उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

स्मृति स्वाधीनता संग्राम की . . .


10 मई 1857, अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध प्रथम स्वाधीनता संग्राम का शुभारम्भ। 1908 में स्वातन्त्र्यवीर सावरकर ने लंदन में 10 मई को क्रांति दिवस के रूप में मनाया था। उन्होंने हुतात्माओं की शपथ ली थी कि जब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो जाता क्रांति की अग्निशिखा को प्रज्वलित रखेंगे। सावरकर ने ही ‘प्रथम स्वातन्त्र्य समर‘ नाम से पुस्तक लिख कर इसके वास्तविक राष्ट्रीय स्वरूप का परिचय भारतीयों को करवाया था। यह विश्व की एकमात्र ऐसी पुस्तक है जिसे छपने पूर्व ही प्रतिबंधित कर दिया गया तथा मूल पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व ही इसका फ्रेंच अनुवाद प्रकाशित हुआ।

सावरकर ने उस समय की परिस्थिति के अनुसार इसे केवल प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम कहा है किन्तु आज हमें यह स्पष्ट करना चाहिये कि यह अंग्रेजों के विरूद्ध प्रथम आंदोलन था। केवल प्रथम कहना तो पूर्ण सत्य नहीं होगा। शिवाजी, राणाप्रताप के संग्राम भी स्वाधीनता के ही संग्राम थे। शिवाजी से प्रेरणा प्राप्त कर छत्रसाल जैसे अनेक वीरों ने मुगलों के परकीय शासन को उखाड़ स्वकीयों के शासन को प्रस्थापित किया था। उससे भी अनेक शताब्दियों पहले सिकन्दर की सेना को भगाने का कार्य चाणक्य के शिष्यों ने किया था। अतः स्वाधीनता का संग्राम तो भारत में सतत चलता रहा है। गत 2000 वर्षों में कोई भी 25-50 वर्ष का भी कालखण्ड ऐसा ना बीता हो जब देश के किसी ना किसी कोने में स्वतन्त्रता का आंदोलन ना हुआ हो। हमने कभी भी विदेशी, विधर्मी सत्ता को पूर्णतः स्वीकार नही किया। इतना ही नहीं इस कालखण्ड के बहुत बड़े हिस्सें में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हमारा अपना स्वदेशी शासन चलता रहा है। विदेशी इतिहासकारों के प्रभाव में आज भी हम इसे मराठा, राजपूत, सिख शासन इस प्रकार बाँटकर देखते है। जब कि ये सब स्वकीय शासन थे। इतिहास को पश्चिमी दृष्टि के स्थान पर भारतीय राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने पर हमको इस कालखण्ड को दासता अथवा गुलामी का काल कहने के स्थान पर संग्राम युग कहना होगा।

प्लासी में द्रोहियों के कारण हुए पराभव के बाद पराधीन हुए भारत का अंग्रजों की सत्ता के विरूद्ध पहला संगठित संग्राम 1857 का है। इस संग्राम की अनेक विशेषतायें हैं। सामान्यतः जिसे केवल सिपाही विद्रोह कहा जाता रहा है तथा दुर्भाग्य से आज भी अनेक भारतीय विश्वविद्यायलों के पाठ्यक्रम में इसी रूप में पढ़ाया भी जाता है वह जन सामान्य का संग्राम था। अंग्रेजी फौज में सम्मिलित भारतीय सैनिक भी जनविद्रोह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। दूसरा भ्रम यह फैलाया जाता है कि यह केवल राजे रजवाड़ों तथा नबाबों का अपने अपने संस्थानों के लिये किया युद्ध था। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता का भाव इसमेे निहित नहीं था। यह भी जानबुझकर फैलाया भ्रम है। उस समय के अंग्रजों के दस्तावेज प्रमाण है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा उनके सेनापति तात्या टोपे के अद्भूत नियोजन से पूरे देश में ही इस संग्राम का जाल बिछाया गया था। ब्रिटिश सेना की छावनियों में फैला असंतोष भी कोई संयोग मात्र नहीं था। रानी के प्रभावी गुप्तचर विभाग का वह सफलतम छù युद्ध था। रानी ने सामान्य वेश्याओं को अपनी कला के माध्यम से राष्ट्र कार्य के लिये प्ररित किया। स्वर्गीय पति की नाट्यशाला की नटियाँ गुप्तचर बनीं और सैनिक शिविरों में नांच गाने के माध्यम से प्रथम असंतोष फैलाने का व बाद में संदेश पहुँचाने का कार्य इन वीरांगनाओं ने किया था।

