईजी ने कथा को वर्तमान सन्दर्भ से जोडा । सभी लोग सावधान हो सुनने लगे । अब तो उनकी अपनी बात हो रही थी ।

बंसी ने अपने इस पडाव तक पहुँचने की यात्रा का वर्णन आरम्भ किया, वह बडी विनम्रता से बोली, ”  ऐसे ही नहीं कान्हा ने मुझे अपनाया ! मैंने भी खूब सहा है । बिना तप के कृष्ण-स्वर नहीं बजते जो आप सुनते ही आकर्षित हो भाग आती हो ।”

मेरे निर्माण का, साधना का पहला चरण प्रारम्भ हुआ- मोहमर्दन से ! मेरे हरे-हरे होते हुए यौवन में ही मुझे अपने कुटुम्ब-बाँस के पेड से अलग किया गया । क्षुद्र मोह से नाता तोडा गया । मेरे अनावश्यक भाग को काट कर अलग कर दिया, फिर खण्ड-खण्ड कर दिया ।

” ईश्वरीय उपकरण बनने के लिये समस्त मोह जनक, अधोगामी क्षुद्रता का त्याग करना पडता है । सदा स्नेहमय कृष्ण मुरारी हमें अपनाये, इसलिए हमें अपने शरीर मय नातों को तोडना होगा । अनन्त से नाता जोडने के लिए जडता को छोडना होगा ।” भाईजी ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट किया।

बंसी कह रही थी, ” यह तो केवल प्रारम्भ है । फिर मुझे रेत में तपाया गया । हरा होते हुए तोडा गया, क्योंकि किशोर तरुण ही राष्ट्रकार्य के लिए ज्यादा उपयोगी होते हैं पर उनके बचपने को तो पकना पडेगा । मजबूती तो तब ही आयेगी । तपकर पक्व बाँस ही बांसुरी बन सकता है । परिपक्व चित्त में ही ईश्वरीय संगीत झंकृत हो सकता है । जैसे पके फल से ही रस झरता है । कृष्ण भक्ति तो रसमय है, मधुर है ।

तीसरे चरण में बाँस की गाँठें घिसी गईं । गाँठें न घिसे तो स्वर कैसे बजेगा ? ईश्वर-प्रदत्त कार्य का कार्यकर्ता बनना है तो अपनी गाँठें घिसनी पडेंगी। अपने अहंकार से उत्पन्न राग-द्वेष की गाँठें प्रिय-अप्रिय गाँठें, क्षुद्र मान-अपमान की गाँठें जो उनका होना चाहे, उसे तो विस्तारित होना चाहिए, उदार होना चाहिए ।”

” इसलिये कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण से पूर्व, उनकी आदतों को मुलायम करना पडता है । गाँठें घिसेंगी तो स्वर बजेगा । गाँठें होंगी तो लट्ठ बजेंगे ।” सभी हँस पडे ।

” आजकल नाक इतनी बढ गई है कि घर-घर में लट्ठ बज रहे हैं ।” सोनू ने टिप्पणी की ।

“हाँ, गाँठें घिसने से बाह्य आचरण विनम्र हो जाएगा । पर यह तो अहंकार का केवल बाह्य रूप है । यह घिस जाए व बाँस अन्दर से भरा रहे भूसे से, तब भी बाँसुरी नहीं बजेगी ।”

भाईजी सबको गहराई में ले जाना चाहते थे । कथा आगे बढी । बंसी बोली, ” बंसी बनने के चौथे चरण में तो मुझे अन्दर से खोखला किया गया । कुचर-कुचर कर मेरे अन्दर के भूसे को निकाल दिया गया । जब आर-पार खोखली हो गई, जब अहंकार लेशमात्र भी नहीं रहा, तब मैं बंसी के स्वर हेतु वायु का प्रवाह बनने को तत्पर हुई ।”

