उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

भारत का महान पर्व गुरु पूर्णिमा


आषाढ की पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है । इसे वेदव्यास की जयन्ती के रूप में जाना जाता है । वैसे तो व्यास अपने आप में एक दायित्व है । शास्त्रों का अध्ययन कर सामान्य जनता तक इसे सुबोध रूप में प्रचारित करने का कार्य करनेवाले व्यक्ति को ‘व्यास’ कहा जाता था । आज भी कथावाचकों को व्यास के रूप में ही जाना जाता है । शास्त्रचर्चा के मंच को भी इसी रूप में व्यासपीठ कहते हैं । हर वक्ता से व्यासपीठ की गरिमा की रक्षा की अपेक्षा की जाती है । महर्षि वेदव्यास का महत्व इस कारण है कि उन्होंने बिखरे हुए श्रृतिज्ञान को एकत्र सम्पादित कर ४ वेदों की रचना की । ऐसा भी माना जाता है कि वे एक व्यक्ति नहीं वरन् साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे । अनेक गुरुकुलों के आचार्यों ने वेदों को संकलित व संपादित करने का कार्य अनेक सदियों तक लगातार किया, इसे भी वेदव्यास के नाम से जाना जाता है । वेद समस्त मानवीय ज्ञान की अक्षय नीधि है अत: इनका लगातार परिष्कार व सम्पादन एक स्वस्थ वैज्ञानिक परम्परा है । हर मन्वन्तर में यह कार्य होता रहा है ऐसी भारतीय मान्यता है । हम काल की चक्रीय गणना को ठीक से समझते हैं इसलिये हमारे लिये यह पुनरावृत्ति सहज है । इसी के कारण हमारी संस्कृति व धर्म दोनों जड नहीं अपितु गतिमान हैं । सतत परिष्कार से इनको युगानुकूल बनाने का कार्य आचार्यों ने निरन्तर किया है । इसलिये हम इसे ‘नित्य नूतन चिर पुरातन’ संस्कृति कहते हैं । इस निरन्तरता का उत्सव ही ‘व्यास पूर्णिमा’ है ।

गत १००० वर्ष के संघर्ष काल में यह परिष्कार व वैज्ञानिक स्पष्टिकरण थम सा गया है । स्वतन्त्रता से पूर्व परकीय सत्ता के साथ संघर्ष में तो यह स्वाभाविक ही था । जब अस्तित्व के लिये ही लड रहे थे तब नवीनीकरण के लिये समय व अवसर ही कहाँ था ? किन्तु स्वतन्त्रता के बाद जिस उत्साह व गति से यह कार्य होना चाहिये था उतना नहीं हुआ । शासन की छद्म सेक्युलर नीति को दोष देना ही होगा । पर वास्तव में यह कार्य शासन का तो नहीं था, धर्माचार्यों का था । किन्तु ज्ञान को युगानुकूल वैज्ञानिकता से समझ धर्म को प्रासंगिकता से लागू करने का व्यास कार्य उतनी गंभीरता से नहीं हुआ । वर्तमान व्यासों ने शास्त्रों को जीवित रखने का महत् कर्तव्य तो किया है किन्तु ज्ञान के परिमार्जन व युगानुकूल नवीनीकरण का तथा युगधर्म के विवेचन हेतु स्मृतिगठन का कार्य अभी भी किसी आधुनिक वेदव्यास की प्रतीक्षा में है ।

ज्यामिति गणित में भी व्यास होता है । वृत्त की चौडाई को व्यास ही नापता है । इसी के आधार पर वृत्त की परिधि भी नापी जा सकती है । इसी प्रकार जो ज्ञान की व्याप्ति को सम्पूर्णता से नापने की क्षमता रखता है उसे व्यास कहा जाता है । ऐसे परमज्ञानी को ही अधिकार है कि वह सामान्य जनों को ज्ञान के गूढ तत्वों को समझाने के लिये रूपकों तथा कथानकों को गूंथ कर पुराणों की रचना करें । १८ मुख्य पुराणों की रचना महर्षि वेदव्यास ने ही की है । जीवन के तत्वों को सरल कथाओं के माध्यम से समझाकर जीवन में उतारने का यह अत्यन्त वैज्ञानिक मार्ग है । आज सारी दुनिया के शिक्षाविद् इस बात पर सहमत हो रहे हैं कि बाल्यकाल में कथा ही शिक्षा की सबसे प्रभावी विधि है । पुराण आध्यात्मिक स्तर पर बालकों के लिये परम सत्य को समझने की सरल व प्रभावी विधि है । व्यास पूर्णिमा के अवसर पर महर्षि का स्मरण करते समय शास्त्रों के स्वाध्याय का संकल्प लेना चाहिये ।