पूरे देश में ही रोटी व कमल के निशान के द्वारा क्रांति का संदेश प्रवाहित हुआ था। जो इतिहासकार अज्ञान अथवा कपट के कारण इसे केवल उत्तरी भारत में सीमित बताते है वे भी सत्य से परें है। मैसूर तथा त्रावणकोर तक इस क्रांति की ज्वाला लगी थी। पूर्वनिर्धारित तिथि 31 मई को दोनों ही राज्यों ने अंग्रेजों के शासन को नकारा तथा युद्ध की घोषणा की। कंपनी के प्रतिनिधियों को निष्कासित कर दिया। मैसूर जैसे राज्यों में जहाँ कंपनी की टुकड़ियों ने विरोध किया वहाँ सभी अंग्रेजों को बंदी बना लिया गया। एक ही दिन में भारत के एक बड़े हिस्से ने स्वयं को कंपनी की सत्ता से मुक्त घोषित कर दिया। इतिहास की कठोर वास्तविकताओं में ‘‘यदि’’ की कल्पनाओं को कोई स्थान नहीं होता। फिर भी यह तो कहना ही होगा कि यदि 10 मई को मंगल पाण्डें संयम नहीं खोता और पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार 31 मई को क्रांति की चिंगारी एकसाथ पूरे देश में प्रगट होती तो अंग्रेजों के लिये इसे नियंत्रित करना निश्चित ही असम्भव हो जाता। अतः 10 मई के क्रांति दिवस का एक संदेश यह भी है कि जोश, उत्साह, उमंग, उत्सर्ग व समर्पण के साथ ही देशसेवा में धैर्य तथा संयम का भी बड़ा स्थान है। कई बार परिवर्तन के आंदोलन की अनिवार्यता व आग्रह के चलते हम प्रतिक्षा को असहनीय मान बैठते है किन्तु बृहत् योजना में इसका भी महत्वपूर्ण स्थान है।

अंग्रेजों को समूल भारत से बाहर करने के जिस उद्देश्य से इस महाक्रांति का आज ही के दिन सूत्रपात हुआ था क्या वह लक्ष्य पूर्ण हुआ है? आज के दिन हमें यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या देश मानसिक दासता से स्वाधीन हुआ है? का हम वास्तव में स्वतन्त्र हुए है? क्या यह जो तन्त्र, व्यवस्था हमने अपनायी है वह स्व की है? स्वदेशी है? इस देश के ऐतिहासिक अनुभव व संस्कारों में से पनपी है? यदि इन सारे प्रश्नों के उत्तर नहीं में दिये जा रहे है तो फिर आज पुनः क्राति की ज्वाला प्रज्वलित करनी होगी। सच्ची स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त करने तक यह क्रांति जीवित रहेगी। यही संकल्प 1857 के वीरों की स्मृति में हर देशभक्त को लेना होगा।

सावरकर का उद्बोधन १० मई १९०८ अवश्य देखें

http://www.youtube.com/watch?v=nCMk3HcXr-8&feature=youtu.be

मई 10, 2012 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , ,

1 टिप्पणी »

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    टिप्पणी द्वारा pravinchn | मई 26, 2012 | प्रतिक्रिया


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