उत्तरापथ

तक्षशिला से मगध तक यात्रा एक संकल्प की . . .

भारत का महान पर्व गुरु पूर्णिमा


आषाढ की पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है । इसे वेदव्यास की जयन्ती के रूप में जाना जाता है । वैसे तो व्यास अपने आप में एक दायित्व है । शास्त्रों का अध्ययन कर सामान्य जनता तक इसे सुबोध रूप में प्रचारित करने का कार्य करनेवाले व्यक्ति को ‘व्यास’ कहा जाता था । आज भी कथावाचकों को व्यास के रूप में ही जाना जाता है । शास्त्रचर्चा के मंच को भी इसी रूप में व्यासपीठ कहते हैं । हर वक्ता से व्यासपीठ की गरिमा की रक्षा की अपेक्षा की जाती है । महर्षि वेदव्यास का महत्व इस कारण है कि उन्होंने बिखरे हुए श्रृतिज्ञान को एकत्र सम्पादित कर ४ वेदों की रचना की । ऐसा भी माना जाता है कि वे एक व्यक्ति नहीं वरन् साक्षात् ज्ञान स्वरूप थे । अनेक गुरुकुलों के आचार्यों ने वेदों को संकलित व संपादित करने का कार्य अनेक सदियों तक लगातार किया, इसे भी वेदव्यास के नाम से जाना जाता है । वेद समस्त मानवीय ज्ञान की अक्षय नीधि है अत: इनका लगातार परिष्कार व सम्पादन एक स्वस्थ वैज्ञानिक परम्परा है । हर मन्वन्तर में यह कार्य होता रहा है ऐसी भारतीय मान्यता है । हम काल की चक्रीय गणना को ठीक से समझते हैं इसलिये हमारे लिये यह पुनरावृत्ति सहज है । इसी के कारण हमारी संस्कृति व धर्म दोनों जड नहीं अपितु गतिमान हैं । सतत परिष्कार से इनको युगानुकूल बनाने का कार्य आचार्यों ने निरन्तर किया है । इसलिये हम इसे ‘नित्य नूतन चिर पुरातन’ संस्कृति कहते हैं । इस निरन्तरता का उत्सव ही ‘व्यास पूर्णिमा’ है ।

गत १००० वर्ष के संघर्ष काल में यह परिष्कार व वैज्ञानिक स्पष्टिकरण थम सा गया है । स्वतन्त्रता से पूर्व परकीय सत्ता के साथ संघर्ष में तो यह स्वाभाविक ही था । जब अस्तित्व के लिये ही लड रहे थे तब नवीनीकरण के लिये समय व अवसर ही कहाँ था ? किन्तु स्वतन्त्रता के बाद जिस उत्साह व गति से यह कार्य होना चाहिये था उतना नहीं हुआ । शासन की छद्म सेक्युलर नीति को दोष देना ही होगा । पर वास्तव में यह कार्य शासन का तो नहीं था, धर्माचार्यों का था । किन्तु ज्ञान को युगानुकूल वैज्ञानिकता से समझ धर्म को प्रासंगिकता से लागू करने का व्यास कार्य उतनी गंभीरता से नहीं हुआ । वर्तमान व्यासों ने शास्त्रों को जीवित रखने का महत् कर्तव्य तो किया है किन्तु ज्ञान के परिमार्जन व युगानुकूल नवीनीकरण का तथा युगधर्म के विवेचन हेतु स्मृतिगठन का कार्य अभी भी किसी आधुनिक वेदव्यास की प्रतीक्षा में है ।

ज्यामिति गणित में भी व्यास होता है । वृत्त की चौडाई को व्यास ही नापता है । इसी के आधार पर वृत्त की परिधि भी नापी जा सकती है । इसी प्रकार जो ज्ञान की व्याप्ति को सम्पूर्णता से नापने की क्षमता रखता है उसे व्यास कहा जाता है । ऐसे परमज्ञानी को ही अधिकार है कि वह सामान्य जनों को ज्ञान के गूढ तत्वों को समझाने के लिये रूपकों तथा कथानकों को गूंथ कर पुराणों की रचना करें । १८ मुख्य पुराणों की रचना महर्षि वेदव्यास ने ही की है । जीवन के तत्वों को सरल कथाओं के माध्यम से समझाकर जीवन में उतारने का यह अत्यन्त वैज्ञानिक मार्ग है । आज सारी दुनिया के शिक्षाविद् इस बात पर सहमत हो रहे हैं कि बाल्यकाल में कथा ही शिक्षा की सबसे प्रभावी विधि है । पुराण आध्यात्मिक स्तर पर बालकों के लिये परम सत्य को समझने की सरल व प्रभावी विधि है । व्यास पूर्णिमा के अवसर पर महर्षि का स्मरण करते समय शास्त्रों के स्वाध्याय का संकल्प लेना चाहिये ।