इसी दिन को अनादिकाल से ही गुरु पूर्णिमा के नाम से भी मनाया जाता है । गुरुकुलों में विद्यारम्भ व स्नातक के रूप में विद्यासमाप्ति के बाद विदाई दोनों इसी दिन हुआ करते थे । इसी दिन ज्ञान पिपासु छात्र अपनी जिज्ञासा व उसके लिये त्याग करने की तत्परता के प्रतीक के रूप में हाथों में समिधा लिये गुरु के आश्रम में आते थे । यह समिधा यज्ञ में डालने के लिये अवश्य होती थी, किन्तु इसको अपने हाथ में धारण करने का अर्थ था – स्वयं को यज्ञ में आहुत करने की तत्परता । ज्ञान तो अग्नि के समान ही सब अशुद्धियों को जलाकर अपने अन्दर के खालीस, विमल यथार्थ को प्रगट करता है । जिसके अन्दर इस प्रकार अग्नि में प्रवेश करने की, सभी स्तरों पर तप करने की तत्परता हो वही गुरु की छत्रछाया में रहने का अधिकारी होता था । इसी को ‘छात्र’ कहा जाता था । गुरु इस समित्पाणि, हाथ में समिधा लिये छात्र को स्वीकार कर उसका उपनयन करते थे । उसे ज्ञान के लिये दृष्टि प्रदान करते थे । मूल जिज्ञासा मैं कौन हूँ ? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है ?… के प्रति जागृति से ही छात्र जीवन का प्रारम्भ होता था । आज सर्वोच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी व्यक्ति इस मौलिक जिज्ञासा से अनभिज्ञ ही रह जाता है । उपनयन में दूसरा नयन अर्थात जीवन के प्रति जिज्ञासा की दृष्टि उत्पन्न होने के बाद उस छात्र को द्विज कहते थे, अर्थात जिसका दूसरा जन्म हुआ है ।

छात्र जीवन में उसे अपने इन्द्रियों का निग्रह करने का प्रशिक्षण दिया जाता था । समस्त ऊर्जा को ज्ञान प्राप्ति के लक्ष्य पर केन्द्रित करने ब्रह्मचर्य के पालन का वैज्ञानिक प्रशिक्षण शिक्षा का प्रथम चरण हुआ करता था । इस भाँति अपनी पूर्ण ऊर्जा को एकाग्र करने में प्रवीण छात्र जीवन के सभी अंगों का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त करते थे । सभी को जीवन की समस्त विधाओं का ज्ञान प्रदान किया जाता था । इसलिये इस काल में छात्र उबटन आदि प्रसाधनों का प्रयोग नहीं करते थे । सुगंधित द्रव्यों से स्नान भी वर्जित था । जब अपने अन्दर की विशिष्टता को पूर्णता से प्रगट करने का सैद्धांतिक व व्यावहारिक ज्ञान छात्र पा लेता था तब गुरु उसे समाज में योगदान करने में सक्षम मान गृहस्थदीक्षा प्रदान करते थे । दीक्षांत से पूर्व परीक्षा होती थी । गुरु अपने शिष्यों को आश्रम के सबसे ऊंचे स्थान पर ले जाते थे और चारों ओर दृष्टि डालकर पूछते थे जो भी दिख रहा है क्या उसके बारे में समस्त ज्ञान तुमने प्राप्त कर लिया है ? इस एक प्रश्न का ही प्रश्नपत्र होता था । गुरु जानते ही थे कि छात्र तैयार हो गया है । किन्तु फिर भी इस समय भी कोई शंका हो तो शिष्य पूछ सकता था और या तो गुरु उसे स्मरण करा देता अथवा आवश्यकता पडने पर एक और वर्ष छात्र जीवन में बिताने का आदेश देता था । समाज में अपनी भूमिका निभाने में पूर्ण सक्षम छात्र ही स्नातक होता था । गुरु पूर्णिमा के दिन ही दीक्षान्त हुआ करता था । अब छात्र को जीवन जीने की समझ मिल गई है और इस कारण अब वह प्रसाधनों का प्रयोग कर सकता है । उबटन आदि सुगंधित तेलों का प्रयोग कर स्नान कर सकता है । अब उसे इन्द्रियों के प्रयोग का सामर्थ्य प्राप्त हो गया है । इसलिये इस दिन वह पूर्ण स्नान कर गुरु का आशीर्वाद लेकर समाज में अपना योगदान देने की यात्रा पर चल पडता है । यह है स्नातक होने का अर्थ ।