अभी तपस्या समाप्त नहीं हुई है । ईश्वरानुरागी बनना है, उनका परम प्रेमस्पद बनना है तो आपको इन्द्रधनुषी योग्यताएँ अर्जित करनी होंगी, गरम सरिये से खोखले बाँस में छः स्वर-छिद्र किये गये । यह ईश्वरीय उपकरण की दिव्य विशेषताएँ हैं ।

भगवान श्रेष्ठता में प्रकट होते हैं । यदि हम अपने जीवन द्वारा ईश्वर को प्रकट करना चाहते हैं तो हमें योग्यताएँ अर्जित करनी होंगी, विविध योग्यताएँ । कार्यकर्ता हर कार्य में दक्ष होना चाहिए, कुशल एवं निपुण होना चाहिए उसे सदा अपने आप को श्रेष्ठ बनाने हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए।

अब भी बंसी नहीं बजेगी । योग्यता के अर्जन मात्र से ईश्वरीय कार्य का हेतु बनना सम्भव नहीं है । मानवी मन की दुर्बलता है कि योग्यता के साथ ही अहंकार भी बढता है । इस अहंकार से स्वर नहीं बज सकते । अतः समस्त खूबियाँ, जीवन में उपार्जित क्षमताएँ समर्पित होनी चाहिए । बंसी के सन्दर्भ में यह समर्पण है- ” फूँक मारने का छिद्र । इसके बिना तो बाँसुरी बज ही नहीं सकती । यह पूर्ण ईश्वर चरण में निवेदन ही बंसी को कृष्ण-स्वर प्रकटन का अधिकार देता है; सदा कान्हा के संग का अवसर प्रदान करता है ।”

” यह समर्पण ही कार्यकर्ता की योग्यता का मापदण्ड है । उसमें कितनी भी शारीरिक बौद्धिक या मानसिक क्षमताएँ हों, यदि समर्पण का भाव न हो तो उसका मूल्य नगण्य है । समर्पण ही ईश्वरप्रकटन का आधार है । अतः केन्द्र-कार्य जैसे सत्कर्म में लगे व्यक्ति को मिलनेवाला महत्व उसके समर्पण के अनुपात में होगा । इसे ही तुम जीवनव्रती बनने की सम्भावना कहकर अभिव्यक्त कर रहे हो ।” भाईजी आविष्ट से बोल रहे थे ।

” और यदि कोई अपने जीवन भर के लिए व्रतस्थ होकर रहने को तत्पर है तो वह सम्मान योग्य है । समाज में भी इस बात की प्रतिष्ठा होना आवश्यक है । समाज आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है । क्षुद्र जीविकोपार्जन ही जीवनलक्ष्य होता चला जा रहा है । माता-पिता भी अपने पुत्रों से पशुवत पेटपालन की ही अपेक्षा करने लगे हैं – समाज का यह परिदृश्य बदलना होगा ।”

समर्पण का ही सम्मान होना चाहिए । आइये ! इस योग भूमि में हम त्याग व समर्पण को परम्परा के रूप में कायम करें ।

मई 5, 2012 - Posted by | Uncategorized | ,

6 टिप्पणियाँ »