इसी दिन को अनादिकाल से ही गुरु पूर्णिमा के नाम से भी मनाया जाता है । गुरुकुलों में विद्यारम्भ व स्नातक के रूप में विद्यासमाप्ति के बाद विदाई दोनों इसी दिन हुआ करते थे । इसी दिन ज्ञान पिपासु छात्र अपनी जिज्ञासा व उसके लिये त्याग करने की तत्परता के प्रतीक के रूप में हाथों में समिधा लिये गुरु के आश्रम में आते थे । यह समिधा यज्ञ में डालने के लिये अवश्य होती थी, किन्तु इसको अपने हाथ में धारण करने का अर्थ था – स्वयं को यज्ञ में आहुत करने की तत्परता । ज्ञान तो अग्नि के समान ही सब अशुद्धियों को जलाकर अपने अन्दर के खालीस, विमल यथार्थ को प्रगट करता है । जिसके अन्दर इस प्रकार अग्नि में प्रवेश करने की, सभी स्तरों पर तप करने की तत्परता हो वही गुरु की छत्रछाया में रहने का अधिकारी होता था । इसी को ‘छात्र’ कहा जाता था । गुरु इस समित्पाणि, हाथ में समिधा लिये छात्र को स्वीकार कर उसका उपनयन करते थे । उसे ज्ञान के लिये दृष्टि प्रदान करते थे । मूल जिज्ञासा मैं कौन हूँ ? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है ?… के प्रति जागृति से ही छात्र जीवन का प्रारम्भ होता था । आज सर्वोच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी व्यक्ति इस मौलिक जिज्ञासा से अनभिज्ञ ही रह जाता है । उपनयन में दूसरा नयन अर्थात जीवन के प्रति जिज्ञासा की दृष्टि उत्पन्न होने के बाद उस छात्र को द्विज कहते थे, अर्थात जिसका दूसरा जन्म हुआ है ।

छात्र जीवन में उसे अपने इन्द्रियों का निग्रह करने का प्रशिक्षण दिया जाता था । समस्त ऊर्जा को ज्ञान प्राप्ति के लक्ष्य पर केन्द्रित करने ब्रह्मचर्य के पालन का वैज्ञानिक प्रशिक्षण शिक्षा का प्रथम चरण हुआ करता था । इस भाँति अपनी पूर्ण ऊर्जा को एकाग्र करने में प्रवीण छात्र जीवन के सभी अंगों का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त करते थे । सभी को जीवन की समस्त विधाओं का ज्ञान प्रदान किया जाता था । इसलिये इस काल में छात्र उबटन आदि प्रसाधनों का प्रयोग नहीं करते थे । सुगंधित द्रव्यों से स्नान भी वर्जित था । जब अपने अन्दर की विशिष्टता को पूर्णता से प्रगट करने का सैद्धांतिक व व्यावहारिक ज्ञान छात्र पा लेता था तब गुरु उसे समाज में योगदान करने में सक्षम मान गृहस्थदीक्षा प्रदान करते थे । दीक्षांत से पूर्व परीक्षा होती थी । गुरु अपने शिष्यों को आश्रम के सबसे ऊंचे स्थान पर ले जाते थे और चारों ओर दृष्टि डालकर पूछते थे जो भी दिख रहा है क्या उसके बारे में समस्त ज्ञान तुमने प्राप्त कर लिया है ? इस एक प्रश्न का ही प्रश्नपत्र होता था । गुरु जानते ही थे कि छात्र तैयार हो गया है । किन्तु फिर भी इस समय भी कोई शंका हो तो शिष्य पूछ सकता था और या तो गुरु उसे स्मरण करा देता अथवा आवश्यकता पडने पर एक और वर्ष छात्र जीवन में बिताने का आदेश देता था । समाज में अपनी भूमिका निभाने में पूर्ण सक्षम छात्र ही स्नातक होता था । गुरु पूर्णिमा के दिन ही दीक्षान्त हुआ करता था । अब छात्र को जीवन जीने की समझ मिल गई है और इस कारण अब वह प्रसाधनों का प्रयोग कर सकता है । उबटन आदि सुगंधित तेलों का प्रयोग कर स्नान कर सकता है । अब उसे इन्द्रियों के प्रयोग का सामर्थ्य प्राप्त हो गया है । इसलिये इस दिन वह पूर्ण स्नान कर गुरु का आशीर्वाद लेकर समाज में अपना योगदान देने की यात्रा पर चल पडता है । यह है स्नातक होने का अर्थ ।