गुरुपूर्णिमा के दिन शिक्षा की इस अद्भुत विधि का स्मरण कर वर्तमान युग में उसको अपनाने का संकल्प लेना होगा । आज के युगानुकूल उसके नवीनीकरण पर विचार करने का अवसर है यह उत्सव । गुरुत्व इस भूमि में परम्परा के रूप में संजोया गया है । अत: यहाँ सम्प्रदायों में गुरु परम्परा का विकास हुआ । गुरु की गद्दी सदियों से सुयोग्य प्रतिनिधि को सौंप कर इस परम्परा की रक्षा की गई । हज़ारों वर्ष की अखण्ड गुरुपरम्परा वाले अनेक मठ आज भी देश में विद्यमान है । अत्यन्त सूक्ष्मता से अधिकारी का चयन किया जाता था । बडी कठोरता के साथ प्रशिक्षण दिया जाता था । इसके उपरान्त भी गुरु स्थान पर विराजमान व्यक्ति को भान होता था कि यह उसका व्यक्तिगत आदर नहीं अपितु परम्परा का सम्मान है । आज भी जब शिष्य गुरु के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लेता है तो गुरु अपने स्मरण हेतु निम्न श्लोक का पाठ करते हैं –

ईश्वरोगुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिणे ।

व्योमवत् व्याप्त देहाय दक्षिणामूर्तये नम: ।।

आदि शंकराचार्य ने इस परम्परा का प्रारम्भ किया । गुरु को स्मरण रहे कि देहबुद्धि से जिस अहंकार को ‘मैं’ माना जाता है वह गुरु नहीं है । वास्तव में गुरु व ईश्वर एक ही हैं । अत: वह व्योमव्यापी आदिगुरु दक्षिणामूर्ति को स्मरण कर उसके प्रतिनिधि के रूप में प्रणाम को स्वीकार करता है और उसी गुरु तत्व की ओर से आशीर्वाद प्रदान करता है ।

वर्तमान युग में विखण्डित परम्परा व सर्वत्र व्याप्त अशुद्धि के चलते अहंकार का पूर्ण विगलन कठिनतम होता जा रहा है । इसी को ध्यान में रखते हुये वेदान्त की परम्परा में से निर्वैयक्तिक गुरु का पुनरूज्जीवन आवश्यक हो गया था । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय इसके संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिरामपंत हेडगेवार ने ज्ञान, त्याग व यज्ञ की संस्कृति की विजय पताका परमपूज्य भगवे ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया । विश्व के सबसे बडे अनुशासित स्वयंसेवी संगठन के रूप में संघ के विकास का एक प्रमुख कारक यह निर्वैयक्तिक गुरु ही है । प्रतिदिन शाखा में इसी गुरु की छत्रछाया में एकत्रित हो भारतमाता को परमवैभव पर ले जाने की साधना करोडों स्वयंसेवक विश्वभर में करते हैं । विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना के समय माननीय एकनाथ जी रानडे ने ईश्वर के वाचक प्रणवमन्त्र ओंकार को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया । आज भी ५ वर्ष के प्रशिक्षण के पश्चात जीवनव्रती कार्यकर्ता प्रणवमन्त्र से ही दीक्षा प्राप्त करते हैं ।

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है । यदि इस अवसर पर हमने इसके सभी पहलुओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया तथा ज्ञानसाधना के संकल्प को पुनर्नवा किया तो भारतमाता को विश्व में अपने गुरुपद पर आसीन करने का कार्य सम्पन्न हो सकेगा । आइये, इस ज्ञानभूमि को पुनर्जाग्रत करने का संकल्प लें ।