  1. सच बात है । त्याग और समर्पण से अहंभाव मिटता है। ‘स्व’ का जीवन लक्ष्य के प्रति समर्पण करते ही द्वेत का भाव समाप्त हो जाता है। पर यह समर्पण पूर्वभूमिका के बिना संभव नहीं है।हमारे शास्त्रों में समर्पण के दो तरीके बताए हैं । एक – प्रेम की पराकाष्ठा ,जिसे प्रभु प्रेमी ‘भक्ति’ कहते हैं। दूसरा तरीका ज्ञान मार्ग है। आत्मा की वास्तविक स्थिति को जानकर,सब से अद्वेत भाव का व्यवहार करना। यह कहना सरल है पर व्यवहार में लाना बहुत कठिन है।सहज और स्वाभाविक होते हुये भी कठिन है ! सिद्धांतः हम यह मानते है कि मैं भी वही हूँ जो दूसरा है। तब कौन किसको प्रेम दे रहा है और कौन किसकी उपेक्षा कर रहा है ,यह प्रश्न उठना ही नहीं चाहिए। स्वामी विवेकानन्द जी ने अपने समूचे ज्ञान और विचारों को केवल दो बातों में सीमित करते हुये कहा है “मेरे आदर्श यदि थोड़े शब्दों में बताना हो तो मनुष्य जाति को उसके दिव्यज्ञान के स्वरूप को बताना और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अभिव्यक्ति करने का उपाय बताना ही प्रमुख है।” क्योंकि मुझे अगर यह दिव्य ज्ञान प्राप्त भी होगया और दूसरे को नहीं हुआ तो हमारे विस्तार की कड़ी समाप्त हो जाएगी और हम तत्वज्ञानी होने के बाद भी खोखला और निस्सार जीवन ही व्यतीत करने को मजबूर हो जायेंगे। इसलिए यह जरूरी है कि जो हमारे संपर्क में आते हैं उन्हें भी यह बताना जरूरी है कि आप भी वही हैं जो मैं हूँ। श्रीमद्भगवत गीता में श्री कृष्ण यही तो कहते हैं कि भक्त और ज्ञानी में मुझे ज्ञानी अतिप्रिय हैं । क्योंकि भक्त अपने आराध्य में एकाकार होकर उसी में विलीन होना चाहता है ।प्रेम की पराकाष्ठा में शंका – कुशंका ,लेन देन,जैसे तमाम प्रश्न अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं ।पर इस भाव भूमि पर सदा बना रहना बहुत कठिन कार्य है । ज्ञानी इस तत्व ज्ञान को समझ चुका है । उसका व्यवहार ही आदर्श होगा । उसको यह भान तक नहीं होगा कि कोई उससे पक्षपात कर रहा है। पर व्यवहार में हम देखते हैं कि सब कुछ उलटा सीधा ही हो रहा है। भक्त ज्ञानी बनकर अपने आराध्य का नित्य परीक्षण करता नज़र आ रहा है और ज्ञानी पुरुष चाहते हैं कि लोग उनके प्रति असन्धिग्ध रूप से भक्ति भाव रखें। कृष्ण के प्रेम में दिवानी गोपिकायेँ की बंशी से कृष्ण की नज़दीकी से जलन होना स्वाभाविक है क्योंकि उनका प्यार आत्मिक नहीं है पर दिव्य ज्ञानी अपने सहयोगियों से बंशी जैसा समर्पण की अपेक्षा क्यों करते हैं?

    टिप्पणी द्वारा राम भुवन सिंह कुशवाह | मई 5, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. Bhaiya bahot prernadayee lekh padhne mila.

    टिप्पणी द्वारा Anand Bagadia | मई 5, 2012 | प्रतिक्रिया

  3. tyag aur samarpan ka wastvik arth ek nirjeev upakaran ki jeevant prastuti ke roop me prastut kiya.yah vastvik taur par lekhak ka anutha prayas hai. Aise gyanvardhak prasang padhakar to anand hi aa gaya.

    टिप्पणी द्वारा Bhanwar Singh Rajput | मई 5, 2012 | प्रतिक्रिया

  4. Reblogged this on pravinchn.

    टिप्पणी द्वारा pravinchn | मई 6, 2012 | प्रतिक्रिया

  5. bahut badhiya hai

    टिप्पणी द्वारा ashutosh kumar | मई 8, 2012 | प्रतिक्रिया

  6. this is the perfect time to give this type of experience , on the festive of 150 th jayanti we must take swadhya in baithak with this subject also write in our all patrikas like vivek vichar ,kendra bharti.

    टिप्पणी द्वारा shreeram | मई 8, 2012 | प्रतिक्रिया


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: