उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन


भारत एक युवा देश है। जनसंख्या के अनुसार विश्व की सर्वाधिक युवा आबादी भारत में निवास करती है। भारत में जनगणना के नियमों में 18 से 35 वर्ष की आयु को युवा माना जाता है। विश्व में 15 वर्ष की आयु से यौवन प्रारम्भ होता है। दोनों गणनाओं में भारत विश्व में ना केवल अग्रणी है अपितु विश्व की युवा आबादी का 60 प्रतिशत से अधिक भारत में वास करता है। यह निश्चित ही एक महान निधि है किन्तु साथ ही बहुत बड़ी जिम्मेवारी भी है। इतने बड़ी संख्या में उपस्थित युवा शक्ति का राष्ट्रनिर्माण में प्रयोग करना एक चुनौति है। अर्थशास्त्र के विशेषज्ञों के अनुसार भी इस युवा आबादी को उपयोगी कौशल में प्रशिक्षित करना, फिर इनके लिये पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना तथा उद्योग, कृषि व सेवा क्षेत्र में संतुलन स्थापित करना अपने आप में बड़ा ही दुष्कर कार्य है। उच्च शिक्षा में असंतुलित वृद्धि के कारण एक ओर हम बड़ी संख्या में तैयार हो रहे अभियंताओं को उचित रोजगार नहीं दे पा रहे है वहीं दूसरी ओर अनेक आवश्यक कार्यों के लिये प्रशिक्षित व्यक्ति उपलब्ध नहीं है। एक आकलन के अनुसार स्नातक स्तर पर कला क्षेत्र में घटते प्रवेश के कारण आनेवाले दशकों में पूरे विश्व में भाषा शिक्षकों की कमी होगी। तकनिकी क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव के कारण मूलभूत विज्ञान यथा भौतिकी, रसायन तथा जीवविज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिये पर्याप्त संख्या में वैज्ञानिक नहीं मिल पा रहे है। अभी से दिख रहे इस असंतुलन की स्थिति आगामी दशकों में और विकट होनेवाली है।

इसके मूल में हमारे युवाओं में यौवन के वास्तविक शक्ति के ज्ञान का अभाव है। युवा को युवा होने का अर्थ ही पता नहीं है। युवा अर्थात अनुशासनहीन, अस्तव्यस्त, उपद्रवकारी ऐसा ही विचार सबके मन में आता है। किन्तु यह केवल उपरी विचार है। वास्तव में आज के युवा को ज्ञान की बड़ी पिपासा है। केन्द्र के स्वाध्याय वर्गों में सभी कार्यकर्ताओं का अनुभव है कि अवसर मिलने पर युवा अध्ययन, विचार व चर्चा सभी के लिये तत्पर है। इससे आगे बढ़कर वह इन विचारों को क्रियान्वित भी करना चाहता है। अतः युवा आबादी को काम देने को एक भार माननें के स्थान पर अवसर मानकर विचार किया जाना चाहिये। रोजगार की ही बात लें। युवा केवल नौकरी पाने का विचार क्यों करे? क्या स्वयं के बुते पर व्यवसाय कर नौकरी देने का विचार युवा नहीं कर सकता? युवा को चुनौति तो देकर देखों क्या क्या चमत्कार कर सकता है। वीर सावरकर कहा करते थे, ‘युवा की क्षमता को समझना है तो इस पद को पलट कर देखों – वायु! युवा वायु के समान शक्तिशाली है। यदि अनुशासन तोड़ दे तो प्रभंजन बन पूरी दुनिया को तबाह कर सकता है। प्राण हरण कर सकता है। वहीं यदि नियम से अनुशासित हो तो प्राणायाम बन जीवन की रक्षा भी कर सकता है।’ आवश्यकता है इस शक्ति के अनुशासित जागरण की।