जून 29, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , , | 2 टिप्पणियाँ

गो आधारित जीवन ही समस्त समस्याओं का उपाय


गायों की प्रचूरता के कारण ही भारतभूमि यज्ञभूमि बनी है । पर आज हमने गायों को दुर्लक्षित कर दिया है इसी कारण देश के प्राणों पर बन पडी है । गाय के सान्निध्य मात्र से ही मनुष्य प्राणवान बन जाता है । आज हमारे शहरी जीवन से हमने गाय को कोसों दूर कर दिया है । परिणाम स्पष्ट है मानवता त्राही-त्राही कर रही है और दानवता सर्वत्र हावी है ।

तपोभूमि भारत ॠषियों की भूमि है । तपस्या के द्वारा यहाँ ज्ञान व विज्ञान दोनों का ही परमोच्च विकास हुआ । अपने गहन अंतरतम में प्रसुप्त सत्य को प्रकाशित करना ज्ञानयज्ञ है । वहीं सत्य जब जीवन के व्यवहार में उतारा जाता है तब ज्ञान के इस विशेष प्रयोग को विज्ञान कहते हैं । हिन्दू जीवन पद्धति के हर अंग की वैज्ञानिकता का यही रहस्य है । आधुनिक भौतिक विज्ञान की प्रगति के साथ जहाँ अन्य मतों को अपने धर्मग्रंथों को बदलना पड रहा है, वहीं दूसरी ओर जैसे-जैसे अणु से भी सूक्ष्म कणों पर प्रयोग के द्वारा सृष्टि के सुक्ष्मतम रहस्यों की खोज होती जा रही है वैसे-वैसे वेदोक्त हिन्दू सिद्धान्तों की पुष्टि होती जा रही है । बीकानेर के लालेश्वर महादेव मंदिर के महंत संवित सोमगिरीजी महाराज को रक्षा अनुसंधान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक ने सूचना दी कि आधुनिक भौतिक विज्ञान की खोजें वेदान्त के सिद्धान्तों को साबित कर रही है तो स्वामीजी ने अनायास कहा, ‘‘इसका अर्थ है अब भौतिक विज्ञान सही दिशा में आगे ब‹ढ रहा है । वेद तो सत्य है ही उनके निकट आने से आधुनिक विज्ञान की सत्यता स्पष्ट होती है । यदि हमारे ॠषियों की बातें आज हमें वैज्ञानिक आधार पर स्पष्ट नहीं हो पा रही है तो शंका उनकी सत्यता पर नहीं विज्ञान के अधूरेपन पर करनी होगी ।”

भारतीय विज्ञान की दिशा अंदर से बाहर की ओर है । आधुनिक विज्ञान बाह्य घटनाओं के निरीक्षण व प्रयोग के द्वारा उसमें छिपे सत्य को पहचानने का प्रयत्न करता है । हिन्दू विज्ञान सूक्ष्म से स्थूल की ओर ले जाता है तो आधुनिक विज्ञान ठोस स्थूल के माध्यम से विश्लेषण व निष्कर्ष की विधि द्वारा सूक्ष्म को पकडने का प्रयास कर रहा है । इस मूलभूत भेद को समझने से हम भारतीय वैज्ञानिक दृष्टि का सही विकास कर सकते हैं । फिर हम अपने अज्ञान के कारण ॠषियों द्वारा स्थापित परम्पराओं को अन्धविश्वास के रूप में नकारने के स्थान पर उनमें छिपे गूढ तत्व को समझने का प्रयत्न करेंगे । गाय को भारतीय जीवन में दिये जाने वाले महत्व को भी इसी श्रद्धात्मिका दृष्टि से समझा जा सकता है ।

निश्चित ही कृषिप्रधान राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का केन्द्रबिन्दू होने के नाते गाय को “गोधन” कहा जाता रहा है । वैदिक काल में इसके वास्तविक धन के रूप में प्रचलित होने की भी सम्भावना है । किसी चलन के समान सम्पदा के मापन का एक आधार गायों की संख्या रहा है । जिसके पास अधिक गायें होंगी वह अधिक सम्पन्न माना जाता रहा है । ऊर्जा एवं उत्पादकता के रूप में पूर्ण उपयोगिता इस आर्थिक महत्व का एक कारण निश्चित ही रहा होगा । गाय द्वारा प्रदत्त दूध, दही, माखन व घी जैसे पौष्टिक उत्पादों, यांत्रिक ऊर्जा के रूप में गोवंश की उपयोगिता के साथ ही गाय के विसर्जन, गोबर व गोमुत्र भी कृषि कार्य में खाद व कीटनाशक के रूप में अत्यन्त उपयोगी होते हैं । गोबर आज भी ग्राम्य भारत में ईंधन का सबसे पवित्र स्रोत है । इस प्रकार गाय अपने पूरे जीवन पर्यन्त मानव के उपयोगी रहने के बाद मृत्यु के पश्चात भी गोचर्म के द्वारा पदवेश, कवच आदि विभिन्न उत्पादों से मानव की रक्षा का कार्य करती है । गाय की इस सर्वांगीण उपयोगिता से ही उसे गोधन माना जाता है ।