गुरुपूर्णिमा के दिन शिक्षा की इस अद्भुत विधि का स्मरण कर वर्तमान युग में उसको अपनाने का संकल्प लेना होगा । आज के युगानुकूल उसके नवीनीकरण पर विचार करने का अवसर है यह उत्सव । गुरुत्व इस भूमि में परम्परा के रूप में संजोया गया है । अत: यहाँ सम्प्रदायों में गुरु परम्परा का विकास हुआ । गुरु की गद्दी सदियों से सुयोग्य प्रतिनिधि को सौंप कर इस परम्परा की रक्षा की गई । हज़ारों वर्ष की अखण्ड गुरुपरम्परा वाले अनेक मठ आज भी देश में विद्यमान है । अत्यन्त सूक्ष्मता से अधिकारी का चयन किया जाता था । बडी कठोरता के साथ प्रशिक्षण दिया जाता था । इसके उपरान्त भी गुरु स्थान पर विराजमान व्यक्ति को भान होता था कि यह उसका व्यक्तिगत आदर नहीं अपितु परम्परा का सम्मान है । आज भी जब शिष्य गुरु के चरणस्पर्श कर आशीर्वाद लेता है तो गुरु अपने स्मरण हेतु निम्न श्लोक का पाठ करते हैं –

ईश्वरोगुरुरात्मेति मूर्तिभेदविभागिणे ।

व्योमवत् व्याप्त देहाय दक्षिणामूर्तये नम: ।।

आदि शंकराचार्य ने इस परम्परा का प्रारम्भ किया । गुरु को स्मरण रहे कि देहबुद्धि से जिस अहंकार को ‘मैं’ माना जाता है वह गुरु नहीं है । वास्तव में गुरु व ईश्वर एक ही हैं । अत: वह व्योमव्यापी आदिगुरु दक्षिणामूर्ति को स्मरण कर उसके प्रतिनिधि के रूप में प्रणाम को स्वीकार करता है और उसी गुरु तत्व की ओर से आशीर्वाद प्रदान करता है ।

वर्तमान युग में विखण्डित परम्परा व सर्वत्र व्याप्त अशुद्धि के चलते अहंकार का पूर्ण विगलन कठिनतम होता जा रहा है । इसी को ध्यान में रखते हुये वेदान्त की परम्परा में से निर्वैयक्तिक गुरु का पुनरूज्जीवन आवश्यक हो गया था । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के समय इसके संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिरामपंत हेडगेवार ने ज्ञान, त्याग व यज्ञ की संस्कृति की विजय पताका परमपूज्य भगवे ध्वज को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया । विश्व के सबसे बडे अनुशासित स्वयंसेवी संगठन के रूप में संघ के विकास का एक प्रमुख कारक यह निर्वैयक्तिक गुरु ही है । प्रतिदिन शाखा में इसी गुरु की छत्रछाया में एकत्रित हो भारतमाता को परमवैभव पर ले जाने की साधना करोडों स्वयंसेवक विश्वभर में करते हैं । विवेकानन्द केन्द्र की स्थापना के समय माननीय एकनाथ जी रानडे ने ईश्वर के वाचक प्रणवमन्त्र ओंकार को गुरु के रूप में प्रतिष्ठित किया । आज भी ५ वर्ष के प्रशिक्षण के पश्चात जीवनव्रती कार्यकर्ता प्रणवमन्त्र से ही दीक्षा प्राप्त करते हैं ।

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिये अत्यन्त महत्वपूर्ण पर्व है । यदि इस अवसर पर हमने इसके सभी पहलुओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया तथा ज्ञानसाधना के संकल्प को पुनर्नवा किया तो भारतमाता को विश्व में अपने गुरुपद पर आसीन करने का कार्य सम्पन्न हो सकेगा । आइये, इस ज्ञानभूमि को पुनर्जाग्रत करने का संकल्प लें ।

जून 29, 2012 - Posted by | सामायिक टिपण्णी | , , , , , , , , , , , , , ,

2 टिप्पणियाँ »

  1. Bahut Sunder. Guru Purnima ki Badhai ho

    टिप्पणी द्वारा Deepesh | जून 30, 2012 | प्रतिक्रिया

  2. मुकुल भैया, लेख बहुत ही बेहतरीन है . गुरु, स्नातक, छात्र की व्याख्या पढकर बहुत अच्छा लगा. गौरव

    टिप्पणी द्वारा Dr. Gaurav Bissa | जुलाई 20, 2012 | प्रतिक्रिया


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