युवा बल को युवा शक्ति में रूपांतरित करने के लिये सबसे पहले युवा को अपने स्वभाव को पहचानने का प्रशिक्षण देना होगा। स्वभाव के अनुरूप कार्य का चयन करने से पूरी क्षमता व संभावना का विकास हो सकता है। भेड़चाल में आजिविका का चयन करने के स्थान पर अपने स्वभाव के अनुसार उच्च शिक्षा व तदनरूप व्यवसाय चयन करने से राष्ट्रनिर्माण के सभी क्षेत्रों मे पर्याप्त कौशल उपलब्ध हो सकेगा। अतः युवाशक्ति जागरण का प्रथम मन्त्र हुआ ‘स्वभाव से स्वावलम्बन’। इसमें सफलता प्राप्त करने के लिये दूसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है संकल्प की। मन तथा इन्द्रियों की असीम शक्ति को एक लक्ष्य पर एकाग्र करने को संकल्प कहते है। संकल्पित युवा ही अपनी पूर्ण क्षमता को प्रगट कर किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह संकल्प जीवन के हर क्षेत्र में चमत्कार कर सकता है। विज्ञान में अनुसंधान हो, स्वरोजगार के लिये व्यवसाय को संचालन हो, देश की रक्षा के लिये सेना में प्रवेश हो अथवा जनजागरण के लिये समाज सेवा का क्षेत्र हो हर स्थान पर संकल्पित युवा ही असम्भव को सम्भव कर दिखाता है।

अपने स्वभाव को पहचान, उच्च लक्ष्य के लिये संकल्पित युवाओं को संगठित करना होगा। संगठन में ही शक्ति है। स्वामीजी ने अपने पश्चिम प्रवास में इस शक्ति के चमत्कार को देखा और भारत में सामूहिक कार्य की शक्ति को पुनः जागृत करने का काम किया। बड़े बड़े संगठनों का निर्माण स्वामीजी के विचारों की प्रेरणा से हुआ। इसके साथ ही हर स्तर पर छोटे बड़े संगठित प्रयासों की आवश्यकता है। संकल्पित युवा एकत्रित आकर एक दूसरे की क्षमताओं के परिपूरक बन प्रचण्ड शक्ति का जागरण कर सकते है। देश सेवा के हर क्षेत्र में सहकार पर आधारित संगठित प्रयास की नितान्त आवश्यकता हैै। इस संगठित शक्ति का उदात्त ध्येय के लिये समर्पित होना अनिवार्य है। अन्यथा अपने स्वार्थ में संलिप्त हो कर यही शक्ति प्रभंजन के समान विनाश कर सकती है। भारत का राष्ट्रीय जीवनध्येय विश्व मानवता का मार्गदर्शन करना है। जगत् गुरू के अपने नियत सिंहासन पर आरूढ़ होने की ओर भारत की यात्रा स्वामीजी के शिकागो दिग्विजय से प्रारम्भ हो चुकी है। वैश्विक परिदृष्य प्रचण्ड गति से इसके शीघ्र ही साकार होने की ओर अग्रेसर है। ऐसे में भारत की संगठित युवा शक्ति को स्वयं को राष्ट्रकार्य के लिये समर्पित करने की आवश्यकता है। सीधे राष्ट्रसेवा में समर्पित होने के अवसर विवेकानन्द केन्द्र जैसे संगठन देते ही है। साथ ही राष्ट्रजीवन के हर क्षेत्र में स्वभाव के अनुरूप, संगठित कार्य करते हुए अपने लक्ष्य व समस्त उपलब्धियों को राष्ट्र के जीवनध्येय के साथ समाहित करना भी समर्पण का एक माध्यम है।

स्वभाव से स्वावलम्बन, संकल्प, संगठन तथा समर्पण के सकारात्मक मन्त्र से अभिमंत्रित युवा शक्ति ही राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी साधन बन सकती है।

जून 8, 2012 Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , | 1 टिप्पणी

   

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