आज भी गाय की उत्पादकता व उपयोगिता में कोई कमी नहीं आई है । केवल हमने अपनी जीवनशैली को प्राकृतिक आधार से हटाकर यन्त्राधारित बना लिया है । विदेशियों के अंधानुकरण से हमने कृषि को यन्त्र पर निर्भर कर दिया । यन्त्र तो बनने के समय से ही ऊर्जा को ग्रहण करने लगता है और प्रतिफल में यन्त्रशक्ति के अलावा कुछ भी नहीं देता । बैलों से हल चलाने के स्थान पर ट्रेक्टर के प्रयोग ने जहाँ एक ओर भूमि की उत्पादकता को प्रभावित किया है वहीं दूसरी ओर गोवंश को अनुपयोगी मानकर उसके महत्व को भी हमारी दृष्टि में कम कर दिया है । फिर यन्त्र तो ईंधन भी मांगते हैं । आज खनिज तेल के आयात के कारण देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत असर हो रहा है । और बढती महंगाई का एक महत्वपूर्ण कारण यह तेल निर्भर व्यापार ही है । अप्राकृतिक, पर्यावरण के लिये विनाशकारी इस जीवनशैली को छोड गो आधारित उत्पादक अर्थनीति को अपनाना ही अक्षय विकास का माध्यम हो सकता है । आधुनिक तकनीकि उन्नति का प्रयोग कर गो-ऊर्जा पर आधारित कृषि यन्त्रों को विकसित करने की आवश्यकता है ताकि प्राकृतिक विधि से उत्पादकता भी बढे और गोमाता का आशीर्वाद भी बना रहे।

गाय को गोमाता के रूप में मानना भी अत्यन्त वैज्ञानिक है । मां के दूध के बाद सबसे पौष्टिक आहार देसी गाय का दूध ही है । इसमें जीव के लिये उपयोगी ऐसे संजीवन तत्व है कि इसका सेवन सभी विकारों को दूर रखता है । जिस प्रकार मां जीवन देती है उसी प्रकार गोमाता पूरे समाज का पोषण करने का सामर्थ्य रखती है । इसमें माता के समान ही संस्कार देने की भी क्षमता है । देशज वंशों की गाय स्नेह की प्रतिमूर्ति होती है । गाय जिस प्रकार अपने बछडे अर्थात वत्स को स्नेह देती है वह अनुपमेय है, इसलिये उस भाव को वात्सल्य कहा गया है । वत्स के प्रति जो भाव है वह वत्सलता है । मानव को स्वयं में परिपूर्ण होने के लिये आत्मीयता के इस संस्कार की बडी आवश्यकता है । परिवार, समाज, राष्ट्र व पूरी मानवता को ही धारण करने के लिये यह त्याग का संस्कार अत्यन्त आवश्यक है । पूरे विश्व का पोषण करने में सक्षम व्यवस्था के निर्माण के लिये अनिवार्य तत्व का संस्कार गोमाता मानव को देती है । शोषण मानव को दानव बनाता है । गोमाता संस्कार देती है दोहन का । दोहन अर्थात अपनी आवश्यकता के अनुरूप ही संसाधनों का प्रयोग । जिस प्रकार गाय का दूध निकालते समय बछडे की आवश्यकता को संवेदना के साथ देखा जाता है उसी प्रकार जीवन के सभी क्रिया-कलापों में भोग को नियंत्रित करने का संस्कार दोहन देता है । आज सारी व्यवस्था ही शोषण पर आधारित हो गई है । इस कारण सम्पन्न व विपन्न के बीच की खाई ब‹ढती जा रही है । गोमाता के मातृत्व को केन्द्र में रखकर बनी व्यवस्था से ही “सर्वे भवन्तु सुखिन:” को साकार करना सम्भव हो सकेगा । इसी आदर्श को प्रस्थापित करने हमारे ज्ञानी ॠषी पूर्वजों ने गाय की पूजा की ।

गोपूजन की परम्परा के पीछे प्राणविज्ञान का रहस्य है । कहा जाता है कि गाय में तैंतीस करोड देवी-देवता वास करते हैं । सामान्यत: हम देवता का अर्थ ईश्वर के रूपों अथवा अवतारों से लेते हैं किन्तु शास्त्र कुछ और ही बताते हैं । प्रकृति की शक्तियों को देवता कहा जाता है । हमारे अध्यवसायी ॠषियों ने सृष्टि में प्रवाहित जीवनदायी शक्तियों को सम्पूर्णता के साथ जाना । इस शक्ति को ही प्राण कहा जाता है । मूलत: सूर्य से प्राप्त यह महाप्राण सारी सृष्टि में विविधता से प्रवाहित होता है । उसके प्रवाह की गति, दिशा, लय व आवर्तन के भेदों का ॠषियों ने बडी सूक्ष्मता से अध्ययन किया । और इस आधार पर उन्होंने पाया कि ३३ कोटी प्रकार से प्राण प्रवाहित होता है या कहा जाय कि प्राण के तैंतीस कोटी प्रवाहित रूप हैं । इस प्रत्येक विशुद्ध प्रवाह को देवता कहा गया । सारी सृष्टि में विविध संमिश्रणों में यही प्राण विद्यमान है । सत्व, रज और तम, इस प्रकार इनके गुण भेद भी हैं । इस प्राण विज्ञान के अनुसार हमने पदार्थों के प्रयोग की विधियों का विकास किया । तुलसी, पीपल आदि में अधिक सत्व प्राण होने के कारण इनकी पवित्रता का उपयोग आध्यात्मिक रूप से किया गया । बिल्ली, तिल आदि के तम प्रधान प्राण संरचना के कारण ही इनके वर्जन की प्रथाओं का निर्माण हुआ । बिल्ली के राह काटने के कारण कार्य बाधा का शगुन-शास्त्र भी प्राण विज्ञान की ही देन है । प्राणविज्ञान के प्रति हमारे अज्ञान के कारण यह अंधविश्वास में परिणत हो गया है ।

सारी सृष्टि में केवल दो ही प्राणियों के देह ऐसे हैं जिनमे पूरे तैंतीस कोटी प्राण निवास करते हैं- गाय और मानव । मानव को कर्म स्वातंत्र्य होने के कारण वह उन प्राणों का साक्षात्कार कर अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिये उनका प्रयोग कर सकता है । इसी के लिये गोमाता का पूजन व सान्निध्य अत्यन्त उपयोगी है । इस विज्ञान के कारण ही गाय को समस्त देवताओं के निवास के रूप में पूजा जाता है । सभी धार्मिक अनुष्ठानों में गाय के पंचगव्यों का महत्व होता है । गोबर से लिपी भूमि, दूध, दही, घी से बना प्रसाद, गोमूत्र का सिंचन तथा गोमाता का पूजन पूरे तैंतीस करोड प्राणों को जागृत कर पूजास्थल को मानव के सर्वोच्च आध्यात्मिक उत्थान की प्रयोगशाला बना देता है । गायों की प्रचूरता के कारण ही भारतभूमि यज्ञभूमि बनी है । आज हमने गायों को दुर्लक्षित कर दिया है इसी कारण देश के प्राणों पर बन पडी है । गाय के सान्निध्य मात्र से ही मनुष्य प्राणवान बन जाता है । आज हमारे शहरी जीवन से हमने गाय को कोसों दूर कर दिया है । परिणाम स्पष्ट है मानवता त्राही-त्राही कर रही है और दानवता सर्वत्र हावी है ।

आज मानव के स्वयं के कल्याण हेतु, विश्व की रक्षा हेतु, पर्यावरण के बचाव के लिये तथा समग्र, अक्षय विकास के लिये गाय के संवर्धन की नितान्त आवश्यकता है । गो-विज्ञान को पुन: जागृत कर जन -जन में प्रचारित करने की अनिवार्यता है । गोशालाओं के माध्यम से कटती गायों को बचाने के उपक्रम तो आपात्कालीन उपाय के रूप में करने ही होंगे किन्तु गो आधारित संस्कृति के विकास के लिये गो-केन्द्रित जीवन पद्धति को विकसित करना होगा । प्रत्येक घर में गाय का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक है । गाय के सान्निध्य मात्र से ही जीवन शरीर, मन, बुद्धि के साथ ही आध्यात्मिक स्तर पर पवित्र व शुद्ध हो जायेगा । प्रतिदिन कटती लाखों गायों के अभिशाप से बचने के लिये शासन पर दबाव डालकर गो-हत्या बंदी करवाने का प्रयास तो आवश्यक है ही किन्तु उससे भी बडी आवश्यकता है प्रत्येक के दैनंदिन जीवन में गाय प्रमुख अंग हो । घर घर में गोपालन हो । अपने हाथ से गोसेवा करने का सौभाग्य हर परिवार को प्राप्त हो । प्रत्यक्ष जिनके भाग्य में यह गोसेवा नहीं वे रोज गोमाता का दर्शन तो करें । मन ही मन पूजन, प्रार्थना करें व प्रतिदिन अपनी आय का कुछ भाग इस हेतु दान करें । किसी ना किसी रूप में गाय हमारे प्रतिदिन के चिंतन, मनन व कार्य का हिस्सा बनें । यही मानवता की रक्षा का एकमात्र उपाय है ।

जून 19, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 3 टिप्पणियाँ

युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन


भारत एक युवा देश है। जनसंख्या के अनुसार विश्व की सर्वाधिक युवा आबादी भारत में निवास करती है। भारत में जनगणना के नियमों में 18 से 35 वर्ष की आयु को युवा माना जाता है। विश्व में 15 वर्ष की आयु से यौवन प्रारम्भ होता है। दोनों गणनाओं में भारत विश्व में ना केवल अग्रणी है अपितु विश्व की युवा आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक भारत में वास करता है। यह निश्चित ही एक महान निधि है किन्तु साथ ही बहुत बड़ी जिम्मेवारी भी है। इतने बड़ी संख्या में उपस्थित युवा शक्ति का राष्ट्रनिर्माण में प्रयोग करना एक चुनौति है। अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार भी इस युवा आबादी को उपयोगी कौशल में प्रशिक्षित करना, फिर इनके लिये पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना तथा उद्योग, कृषि व सेवा क्षेत्र में संतुलन स्थापित करना अपने आप में बड़ा ही दुष्कर कार्य है। उच्च शिक्षा में असंतुलित वृद्धि के कारण एक ओर हम बड़ी संख्या में तैयार हो रहे अभियंताओं को उचित रोजगार नहीं दे पा रहे है वहीं दूसरी ओर अनेक आवश्यक कार्यों के लिये प्रशिक्षित व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। एक आकलन के अनुसार स्नातक स्तर पर कला क्षेत्र में घटते प्रवेश के कारण आनेवाले दशकों में पूरे विश्व में भाषा शिक्षकों की कमी होगी। तकनिकी क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव के कारण मूलभूत विज्ञान यथा भौतिकी, रसायन तथा जीवविज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिये पर्याप्त संख्या में वैज्ञानिक नहीं मिल पा रहे है। अभी से दिख रहे इस असंतुलन की स्थिति आगामी दशकों में और विकट होनेवाली है।

इसके मूल में हमारे युवाओं में यौवन के वास्तविक शक्ति के ज्ञान का अभाव है। युवा को युवा होने का अर्थ ही पता नहीं है। युवा अर्थात अनुशासनहीन, अस्तव्यस्त, उपद्रवकारी ऐसा ही विचार सबके मन में आता है। किन्तु यह केवल उपरी विचार है। वास्तव में आज के युवा को ज्ञान की बड़ी पिपासा है। केन्द्र के स्वाध्याय वर्गों में सभी कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि अवसर मिलने पर युवा अध्ययन, विचार व चर्चा सभी के लिये तत्पर है। इससे आगे बढ़कर वह इन विचारों को क्रियान्वित भी करना चाहता है। अतः युवा आबादी को काम देने को एक भार माननें के स्थान पर अवसर मानकर विचार किया जाना चाहिये। रोजगार की ही बात लें। युवा केवल नौकरी पाने का विचार क्यों करे? क्या स्वयं के बुते पर व्यवसाय कर नौकरी देने का विचार युवा नहीं कर सकता? युवा को चुनौति तो देकर देखों क्या क्या चमत्कार कर सकता है। वीर सावरकर कहा करते थे, ‘युवा की क्षमता को समझना है तो इस पद को पलट कर देखों – वायु! युवा वायु के समान शक्तिशाली है। यदि अनुशासन तोड़ दे तो प्रभंजन बन पूरी दुनिया को तबाह कर सकता है। प्राण हरण कर सकता है। वहीं यदि नियम से अनुशासित हो तो प्राणायाम बन जीवन की रक्षा भी कर सकता है।’ आवश्यकता है इस शक्ति के अनुशासित जागरण की।

युवा बल को युवा शक्ति में रूपांतरित करने के लिये सबसे पहले युवा को अपने स्वभाव को पहचानने का प्रशिक्षण देना होगा। स्वभाव के अनुरूप कार्य का चयन करने से पूरी क्षमता व संभावना का विकास हो सकता है। भेड़चाल में आजिविका का चयन करने के स्थान पर अपने स्वभाव के अनुसार उच्च शिक्षा व तदनरूप व्यवसाय चयन करने से राष्ट्रनिर्माण के सभी क्षेत्रों मे पर्याप्त कौशल उपलब्ध हो सकेगा। अतः युवाशक्ति जागरण का प्रथम मन्त्र हुआ ‘स्वभाव से स्वावलम्बन’। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिये दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है संकल्प की। मन तथा इन्द्रियों की असीम शक्ति को एक लक्ष्य पर एकाग्र करने को संकल्प कहते है। संकल्पित युवा ही अपनी पूर्ण क्षमता को प्रगट कर किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह संकल्प जीवन के हर क्षेत्र में चमत्कार कर सकता है। विज्ञान में अनुसंधान हो, स्वरोजगार के लिये व्यवसाय को संचालन हो, देश की रक्षा के लिये सेना में प्रवेश हो अथवा जनजागरण के लिये समाज सेवा का क्षेत्र हो हर स्थान पर संकल्पित युवा ही असम्भव को सम्भव कर दिखाता है।

अपने स्वभाव को पहचान, उच्च लक्ष्य के लिये संकल्पित युवाओं को संगठित करना होगा। संगठन में ही शक्ति है। स्वामीजी ने अपने पश्चिम प्रवास में इस शक्ति के चमत्कार को देखा और भारत में सामूहिक कार्य की शक्ति को पुनः जागृत करने का काम किया। बड़े बड़े संगठनों का निर्माण स्वामीजी के विचारों की प्रेरणा से हुआ। इसके साथ ही हर स्तर पर छोटे बड़े संगठित प्रयासों की आवश्यकता है। संकल्पित युवा एकत्रित आकर एक दूसरे की क्षमताओं के परिपूरक बन प्रचण्ड शक्ति का जागरण कर सकते है। देश सेवा के हर क्षेत्र में सहकार पर आधारित संगठित प्रयास की नितान्त आवश्यकता हैै। इस संगठित शक्ति का उदात्त ध्येय के लिये समर्पित होना अनिवार्य है। अन्यथा अपने स्वार्थ में संलिप्त हो कर यही शक्ति प्रभंजन के समान विनाश कर सकती है। भारत का राष्ट्रीय जीवनध्येय विश्व मानवता का मार्गदर्शन करना है। जगत् गुरू के अपने नियत सिंहासन पर आरूढ़ होने की ओर भारत की यात्रा स्वामीजी के शिकागो दिग्विजय से प्रारम्भ हो चुकी है। वैश्विक परिदृष्य प्रचण्ड गति से इसके शीघ्र ही साकार होने की ओर अग्रेसर है। ऐसे में भारत की संगठित युवा शक्ति को स्वयं को राष्ट्रकार्य के लिये समर्पित करने की आवश्यकता है। सीधे राष्ट्रसेवा में समर्पित होने के अवसर विवेकानन्द केन्द्र जैसे संगठन देते ही है। साथ ही राष्ट्रजीवन के हर क्षेत्र में स्वभाव के अनुरूप, संगठित कार्य करते हुए अपने लक्ष्य व समस्त उपलब्धियों को राष्ट्र के जीवनध्येय के साथ समाहित करना भी समर्पण का एक माध्यम है।

स्वभाव से स्वावलम्बन, संकल्प, संगठन तथा समर्पण के सकारात्मक मन्त्र से अभिमंत्रित युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन बन सकती है।

जून 8, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

   

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